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जम्मू-कश्मीर : भाजपा की जीत नहीं तो हार भी नहीं
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जम्मू-कश्मीर : भाजपा की जीत नहीं तो हार भी नहीं

भाजपा इसी तरह की कोशिशें घाटी के उन चुनाव क्षेत्रों में भी कर रही है, जहां मुहाजिर कश्मीरी पंडितों का अच्छा-खासा वोट बैंक है और मुसलमान वोट या तो बहिष्कार के चलते प्रभावहीन हो जाता है या फिर अधिक उम्मीदवारों के कारण विभाजित. एक आम राय यह है कि भाजपा ने घाटी की कई सीटों पर स्वतंत्र उम्मीदवार खड़े कराए हैं, ताकि मुस्लिम वोट विभाजित हों और उसे (भाजपा)  मुहाजिर कश्मीरी पंडितों के वोटों की मदद से जीत हासिल हो जाए. भाजपा ने घाटी में अपनी भरपूर मौजूदगी का एहसास दिलाने के लिए युवकों और महिलाओं पर भी भरोसा जताया है. 

bbbलोकतंत्र, मानवता और कश्मीरियत के बारे में वाजपेयी जी का नज़रिया आगे बढ़ाया जाएगा. चलो चलें मोदी के साथ, बदलें कश्मीर के हालात. यह वह संदेश है, जो इन दिनों कश्मीर में दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल के लाखों मोबाइल उपभोक्ताओं को दिन में कई बार मिल रहा है. कश्मीर में लोग सुबह नींद से जागते ही जब अख़बार अपने हाथों में लेते हैं, तो उन्हें उसके पहले पन्ने पर नरेंद्र मोदी की बड़ी तस्वीर के साथ भाजपा का वह विज्ञापन पढ़ने को मिलता है, जिसमें जनता से बेहद विनम्र शब्दों में उसके (भाजपा) पक्ष में वोट डालने की अपील होती है. जम्मू-कश्मीर के हिंदू बाहुल्य क्षेत्रों और लद्दाख की बौद्ध आबादी में तो मोदी के नाम का डंका पहले से ही बज रहा है, लेकिन अब मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर, जहां अतीत में भाजपा का कोई नाम लेने वाला नहीं था, में भी यह राष्ट्रीय पार्टी अपनी जड़ें मज़बूत करने की कोशिश करती नज़र आ रही है. जोड़-तोड़ की राजनीति करने और मतदाताओं को रिझाने के लिए भाजपा की कई टीमों ने इस समय घाटी व राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में अपना डेरा डाल रखा है. भाजपा की ओर से शुरू हुई सक्रियता से ऐसा लगता है कि घाटी में वह अपनी जड़ें मज़बूत करने में सफल हो चुकी है.
दूसरी ओर चुनावी राजनीति में आम लोगों की बढ़ती हुई दिलचस्पी भी आश्‍चर्यजनक है. राज्य विधानसभा चुनाव के लिए 25 नवंबर को पहले चरण और दो दिसंबर को दूसरे चरण के मतदान के दौरान मतदाताओं ने जिस उत्साह का प्रदर्शन किया, उसने राजनीतिक विश्‍लेषकों को दंग कर दिया है. लोगों ने सामूहिक रूप से बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग किया. यह नि:संदेह एक स्पष्ट परिवर्तन है, जो जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक हालात को लेकर दूरदर्शी परिणाम ला सकता है. हालांकि, अलगाववादी दलों ने जनता से चुनाव का बहिष्कार करने की अपील की थी, लेकिन उनकी अपील को किसी ने तवज्जो नहीं दी. भाजपा को इस वर्ष संसदीय चुनाव में राज्य के कुल 87 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों में से 30 में वोटों की बढ़त मिली थी. वह अब घाटी की उन्हीं सीटों पर नज़र जमाए हुए है, जहां मुहाजिर कश्मीरी पंडितों का एक बड़ा वोट बैंक है. ऐसे क्षेत्रों में अमीर कदल, जब्बा कदल, सोनावार, खानयार, तराल और सुपोर आदि उल्लेखनीय हैं. भाजपा घाटी की उक्त सीटें हासिल करने की फिराक़ में है.
तराल क्षेत्र दक्षिणी कश्मीर में स्थित है. यहां मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 85 हज़ार है, जिनमें मुसलमान 70 हज़ार, सिख छह हज़ार और मुहाजिर कश्मीरी पंडित 8 हज़ार हैं. इस क्षेत्र में प्रत्येक चुनाव में अलगाववादियों के कहने पर पूर्ण बहिष्कार किया जाता है. इस वर्ष संसदीय चुनाव के अवसर पर यहां एक प्रतिशत से भी कम मतदाताओं ने अपने वोट डाले थे, लेकिन अबकी बार भाजपा यहां के मुहाजिर कश्मीरी पंडितों और सिख मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित कर रही है. भाजपा के एक स्थानीय नेता ने बताया कि पार्टी तराल क्षेत्र को कश्मीरी पंडित और सिख मतदाताओं के दम पर जीतने की पूरी उम्मीद रखती है. क्योंकि, यह तय है कि यहां के मुस्लिम मतदाता मतदान का बहिष्कार करेंगे. उन्होंने बताया कि तराल में चुनावी रैली को संबोधित करने के लिए पंजाब से प्रकाश सिंह बादल को विशेष रूप से बुलाया जा रहा है, ताकि यहां की सिख आबादी को चुनाव का बहिष्कार न करने और भाजपा को वोट देने के लिए मनाया जा सके.
भाजपा इसी तरह की कोशिशें घाटी के उन चुनाव क्षेत्रों में भी कर रही है, जहां मुहाजिर कश्मीरी पंडितों का अच्छा-खासा वोट बैंक है और मुसलमान वोट या तो बहिष्कार के चलते प्रभावहीन हो जाता है या फिर अधिक उम्मीदवारों के कारण विभाजित. एक आम राय यह है कि भाजपा ने घाटी की कई सीटों पर स्वतंत्र उम्मीदवार खड़े कराए हैं, ताकि मुस्लिम वोट विभाजित हों और उसे (भाजपा) मुहाजिर कश्मीरी पंडितों के वोटों की मदद से जीत हासिल हो जाए. भाजपा ने घाटी में अपनी भरपूर मौजूदगी का एहसास दिलाने के लिए युवकों और महिलाओं पर भी भरोसा जताया है. डॉ. जनाबट, नीलम गाश एवं डॉ. दरख्शां अंदराबी को क्रमश: अमीर कदल, सोनावार और जड्डीबल जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर उतारा गया है. चौथी दुनिया ने उक्त तीनों उच्च शिक्षित महिलाओं से यह जानने की कोशिश की कि आख़िर उन्हें भाजपा में ऐसी क्या बात नज़र आई कि वे उसमें न केवल शामिल हुईं, बल्कि पार्टी का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार हो गईं.
अमीर कदल से चुनाव लड़ रहीं हिना भट ने कहा कि उन्हें नरेंद्र मोदी के विज़न और उनकी प्रशासनिक क्षमता ने प्रभावित किया. हिना को विश्‍वास है कि कश्मीर को मौजूदा परिस्थितियों से बाहर निकालने की क्षमता केवल मोदी में है. हिना को भरोसा है कि उन्हें चुनाव में जीत हासिल होगी. कुछ दिनों पहले हिना ने अपने एक बयान में इस बात का खंडन किया था कि भाजपा राज्य को विशेष अधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने की इच्छुक है. उन्होंने कहा कि अगर भाजपा ने ऐसा किया, तो सबसे पहले वह बंदूक उठाएंगी. हिना कहती हैं कि भाजपा कभी भी 370 को हटाने की पक्षधर नहीं रही. वह तो केवल विकास पर ज़ोर दे रही है, इसलिए उन्होंने इस पार्टी को चुना. अमीर कदल राजनीतिक महत्व के लिहाज़ से एक बेहद हाई प्रोफाइल सीट मानी जाती है. हिना का मुक़ाबला 30 से अधिक उम्मीदवारों के साथ है, जिनमें नेशनल कांफ्रेंस के वर्तमान विधायक नासिर असलम वानी और पीडीपी के अल्ताफ़ अहमद बुख़ारी भी शामिल हैं. यह वही चुनाव क्षेत्र है, जहां 1987 में मोहम्मद यूसुफ़ नामक शख्स ने मुस्लिम मुत्तेहादा महाज़ के टिकट पर चुनाव लड़ा था और आम राय के अनुसार चुनाव जीत भी लिया था, लेकिन उस समय नेशनल कांफ्रेंस की धांधलियों की वजह से उसे नाकाम क़रार दिया गया था. मोहम्मद यूसुफ़ अब सैयद सलाहउद्दीन के नाम से जाने जाते हैं और सशस्त्र संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के प्रमुख एवं कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के गठबंधन यानी जिहाद काउंसिल के चेयरमैन हैं.
डॉ. दरख्शां अंदराबी कहती हैं, सवाल ही पैदा नहीं होता कि भाजपा 370 के साथ कोई छेड़छाड़ करेगी. मोदी धर्मनिरपेक्ष मानसिकता वाले शख्स हैं.वह केवल हिंदुओं के वोट से नहीं, बल्कि देश भर के मुसलमानों के वोट से भी प्रधानमंत्री बने हैं. वह ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जिससे जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों के हितों को नुक़सान पहुंचे. दरख्शां सोनावार क्षेत्र से चुनाव लड़ रही हैं, जहां उनका मुक़ाबला अन्य उम्मीदवारों के अलावा राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह से है. उमर अब्दुल्लाह दो सीटों यानी सोनावार और बेरूआ से चुनाव लड़ रहे हैं. यह पूछने पर कि उन्हें एक हाई प्रोफाइल राजनीतिज्ञ के साथ मुक़ाबला करते हुए डर तो नहीं लग रहा है, के जवाब में दरख्शां, जो उर्दू की प्रसिद्ध शायरा भी हैं, कहती हैं कि वह केवल अल्लाह से डरती हैं. उन्हें केवल इस बात की चिंता है कि वह इस समय लोगों से निर्माण और विकास के जो वादे कर रही हैं, उन्हें निभाने में उनसे कोई कोताही न हो. वह कहती हैं कि कश्मीर के लोग बेबस हैं. अब तक उन्होंने कई प्रतिनिधि चुने, जिन्होंने धोखे के सिवाय कुछ नहीं दिया.
नीलम गाश को भी विश्‍वास है कि केवल गिने-चुने चुनाव क्षेत्रों में नहीं, बल्कि पूरे जम्मू-कश्मीर में विकास का एक नया दौर शुरू होगा. उन्होंने कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आ गई, तो विकास का एक ऐसा दौर शुरू होगा, जिससे यहां के लोगों की तक़दीर बदल जाएगी. उन्हें यही बात भाजपा में खींचकर लाई है. नीलम का दावा है कि उनके चुनाव क्षेत्र में नौजवानों की एक बड़ी संख्या भाजपा में शामिल हो चुकी है. 2002 में गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगे के कारण मोदी की बदनामी के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि विश्‍वास कीजिए, भाजपा के बारे में जो ग़लत धारणा यहां आम है, वह आने वाले दिनों में ख़त्म हो जाएगी. लोगों को पता चलेगा कि उनके असली दुश्मन वे राजनीतिज्ञ और राजनीतिक पार्टियां हैं, जो आज तक उन पर हावी रहे.
समीक्षकों का कहना है कि भाजपा इस चुनाव में भले ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में न उभरे, लेकिन राज्य में उसके सुनहरे भविष्य को खारिज नहीं किया जा सकता. राज्य के हालात पर गहरी नज़र रखने वाले समीक्षक शाह अब्बास कहते हैं कि 1996 में जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस का वजूद न के बराबर था. हालांकि, उस समय कांग्रेस में मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती जैसे चेहरे थे, लेकिन कुछ सालों के बाद यानी 2002 के चुनाव में कांग्रेस एक अहम पार्टी के रूप में सामने आई और राज्य में गठबंधन सरकार का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई. 2008 के चुनाव में भी कांग्रेस 17 सीटें जीतकर एक बार फिर नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी. शाह अब्बास का कहना है कि अगर इस चुनाव के नतीजे में भाजपा सत्ता में न भी आई, तो भी उसके बड़ी पार्टी बनकर उभरने की प्रबल संभावना है. उन्होंने कहा कि संभव है, भाजपा राज्य में इतनी सीटें पाने में सफल हो जाए कि उसे सरकार बनाने के लिए महज़ कुछ आज़ाद उम्मीदवारों या किसी छोटी-मोटी पार्टी की मदद लेनी पड़े. ऐसे में, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जैसे दल भी अपना सहयोग देने पर राज़ी हो सकते हैं, क्योंकि अगर भाजपा के पास पर्याप्त सीटें होंगी, तो नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी खुद को बेबस महसूस करने लगेंगी.
शाह कहते हैं कि पीडीपी वैसे भी पिछले छह वर्षों से विपक्ष में है. वह और छह वर्षों तक विपक्ष में नहीं बैठ सकती. इसी तरह अपने शासनकाल में सैकड़ों निर्दोष लोगों के मारे जाने और हालिया बाढ़ के बाद पुनर्वास प्रक्रिया में अपनी नाकामी की वजह से पार्टी पहले ही साख खो चुकी है. इस साल के संसदीय चुनाव में उसे जबरदस्त शिकस्त मिली. पार्टी के सबसे कद्दावर नेता फ़ारूक़ अब्दुल्लाह भी चुनाव हार गए. ऐसे में, नेशनल कांफें्रस भी अगले छह वर्षों तक विपक्ष में नहीं रह सकती, क्योंकि उसकी जड़ें और कमज़ोर हो जाएंगी. अगर भाजपा को 30 से अधिक सीटें मिलीं, तो कोई भी दूसरी पार्टी उसे सरकार बनाने के लिए अपना सहयोग देने को तैयार हो जाएगी.
बहरहाल, जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव के अंतिम परिणाम क्या होंगे, इस बारे में अभी कोई बात नहीं कही जा सकती, लेकिन यह तय है कि जम्मू-कश्मीर के पिछले छह दशकों के इतिहास में पहली बार भाजपा यहां अपने जड़ें मज़बूत करने में सफल हो चुकी है. वह एक ऐसी पार्टी के रूप में उभर चुकी है, जिसे अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

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