solar-energy-panels-720भारत में अनेक ऐसे आविष्कार हुए हैं, जो क्रांति ला सकते हैं, लेकिन सरकार की अनदेखी के कारण उन्हें पहचान नहीं मिली. ऐसे आविष्कारों को सरकार मान्यता देने से भी कतराती हैं. देश में कई आविष्कारकों ने ऊर्जा के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार किए, लेकिन देश के लोग ही उन्हें नहीं आजमाते. तमिलनाडु के रामर पिल्लई ने हर्बल ईंधन का आविष्कार किया है, जिसका इस्तेमाल वाहनों में किया जा सकता है. सीबीआई ने पिल्लई को किसी शिकायत के आधार पर धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था. 2008 में रामर पिल्लई जेल से रिहा हुए और उन्होंने अपने आविष्कार को एक नए रूप में पेश किया. बकौल पिल्लई, हर्बल ईंधन बनाने में केवल पांच रुपये प्रति लीटर का खर्च आता है. इसके लिए 15 ग्राम अमोनियम क्लोराइड, 15 ग्राम बुरादा एवं 15 ग्राम खमीर एक लीटर पानी में मिलाते हैं, फिर उसे 78 डिग्री तापमान पर गर्म किया जाता है, तो उसमें से नीले रंग की लौ निकलती है, जो ज्वलनशील ईंधन में बदल जाती है. पिल्लई का कहना है कि उन्हें सरकार से मदद और प्रमाण-पत्र की आवश्यकता है, जिससे उनके आविष्कार को मान्यता मिले और बाज़ार में कोई समस्या न हो.
जट्रोफा एक ऐसा पौधा है, जिसके फल से बायो-डीजल का निर्माण होता है. बायो-डीजल बनाने के लिए कई पौधों की पहचान की गई है. जट्रोफा की खेती 2003 में शुरू की गई थी, लेकिन अभी भी बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है. जतरोफा की खेती को बढ़ावा देकर देश में वाहन ईंधन की कमी पूरी की जा सकती है. इसी प्रकार सूर्य की रोशनी का भी इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा सकता है. सूर्य की रोशनी से जो ऊर्जा पैदा होती है, उससे बहुत सारे कार्य किए जा सकते हैं और किए जा रहे हैं. इसे देश में बढ़ावा देने की ज़रूरत है, जिससे बिजली और वाहन ईंधन की बचत की जा सके. बिजली से चलने वाली अधिकतर वस्तुओं में सौर ऊर्जा इस्तेमाल की जा सकती है. यह जानकारी आम जन तक पहुंचाने की ज़रूरत है कि वे कैसे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. जहां पर अभी तक बिजली नहीं पहुंच सकी है, वहां कृषि कार्य में सौर ऊर्जा की मदद ली जा सकती है. सौर ऊर्जा की मदद से प्रकाश एवं पेयजल जैसी ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं.
पानी से ऊर्जा पैदा करने के भी कई नए आविष्कार हुए हैं, जिनमें पानी से वाहन चलाने का आविष्कार भी शामिल है. पानी से हाईड्रोजन पैदा किया जाता है, जिसका इस्तेमाल बाइक समेत विभिन्न वस्तुओं में किया जा सकता है. इसे देखते हुए टाटा मोटर्स ने हाईड्रोजन से चलने वाली एक बेहद सस्ती कार बनाने का फैसला किया है. इन तकनीकों के जरिये कई कार्य किए जा सकते हैं. लोगों को जानकारी देने की ज़रूरत है कि इनका इस्तेमाल किस प्रकार किया जा सकता है. गोबर गैस का इस्तेमाल भी पूरे देश में किया जा सकता है. पहले गांवों में गोबर गैस का इस्तेमाल होता भी था. आज गांवों में भी लोग पेट्रोलियम गैस का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन वे इस देशी आविष्कार को भूल गए हैं. गोबर गैस बनाने में अधिक खर्च नहीं आता हैै. गोबर गैस बनने के बाद जो कचरा निकलता है, उसे खेतों में खाद की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, वह उपज बढ़ाता है.
मध्य प्रदेश के इंदौर में 10वीं कक्षा की छात्रा ने अपने कॉलेज के एक कार्यक्रम के दौरान एक ऐसा स्वयं निर्मित फ्रिज पेश किया, जो बिना बिजली के चल सकता है. इस फ्रिज में पानी तीन तरफ़ से होते हुए नीचे आता है. आसपास की सतहों पर और निचले भाग में कोयला एवं खस होने के कारण इसमें शीतलता रहती है. कूड़े से भी ऊर्जा पैदा की जा रही है. देश के बड़े शहरों में प्रतिदिन हज़ारों टन कूड़ा निकलता है, उसका इस्तेमाल करके बिजली की कमी पूरी की जा सकती है. दिल्ली में इसकी शुरुआत भी हो गई है. देश के कई राज्यों में शौचालयों में इकट्ठा हुए मल-मूत्र द्वारा भी बिजली का उत्पादन हो रहा है. शौचालयों में इकट्ठा हुए मल-मूत्र से पहले बायोगैस बनाई जाती है, फिर उससे बिजली उत्पन्न की जाती है.
गांवों में बिजली की सबसे ज़्यादा कमी है और वहां शौचालय भी नहीं हैं. यदि सरकार गांवों में अभियान चलाकर इसके बारे में बताए, तो बिजली संकट से जूझ रहे लोग पहले शौचालय बनाएंगे और फिर उसमें इकट्ठा मल-मूत्र से बिजली का उत्पादन कर सकते हैं. मौजूदा बिजली संकट को देखते हुए इन आविष्कारों को आजमाने की ज़रूरत है. हमारे देश में वाहन ईंधन से लेकर बिजली बनाने तक के साधन उपलब्ध हैं, लेकिन सरकार उनकी अनदेखी करती है. सरकार पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस एवं बिजली आदि मदों पर अरबों रुपये खर्च करती है. यदि वह चाहे, तो इन्हीं पैसों और उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल करके देश को विभिन्न समस्याओं से निजात दिला सकती है.

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