जिस भीमा कोरेगाव के केसमे उन्हें अक्तूबर 2020 को एन आई ए ने गिरफ्तार किया था, उस भीमा कोरेगावमे फादर स्टेन स्वामी जींदगी में कभी भी गये नहीं थे . और एल्गार परिषदसेभी उनके संबंध होने का कोई कारण ही नहीं है. क्योंकि वह परिषद विशुद्ध रूप से भीमा कोरेगाव शौर्य दिन के 200 वा साल (1जनवरी 2018 के दिन) मनाने हेतु महाराष्ट्र के दो सौ से भी ज्यादा सामाजिक संगठनों ने मिलकर बनाई परिषद थी. जिसमें राष्ट्र सेवा दल के तरफ से अध्यक्ष पद पर रहने के हैसियत से मै खुद एक सदस्य था. और एक जनवरी 2018 के भीमा कोरेगाव शौर्य दिन मनाने के बाद उस परिषद का बाद में कोई भी अस्तित्व नहीं है. यह शुद्ध 2018 भिमा कोरेगांव के शौर्य दिन के दो सौ साल पूरे होने के कार्यक्रम के लिए बनाई गई थी.
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और इस पुरी प्रक्रियाओं मे अभी जितने भी लोग एल्गार परिषद के नाम पर जेल मे है ,उनमें से एक दो छोडकर अन्य लोगों के संबंध नहीं है. हालाँकि हमारे और उनके राजनीतिक मतभेद जरूर है. क्योंकि हम राष्ट्र सेवा दल के लोग महात्मा गाँधी, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया,डॉ बाबा साहब अंबेडकर के विचार से चलने वाले लोगों मे से हैं. लेकिन मुझे लगता है कि इन मे से ज्यादातर लोग दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समुदाय और महिलाओके सवालों पर बरसों से काम करने वाले जरूर है. और इस देश के वर्तमान सांप्रदायिक राजनीति को देखते हुए हम लोग कुछ मुद्दों पर कभी-कभी मिलकर काम करते हैं. और इसीलिए हमारे परिचित होने के कारण भीमा कोरेगाव के एक जनवरी 2018 को हुए दंगे की राष्ट्र सेवा दल के तरफसे आठ जनवरी 2018 यानी एक हप्ते के भीतर मेरी ही अध्यक्षता में जाँच की है. और वह रिपोर्ट भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशधनंजय चंद्रचूड ने अपने डिसेंट जज्मेंट मे भी पूरा रिपोर्ट कोट किया है. उसी तरह मुंबई हाईकोर्ट में भी दंगे के असली दोषी मनोहर भीडे और एकबोटे के जमानत अर्जी के खिलाफ भी हमारे रिपोर्ट को कोट किया है. और वह रिपोर्ट सबसे पहले पुणे के कोर्ट में भीडे और एकबोटे के जमानत अर्जी के खिलाफ भी कोट किया है. और वह रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार ने भीमा कोरेगाव जाँच आयोग पूर्व न्यायाधीश जे. एन. पटेलके नेतृत्व में नियुक्त किया गया आयोग के पुणे सिटिग मे मैने खुद जमा किया है.
और हमारे आठ जनवरी 2018 के दिन भीमा कोरेगाव, वढूबुद्रुक, शिक्रापूर परिसर के लोगों से बातचीत और प्रत्यक्ष स्थिति को देखते हुए, पुलिस-प्रशासन तथा भीमा कोरेगाव ग्राम पंचायत के पदाधिकारियों से बातचीत करने के बाद लिखी है. और उस रिपोर्ट को भारत के चुनिंदा प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित (Mainstream.)जैसे अंग्रेजी, हिंदी, मराठी पत्रिकाओंने खुद प्रकाशित करने का काम किया है. तो हमारे निजी अनुभवों के आधार पर हम इस नतीजेपर आए हैं कि ,भीमा कोरेगाव दंगे के पीछे मनोहर भीडे और एकबोटे के घोर जातीयता वादी विषैला प्रचार के कारण दो सौ साल मे पहली बार सोचि-समझीं साजिश करके दंगे की शक्ल दी गई है. और वह दोनों आरोपियों पर तत्कालीन महाराष्ट्र की सरकार की विशेष कृपा रहने के कारण कोई भी कारवाही करने का काम पुलिस-प्रशासन न करते हुए, उल्टा जिन्होंने अपने जीवन के ज्यादातर समय दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला ओके लिए काम करने मे जा रही है. ऐसे लोगों को जानबूझकर फसाकर जेल मे बंद कर चौरासी साल के स्टेन स्वामी की मृत्यु के लिए जेल प्रशासन और हमारे देश के न्याय व्यवस्था भी जिम्मेदार है. पचास साल से झारखंड के आदिवासियों के सवालों पर काम कर रहे , उसे उठाकर हमारे जाँच एजेंसियों ने बहुत ही गैरजिम्मेदार काम किया है. और वह भी इस मृत्यु के लिए जिम्मेदार है. लगता है कि सरकार ने आदिवासियों के लिए जो भी कुछ संविधानिक प्रावधान किया है. तो वह हटानेका वर्तमान सरकार कृषि कानून, एन आर सी, और कश्मीर के 370 और 35 ऐ को खत्म करने की कृति को देखकर लगता है कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी के ‘एक देश,एक भाषा, एक संविधान और एक निशाण’ वाले नारे को तथा सावरकर-गोलवलकरके ‘एकचालकानूवर्त’ भारत जिसमें दलित, आदिवासी, और अन्य भाषाओं, संस्कृति के लोगों को जोर जबरदस्ती से एक रंग में रंग कर तथाकथीत हिंदू राष्ट्र के लिए हमारे देश के संविधान को बदलने की कवायद करने के मार्ग के रोडे हटानेका कार्यक्रम जारी है.

फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु उसी कार्यक्रम का भाग है. भीमा कोरेगाव के केस में ले जाने के पहले उन्होंने झारखंड में आदिवासीयो के लिए संविधान की पाँच वी अनुसूची के तहत ‘हमारे गाँव में हमारा राज’ के घोषणा के तहत इस इलाके के ग्राम सभा की जबतक इजाजत नहीं है, तबतक इस इलाके में प्रवेश नहीं कर सकते. जैसे ‘पत्थलगढी’ यह मुंडा शब्द है. किसी पत्थर पर लिखें हूऐ शिलालेख के लिए जगह-जगह इस तरह के पत्थरों को लगाने का आंदोलन किया था. और बीजेपी की सरकार ने नक्सली बोलकर शेकडो लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. जिसमें फादर स्टेन स्वामी को भी गिरफ्तार किया गया था . झारखंड पार्टी की सरकार चुनकर आई है. तो हेमंत सोरेन ने उन्हें और अन्य सभी लोगों के उपर देशद्रोह के आरोप हटानेका काम कर के सबको रिहा करने का आदेश दिया है.
जर्मनी और इटली में सौ साल पहले यही प्रोग्राम किया गया है. और संघ की संपूर्ण प्रेरणा हिटलर-मुसोलिनी के फासीवाद के नाम पर जर्मनी और इटली के प्रयोगोंका अध्ययन संघ के एक संस्थापक डॉ. मुंजे जो फेब्रुवारी- मार्च 1931को लंडन से राउंड टेबल कान्फ्रेंस से लौटते हुए सवा महीने के लिए इटली में रहकर ,फासिस्ट इन्स्टीट्यूट ऑफ फिज़िकल एज्युकेशन, फासिस्ट इन्स्टीट्यूट ऑफ मिलिटरी स्कूल ,और सबसे अंतिम मे मुसोलिनी के साथ मुलाकात करके यह विवरण उनके अपने डायरी के तेरह पन्नोमे दर्ज है, और उन पन्नों की माइक्रो फिल्म दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु मेमोरियल में सुरक्षित रखी गई थी. लेकिन मुझे संदेह है कि गत सात साल से संघ परिवार ने भारत के सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं मे अपने ही लोगों को नियुक्त करके, सबसे पहले इस तरह के दस्तावेजों को नष्ट करने का काम अवश्य ही किया होगा.

तथाकथित विकास के नाम पर भारत के दस करोड़ आदिवासी पंद्रह करोड़ से भी ज्यादा दलित और दोनों समुदायों को मिला कर जितनी संख्या होती है. उतनी ही संख्या में अल्पसंख्यकों की आबादी यही देश की आधी से भी ज्यादा आबादी हो रही है. भारत की आधी से भी ज्यादा संख्या के लोगों को असुरक्षित मानसिकता में डालने का काम भारतीय समाज- स्वास्थ्य के लिए खतरा बढानेका काम संघ परिवार कर रहा है.
आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों के उपर निर्भर है.और उनकी आजीविका के जल – जंगल-जमीन को विकास के नाम पर दखल करने के खिलाफ ही ,पाँचवी अनुसूची में शामिल प्रावधानों के अनुसार ‘हमारे गाँव में हमारा राज’ के (‘मावा नाटे मावा राज’ डॉ. बी. डी. शर्मा जीसे प्रेरणा लेकर) ,इस इलाके के ग्राम सभा की जबतक इजाजत नहीं है, तबतक इस इलाके में प्रवेश करने की भी मनाई है. ऐसे पत्थरों पर लिख कर हर गांव के बाहर खड़े करने का आंदोलन झारखंड में फादर स्टेन स्वामी और अन्य साथियों ने चलाया था.
कुछ साल पहले महाराष्ट्र में चंद्रपूर जीले मे डाॅ. बी. डी. शर्मा जीसे प्रेरणा लेकर राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज के शिष्य गिताचार्य तुकाराम दादा ने इसी तरह के गाँव के बाहर पाँच वी अनुसूची के तहत ‘हमारे गाँव में हमारा राज’ के अनुसार इस इलाके के ग्राम सभा की जबतक इजाजत नहीं है. तबतक इस इलाके में प्रवेश नहीं कर सकते लिखें हूऐ बोर्ड लगाने का अभियान चलाया था. और महाराष्ट्र पुलिस ने राष्ट्र-द्रोही के आरोप में शेकडो लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. और उस समय महाराष्ट्र की विधानसभा का शितकालीन अधिवेशन नागपुर में चल रहा था. और तुकाराम दादा को लेकर मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख जी से मुलाकात करने के बाद मामला सुलझाने में कामयाबी मिली थी.

एल्गार परिषद के नाम पर गिरफ्तार करना शत-प्रतिशत झूठ मामला है. और इसीलिए आठ महीने से भी ज्यादा समय होने के बाद भी भारत के जाँच एजेंसी द्वारा फादर स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी को और उनके उपर क्या आरोप है ? यह एन आई ए कोर्ट को बता नहीं कर सकी.
और भारत की जेलों में इसी तरह के पाँच लाख के आसपास और उसमे से 70% कैदियों के उपर आरोप पत्र दाखिल नहीं है. और इन कैदियों में 90 % दलित आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का समावेश है.
एल्गार परिषद के नाम पर गिरफ्तार लोगों की चर्चा लगातार जारी है ,इसलिए यह बात काफी लोगों को मालूम है. लेकिन अन्य लोगों के संबंध में जयप्रकाश नारायण के बनाये हुए जनतंत्र समाज की तरफ से मै मांग करता हूँ कि भारत के सभी जेल मे बंद कैदियों की सही जानकारी और कौन किस आरोप में बंद है ? यह जानकारी के लिए संयुक्त याचिका दायर करनी चाहिए.
मै फादर स्टेन स्वामी को तीस साल से भी ज्यादा समय से जानता था. 1994 के बाद भारत के विभिन्न जन आंदोलन करने वाले लोगों के फोरम जन आंदोलनोका राष्ट्रीय समन्वय (एन ए पी एम) का मै संस्थापक संयोजक रहा हूँ . और मेरे हिस्से में भारत के सभी पूर्वी प्रदेश जिसमें बिहार-झारखंड, बंगाल, ओरिसा, आसाम, और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों की जिम्मेदारी का वहन मैंने किया है. उस दरमियांन मुझे झारखंड के कोयलकारो के आंदोलन के क्षेत्र लोहाजिमी तक जाने का अवसर मिला था. और लोकल होस्ट फादर स्टेन स्वामी ही थे. वह तमिलनाडु से 1965 में आदिवासी सवाल पर काम करने हेतु झारखंड का नागरिक बने और लगभग सभी आदिवासी बोलियों में सहजता के साथ बात करते थे. लोहाजिमी मे एक बहुत विशाल महुआ के पेड़ के नीचे लोहाजिमी के लोगों की सभा रखी थी. सभा से पहले अनौपचारिक बातचीत मे मैने एक बुजुर्ग आदिवासी महिला को पूछा कि “काहे को कोयलकारो परियोजना का विरोध कर रहे हो ? यहाँ से दुसरी जगह पर आपको नया घर मिलेगा ,और शायद मुआवजे मे कुछ पैसे भी” तो तपाकसे उस बुजुर्ग महिला ने कहा कि यह जो महुआ का पेड़ है. उसे वह सिंगबोआ (भगवान) बोल कर पूछी कि नई जगह पर यह मिलेगा ? यहाँ हमारे कितने पीढी के लोगों की शादी और अन्य उत्सव हुए है. यह हमारे सिंगबोआ को छोड़ कर हम कहाँ जायेंगे ?” सचमुच वह महुआ के पेड़ जैसे विशाल महुआ के पेड़ को मैंने कभी नहीं देखा था. कम-से-कम दो सौ साल पुराना होगा.
इस परियोजना का शिलान्यास करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री. नरसिंहा राव और तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री श्री. लालु प्रसाद यादव ने ऐलान कर दिया था कि हम कोयलकारो परियोजना का शिलान्यास किसी भी हालत में करेंगे. उस घोषणा की परवाह न करते हुए लाखों की संख्या में आदिवासी लोहाजिमी परिसर में जहाँ हेलिकॉप्टर उतरना था. उस जगह से उसकी आसपास की संपूर्ण आसमान के निचे जगह पर ही संपूर्ण परिवार के साथ पथ्थर के चूल्हो पर खाना बनाकर कई दिनों तक जमे रहे. और आज भी कोयलकारो परियोजना का शिलान्यास होना बाकी है. मैं जन-आंदोलनों के राष्ट्रीय संयोजन समिति का एक सदस्य होने के नाते लगभग सभी जन-आंदोलनों की खबर रखता था. लेकिन बगैर किसी विशेष नेता या नेत्री के अलावा लाखों की संख्या में इस तरह के जनआंदोलन के इतिहास का यह एकमात्र आंदोलन है. जो कि सही मायनों मे जनआंदोलन है. लोहाजिमी की बुजुर्ग महिला कि बात मुझे समस्त झारखंड के दो सौ से भी ज्यादा सालो के विद्रोह के प्रतीक लगता है. और उसमें तमिलनाडु से समाजशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त कीये हुए चौरासी साल के स्टेन स्वामी का योगदान भी एक कारक तत्व लगता है. इसलिए तिलका माझी, सीधू कानू, तंट्या भिल और शेकडो आदिवासी सवालों पर काम करने वाले लोगों की कडी मे फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु देख रहा हूँ. और जो लोग फादर स्टेन स्वामी की मृत्यु से मर्माहत है. उन सभी से विनम्र प्रार्थना है कि स्वामी को सही श्रध्दांजलि हमारे देश के संविधान के द्वारा आदिवासियों को सुरक्षित रखने के लिए दिया हुआ विशेष प्रावधान पाँच वी अनुसूची और छठवी को हटाने के वर्तमान सरकार के इरादे को रोकने के लिए गोलबंद होकर, हर हालत में संविधान के साथ चल रही छेडछाड को रोकने के लिए इकट्ठा लडाई करना यही सही श्रध्दांजलि होगी.













