कुछ लोग इसमें स्त्री विरोधी मानसिकता खोज सकते हैं तो कुछ को विरोध का यह तरीका नवाचारी भी लग सकता है। कुछ इसे शाब्दिक गाली-गलौज के बजाए राजनीतिक विरोध का संस्कारित रूप मान सकते हैं या फिर इसे सियासी प्रतिरोध के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों का दुरूपयोग भी कह सकते हैं। मामला पंजाब का है और निशाना रेलें और रेल मंत्री हैं। राज्य के लुधियाना व्यापार मंडल के प्रधान मनिंदर पाल सिंह गुलियानी ने ऑनलाइन ऑर्डर कर रेल मंत्री पीयूष गोयल को घुंघरू उनके मुंबई स्थित पते पर भेजे हैं । दूसरी तरफ गुलियानी ने मंत्री गोयल के साथ साथ भाजपा राष्ट्रीय महासचिव तरूण चुग व पार्टी के प्रदेश प्रधान अश्वनी शर्मा को भी चूडि़यां भेजी हैं। घुंघरू और चूडि़यों का यह ‘नजराना’ इस लानत के साथ भेजा गया है कि वो ‘घटिया राजनीति’ कर रहे हैं। गुलियानी की नाराजी यह है कि पंजाब में रेल पटरियां खाली पड़ी रहने के बावजूद मोदी सरकार उन पर नियमित ट्रेनें नहीं चला रही है। रेल मंत्री को घुंघरू भेजने के पीछे गुलियानी का तर्क यह है कि राज्य में ( कृषि बिल विरोधी आंदोलन के बाद) किसानो ने रेल पटरियां खाली कर दी हैं। इसके बावजूद पीयूष गोयल रेलें नहीं चला रहे। उन्हीं के आदेश पर मालगा़डी सेवा भी बंद है। गुलियानी का आरोप है कि ऐसा करके रेल मंत्री वास्तव में कारपोरेट घरानों के इशारे पर ‘नाच’ रहे हैं।

ऐसे में गोयल को ये घुंघरू पहन लेना चाहिए ताकि पूरी दुनिया को पता चल सके कि भारत के रेल मंत्री किन औद्योगिक घरानों के इशारों पर नाच रहे हैं। गुलियानी ने चेतावनी दी है कि यदि अगले 7 दिनों में पंजाब में मालगा़डि़यां दौड़ना शुरू नहीं हुईं तो पूरे राज्य में भाजपा नेताओं के पुतले जलाए जाएंगे। व्यवसायी अपनी दुकानों और फैक्ट्रियों पर ताले डाल देंगे और उनकी चाबियां प्रधानमंत्री को भेजकर अपना रोष व्यक्त करेंगे। गुलियानी की शिकायत है कि मालगाडि़यां स्थगित रहने से पंजाब के तमाम उद्योगपति जो, मोदी के वोटर हैं, भारी घाटे का सामना कर रहे हैं। उद्योगों ने स्टील मंहगा कर दिया है। रही बात भाजपा के दूसरे नेताओ को चूड़ी भेंट करने की तो इसके पीछे गुलियानी का तर्क है कि ये नेता कठिन परिस्थिति में सकारात्मक भूमिका निभाने के बजाए घटिया राजनीति कर रहे हैं और व्यापारियों को किसानों के खिलाफ भड़का रहे हैं।

बयान की भाषा से साफ समझा जा सकता है कि गुलियानी कांग्रेसी हैं और उन्होंने जो कुछ कहा है, या उनसे कहलवाया गया है और शुद्ध राजनीति का हिस्सा है। जिसका मकसद रेल के बहाने मोदी सरकार और भाजपा को निशाना बनाना है। क्योंकि पंजाब में किसानों के सरकार पोषित ‘रेल रोको आंदोलन’ के बाद रेलें पूरी तरह से बंद हैं। किसान आंदोलन तो अब ठंडा पड़ गया, लेकिन सरकार रेलें चलाने की जल्दी में नहीं है। परेशानी आम पब्लिक को हो रही है।
यहां दिलचस्प बात विरोध और धिक्कार का नवाचारी तरीका है। चूडि़यां तो पहले भी भेंट की जाती थी, लेकिन घुंघरू भेज कर लताड़ने की टेक नई है। गुलियानी ने अपने राजनीतिक विरोध को भी दो वर्गों में बांट दिया है। मसलन रेल मंत्री को घुंघरू जबकि बाकी भाजपाइयों को चूडि़यां थमाई गई हैं। पहले में (किसी के इशारे पर) नाचने का रूपक है तो दूसरे में कायरपन का प्रतीक है। यूं कहने को ये दोनो मुख्‍यत: महिलाओं के अलंकार हैं। एक कलाई में और दूसरा एड़ी में पहना जाता है। हालांकि घुंघरू उस अर्थ‍ में सिंगार या सुहाग का प्रतीक नहीं है, जिस अर्थ में चूड़ी है। घुंघुरू मूल रूप से एक संगीत उपकरण है, जिसमें कई छोटी-छोटी घंटियां संयोजित होती हैं और जो अपनी संख्‍या और पैर की थाप पर सुरीले ढंग से बजती हैं। भारतीय शास्त्रीय नृत्यकला में घुंघरुओं का महत्व अन्यतम है। अब तोक घुंघरू वादन भी एक कला है। बावजूद इसके जन मानस में घुंघरू बांधना नकारात्मक अर्थ में ही लिया जाता है। वहां इसका अर्थ लोक लाज को तजकर सरे आम नाचने से लिया जाता है। लोक मान्यता है कि घुंघरू बांधना तवायफ की जिंदगी जीने के समान है।

कला दृष्टि से इतर घुंघरू बांधने को मजबूरी के रूप में ज्यादा लिया जाता है। हालांकि शास्त्रीय नर्तक या कलाकार किसी के ‘इशारे’ पर नहीं नाचता। नृत्य उसके लिए आराधना है। लेकिन राजनीति में लोग घुंघरू किसी की कृपा पाने या किसी का हुक्का भरने के लिए बांधते हैं।यही सियासी तड़का घुंघरुओं को नृत्यकला से हटकर ‘इशारो पर नाचने’ में तब्दील करता है। पीयूष शास्त्रीय नृत्य के बारे में कितना जानते हैं, पता नहीं, क्योंकि वो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और धंधे से राजनेता हैं। अलबत्ता गुलियानी यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि पीयूष रेलों के पहिए इसलिए जाम रखे हुए हैं कि रेल विभाग पर अंतत: ताला लग जाए और ये लोक सेवा भी किसी बड़े कारोबारी के कारपोरेट का ‍हिस्सा बन जाए। सरकार अपने सामाजिक दायित्व से भी मुक्त हो जाए। संकेत यही है कि सरकार धीरे-धीरे उन सभी कामों से हाथ खींचती जा रही है, जिनका रिश्ता जनता से है। बाकी सेठ जाने और पब्लिक जानें। सरकार वहीं थिरकेगी, जहां घुंघरुओं की खनक सुनाई दे।

अब बात चूड़ी की। हिंदू परंपरा में चूड़ी आभूषण के साथ सुहाग का प्रतीक भी हैं। इसलिए चूड़ी पहनना जहां सौभाग्य का परिचायक है, वहीं ‘चूडि़यां फोड़ना’वैधव्य का लक्षण है। चूडि़यां छनकाने में खुशी के साथ एक श्रृंगारिक आमंत्रण भी है। घुंघरुओं और चूड़ियों में बुनियादी फरक यह है कि चूडि़यां केवल महिलाएं पहनती हैं, जबकि घुंघरू पुरूष भी बांधते हैं। दोनो ज्यादातर बहुवचन में ही इस्तेमाल होते हैं। लेकिन दोनो ‘वीर रस-फ्री’ हैं। क्योंकि चूडि़यां भले राजनीति न करती हों, लेकिन राजनीति चूडि़यों का इस्तेमाल अपने फायदे में कैसे करना, यह अच्छी तरह जानती है।

रहा सवाल घुंघरुओं का तो नेता पैरों में घुंघरू भले न बांधें, लेकिन वादों के घुंघरू बांध कर चौबीसो घंटे नाचते रहते हैं। कलाकार के घुंघरू तो कभी नाचते-नाचते टूट भी जाते हैं, लेकिन राजनीति के घुंघरू टूटने का नाम ही नहीं लेते। बजते समय उनमें हरदम उनमें सुर-ताल भी हो, जरूरी नहीं है। गुलियानी के घुंघरुओं में भी राजनीतिक रवानी ही नज़र आती है।अब सवाल यह कि सियासी विरोध का यह तरीका कितना सही, कितना स्त्री और कला विरोधी है? किसी पुरूष को चूड़ी भेंट करना या चूड़ी भेजना यूं भी महिलाओं के प्रति पुरातनपंथी और प्रतिगामी सोच का परिणाम हैं। आज जब खुद महिलाएं चाबुक फटकारने की हैसियत मे हैं तो चूड़ी को उनके अबलापन से जोड़कर दिखाने का क्या मतलब है? यह कौन सी और किस जमाने की सोच को दर्शाता है?

राजनीतिक विरोध के इतिहास में यह शायद पहला मौका है, जब घुंघरू और चूड़ी दोनो उपकरणों का इस्तेमाल प्रतिद्वंद्वी के राजनीतिक चरित्र और प्रतिबद्धता को उजागर करने की नीयत से किया गया है। इसके पीछे कारण यह हो सकता है कि सियास विरोध के पुराने औजारों में अब वैसी धार और टंकार नहीं रही। इसलिए कला और सौंदर्य जगत के उपकरणों का इस्तेमाल सियासी नाराजी जताने के लिए किया जा रहा हो। यही ट्रेंड चल गया तो मुमकिन है कल को कोई हार, बिंदी, झुमके या पाजेब को भी राजनीतिक विरोध के लिए इस्तेमाल करने की हिमाकत करे। ऐसा हुआ तो यह हमारे पावन प्रतीकों का राजनीतिक दुरूपयोग ही होगा। तो क्या लोकतंत्र में विरोध के पारंपरिक तरीके इतने बेजान हो चुके हैं कि नेताओं को अब घुंघरू और चूड़ियों के रूप में अपनी बात कहनी पड़ रही है?

वरिष्ठ संपादक

अजय बोकिल

‘सुबह सवेरे’

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