राजनारायण बोहरे

जन्म
20 सितम्बर 1959 अशोकनगर मप्र
शिक्षा
विधि और पत्रकारिता में स्नातक एवं हिन्दी साहित्य के स्नातकोत्तर

कहानी संग्रह
1 इज्ज़त-आबरू
2 गोस्टा तथा अन्य कहानियाँ
3 हादसा
4 मेरी प्रिय कहानियाँ

उपन्यास

1 मुखबिर
2 अस्थान
3 आड़ा वक्त
4 दतिया@46

बाल उपन्यास

1 बाली का बेटा
2 रानी का प्रेत
3 गढ़ी के प्रेत
4 जादूगर जंकाल औऱ सोनपरी
5 अंतरिक्ष में डायनासोर

बाल कहानी संग्रह
1 आर्यावर्त्त की रोचक कथाएँ

चम्पामहाराज, चेलम्मा और प्रेम कथा

चम्पा महाराज की नजरों में लूले कक्का पहले से ही महाऐबी हैं । उन्हें देख के पंडित चंपाप्रसाद को गिद्ध याद आया। गिद्ध से जुड़ी रामायण की एक अर्धाली वे गुनगुना उठते है – ‘‘गीध अधम खल आमिष भोगी’’
लूले कक्का ने देखा कि दालान में चंपाप्रसाद के तीनों पार्षद मौजूद हैं- परमा खवास, खेता भोई और रतना परजापत। यानी कि चंपाप्रसाद की पूरी परिषद बैठी है।
लूले कक्का ने पंडित जी से जुहार की, और तख्त के बगल में बिछे डोरिया पर अपनी वैशाखी रखके बैठ गये। महुआखेड़ी के पुजारी वाला प्रसंग चल रहा था। चंपाप्रसाद जोर जोर से बोलते हुए उत्तेजित हो देवचन्द को गरिया रहे थे। मानो पुजारी देवचन्द परिषद के इजलास में मुजरिम बने खुद मौजूद हों और अदालत की लांछना सुन रहे हों। सब जानते हैं कि पिछले दिनों देवचन्द अपने गांव की एक औरत को लेकर कहीं भाग गये, आसपास के तमाम गांव वालों के पास ले देकर इन दिनों यही रोमांचक प्रसंग तो ताल ठोकता रहता है ।
पुजारी देवचन्द के बहाने रामायण में बताये गयें कर्मकाण्डी ब्राह्यणों के आचरण और नियम बखानते चंपाप्रसाद उन्हें देखकर एक पल को रुके जुहार की, और आगे शुरु हो गये ‘‘ तो मैं कह रहा था कि – सोचिय बिप्र जो वेद बिहीना…. यानी कि वह ब्राह्यण सोचने योग्य है जोकि वेद के रास्ते पर नहीं चलता। अब वेद के बताये रास्ते तो थोड़े से ही है भैया, कि मारग चलते छुआ-छूत का ध्यान धरो, खान-पान में शुद्धता का ख्याल रखो। हो सके तो पात्र-कुपात्र से बातचीत का भी विचार रहे। जित्ती बार घर से बाहर निकलो हर बार घर लौट के स्नान करो । हर ब्राम्हण को रसोई-घर में जाने वाली हर चीज अमनिया कर लेना चाहिये, माने जल से पवित्र कर लो । रोटी का आटा घर की चक्की का पिसा हुआ होना चाहिए । जबकि पीने का पानी घर के कुंआ या पाताली नल से लेने का विधान है।’’
‘‘आपके यहां तभी तो चूल्हे की लकड़ी भी धो के जलाई जाती है न महाराज’’ परमा खवास अपनी जानकारी प्रकट करता हुआ पुलकित था।
चंपाप्रसाद को यह सुनकर बहुत अच्छा लगा। पर लूले कक्का सदा की तरह बीच में ताल ठोकने लगे – ‘‘ बहुत बढ़िया कहा तुमने। बस पाताली नल की भली चलाई, उसका बासर तो चमड़े का बना है चम्पा भैया, आजकल तो हरेक के रसोईघर में गैस के चूल्हे चल पड़े है न, उनमें गैस की टंकी जुड़ी रहती है। अब गैस की शुद्धि अशुद्धि को कौन जांच सकता है !’’
खेता भोई को लूले कक्का की बात में दरार निकालने का उम्दा मौका हाथ लगा । वह तो उन पर चढ़ ही बैठा – ‘‘वाह रे लूले कक्का, वैसे तो दुनिया भर की जानकारी अपने खीसा में डार के घूमते फिरते हो, और तुम्हें इतनी सी पता नहीं है कि गैस की टंकी में पेट्रोल से बनी गैस रहती है और सब जानते हैं कि पेट्रोल तो धरती मैया की कोख से पैदा होने वाली कुदरती चीज है, दुनिया में इससे ज्यादा शुद्ध चीज और क्या होगी ? इसमें शुद्धि अशुद्धि क्या देखना।’’
लूले कक्का ने पैंतरा बदला ‘‘खेता भैया, तुम्हें शायद पता नही है कि गोबर से भी गैस बनती है, और दारी इस जीभ को आग लगे भैया कि ये बात भी सोलहा आना सच्ची है कि अब तो आदमी के गू से भी गैस बनने लगी हैं।’’
‘‘कक्का तुम भी….’’ रतना ने घिनाते हुये मुंह बनाया।
‘‘सच्ची कह रहे, हमने तो अपनी आँखन से देखा कि अगल-बगल के कित्तेई गाँवन में बड़े-बड़े धर्मात्मा और कर्मकाण्डी लोगों के घर में वायो-गैस की मशीन लग गई है। हां ये बात अलग है कि आपत्ति काल में ऐसी बातों की चिन्ता करने की फुरसत कहाँ धरी है। विश्वास न हो तो चंपा महाराज से पूछ लो। शास्त्रो में लिखा है आपात काले मर्यादा नास्ती। मायने यह आपत्ति के दिन में मर्यादा की चिन्ता मती करो।’’
वे एक पल को रुके चिर गहरी नजरों से चंपाप्रसाद को भीतर तक बेधते हुए बोले-‘‘आज भिनुसारे जब हम टहलने निकले तो तुम्हारे बड़े भैया कालकाप्रसाद अस्पताल के पास वाली सड़क पर चेलम्मा नर्स की गलबहियां डाले टहलते मिले थे । हमे लगता है कि कालका भैया पिछली रात वहीं सोये थे। बल्कि…..अब आज की क्या कहें, हमने खुद देखा है कि वे रोज वहीं रुकते हैं। मेला-ठेला, हाट-बजार और जिला मुकाम पर अस्पताल वाली बैठक में कालका भैया ही लिवा के ले जाते आजकल उसे। चंपा भैया एक दिना जाके देख तो लो कि वा आग लगी नर्स कौन विरादरी की है। कल को कहीं ऐसा न हो कि कालकाप्रसाद के संग-संग पूरे गांव की नाक काट ले जाये।’’
चंपाप्रसाद बड़ी पशोपेश में पड़ जाते हैं, जब वे किसी जिजमान के यहाँ कथा भागवत बांचते-बांचते पवित्रता, वैदिक आचरण और हिन्दू समाज की वर्ण परम्परा की तारीफ कर रहे हों और अचानक कोई जिजमान उनके भैया कालकाप्रसाद के आचरण के बारे में कुछ पूछने लगे। यही इस समय हुआ। लूले कक्का ने रंग में भंग कर दिया। चंपाप्रसाद भीतर ही भीतर तिलमिला उठे, पर प्रकट में चुप रहे। लूले कक्का जैसे खोजी आदमी को सिरजाना ठीक नहीं है। दुष्टों को दूर से ही नमस्कार कर लो शास्त्र भी ऐसा ही कहते हैं- दुर्जन दूरतः परिहरेत।
लूले कक्का ने देखा कि महफिल फीकी हो चली है । वे यही चाहते थे सो उन्होंने अपनी वैशाखी सम्भाली और उठ के बोले ‘‘जय राम जी की, पंचों को। हमे तो आज दलित मुहल्ले की गोठ में भोजन करनो हैं सो चलें अपन! ’’
इधर बड़ी देर तक उनकी वैशाखी की ठक-ठक दालान के शान्त हो गये वातावरण में गूंजती रही। फिर परिषद के लोग एक-एक करके वहां से खिसकने लगे।
संवदिया की भूमिका निभा के लूले कक्का चले गये थे, पर चंपाप्रसाद तो जैसे अपने तख्त पर कीलित से होकर रह गये थे। उनके मन में दबा रोश अब उखड़ उठा था।
अब कालका भैया से खुली बात करना बहुत जरुरी है कि, घर की बदनामी हो रही है, दादा ये रंग-ढ़ंग छोड़ो। पचास साल की वानप्रस्थी उमर में भी तुम्हें ऐसे ऐल-फैल अच्छे लग रहे है। समाज में पचास दिक्कतें आने वाली हैं। मेरी बच्ची सयानी हो रही है, कल उसकी सगाई करने जायेंगे तो लड़के वाले यही उलाहना ठोक देंगे कि, लड़की के ताऊ तो ऐसा-वैसा करते फिरते हैं। शादी-ब्याह के वक्त ब्राह्मणों में वैसे ही सात पीड़ी तक की खोज खबर ली जाती है। वरणशंकर और दशा ब्राह्मणों को तो देहरी से टिटकार के भगा दिया जाता है। सोचते-सोचते चंपाप्रसाद को अपना माथा भारी सा होता महसूस हुआ। वे तख्त पर पांव पसार कर पूरी तरह लेट गये।
जाने कब बिटिया उन्हें अकेला बैठा देख गयी थी सो चाय बना लाई थी और पीतल के गिलास को कटोरी से ढक के तख्त के पायताने रख गई थी। गुमसुम चंपाप्रसाद ने सहसा चाय देखी तो उठके बैठ गये और चाय का गिलास उठाया फिर फूंक-फूंककर जोर-जोर से सरुटा भरने लगे।
बड़े भैया की खबरें सुन-सुन के कान पक गये हैं। अब पानी सिर के ऊपर निकलने ही वाला है। जल्दी ही कुछ करना पड़ेगा।
लेकिन वे ‘’कुछ’’ यानि क्या करेगे…..? यही तय नहीं कर पा रहे है वे। कदाचित, आज अम्मा जीवित होती, तो उनसे परामर्श करते। कालका भैया को कड़क डांट दिलवा देते। अब तो इस गॉव में और पुरा पड़ौस तक के गांव में भी कोई ऐसा बुजर्ग नहीं बचा है जिससे सलाह लें। जिससे कहेगे, वही जुबान पकड़ लेगा। घर-घर जाके कह देगा कि दुबे महाराज के यहाँ फूटन पड़ गई है बात बात में छुआ-छूत और जाति-पांति की दुहाई देने वाले चंपाप्रसाद के निज बड़े भाई को किसी तरह की अपवित्रता का लिहाज नहीं है। हंस जैसे बेदाग कुल खानदान का सयाना पक्षी, गंदी तलैया में किलोल कर रहा है।
वैसे यह भी सच हैं कि आज अम्मां भी जिन्दा होती तो कुछ न कर पाती। आज जो स्थिति आई है उसके लिये पूरी तरह से अम्मां ही दोषी है।
पन्द्रह साल के ही हो पाये थे कालका भैया, कि सगाई के लाने आमखेड़े के ज्वालाप्रसाद सगया बनके आ गये थे। इर्द गिर्द के गॉवों में ज्वालाप्रसाद का चौधरी खानदान खूब बजीता खानदान था। सात पीढ़ी से उनके कुल में न कोई ऐब था, न किसी तरह का दाग। सो सगया देख के अम्मां भैरा के गिर पड़ी। रिश्ते के बारे में न किसी जान पहचान वाले से कुछ पूछा, न आमखेड़े वाले रिश्तेदारों से सलाह ली। यहां तक कि पिताजी के पास बैठकर दो पल की चर्चा तक न की और खुदमुख्तार होके रिश्ता तय कर दिया।
ज्वालाप्रसाद उसी दिन नारियल-रुपया देकर चले गये तो अम्मां ने दूसरे दिन ही नाई के हाथ शगुन की धोती और पोलका (साड़ी-ब्लाउस) भेज दिये थे। सम्बन्ध पक्का हो गया। अम्मां बहुत खुश हो गुनगुना उठी थीं-सखी आज कैसी मनोहर घड़ी है
गले राम जयमाल सुंदर पड़ी है।
आठवीं पास करते-करते कालका भैया की शादी हो गई। ब्याह के वक्त उमर में बहू बहुत छोटी थी, सो उन दिनों के रिवाज के मुताविक बहू की विदा नही हुई। तब दसवां पास किया था कालका प्रसाद ने, जब कि उनका गौना हुआ। अबकी बार बहू साथ मंे आई थी। गुलाबी चमकीली चुनरी ओढ़े, लाल-सिन्दूरी साड़ी में लिपटी गोरी-भूरी बहू के मेंहदी रचे हाथ-पांव देख देख कर चलौआ के लिए गए दूसरे किशोर रोमांचित हो रहे थे, कालकाप्रसाद हाल का तो बड़ा खराब था ! वे अपनी दुल्हन को देखने, उससे बतियाने, उससे मिलने को बड़े उतावले थे।
आमखेड़ा से सुबह छिरिया-बेरा विदा कराके वे लोग चले थे और दोपहर होते-होते अपने घर आ गये थे। मर्द लोग दालान में बैठ के सुस्ता रहे थे और अम्मां मेहमानों की पहुनई के किस्से सुन रहीं थी, कि मुन्नी जिज्जी ने उबलते दूध के उफान में ठण्डे पानी की कटोरी उड़ेल दी। वे कह रहीं थी – भौजी तो निराट पागल है।
यह सुना तो स्तब्ध हो गये थे सबके सब। अम्मां उठीं और लपकती हुई भीतर र्गइंं। दो-पल बहू से बातचीत करी फिर माथा ठोकती बाहर निकलीं थीं- नासपीटे ज्वालाप्रसाद ने धोखा दे दिया। मीठी-मीठी बातें करके सिर्रन मोड़ी ब्याह दी धुंआ लगे ने। हर बाप को अपनी लड़की के अनुरुप वर देखना चाहिए, लेकिन इस काले मन वाले ने अपनी लड़की के लच्छन नहीं देखे। मेरे हीरा से लड़के को ठग लिया कपटी ने।
अम्मां लगातार बड़बड़ा रहीं थीं -मेरे यहां देखा होगा कि घर में साठ बीघा की जोत है, विरासत में गांव के डाकघर का काम हैं। हजारों में एक दिखे ऐसा लम्बा लछारा लड़का हैं। सो राख भये ज्वाला की नीयत डोल गई और मेरे घर को बर्बाद कर डाला। नाश मिट जायेगा ठठरी बंधे का।
मुन्नी जिज्जी ने समझाया अम्मां तनिक धीरे बोलो। बात घर में दबी रहे, चिल्लाओगी तो बाहर के लोग सुनेंगे। और बाहर के लोगों का क्या है, सब हंसने के मीत है
अम्मां चुप रह गईं थीं।
गप्पो खवासन बड़ी सयानी औरत थी। अम्मां ने चुपचाप उसे बुलवाया। घर की बात घर में रखने के लिये आस-औलाद की सौगंध देकर उसे बहू के पास भेजा। तीन चार दिन तक दुल्हन से बातें करती गप्पो उसकी मालिश करने के बहाने पूरे शरीर पर हाथ फेर आई थी। उसने अम्मां को बताया कि बहू की देह में लुगाइयों जैसा कुछ नहीं है। उसकी तो सूखे मैदान सी मर्दो जैसी छाती है। सख्त हाथ-पांव में बड़े-बड़े रोम और कड़क-चामड़े की जांघ वाली ये दुल्हन आदमी-बइयर के आपसी संबंधो के बारे में कुछ भी नही जानती। गप्पो तो चली गई पर अम्मां का जियरा सुलग उठा था।
उनने फिर भी हिम्मत नही हारी थी।
एक दिन पड़ौस में गारी के बुलौआ का बहाना कर वे मुन्नी और चंपा को साथ ले गई थी, ताकि घर पर अकेले बचे कालका और बहू की आपस में कोई बातचीत शुरु हो सके।
दस मिनिट बाद ही बाखर में से बहू के रोने चीखने की आवाजें आने लगी तो किसी ने जाकर अम्मां को खबर की थी। अम्मां मन ही मन अनुमान लगाती लौट आई थीं कि घर में क्या हुआ होगा।
घर आके बहू को पुचकार के उनने चुप कराया और झेंपते खड़े कालका को बाहर जाने का इशारा किया था।
अम्मां ने बहू को सुदमती करने के लिए गांव भर के गौड़-घटोइया, देई-देवता मनाने शुरु कर दिये थे। एक सयाने को बुला के झाड़ा भी दिलाया था। पर सब बेकार रहा। चंपा को याद है कि पहले की तरह भौजी बावरी सी बनी सिर खोले, पल्लू लटकाये कभी भी अपने कमरे से बाहर चली आतीं। वे कभी आंगन की मोरी पर बिना लिहाज धोती उठाकें पेशाब को बैठ जातीं। कभी घर भर में समय-बेसमय झाड़ू लगाने लगतीं, तो कभी धुले-अनधुले कपड़े उठाके पानी में भिगो देती और कुटनी से कूट कूट कर उनका मलीदा बना देतीं।
वे दिन बड़ी मुश्किल के दिन थे।
भौजी की बात गांव में फैलने लगी थी। अम्मां शर्म संकोच में डूबी हूई घर में बंद रहने लगी थीं। गांव में कुछ औरतों का कुटनी का ही जन्म होता है न, सो उनमें से कोई किसी न किसी बहाने घर में चली आतीं और सुर्र-फंू निकालने का यत्न करतीं। अम्मां कुछ न कहतीं। भौजी की बात यूं ही टाल जातीं। पर ऐसी बातें छिपाये नहीं छिपतीं, सो एक मुंह से दूसरे, फिर तीसरे होती हुई कालका की बहू के पागलपन की बातें घर-घर में पहुंच गयीं थीं।
घर के दूसरे सदस्य भी परेशान थे। मुन्नी जिज्जी आपसी चर्चा में भौजी की बात उठने के डर से अपनी सहेलियों के पास जाने का साहस नहीं कर पातीं थीं और चंपाप्रसाद पढ़ाई के बहाने गांव में नही लौटते थे, कस्बे में ही बने रहते थे। पिताजी तो सदा से इकल मिजाजी रहे, न ऊधो का लेना न माधो का देना। सो उन्हें कोई दिक्कत न थी। वे अपने डाकघर के काम में लगातार व्यस्त रहते। कालका भैया तो सबसे ज्यादा दुखी व परेशान थे।
़ सावन का महीना आया। आमखेड़ा से कालका भैया के साले अपनी बहन को लिवाने आये तो अम्मां ने उनकी खूब आव-भगत की और भौजी को बिदा करके हमेशा के लिये अपने हाथ झटकार लिए।
महीनों बीते। आमखेड़ा से एक दो कहनातें आयीं। तीसरी बार ज्वालाप्रसाद खुद आये। पर अम्मां नहीं मानी। वे सिर्रन बहू को अपने घर में रखने को तैयार नहीं हुई। भौजी मायके में ही जिन्दगी बिताने लगी।
चाय का खाली गिलास उठाने पंडिताइन खुद आई थी। पति को टोकना चाह रहीं थीं पर पंडित जी को गंभीर बना देखके कुछ बोलने का साहस नही हुआ। सो चुपचाप लौट गई। इस वक्त चंपाप्रसाद भी चाह रहे थे कि रोक के कमला (पत्नी) से कुछ मशाविरा करें। लेकिन वे पुरानी यादों में डूब उतरा रहे थे, सो मन नहीं हुआ। हालांकि कमला बैठती तो अच्छा लगता, कहीं पढ़ी हुई बात याद आयी- पेड़ हर वक्त फल दे यह जरूरी नहीं, उसकी छाया भी बड़ा सुकून देती है।
दसवीं पास करते करते चंपाप्रसाद की भी शादी कर दी थी अम्मां ने। इसके पहले उन्होने मुन्नी जिज्जी को भी शादी करके ससुराल विदा कर दिया था।
चंपाप्रसाद की बहू घर में आई, तो कालका भैया का आंगन में प्रवेश निषेध हो गया। वे दालान या पौर में ही बैठे रहते या फिर पिताजी के साथ डाकघर का काम निपटाते रहते। चंपाप्रसाद जब भी पत्नी के साथ होते एक अजीब सा अपराध बोध उन्हें घेर लेता। घर में बिना
घरवाली वाला ब्याहा थ्याहा बड़ा भाई बैठा था और छोटा जवानी का सुख भोग रहा था।
कालका भैया का ध्यान खेती में लगने लगा था और वे भुरहरा-बेला खेत-टगर में निकल जाते फिर रात गये तक ही उधर ही रहते।
ऐसे में ही एक दिन अचानक पिताजी सोते के सोते रह गये। घर पर आफत टूट पड़ी थी। अम्मां का धीरज एक बार फिर काम आया। उन्होंने तेरही होने के पहले ही कालका प्रसाद को डाकघर का काम संभलवा दिया। डाकखाने के बड़े अफसरों को दरख्वास्त भेजी गयी कि पिता की जगह पुत्र को डाकघर का काम दे दिया जाये। बाद में कालकाप्रसाद के नाम का रुक्का भी आ गया था, तो अम्मां ने चैन की सांस ली थी। चंपाप्रसाद की पढ़ाई छुड़ा के वापस बुलाया और अम्मां ने उन्हें घर द्वार संभालने की जिम्मेदारी सौप दी थी। सब कुछ ठीकठाक चलने लगा था। गांव के एक मात्र पूजा स्थल राम जानकी मन्दिर की सेवा पूजा भी पंचों ने कालकाप्रसाद को सौंप दी, तो उनकी दिनचर्या सुबह से शाम तक एकदम तंग और कसी-कसी सी हो गई थी।
कार्तिक का महीना आया तो गांव भर की औरते ‘‘कतक्यारी’’ बन गईं और कार्तिक नहान का व्रत ले बैठीं। हर दिन सुबह पांच बजे औरतों के ठट्ठ के ठट्ठ कुआँ-तालाब की तरफ चल पड़ते। नहाने के बाद भीगे कपड़ों में ही स्त्रियां मूर्ति के आसपास गोल बनाके बैठ जाती फिर देर तक भगवान को पूजती रहतीं। वे आपस में खूब चुहल बाजियाँ भी करतीं। इतनी स्त्रियों की सुरक्षा के लिए एकाध मर्द बहुत जरुरी था, सो सब महिलाओं ने परस्पर घोका-विचारी करके पुजारी कालकाप्रसाद से थराई-विनती करी और उन्हें नहाने के बखत साथ चलने को राजी कर लिया।
चंपाप्रसाद अनुमान लगा सकते हैं कि बाहर से वैराग्य का प्रदर्शन करते कालका भैया का मन भीतर से तब भी अनुरागी रहा होगा। उन क्षणों में उनका मन कैसे स्थिर रह पाता होगा, जब एक वस्त्र बदन पर लपेटे, अगल-बगल से अपने गुदाज ठोस बदन की झलक दिखाती, कनखियों से कालका की नजरों को पढ़कर आंखें में सुखानुभूति भरे अर्धनग्न महिलायें पूजा का बहाना करती हुई गीले कपड़ांे में देर तक उनके सामने चुहल करती होंगीं, या जब कोई कतक्यारी अपनी सखी के कान में फुसफुसाती होगी कि ‘रात को कुत्ता छू गया सो मेरा तो धरम भिरस्ट हो गया मै पूजा कैसे करूं गुइयां‘ या ‘कल मेरे ऊपर कल छिपकली गिर पड़ी जो हर बार चौथ-पांचे को गिरती थी, सो आज मैं पूजा नहीं कर पाऊंगी।‘ ‘‘कुत्ता’’ और ‘‘छिपकली’’ के प्रतीकार्थ कालका भैया खूब समझते होंगे।
सुबह के स्नान में कतक्यारियों के सखा बने कालका भैया दोपहर के दूसरे स्नान के बाद लौटती उन्हीं सखियों का रास्ता छेड़ लेते –

प्यारी यहां दधिदान लगे, मम घाट यहां तुम जानत नाहीं।
दै दधिदान खौं जाव घरै, बस और यहाँ कछु लागत नाहीं।।

सखियां कहती-
इकली छेड़ी वन मैं आय श्याम तूने कैसी ठानी रे……।
कंस राजा ते करुं पुकार, मुसक बंधवाय दिवाऊं मार,
तेरी ठकुराई देय निकार,
जुलम करे नहीं डरे हरे तू नारि विरानी रे….। इकली छेड़ी ….
कालका भैया झूम कर गाते-
कंस का खसम लगे तेरो, वो तनहा कहा मेरो,
काउ दिन मार करु ढेरो,
करुं कंस निरवंश मिटा दऊं नाम निसानी रे…..।
कालका भैया को सैकड़ो कवित्त, सवैया, लावनी और दोहे मुखाग्र याद थे, अन्त में कालका भैया की ही जीत होती और सखियों को प्रचलित रिवाज के मुताबिक उन्हें दान और माखन मिश्री देना पड़ता।
तीसरे पहर उजले सफेद धोती कुर्त्ता में सजे-धजे, इत्र से महकते कालका भैया मन्दिर में बैठ के प्रेमसागर की कथा कहते।
कृष्ण चरित्र की गाथायें सुनाते-सुनाते कालका भैया कथारस में गहरे डूब जाते और कथा में चल रहे हर प्रसंग, हर दृश्य और हर भाव का बारीक-बारीक वर्णन करते। उन्हें सारी बृज लीलायें अपने समक्ष साकार होती दिखतीं। गांव वृन्दावन लगने लगता और सारी स्त्रियां गोपी। कालका भैया को भ्रम होता कि वे कान्हा बन गये हैं, और वे कुछ ऐसी-वैसी हरकत कर डालते।
शुरु शुरु में मजाक मान के किसी ने कुछ न कहा पर रोज-रोज वही हरकत देख एक महिला ने घर जाके शिकायत कर दी, तो उस दिन लखन नौगरैया उलाहना लेकर अम्मां के पास आ गये थे।
अम्मां ने उन्हे समझा-बुझा के वापस भेजा, तो अगले दिन पंचमसिंह दाऊ आ धमके थे। अब कर्री बीध गई थी, पटक्का होना था। अम्मां ने उनसे थराई विनती कर क्षमा मांगी और कालकाप्रसाद को तत्काल ही कथा-भागवत के कार्य से बेदखल कर चंपाप्रसाद को उनका चार्ज दिला दिया था। चंपाप्रसाद ने निर्पेक्षभाव से कथा सुनाानी शुरू कर दी थी। कुछ ही दिनों में उन्हे अनुभव होने लगा कि सखियों को इस रूखी-सूखी कथा में मजा नहीं आ रहा है। क्योंकि वे कथा में दो अर्थ वाले संवाद नहीं जोड़ते थे, न रासलीला प्रसंग को लम्बा खींचते थे।घर में नवयौवना,सुंदर,सुघड़ दुलहन थी, सो उन्हे फुरसत ही नहीं थी कि गांव की किसी भौजी को नजर भर के देखें।
साठ बीघा खेतों की भरपूर फसल, कालका भैया की डाकघर की तनख्वाह और पुरोहिताई-चढ़ौत्री से इतनी आमदनी हो जाती कि अल्लै-पल्लै पैसा बरसता। उनके घर के लोग कभी भी ज्यादा खर्चीले नहीं रहे। सब मोटा खाते-मोटा पहनते। सो टाईम-बेटाईम घर में पैसा बना रहता। अड़ौस-पडौस में जिसे जरूरत होती, अपना काम चलाने को रूपया मांग ले जाता। बाद में चंपाप्रसाद ने बाकायदा ब्याज पर रूपया उधार देना शुरू कर दिया। इससे उनका मान-सम्मान और ज्यादा बढ़ गया। अब वे कंगला ब्राह्मण न थे, बल्कि गांव के इज्जतदार बौहरे हो गये थे।
धन और प्रतिष्ठा बढ़ी, तो ब्राह्मण समाज की बिरादरी-पंचायतों में वे पंच बनाये जाने लगे। गांव की ग्रामीण पंचायतों में भी वे सर्वमान्य पंच बन गये। ज्यों-ज्यों इज्जत मिली, त्यों-त्यों वे छुआछूत और ब्राह्मणी संस्कारों के प्रति ज्यादा कठोर होते चले गये। इस प्रतिष्ठा और मान-सम्मान ने उनके मन पर ऐसा असर छोड़ा कि वे कालका भैया के दूसरे ब्याह की बात तक नहीं सोच पाये। दरअसल कालका भैया को अब इस उमर में कोई कुंवारी लड़की तो देता नहीं, हां कोई विधवा या परित्यक्ता ब्राह्मणी मिल पाती। ऐसी औरत ले आने से चंपाप्रसाद की सारी इज्जत धूल में मिल जाती।
शुरूआत में तो अम्मां के पास जब-तब कालका भैया की बदचलनी की शिकायतें आतीं तो अम्मां उन्हें खूब डांटतीं और वे चुप बने सुनते रहते। पर बाद में वे बेशर्म और उग्र होने लगे। एक बार खेती के मईदार (हलवाहे) नत्था की परित्यक्ता बहन झुमकी से संबंध बने और अम्मां ने उनको रोका तो उनने अम्मां को खूब खरी-खोटी सुनाई थीं। उनका तर्क था कि अम्मां सिर्फ चंपाप्रसाद और उसके बच्चों की फिकर करती हैं, कालकाप्रसाद की उन्हें कोई चिन्ता नहीं है। इसी तरह जब एक बाल विधवा गांव के स्कूल में मास्टरनी बनकर आयी और कालका भैया का उससे परिचय बढ़ गया तो उनका स्कूल में ज्यादा आना-जाना होने लगा, तब अम्मां ने उन्हें टोका तो कालका भैया ऐसे ही बिफर पड़े थे। दरअसल खेती पाती संभालने का हुनर तो घर में सिर्फ उन्हीं के पास था। चंपाप्रसाद तो ऊपरी उठा-धराई करते थे। इसलिए सब लोग कालका प्रसाद से दबते भी थे।
अभी साल भर पहले की बात है। उस रात अम्मां को अचानक हैजा हुआ, तो उन्हें तुरन्त ही मोटर सायकिल पर बिठा के कस्बे तक भागे गये। सारा घर परेशान हो उठा। इन्जेक्शन लगेे। बोतलें चढीं। पर अम्मां बच नहीं पाईं। घर पर अचानक गाज सी गिर गई। सब लोग बुरी तरह टूट गये।
सबसे ज्यादा सदमा कालका भैया को लगा। उन पर ऐसा असर हुआ कि वे काम-वासना से एक बार फिर वैरागी से हो गये। उनका ध्यान पूरी तरह से खेती में लगने लगा। एक-एक करके चार कुंये खुदवाये और पूरी जमीन पटवारी की ही में सिंचित रकवा के रूप में दर्ज हो गई। बैल की तरह वे खेत टगर में घूमते रहते और फसल के सीजन में धन-धान्य से घर भर देते। हां ठसके से रहने का नया शौक चर्राया था उन्हें। सफेद उजले कमीज-पजामा पहनकर पावों में वे चमड़े के पंप-शू पहन लेते। सिर में महकौआ तेल चुपड़ कर प्रायः गांव के बस स्टैण्ड पर सुबह ही जा बैठते, फिर सांझ ढले वहां से लौटते।
एक बार फिर सब कुछ ठीक हो गया था।
छह महीना पहले गांव में नया सरकारी अस्पताल खुला और दक्षिण भारत की एक नर्स उसमें स्थायी रूप से नियुक्त होकर रहने के लिए आ गई थी।
पता लगा कि यह नर्स केरल की रहने वाली है और इसका नाम चेलम्मा है। गाँव की औरतें कई दिनों तक चटखारे लेकर नर्स के नाम का उच्चारण करने की कोशिश करती रहीं थीं।
चम्पा प्रसाद ने चेलम्मा की सराहना सुनी थी कि इतने दूर से अकेली चली आई चेलम्मा सचमुच बड़ी निडर और समझदार औरत है। उसकी तत्परता का ये हाल था कि गाँव में से रात बिरात जब भी बुलौआ पहुँचता वह तुरंत ही अपने कंधे पर सरकारी बेग लादकर हाथ में टॉर्च ले तेज कदम रखती फटाक से गाँव में आ धमकती। गाँव में किसी की जचगी होती या किसी दुल्हन के पहली बार पांव भारी होने की खबर फैलती चेलम्मा सदा ही वहाँ मौजूद मिलती। धीरे-धीरे गाँव भर में वह इतनी लोकप्रिय हो गई कि लोग उसे घर का सदस्य मानने लगे।
चर्चा सुनी तो एकदिन चम्पा प्रसाद भी टहलते हुये भी अस्पताल जा पहुँचे थे। अस्पताल के चौकीदार ने नर्स को उनका परिचय दिया तो चेलम्मा ने उनके प्रति खूब आदर प्रकट किया और सिर पर पल्लू लेकर बैठ गई। उन्हें सुखद विस्मय था कि देश के किसी भी कोने की महिला क्यों न हो सब एकसी होती हैं- वही शालीनता, वही लज्जा और वही सौहाद्रता। देखने में सांवली और सूखे से चेहरे की चेलम्मा की उम्र मुश्किल से तीस वर्ष दिखती थी। रहन-सहन में वह बड़ी साफ और गरिमामय महिला दिखती थी। उसका हिन्दी बोलना अच्छा लगता था। वह खूब पढ़ी-लिखी थी और दुनियादारी की बातें अच्छे से समझती थी, राजनीति से लेकर रोग-बीमारी तक की बात वह ऐसे आत्मविश्वास से उनसे करती रही थी मानो कोई एसडीएम या सिविल सर्जन बतिया रहा हो। उस दिन मन ही मन चेलम्मा की तारीफ करते वे वहां से लौटे थे।
उन्हीं दिनों की बात है। अचानक कालका भैया को पूरे बदन में खुजली का रोग फूट निकला। ऐसा भयानक कि वे बेहाल हो उठे। हाथ की उंगलियों के जोड़ से शुरु र्हुइं छोटी-छोटी पीली फुंसियां जांघों-रानों और जहां जगह मिली, बढ़ती चली गईं। खुजली टांगों में फैली तो चलना मुश्किल हो गया, लुंगी बांधे वे टांगें चौड़ी करके चलते थे तो बड़ी तकलीफ होती थी। कांयफर को तेल में मिलाके उनने कई दिन खाया और लगाया, चिरौंजी और मिश्री कई दिनों तक भसकी पर ठीक न हुये। पहले तो हिचकते रहे, फिर एक दिन अस्पताल जाकर कालका भैया ने खुजली की दवा मांगी, तो नर्स चेलम्मा ने बिना किसी लिहाज के अपने हाथों कालका भैया के शरीर पर नीली सी दवा पोत दी थी। उसके दबंग और वेलिहाज आचरण तथा समर्पित सेवाभाव और खुलेपन पर कालका भैया भावाविभूत हो उठे थे।
चंपाप्रसाद को ठीक से याद है कि कालका भैया तब से रोज ही अस्पताल पहुंचने लगे हैं। शरीर की बीमारी तो कब की ठीक हो चुकी थी, पर शायद दिल की बीमारी लग गई थी कालका भैया को। फिर तो घर से प्रायः दालें-दफारें, गेंहूं-चना यानी कि फसल पर जो भी चीज पैदा हो झोलों में भर-भर के चेलम्मा के पास पहुंचने लगी हैं। चंपाप्रसाद यह सब देखके जान बूझकर चुप रहते हैं। गांव की औरतें कमला को कनफुसियाती हुयी कालका भैया के चालचलन पर फिर उल्टीसीधी बातें करने लगी थी।
चेलम्मा पढ़ी-लिखी खुद-मुख्तार औरत है। वह ऐसे किसी को छूट नहीं देगी, हंसने मुस्क्याने की बात अलग। उसने जो भी किया होगा अच्छी तरह से सोच समझ के किया होगा। फिर गांव वालों ने देखा होगा कि दूर देश की इस अकेली औरत के वास्ते लड़ने-तकरार करने को कोई नहीं आने वाला है सो कुछ भी बदनामी करने लगे होंगे। यह सब चम्पाप्रसाद ने खूब सोचा है। चलो अच्छा है, इस बहाने बड़े भैया का कुछ दिन मन बहलता रहे। क्या हर्ज है? वे इसे लेकर उस उम्र में कहीं भाग नहीं जायेगेे,कहीं पढा हुआ वाक्य याद आया-रिश्ते ऐसेे बनाओ जिसमे शब्द कम हों और समझ ज्यादा हो। कई रातों से बड़े भैया के घर न लौटने पर इसी लिये उन्होंने कुछ नहीं कहा है, हालांकि हर बार पता लगा कि अस्पताल में किसी पराये मर्द का रूकना संभव नही है, कालका भैया तो कस्बे तक चले गये थे फिल्म देखने। पर आज जिस तरह से लूले कक्का ने उन्हें उलाहना दिया, उससे लगता है कि अब गांव वालों के पेट में कुछ ज्यादा ही दर्द हो उठा है।
बेटी की आवाज से वे चौंके। वह याद दिला रही थी कि दोपहर के दो बज गये हैं और उन्होंने अभी तक न नहाया-धोया न पूजा करी।
उदास से वे उठे और अपनी धोती-बनियान लेकर बाखर के पिछवाड़े वाले हैण्डपम्प पर जा पहुंचे।
सिर पर ठण्डा पानी गिरा तो सारे बदन में एक फुरहरी सी आ गई। अभ्यस्त भाव से उनने हनुमान चालीसा बोलना शुरु कर दिया -जय हनुमान ज्ञान गुण सागर………
पाठ पूरा होते ही उनने धुले कपड़े पहन लिये थे और पीतल का लोटा मांज के शुद्ध पानी से भर लिया था। बाखर में रखी अज्ञात देवताओं की अस्पष्ट सी प्रतिमाओं पर जल ढार के उनने सूरज भगवान की ओर मुंह उठाया औ