(1920- 1922) के बाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे अंग्रेजी राज के खिलाफ असहयोग आंदोलन को चौरी- चौरा मे हुआ किसानों के विद्रोह मे हुई हिंसा के वजह से महात्मा गाँधी ने अचानक असहयोग आंदोलन को रोकने के फैसले और तुर्कस्थान मे भी अंग्रेजी राज के खिलाफ चले खिलाफत (1920-1924 ) के लिए आंदोलनो मे नाटकिय मोड आने के बाद भारत में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक सी. पी भिसीकर के द्वारा लिखित पुस्तक ‘पूर्वोक्त’ पृष 4 के अनुसार ” देश में एक परिवर्तन आ रहा था. 1921 के खिलाफत (920-1925) आंदोलन के बाद जो कुछ हुआ, उससे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्तब्ध रह गए. भारतीय मुसलमानों ने खुद ही साबित कर दिया कि वह पहले मुसलमान है, फिर बाद में भारतीय है, इसलिए अब तुर्की में खिलाफत आंदोलन समाप्त हो गया तो वे राष्ट्रीय स्वाधीनता के संयुक्त आंदोलन से अलग हट गए. समस्त वातावरण हिन्दू विरोधी विद्वेष से विषाक्त था. ‘अल्ला हो अकबर ‘ ही सुनाई पड रहा था,’भारत माता की जय’ कही नहीं. इसके फौरन बाद बन्नू, कोहट, मुलतान, कानपुर, नागपुर और अन्य स्थानों पर मुस्लिम दंगे हूए. डाक्टरजी कहते थे, कि “यह हिंदु – मुस्लिम दंगे नहीं थे यह सिर्फ मुस्लिम दंगे थे,क्योंकि हर जगह दंगो को वही शुरू करते थे,और वही हमले करते थे. ” इन दंगो का चरम बिंदु मोपला उपद्रव था, जिसमे आगजनी, लूट, बलात्कार और बलात – धर्मपरिवर्तन के कांड हुए. राष्ट्र स्तब्ध रह गया. डाक्टरजी ने सोचा” यह खिलाफत है या आफत” ?


1885 मे कांग्रेस की स्थापना के समय से ही कांग्रेस मे हिंदूत्ववादीयो तथा मुस्लिमों कट्टरपंथी धार्मिक समुदाय के लोगों का समावेश था. डॉ. हेडगेवार भी लोकमान्य तिलक के प्रभाव में थे. 1920 के 1 अगस्त को तिलक की मृत्यु होने के बाद, नागपुर में हुऐ 1920 के कांग्रेस अधिवेशन में ( जिसके स्वागत समिति मे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार थे.) महात्मा गाँधी के द्वारा रखा गया अस्पृश्यता विरोधी प्रस्ताव पारित होने की घटना को देख कर कांग्रेस के भितर के हिंदूत्ववादीयो के कान खड़े हो गए थे. ठीक हो या गलत, तत्कालीन परिस्थितियों में आवश्यक रहा हो या न रहा हो आर एस एस के संस्थापक और उनके सहयोगियों की यही समझ थी. और इसी आधार पर उन्होंने अलग मार्ग अपनाया. उसी पुस्तक से पता चलता है कि वह इस निष्कर्ष पर पहुच चुके थे :
” सिध्द हो गया कि भारत में हिंदू ही राष्ट्र है. और हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है. यथार्थ की और से आँखे मूंदनेवाले विचारकों ने राष्ट्र की राजनीतिक वास्तविकता को देखने से इन्कार कर दिया, लेकिन यथार्थवादी डॉ. हेडगेवार स्वप्न – जगत मे विवरण करने वाले जीव नहीं थे. सत्य प्रकट हो चुका था. हिंदू ही हिंदूस्थान को स्वतंत्र कर सकते थे. हिंदू संस्कृति की रक्षा वे ही कर सकते थे. देश को हिंदू – शक्ति ही बचा सकती थी. तथ्य यही साबित कर रहे थे. व्यक्तिगत चरित्र और मातृभूमि के प्रति अखंड प्रेम के आधार पर हिंदू यूवको को संघठीत करना ही था. और कोई दूसरा रास्ता नहीं था. महान आत्मा की पिडा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के रूप में अभिव्यक्त हो उठी. पांच मित्रों के साथ उन्होंने आर एस एस का दैनिक कार्यक्रम शुरू किया, यह महान दिवस 1925 की शुभ विजयादशमी का दिन था. ” लेकिन 1925 मे स्थापन किया गया संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का 15 अगस्त 1947 तक 22 वर्ष की यात्रा मे भारत के स्वतंत्रता संग्राम मे शामिल होने का कोई रेकॉर्ड न होना भी एक अनबुझी पहेली है. उल्टा अंग्रेजों की पुलिस- प्रशासन मे अपने लोगों को भर्ती करने का रेकॉर्ड है.


संघ के लोगों को डाक्टर हेडगेवार की भूमिका और महत्ता को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की आदत है. आर एस एस की समस्त वैचारिक धारणा आद्य – सरसंघचालक की चेतना में ईश्वर के वरदान, दैवी प्रेरणा, या राष्ट्रीय पुनर्जीवन की ज्वलंत इच्छा शक्ती की अभिव्यक्ती के रूप में उदित हुई. रहस्यवादी पंथों के अनुकरण पर स्थापित संघठन की जरूरत भले ही इसमे पूरी हो जाती हो, लेकिन यह बात तथ्यों के अनुकूल नहीं है.
उस विशिष्ट दिन, अर्थात 1925 की विजयादशमी को जो कुछ सामने आया उसे आर एस एस की शाखा भी नहीं बोल सकते . हेडगेवार के घर पर सिर्फ पाँच समान विचारधाराओं के व्यक्ति हिंन्दू समाज के जुझारू संघठन कर्ताओं की शिशुशाला या नर्सरी के रूप में काम करने वाली संस्था खोलने के उध्देश्य से एकत्र हुए थे.

डॉ. बी. एस. मुंजे

डॉ. एल. वी. परांजपे

डॉ. के. बी. हेडगेवार

बाबाराव सावरकर

यह पाँच लोग थे- (1) डॉ. बी. एस. मुंजे,( 2) डॉ. एल. वी. परांजपे (3) डॉ. के. बी. हेडगेवार (4) डॉक्टर थोलकर और (5) बाबाराव सावरकर. लेकिन आर एस एस के अधिकृत प्रकाशित कीए जाने वाले साहित्य मे सिर्फ पाँच का आकड़ा दिया जाता है,व्यक्तियों के नाम नहीं. क्योंकि सभी हिंदू महासभा के थे. और आरएसएस को हिंदू महासभा से अपना संबध प्रकट करने मे हिचक होती है. यही आरएसएस की कार्यप्रणाली शुरू से ही रही है. की एक विशिष्ठ व्यक्ती को केंद्र मे रख कर उसके इर्द-गिर्द एक काल्पनिक आभामंडल तैयार करते हूऐ, उसे प्रोजेक्ट करते हूऐ, अपने संघठन का विस्तार करने का प्रयास करते हैं. उदाहरण के लिए संस्थापकों मे से एक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा द्वितीय प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर इन दोनों को सबसे अधिक आज भी दिव्य पुरुषों की श्रेणी में रखकर उनका महिमामंडन करते हूऐ आरएसएस का स्वयंसेवक किसी भी तरह के प्रचार-प्रसार से दूर रह कर निष्ठापूर्वक अपना काम करता है. और यह बात सही है. क्योंकि पहले और दूसरे प्रमुख की तुलनामे तृतीय प्रमुख बाळासाहेब देवरस तथा चतुर्थ प्रमुख प्रोफेसर राजेंद्रसिंह और पांचवे प्रमुख के. एस. सुदर्शन और वर्तमान प्रमुख मोहन भागवत को लेकर हेडगेवार और गोलवलकर की तुलनामे ज्यादा चर्चा भी नहीं होती है.


बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर के 80 वे जन्मदिन 15 मई 1963 मे गोलवलकर ने भाषण में कहा कि राष्ट्रवाद का सिद्धांत की वैज्ञानिक व्याख्या मुझे सावरकर के ‘हिंदूत्व’ शिर्षक की किताब से ही मिली है. और उसी क्रम में उन्होंने सनसनीखेज उद्घाटन किया कि उनकी (We, Or Our Nationhood Defined 1939) के शिर्षक की किताब वस्तुतः बाबाराव सावरकर की ‘राष्ट्र मीमांसा’ पुस्तक का संक्षिप्त अनुवाद है.हालांकि बहुत सोच समझकर 12 – 15 वर्ष के स्कूली बच्चों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भरती करने के पहले बच्चे की निष्ठा और आज्ञाकारिता की क्षमता की छान-बीन करने के बाद ही शामिल करते हैं. कभी-कभी जो बच्चे शामिल होना चाहते थे लेकिन उनके चिकित्सक स्वभाव को देख कर उसे रोक देते थे . क्योंकि आरएसएस सेमी- रेजिमेंटेंड संघठन होने के कारण सवाल करने वाले या हिंदूओं के अलावा और किसी अन्य धर्मों के बच्चों को प्रवेश निषिद्ध होने के कारण मुझे खुद को आर एस एस से सत्तर के दशक में निकालने का उदाहरण है. मै खुद एक पूर्व स्वयंसेवक रहा हूँ. (1965-66 .) मुझे मेरे भूगोल के शिक्षक ने आर एस एस की शाखा में आने के लिए प्रेरित किया था. और मेरे शाखा में जाने के शुरुआती दिनों मे ही मैनें मेरे मुस्लिम मित्रों को भी शाखा में लाने की कोशिश की थी. उल्टा मुझे ही बाहर कर दिया है.

आर एस एस की सौ साल की यात्रा की संघटनात्मक ताकत क्या है ? और उसके साथ मुकाबला करने के लिए तैयारी किस तरह कर सकते हैं ? संघ की वर्तमान संघटनात्मक ताकत 1990 के बाद विश्व का सबसे बड़ा संगठन मे दो करोड़ रोज की गतिविधियों में भाग लेने वाले लोगों से लेकर, दैनिक 87000 शाखा, और14000 साप्ताहिक शाखा, 7000 मासिक शाखाओं , का विस्तार 86,293 देश के विभिन्न क्षेत्रों में यह 2016 के आंकड़े है. 2015 से 16 के दौरान 51,332 से 57000 की संख्या में शाखाओं की वृध्दि हुई है. 6000 प्रचारकों के सहयोग से. हिंदू राष्ट्रवाद का प्रचार-प्रसार करने के लिए लामबंद है. विदेशों में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में वहाँ पर काम कर रहे कुछ हिंदू शामिल है. इसलिए कल के विजयादशमी के दिन दिऐ भाषण में मोहन भागवत ने आने वाले समय में विदेशों में भी दौरा करने की घोषणा की है.

इसके अलावा 1980 बाद आखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिंदू परिषद, के अलावा, जिवन के हर क्षेत्र के लिए अलग – अलग इकाइयों का गठन किया है. जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, स्वदेशी जागरण मंच, अखिल भारतीय ग्राहक संघ , वरिष्ठ नागरिक मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, विज्ञान भारती, ज्ञान प्रबोधिनी, अधिवक्ता संघ, चिकित्सा संघ, पत्रकार संघ, लघु उद्योग भारती, राष्ट्र सेवीका समिति, विश्व हिन्दू परिषद, विवेकानंद केंद्र से लेकर जीवन के हर क्षेत्र की संस्थाओं के इसके अलावा देश(विदेश के विभिन्न स्थानों पर दिनदयाल शोध संस्थान, रामभाऊ म्हाळगी अकादमी, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे संस्थानो का निर्माण किया गया है.


वैसेही बाळासाहेब देवरस के संघप्रमुख बनने के बाद वह पहले संघप्रमुख थे. जिन्होंने पहचाना की राजनीति, भारत जैसे बहुजातिय देश में संघ का ब्राह्मणी स्वरूप बदलने की आवश्यकता महसूस की है. और उन्होंने उसे बदलने की, ऐतिहासिक सुरूवात भी की है . और इस कारण से उन्होंने आदिवासीयो मे तथा दलितों मे अपने काम को बढ़ावा देने के लिए ‘वनवासी कल्याण आश्रमों”, से लेकर समरसता मंच की स्थापना करके के, आरोग्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में, और मुख्यतः आदिवासीयो – दलितों के क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्रों में कल्याण कारी कार्यक्रम के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा, उनके कार्यकाल में 5000 प्रोजेक्ट से, 1989 में दस गुना वृद्धि करने के कारण 1998 में 1,40,000, 2012 में 1,65, 000 प्रोजेक्टो की संख्या बढी है. देवरस ने महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों के दौरे के बाद मे पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि “45-48 विभागीय. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की संघीय व्यवस्था को नहीं मानता है. इसलिए उन्होंने अपनी भाषा में और अपनी सुविधा से विभाग निर्माण किए हैं. कार्यकर्ताओं को शुद्ध रूप से सेवा के क्षेत्र में काम करने के लिए विशेष रूप लामबंद होने की जरूरत है. सबसे अहं बात बीजेपी और संघ के साथ, जनयोजनाओ को लेकर एक गोष्ठी आयोजित करने के बाद दोनों के बीच संवाद बढ़ाने की शुरुआत की. और नितीगत योजनाओं को लेकर जनता के साथ उसे उजागर करने की शुरुआत की. और इस तरह भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक मामलों में एक दूसरे के साथ आदान- प्रदान व सहयोग को मजबूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण शुरुआत भी की है.


गोलवलकर और हेडगेवार की तुलना में जो कि प्रथम और द्वितीय प्रमुख, लगभग संघ के 100 साल के सफर में 48 साल उस पदपर रहे हैं. और अगर देवरस के 21 साल मिला दें तो 69 साल का कार्यकाल, पहले तीन संघप्रमुखको का ही होता है. और वह संघ के सौ साल की उम्र में कम-से-कम तीन चौथाई हिस्सा आता है.और आज का राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ, उनकी मेहनत और कल्पना से ही मौजूद है. बहुत लोग संघ को ‘एकचालकानुवर्त’ जैसे आरोप करते हैं. और वह सही भी है. लेकिन आज संघ के देशभर के काम के फैलाव को देखते हुए लगता है कि उन्होंने बहुत ही जमीनी स्तर पर सोच विचार करने के बाद इस तरह का संगठनात्मक हिस्सा बनाया ताकि उसे स्थाई रूप दे सके .

बालासाहब देवरस ने, 1973-94 इक्कीस साल तक संघप्रमुख रहने के कार्यकाल में संघ के ब्राम्हणी और शहर केंद्रित स्वरूप को बदलकर ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर बहुजन- दलित और आदिवासियों के बीच कल्याण कारी कामो के लिए शेकडो युवा लोगों को भेजने का निर्णय लिया था. जिसका परिणाम आज उत्तर पूर्वी प्रदेश से लेकर. देश के आदिवासियों क्षेत्रों में और ग्रामीण क्षेत्रों में भी संघ की पैठ बनाने के लिए, देवरस के समय काफी बड़ा काम हुआ है.

उसी तरह इक्कीसवीं शताब्दी का सज्ञान लेते हुए उन्होंने अपनी निती और सदस्यों के बदलाव के लिए विशेष रूप से प्रयास किया है. 1990 राष्ट्रीय आर्थिक विकास 400 %बढ़ने के कारण विश्व बैंक हवाले से शहरी करण 1960 की तुलना में 2015 में डबल हो गया जो 1960 में 18 %था 1990 में 26 %और 2015 में 33% किन्से इन्स्टिटय़ूट के अनुसार मध्य वर्ग बढने की गति 14 %से 2005 में, 29 % 2015 में और उनके अंदाज के अनुसार 2025 में 44 % ! जिसके परिणामस्वरूप मोबाईल फोन इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि उसका सबसे बड़ा उदाहरण है. और इन्हें अपनी गिरफ्त में लेने के लिए नरेंद्र मोदी भारत के पहले राजनेता है. जिन्होंने 2007 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए, पहली बार थायलंड की एक सायबर कंपनी को किराये से मोबाइल धारकों के साथ लेकर प्रचार- प्रसार करने की शुरुआत की है. जो शुरू में कुछ हजारों में थे अब करोड़ों की संख्या में है. जिसे कुछ लोग ‘सेफ्रोन डिजिटल आर्मि भी कहते है. “और यह लोग बारह महीनों चौबीसों घण्टों अपने- प्रचार और दुसरे विचारों के लोगों के खिलाफ बदनामी की मुहिम लगातार करते हैं. जिसके लिए फेक न्यूज, उनमें फेक जानकारियां यहां तक कि बंगला देश, पाकिस्तान, अफगाणिस्तान, सिरिया की घटनाओं को भारत में हुई है. उदाहरण के लिए पहलगाम हमले के बाद किया गया आँपरेश सिंदूर के दौरान लाहोर, कराची, रावलपिंडी, इस्लामाबाद तक भारत ने कब्जा कर लिया है . जैसे समाचार हमारे देश के मुख्य धारा के न्यूज चैनलों ने प्रसारित करने के उदाहरण सामने है.


1925 में डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार,और उनके साथ और चार महाराष्ट्रियन ब्राम्हणों ने मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को स्थापित करने के बाद पंद्रह वर्ष उन्होंने सरसंघचालक का पद संभालने के बाद, अपनी मृत्यु के पहले ही चार साल तक प्रचारक के रूप रहे श्री. गुरुजी उर्फ माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर को 1940 में, डाॅ. हेडगेवार की मृत्यु के बाद 1973 तक तैतीस साल संघ के इतिहासमेसे सबसे लंबे समय तक, कमान संभालने के कारण वर्तमान समय का संघ और उसकी कार्यप्रणाली से लेकर हिंदुत्व की बौद्धिक बैठक बनाने का काम किया है. उनकी मृत्यू के बाद, महाराष्ट्र के ही हेडगेवार के शिष्यों में से एक बालासाहब उर्फ मधुकर दत्तात्रय देवरस 1973 – 94 तक लगभग इक्कीस साल संघ प्रमुख रहे हैं. जन्म से ब्राम्हण रहने के बावजूद और संघ को बहुत लोग सिर्फ ब्राम्हणों का संघठन बोलने की गलती करते हैं. लेकिन देवरस ने अपने कार्यकाल में संघ में पिछड़े वर्ग के लोगों से लेकर दलित, लोगों को भी प्रवेश देने की शुरुआत की है. और इसिलिये आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू , पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद, तथा वर्तमान उपराष्ट्रपति राधाकृष्ण जैसे बहुजन, दलित और आदिवासियों के लोग इसके सबसे बडे उदाहरण है. और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को छोड़कर अन्य भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री बहुजन समाज के है.


और बालासाहब देवरस ने नब्बे के दशक में, नई आर्थिक निती के दौरान तथाकथित ग्लोबलायझेशन के आपाधापी के दौर का फायदा उठाकर पहचान की राजनीति को उछालने के कारण ही बाबरी मस्जिद – राममंदिर आंदोलन और “गर्व से कहो कि हम हिंदु हैं” के स्टिकर हर दरवाजे पर लगाने से लेकर भागलपुर – गुजरात के दंगो से लेकर बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने के लिए सबसे अधिक संख्या में बहुजन समाज के लोगों का समावेश रहा है.


और वह संघप्रमुख रहते हुए ही 1985-86 में शाहबानो को लेकर कठमुल्ला मुस्लिम समुदाय के लोगों की तरफ से उठाया गया विवाद के मामले ने और उसमे से निकला हुआ नारा “सवाल आस्था का है, कानून का नही.” को हथियार बनाकर संपूर्ण देश में राम जन्मभूमि विवाद के आड में सोमनाथ से आयोध्या तक कि रथयात्राओ का दौर शुरू कर दिया. और उस कारण लोगों के रोजमर्रे के सवाल, हाशिये पर जाने की शुरूआत हुई. और इसी कारण नई आर्थिक नितियो से लेकर, महंगाई, बेरोजगारी, विस्थापन, पर्यावरणीय जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर के आंदोलनों की जगह, जनलोकपाल जैसे, अजिबोगरीब मुद्दे पर, आंदोलन आया भी. और बीजेपी को सत्ता में चढाकर ठंडा भी हो गया. मतलब इस आंदोलन के पडदे के पिछे संघ के लोग थे. जो रोज सुबह पांच बजे आज दिनभर जंतर-मंतर पर क्या होगा ? यह तय किया करते थे. यहां तक कि आज दिन में कौन से नारे लगाने है. और कौन से नहीं. और स्टेजपर कौन रहेगा और कौन नहीं. मतलब जनलोकपाल एक जोकपाल बन कर रहा. अफसोसजनक बात है, कि उस समय कुछ प्रख्यात वकील, प्रोफेसर तथा एक्टिव्हिस्ट लोग भी उस हवा में बह गए थे. जिन्हें बाद में दुध में गिरी हुई मख्खि की तरह निकाल कर बाहर फेक दिया है. और दलितों से लेकर, पिछडी जातियों से लेकर, आदिवासीयो तक पैठ बनाने के कारण इन सब वर्गों में कम्युनिस्ट , सोशलिस्ट, आंबेडकरी तथा कई स्वयंसेवी संस्था, विभिन्न प्रकार के मज़दूरों के संघठन जो सेक्युलर थे. लेकिन उनके पचास साल पहले के कामों के बावजूद भले ही वह विस्थापन के होंगे या पर्यावरण संरक्षण के पहचान की राजनीति में. सब के सब असंबद्ध होकर रह गए. और देखते – देखते हिंदुत्ववादीयो के चुंगुल में ज्यादातर लोग चलें गए और भागलपुर से लेकर गुजरात तक के दंगों में हरावल दस्ते के रूप में काम कीए हैं. और बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिजाब, लवजेहाद, मॉबलिंचिग जैसे, हमलों में आगे रहते हैं.

और समस्त उत्तर भारत की, सत्तर के दशक में शुरू हुआ अगड़ी – पिछडी जातियों की राजनीति में मंडल की जगह कमंडल की, राजनीति करने में सक्षम हुए. इसलिये ज्यादातर पिछडी जातियों के लोगों ने, ‘मंदिर वहीं बनायेंगे के’ आंदोलन में शामिल होना शुरु किया. और उस कारण, उत्तर भारत की राजनीति में कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार जैसे लोगों को आगे बढ़ाना शुरू किया और बसपा तथा सपा तथा समता पार्टी. मतलब किसी जमाने के समाजवादी जॉर्ज फर्नाडिसका और उनके चेले नितिश कुमार तथा रामविलास पासवान का एन डी ए के अध्यक्ष बनने तक का सफर उनकी समाजवादी राजनीतिक आत्महत्या का और भाजपा को उत्तर भारत में संजीवनी देने का सफर रहा.


अन्यथा नरेंद्र मोदी जैसे आदमी को भारत का प्रधानमंत्री के पद संभालने के लिए चुना नही गया होता. सौ साल पहले के, नाजीवादी जर्मनी की स्थिति में आज भारत को ले जाने के लिए संघ परिवार के अथक प्रयासों का फल है. आज की नरेंद्र मोदी की दिल्ली में 11 सालों से भी अधिक समय से चल रही सरकारने सत्ताधारी बनने के पहले ही दौर में नोटबंदी जैसा तुलकी निर्णय से देश की आर्थिक स्थिति चरमराई, सामान्य लोगों के हाल बेहाल हो गए थे. हर साल दो करोड़ रोजगार देने की घोषणा करने वाले ने उल्टा उससे अधिक लोगों को बेरोजगारी की मार झेलने के लिए लगा दिया है. और महंगाई आसमान को छूने लगी सत्ताधारी बनने के पहले घरेलू गैस तिनसौ रुपये से कितना गुना बढ़ गया है ? और पेट्रोल – डिझेल के दामों से लेकर दाल, सब्जी और घरेलू चिजो के दाम कितने बढे ? और किसानों के साथ कितनी नाइंसाफी की. लेकिन उसके बावजूद 2024 मे तिसरी बार सत्ता में वापसी का रहस्य है . जो अब चुनाव में की जा रही धांधलीया को देखकर सामने आने से साफ हो रही है. क्योंकि हमारे देश के प्रशासनिक सेवाओं के भीतर आर एस एस ने अपने स्थापना के तुरंत बाद ही, स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी बनाते हूऐ अपने स्वयंसेवकों को पूर्वनियोजित योजनाओं के साथ भर्ती कराने का काम किया है. इसलिए आज पुलिस- प्रशासन, चुनाव आयोग तथा न्यायपालिका की मदद से अपने आप को सत्ता में बनाऐ रखने मे कामयाब हो रहे हैं.

आर एस एस संघठन की रचना, उसके कार्यशैली तथा उसने बनाये हुए अन्य क्षेत्रों में अपनी, शाखा- उपशाखा और संख्या के हिसाब से संघ के विस्तार के ग्राफ यहां तक की अपनी राजनीतिक ईकाई बीजेपी की भी मतों के अनुपात से लेकर संख्यात्मक बढत को देखते हुए पता चलता है, कि लगभग देश की आधी से भी अधिक आबादी को संघ ने अपने प्रभाव में ले लिया है. और शिक्षा के क्षेत्र में, आज भारत के सबसे ज्यादा विद्यार्थियों से लेकर शिक्षक और व्हाइस चांसलरोकी संख्या देखकर लगता है कि आज की तारीख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बराबरी कर सकने की क्षमता और किसी भी संगठन की नही है ऐसा आभासी चित्र बनाया जा रहा है.

मै मेरे जीवन के 60 साल से भी अधिक समय से, राष्ट्र सेवा दल के काम को देखते हुए मेरी समझ आई तबसे यह चिंता और चिंतन का विषय रहा है. कि राष्ट्र सेवा दल को भी इस जून महीने में 84 साल पूरे हो गए हैं. और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी शुरू हो गई है. हमारे और उनके उम्र में सिर्फ सोलह साल का फर्क है. जबकि हमारे स्थापना के दुसरे ही साल, मुंबई जैसे शहर में राष्ट्र सेवा दल की 125 शाखाओं का फैलाव था. और मुंबई के मिलों के जैसे, तीन पारीयो में, 125 शाखाओं की गतिविधियों का आयोजन होता था यह बात मुझे 2017 में पालघर के 90 साल से भी अधिक उम्र के नवनित भाई शाह ने, अपनी मुलाकात के दौरान मुझे बताई है. वैसाही 9 अगस्त 1942 भारत छोडो आंदोलन के ऐलान के बाद, समस्त महाराष्ट्र में मुझे ‘भारत छोडो आंदोलन’ के पचहत्तर साल के उपलक्ष्य में 2017 मे राष्ट्र सेवा दल के तरफसे आयोजित, यात्रा के दौरान पहली बार पता चला है कि अकेले राष्ट्र सेवा दल के एक हजार से अधिक शहिद उम्र के तीस सालों से भी कम समय के हुए हैं.
वहीं गोवा मुक्ती की लड़ाई में भी गोवा, महाराष्ट्र और कर्नाटक के बेलगाव तथा अन्य सिमावर्ति इलाके के शेकडो राष्ट्र सेवा दल के सैनिकों ने, जिसमें बैरिस्टर नाथ पै से लेकर मधू लिमये, मधू दंडवते, नानासाहेब गोरे, महादेव जोशी, एडवोकेट राम आपटे, मेनसे, वासू देशपांडे से लेकर शेकडो ने गोवा के आजादी के लडाई में हिस्सा लिया है. वैसे ही हैदराबाद के निजाम के खिलाफ मराठवाडा राष्ट्र सेवा दल के प्रोफेसर नरहर कुरुंदकर से लेकर अनंतराव भालेराव, डॉ. बापु कालदाते, गंगाप्रसाद अग्रवाल, विनायकराव चारठानकर, गोविंद भाई श्रॉफ, जस्टिस नरेंद्र चपळगावकर जैसे शेकडो लोगो ने अपनी जान की परवाह किए बिना सहभागिता की है. मतलब स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर हैदराबाद मुक्ति आंदोलन, तथा पोर्तुगीजों से गोवा के मुक्ति मे अपनी जान की परवाह किए बगैर हजारों की संख्या में राष्ट्र सेवा दल के लोगों की सहभागिता रहने के बावजूद, आज यह विडंबना है कि इन सभी लडाईयो से नादारद रहने वाले संघी आज राष्ट्रद्रोही के और राष्ट्रभक्ति के सर्टिफिकेट दे रहे हैं.


और 1990 के तथाकथित जागतिकीकरण के संक्रमण काल. और बाबरी मस्जिद – राम मंदिर आंदोलन के कारण कई सारी आर्थिक समस्याओं के रहते हुए जितने लोगों के आर्थिक सवालों को लेकर आंदोलन होने चाहिए थे. उससे अधिक धार्मिक आधार पर रथयात्राओ से लेकर कारसेवा तक “सवाल आस्था का है, कानून का नही” इसनारे पर इकठ्ठे हो गए . और सबसे बडा उदाहरण उत्तर प्रदेश के चुनाव से लेकर गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओरिसा, गोंवा तथा उत्तर पूर्व में आसाम के चुनाव में इतिहास के क्रम में सबसे अधिक महंगाई, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार के बावजूद सिर्फ धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर अगडे – पिछड़ा सिद्धांत से लेकर सभी तरह के गणितीय हिसाब-किताब को मात देते हुए पुलवामा तथा पहलगाम के आतंकवादी हमलो के आड में “गर्व से कहो कि हम हिंदु हैं” कि आंधी पर चुनाव की नैया पार कर के ले जा रहे हैं. मतलब सौ साल पुरे होने के पहले ही अघोषित हिंदुराष्ट्र, बनाने में संघ को कामयाबियां हासिल हो रही है. यह वास्तव स्वीकार करने के बाद उससे निपटने के लिए पहल करने की आवश्यकता है.

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