जब मैंने एपीजे अब्दुल कलाम को ऑफ़िस टेबल पर सोते हुए देखा
एक बार मुझे देश के महान वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम का इंटरव्यू लेने की जिम्मेदारी सौंपी गयी ।हालांकि विज्ञान मेरी बीट नहीं थी, बावजूद इसके मुझे यह दायित्व सौंपा गया ।कारण साफ था ।’दिनमान’ में अपने संपादककाल में श्री सच्चिदानंद हीरानंद
वात्स्यायन अज्ञेय कहा करते थे कि सभी संपादकीय सहयोगियों को हर विषय की जानकारी रखनी चाहिए ताकि वक़्त जरूरत पर उसका उपयोग हो सके । इसे हम लोग ‘वात्स्यायन का गुरुमंत्र’ मानते थे । हर किसी में अपने आप में इतना भरोसा होना चाहिए कि वह किसी की बीट पर भी काम कर सकता है ,कोई indispensable (अपरिहार्य) नहीं है,मैं भी नहीं । वह किसी पर लादी नहीं लादते थे, अपने आचरण से वह स्वयं अपनी मिसाल पेश किया करते थे ।चाहे ऑन द स्पॉट रिपोर्टिंग हो,फोटोग्राफी हो,प्रूफ रीडिंग हो, कम्पोजिंग, प्रिंटिंग मशीन चलाना अर्थात पत्रकारिता से जुड़े हुए हर काम से वह परिचित थे ।उन्हें दुनिया के कमोबेश हर विषय की गहन जानकारी थी ।अज्ञेय कहा करते थे कि जब कभी किसी विशेषज्ञ से भेंटवार्ता करने के लिए जायें तो अपनी पूरी तैयारी के साथ जाएं ताकि उस विशेषज्ञ को लगे कि इंटरव्यू करने वाला भी उस विषय की व्यापक जानकारी रखता है ।
1980 में रघुवीरसहाय ने जब मुझे देश के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से मिलकर उनके ‘रोहिणी’ उपग्रह को निकट-पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में सफलता पायी जैसे विषय पर इंटरव्यूनुमा बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी तो मैं इधर-उधर बगलें झांकता रहा और बोला कि ‘सर, यह तो मेरी बीट नहीं है और मुझे विज्ञान का बहुत कम ज्ञान है ।’ रघुवीरसहाय धीरे से हंसे और बोले,’यह आप कह रहे हैं ! मुझे मालूम है कि वात्स्यायन जी के समय तो आपने अपनी बीट के बाहर की बहुत स्टोरियां की थीं,अब हिचकिचाहट क्यों।’ मैंने चुप्पी साध ली और उनके कक्ष से उठकर सीधे लाइब्रेरी में जाकर बैठ गया और लाइब्रेरी इंचार्ज सुजान सिंह और राज किशोर से रोहिणी उपग्रह से जुड़ी सारी जानकारी जुटाने के लिए कहा और साथ में एपीजे अब्दुल कलाम का व्यक्तिचित्र भी । रोहिणी उपग्रह को 18 जुलाई, 1980 को पहली बार सफलतापूर्वक छोड़ा गया था।यह भारत निर्मित उपग्रह प्रेक्षपण यान,एसएसलीवी-3 द्वारा कक्षा में स्थापित किया गया था ।इस प्रेक्षपण के साथ ही भारत रॉकेट प्रेक्षपण में सक्षम सातवें देश के रूप में शामिल हो गया ।हालाँकि मैं ‘नवभारत टाइम्स’ के अपने मित्र हरीश अग्रवाल के साथ कलाम साहब से पहले भी मिल चुका था लेकिन वह शिष्टाचारी भेंट थी ।हरीश अग्रवाल ‘नवभारत टाइम्स’ में विज्ञान पर लिखते थे।ऑफ़िस के अलावा कभी कभी वह मुझे डिप्लोमेटिक पार्टियों में भी मिल जाया करते थे । खैर, लाइब्रेरी के साथियों की मदद से मैंने अपने आपको पूरी तरह से लैस कर वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने के लिए फोन मिलाया ।फोन उन्होंने खुद ही उठाया और अगले दिन सुबह राजाजी मार्ग स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के ऑफ़िस में आने के लिए कहा ।अपनी आदत के मुताबिक मैं सुबह जल्दी पहुंच गया और उनके कमरे को खटखटाकर जब वहां दाखिल हुआ तो देखा वह अपने टेबल से उठकर वॉशरूम जा रहे थे ।मुझे आया देखकर बोले,’सॉरी,मैं अभी आता हूं।’ उन दिनों आज जैसी पूछताछ नहीं हुआ करती थी ।वैसे भी कलाम साहब से मैं पूर्व निश्चित समय तय करके आया था ।वॉशरूम से निकलने के बाद बोले कि ‘रात को देर तक काम करते करते मैं यहीं सो गया था ।’ उन्होंने काफी मंगायी ।कॉफ़ी पीते पीते ही मैंने सीधे रोहिणी उपग्रह की चर्चा छेड़ दी ।इस पर उन्होंने पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि इसका श्रेय विक्रम साराभाई को जाता है जिन्होंने मुझे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में शामिल किया जो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)का ही एक अंग है । वहां से मैं उपग्रह प्रेक्षपण यान (एसएलवी) का परियोजना निदेशक बना ।इससे पहले मैंने स्वतंत्र रूप से रॉकेट परियोजना पर काम शुरू किया । अब्दुल कलाम ने बताया कि वह एसएलवी-3 और पोलर सैटेलाइट लांच व्हीकल (पीएसएलवी) को विकसित करने के प्रयास का हिस्सा थे ।
मई,1974 में देश के पहले परमाणु परीक्षण में आपकी कोई भूमिका नहीं थी के प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि यह राजा रमन्ना का प्रोजेक्ट था, उसमें प्रत्यक्ष तौर पर मेरी कोई भागीदारी नहीं थी लेकिन टर्मिनल बैलिस्टिक रिसर्च लेबोरेटरी के प्रतिनिधि के रूप में पहले परमाणु परीक्षण ‘स्माइलिंग बुद्धा’ को देखने के लिए आमंत्रित किया गया था, भले ही आधिकारिक तौर पर मैं उस परियोजना का हिस्सा नहीं था ।’ लेकिन मई, 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण में एपीजे अब्दुल कलाम ने महत्वपूर्ण संगठनात्मक,राजनीतिक और तकनीकी भूमिका निभाई थी ।इसको ‘शक्ति’ नाम दिया गया ।दरअसल वह इस परियोजना के मुख्य समन्वयक थे जिसके चलते मीडिया ने उन्हें सबसे प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक बना दिया था।
आपको ‘भारत का मिसाइल मैन’ क्यों कहा जाता है ।इसके पीछे की क्या कहानी है? डॉ एपीजे अब्दुल कलाम थोड़ा मुस्कुराये और बोले,लगता है आप पूरी तैयारी के साथ आए हैं । कोई खास लंबी चौड़ी कहानी नहीं है बल्कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का मुझ में व्यक्त किया गया विश्वास है ।हुआ यों कि मैंने दो परियोजनायें प्रोजेक्ट डेविल और प्रोजेक्ट वैलिएंट का निर्देशन किया जिसमें सफल एसएलवी कार्यक्रम से प्रौद्योगिकी का उपयोग करके बैलिस्टिक मिसाइलों को विकासित करने की मांग की गई थी ।जब यह परियोजना केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष पेश की गयी तो उसने अस्वीकार कर दिया लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग करते हुए मुझे अपनी परियोजनाओं को गोपनीय रखते हुए आगे बढ़ाने के लिए कहा ।जब मैंने पूरे और गहन शोध के बाद एक प्रतिवेदन तैयार किया तो प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल का अनुमोदन और स्वीकृति प्राप्त कर ली ।यह था उन दिनों मंत्रिमंडल का रुतबा जिसकी उपेक्षा प्रधानमंत्री भी नहीं कर सकता था । मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद इस परियोजना के लिए बजट भी पास हो गया ।इस अवसर पर तत्कालीन प्रतिरक्षामंत्री आर. वेंकटरमण का सुझाव था कि योजनाबद्ध मिसाइलों को एक के एक करने के बजाय मिसाइलों का एक साथ विकास किया जाये । लिहाजा मैंने मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि और सामरिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल पृथ्वी सहित मिसाइलों के विकास में प्रमुख और महत्वपूर्ण भूमिका निभायी ।बैलिस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण वाहन प्रौद्योगिकी के विकास पर मुझे ‘भारत के मिसाइल मैन’ के तौर पर जाना जाता है ।एपीजे अब्दुल कलाम पहले प्रतिरक्षामंत्री और बाद में प्रधानमंत्री के भी मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे।
कलाम साहब, मद्रास इन्स्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नालॉजी में एरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद आप लड़ाकू पायलट बनने का सपना संजोये हुए थे,उसका क्या हुआ? उत्तर में बोले,प्रयास तो किया था,क्वालीफाई भी कर लिया था लेकिन मैं नवें स्थान पर रहा ।भारतीय वायुसेना में तब केवल आठ पद ही उपलब्ध थे, इसलिए मैं लड़ाकू पायलट बनते बनते रह गया। पर मुझे इस का कोई अफसोस नहीं ।वहां अगर चयन हो जाता तो प्रतिरक्षा मंत्रालय का हिस्सा रहता,अब जहां हूं वह भी प्रतिरक्षा मंत्रलाय के अधीन आता है ।
क्या भारतीय वायुसेना में न जा सकने का आपको मलाल है?हंसकर बोले, नहीं,वह बालपन का सपना था,प्रयास भी किया,सफल भी हुआ लेकिन कुदरत ने शायद मेरे लिए कुछ और सोच रखा था ।उसके बाद एक वैज्ञानिक के रूप में मैं रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में आ गया।मैंने भौतिकी और एरोस्पेस इंजीनियरिंग तक पढ़ाई कर रखी थी इसलिए मैंने अपने हाथ यहां मारे और कामयाब हो गया ।प्रारंभ में मुझे छोटे होवरक्राफ्ट के डिज़ाइन में शामिल किया गया ।वहां भी तब तक मन नहीं रमा जब तक कि प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के अधीन काम करते हुए मुझे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में शामिल नहीं कर लिया गया ।सच में कहूं तो मैं विक्रम साराभाई, प्रोफेसर सतीश धवन और डॉ ब्रह्म प्रकाश को अपना गुरु मानता हूं जिन्होंने मुझे सीखने और ज्ञान अर्जन का अवसर प्रदान किया।
और होमी जहांगीर भाभा जिन्हें ‘भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक’ माना जाता है से क्या कभी मुलाकात हुई थी? डॉ अब्दुल कलाम ने बताया कि ‘हां देखा और मिला ज़रूर था लेकिन उनसे सीखने का अवसर नहीं मिला जबकि उनके उत्तराधिकारी विक्रम साराभाई मेरे सरपरस्त रहे ।वह होमी भाभा के बारे में बताया करते थे कि उनकी सलाह पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 10 अगस्त,1948 को एक कानून द्वारा परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की थी ।उन्होंने पंडित नेहरू से सामने एक शर्त रखी थी कि वह सीधे प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह होंगे,उन्हें कार्यकारी शक्ति प्राप्त होगी और उनके काम में दूसरा कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा ।भाभा ने देश में यूरेनियम भंडार के बजाय थोरियम भंडार से ऊर्जा उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने की रणनीति बनायी ।
1959 में चीन के संभावित परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर जब पंडित नेहरू ने चिंता व्यक्त की तो इसके मद्देनज़र भाभा ने दावा किया था कि भारत बिना किसी बाहरी सहायता के परमाणु हथियार बना सकता है । अक्टूबर,1964 में चीनी परमाणु परीक्षण के बाद भाभा ने सार्वजनिक रूप से भारत द्वारा परमाणु विस्फोटक बनाने की बात की थी । इसके फलस्वरूप भारत सरकार पर देश के भीतर अपना बम विकसित करने का दबाव बढ़ने लगा ।पंडित नेहरू के उत्तराधिकारी लालबहादुर शास्त्री ने कहा कि गैरसैन्य उपयोग के लिए शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोटकों का विकास भाभा की सोच के अनुरूप शामिल है ।विक्रम साराभाई का मानना है कि यदि 24 जनवरी,1966 को 56 साल की उम्र में भाभा की एयर इंडिया के विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से मृत्यु न हुई होती तो यह परीक्षण 1974 से पहले ही हो जाता । उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि हमारे परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विकास के इस महत्वपूर्ण क्षण में डॉ होमी जहांगीर भाभा को खोना हमारे राष्ट्र के लिए एक गहरा आघात है ।उनके उत्तराधिकारी विक्रम साराभाई (1919-1971) ने भारत में परमाणु ऊर्जा विकास में मदद की लेकिन 52 साल की कम उम्र में उनका निधन हो जाने से वह भी पहले परमाणु परीक्षण को नहीं देख पाये जिसके लिए उन्होंने बहुत परिश्रम किया था । 1974 के परमाणु परीक्षण की बुनियाद निस्संदेह होमी भाभा और विक्रम साराभाई रख गए थे ।
क्या यह सच है कि मरने से पहले 30 दिसंबर, 1971 को त्रिवेंद्रम से विक्रम साराभाई ने टेलीफोन पर आपसे आखिरी बातचीत की थी?डॉ अब्दुल कलाम ने इसका जवाब देते हुए कहा कि ‘हां,यह सही है। हम लोगों ने कुछ परियोजनाओं पर बातचीत की जिसमें एसएलवी डिज़ाइन की समीक्षा भी शामिल थी ।उसी रात वह त्रिवेंद्रम से मुंबई लौटने वाले थे कि उन्हें दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया ।
डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से मेरी इस बातचीत को काफी सराहा गया ।’दिनमान’ की एक प्रति मैं कलाम साहब को दे आया ।उन्होंने भी इसका अनुवाद कराकर संतोष व्यक्त किया ।उसके बाद गाहेबगाहे इस महान वैज्ञानिक से जब भेंट होती तो मुझे अपना परिचय देने की जरूरत नहीं पड़ती थी।उनकी इस अद्भुत स्मरणशक्ति को डीआरडीओ के कुछ वैज्ञानिक भी दाद देते हैं । डीआरडीओ के एक वैज्ञानिक ने बताया कि वह कभी भी किसी के पास पहुंच जाया करते थे और उनके साथ वहीं उनके टेबल पर बैठकर उनकी परियोजना की प्रगति पर चर्चा कर लिया करते थे,ऐसी उनकी आदत थी।उस वैज्ञानिक ने बताया कि एक बार वह तीन चार वैज्ञानिकों के साथ किसी परियोजना पर बातचीत कर रहे थे तो उन्होंने उस परियोजना की प्रगति के बारे में पूछा।जब उन्हें बताया गया कि यूपीएस के उपलब्ध न होने से वह लंबित है। इस उत्तर से वह नाखुश हो गए और पूछा कि इस परियोजना के लिए कौन जिम्मेदार है ।जब उस वैज्ञानिक ने इस देरी की वजह यूपीएस को बताया तो उन्होंने निर्देश दिया कि संबंधित व्यक्ति से संपर्क कर तीन दिन में यूपीएस का इंतजाम करें ।चार दिनों के बाद मैं फिर आऊंगा ।उस समय डॉ अब्दुल कलाम डीआरडीओ के डायरेक्टर थे ।डॉ कलाम का निर्देश पा वह वैज्ञानिक अपने काम में जुट गया।तीन दिन में यूपीएस भी उपलब्ध हो गया और लंबित काम भी पूरा हो गया ।उस दिन के बाद यूपीएस का नाम ‘कलाम यूपीएस’ पड़ गया ।
डीआरडीओ की एक शाखा पुरानी दिल्ली के तिमारपुर में भी है । यहां भी बड़ी संख्या में वैज्ञानिक काम करते हैं ।एक बार डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने वहां रहकर काम करने की इच्छा ज़ाहिर की ।डॉ कलाम की यह बात सुनकर वहां के वैज्ञानिक घबरा गये ।अविवाहित अब्दुल कलाम तो चौबीसों घंटे काम में व्यस्त रहते थे।अपने आपको तरोताज़ा रखने के लिए वह या कर्नाटक भक्ति संगीत सुनते अथवा वीणा वादन करते थे ।तमिल में वह कविताएं भी लिखते थे ।जिस तरह से अब्दुल कलम को मैंने उनके मुख्य कार्यालय में टेबल पर सोये हुए देखा था तिमारपुर ऑफ़िस में काम करने वाले लोग उनकी ऐसी आदतों से परिचित थे ।वह ईमानदार,निस्स्वार्थ,मृदुभाषी,सरल और सहज व्यक्ति थे जो अपने काम के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे।अब्दुल कलाम द्वारा तिमारपुर में रहने के निर्णय से वहां रहने वाले लोग यह सोचकर डर गये कि न जाने उन्हें कब तलब कर लिया जाये ।लिहाजा उन्होंने डॉ कलाम को यह समझाने की कोशिश की कि यह स्थान सुरक्षित नहीं ।आपको सदा नार्थ या साउथ ब्लाक में उच्च अधिकारियों के साथ मीटिंग के लिए जाना पड़ता है ।यहां अक्सर जाम रहता है,आप वहां कैसे समय पर पहुंचे पाएंगे।कलाम साहब कहते थे कि मुझे एक कमरा चाहिए,बाकी मैं संभाल लूंगा ।वहां के वैज्ञानिकों को अब्दुल कलाम के वहां रहने से अपनी ‘प्राइवेसी’ में खलल महसूस होने का अंदेशा था।लेकिन कलाम साहब को नज़दीक से जानने वाले एक वैज्ञानिक की राय थी कि इन लोगों का यह भ्रम है कि कलाम साहब के यहां रहने पर उनकी प्राइवेसी डिस्टर्ब होगी ।हक़ीक़त यह है कि कलाम साहब अपने काम में मगन रहते हैं,वह बेवजह किसी को डिस्टर्ब नहीं करते । खैर,इन वैज्ञानिकों ने किसी न किसी तरीके से कलाम साहब के तिमारपुर में रहने के उनके फैसले को बदलने के लिए मजबूर कर दिया ।बाद में उन्हें एसियाड विलेज में एक फ्लैट आवंटित हो गया जो उनके पद की गरिमा और मर्यादा के अनुकूल था।यहीं रहते हुए ही उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था । राष्ट्रपति चुने जाने के बाद 25 जुलाई,2002 को उन्होंने 11वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ग्रहण की थी ।वह डॉ ज़ाकिर हुसैन और फखरुद्दीन अली अहमद के बाद तीसरे मुस्लिम राष्ट्रपति थे।इनके अतिरिक्त जस्टिस मोहम्मद हिदायतुल्लह 20 जुलाई,1969 से 24 अगस्त,1969 तक अंतरिम राष्ट्रपति रहे।
राष्ट्रपति बनने के बाद एक बार फिर मुझे डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने का अवसर मिला ।समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया गरीब और झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले माता पिता के मंदबुद्धि के बच्चों के लिए दिल्ली के तिमारपुर में एक विशेष स्कूल चलाते हैं ‘मासूम’। इस स्कूल की प्रमुख हैं श्रीमती नफ़ीस खान ।उन्होंने मुझे भी अपनी कार्यकारिणी का सदस्य बना रखा है ।वह प्रमुख उत्सवों पर ‘मासूम’ स्कूल के बच्चों को बड़ी बड़ी शख्सियत से मिलाती रहती हैं ।इनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी,पवन पावन दलाईलामा,श्री श्री रवि शंकर,दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित,लोक सभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चट्टर्जी आदि प्रमुख हैं ।ऐसे ही अवसर पर वह ‘मासूम’ के बच्चों के साथ मुझे भी राष्ट्रपति भवन ले गयीं ।राष्ट्रपति अब्दुल कलाम से तीन बार ‘मासूम’ स्कूल के बच्चे मिल चुके थे ।इन बच्चों से राष्ट्रपति अब्दुल कलाम बड़े प्यार से मिलते थे ।बच्चे भी उनके लिए कोई न कोई गिफ्ट लाते अपने हाथ से बनाकर ।कोई उन्हें अपनी पेंटिंग्स पेश करता तो कोई स्कैच,कोई मोमबत्ती का पैकट तो कोई बैग,कोई टेलीफोन कवर ।कुछ बच्चे अगरबत्तियां भी पेश करते । कुछ बच्चे संगीत के वाद्ययंत्र बजाते तो कुछ अपने नृत्य प्रस्तुत करते ।इन बच्चों के द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम देखकर कोई भी उन्हें मंदबुद्धि के बच्चे नहीं कह सकता था।इसीलिए संजय डालमिया कहते हैं कि अगर कुदरत इन बच्चों को एक चीज से वंचित रखती है तो दूसरे क्षेत्र में उन्हें हुनरमंद भी बनाती है। ।
विभिन्न प्रतियोगतओं में प्राप्त होने वाले पदक भी इन बच्चों ने राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को दिखाये ।’मासूम’ स्कूल की गतिविधियों के बारे में श्रीमती नफ़ीस खान ने कलाम साहब को तफसील से जानकारी देते हुए बताया कि अमीरों और संपन्न परिवारों के मंदबुद्धि के बच्चों के लिए कई स्कूल हैं लेकिन झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले माँ बाप के बच्चों के लिए ऐसी सहूलियत नहीं थी ।संजय डालमिया के सौजन्य से हम यह ‘मासूम’ स्कूल चला रहे हैं । हमारा उद्देश्य है कि ये बच्चे रोजमर्रा के काम खुद कर सकें जैसे दांत साफ करना, अपने बाल संवारना, अपने जूते खुद पहनना आदि ।उन्हें दोनों हाथ जोड़कर ‘नमस्ते’ करना भी सिखाया जाता है तो ‘धन्यवाद’ कहना भी । झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले इन बच्चों को उनके माँ बाप उनके हाल पर छोड़कर अपने काम पर चले जाते थे,ऐसे उपेक्षित बच्चों को हमने ‘मासूम’ विशेष स्कूल में दाखिल कर उन्हें सामान्य बच्चों के कुछ तौर-तरीके सिखाये ।इन बच्चों की देखभाल के लिए विशेष प्रशिक्षित टीचर हैं,संगीत सिखाने के लिए भी संगीत का एक अध्यापक है।इन्हें दोपहर का खाना दिया जाता है और जो बच्चे दूर रहते हैं उन्हें लाने और छोड़ने के लिए स्कूल की वैन हैं ।हम इन बच्चों में छुपा हुनर तलाश कर उस क्षेत्र में उन्हें प्रशिक्षित करते हैं ।उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई चीज़ों के निर्माण में उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है ।
डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से मेरा परिचय कराते हुए श्रीमती नफ़ीस खान ने कहा कि त्रिलोक दीप मेरे सहयोगी हैं और मासूम से जुड़े हुए हैं ।पहले यह पत्रकार थे ‘दिनमान’ और ‘संडे मेल’ में ।’संडे मेल’ के मालिक संजय डालमिया थे और त्रिलोक दीप उस पत्र में कार्यकारी संपादक । मेरी मुलाकात भी उन्हीं दिनों दीप जी से हुई । यह हमारे एनजीओ में पूरा सहयोग देते हैं । नफ़ीस जी का मेरे बारे में विवरण सुनकर राष्ट्रपति कलाम मंद मंद मुस्कुराते रहे और फिर बोले,’मैं इन्हें बहुत दिनों से जानता हूं ।इन्होंने ‘दिनमान’ के लिए मेरा इंटरव्यू लिया था जब मैं डीआरडीओ में काम करता था ।अच्छा लगा अब त्रिलोक दीप आपकी संस्था के साथ जुड़े हुए हैं ।मेरी शुभकामनाएं आप सभी को ।
डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को ‘जनता का राष्ट्रपति’कहा जाता था ।इसके कई कारण हैं ।एक तो वह पेशेवर राजनेता नहीं थे,वैज्ञानिक थे ।दूसरे किसी राजनीतिक पार्टी से उनका जुड़ाव नहीं था ।तीसरे वह जानते थे कि वह संवैधानिक मुखिया हैं और उन्हें प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के परामर्श से ही फैसले लेने हैं ।उनके राष्ट्रपतिकाल में उन्हें दो प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ मनमोहन सिंह की सलाह पर काम करना था और दोनों के साथ ही उनके मधुर और सौहार्दपूर्ण संबंध रहे ।वह सरकार के कामकाज में कभी दखल नहीं देते थे और सरकार उनके गैरसरकारीऔर उनके प्रिय कार्यक्रमों में हस्तक्षेप नहीं करती थी ।उन्होंने राष्ट्रपति भवन को आम जनता, विशेष तौर पर छात्रों के लिए खुला रखा ।डॉ कलाम ने युवा पीढ़ी को हमेशा प्रेरित किया और एक वैज्ञानिक के नाते उन्हें देश की रक्षा और अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करने में अमूल्य योगदान दिया ।वह खुद को राष्ट्रपति से ज़्यादा एक शिक्षक कहलाना पसंद करते थे ।वह अक्सर स्कूलों और कॉलेजों में जाकर छात्रों को बड़े सपने देखने और कड़ी मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित करते थे । डॉ अब्दुल कलाम ने राजनीतिक प्रोटोकोल तोड़ कर आम आदमी से सीधे संवाद स्थापित किया ।
राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम की सादगीभरी जीवन शैली, उनकी विनम्रता और मिलनसार तथा प्रेरणादायक स्वभाव,शिक्षा पर ध्यान,ज़मीन से जुड़े होने की वजह से आम लोगों का दिल जीता ।उनकी ईमानदारी,वैज्ञानिक कुशाग्रता और युवाओं के प्रति प्रेम ने उन्हें हर भारतीय का प्रिय बना दिया था । अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर,1931को पंबन द्वीप पर रामेश्वरम में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था ।उनके पिता एक नाव के मालिक थे तथा एक स्थानीय मस्जिद में इमाम । उनके पिता का व्यवसाय में नुकसान होने की वजह से कलाम के जन्म के समय तक परिवार गरीबी से त्रस्त था।कलाम को बचपन में अखबारें बेच कर पढ़ाई करनी पड़ी ।कलाम के लिए धर्म और आध्यात्मिकता बहुत महत्वपूर्ण थे ।वह सुन्नी मुसलमान थे और रमजान के दौरान दैनिक नमाज और उपवास उनके जीवन का अभिन्न अंग थे। कलाम यह मानते थे कि अन्य धर्मों के प्रति सम्मान इस्लाम की प्रमुख आधारशिलाओं में से एक है और उनका कहना था कि ‘धर्म दोस्त बनाने का एक तरीका है’। वह शाकाहारी थे और मदिरापान भी नहीं करते थे ।उनके पास कभी टेलिविज़न नहीं था ।
राष्ट्रपति का पद छोड़ने के बाद अब्दुल कलाम शिक्षण में लौट आये और विभिन्न संस्थानों में विज़िटिंग प्रोफेसर बने । 27 जुलाई, 2015 को कलाम आईआईएम,शिलंग में एक व्याख्यान दे रहे थे कि वह अचानक बेहोश होकर गिर पड़े और उनका निधन हो गया ।उनके निधन पर भारत सरकार ने सात दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की । 30 जुलाई,2015 को स्थानीय इमाम द्वारा की गयी इस्लामी दफन प्रार्थना के बाद बड़ी तादाद में लोगों की उपस्थिति में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया । रामेश्वरम के पेई करुम्बु में डीआरडीओ द्वारा कलाम की स्मृति में एक स्मारक बनाया गया जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई, 2017 में किया ।स्मारक में उन रॉकेटो और मिसाइलों की प्रतिकृतियां प्रदर्शित हैं जिनके साथ कलाम ने काम किया था।प्रवेशद्वार पर एक बड़ी मूर्ति है जिसमें वह वीणा बजाते हुए दिखाई दे रहे हैं । उनकी निजी संपत्ति में कुछ किताबें,एक वीणा, कपड़े, एक काम्पैक्ट डिस्क प्लेयर और एक लैपटाप शामिल है । भारत सरकार ने उन्हें 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया । इनके अतिरिक्त उन्हें दुनिया भर के पुरस्कार प्राप्त हुए ।कलाम का जन्मदिन विश्व छात्र दिवस के रूप में मनाया जाता है । ऐसी शख्सियत की स्मृति में मेरा सादर नमन ।













