राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक ईकाई भाजपा बार – बार प्रचार – प्रसार करता है कि कॉंग्रेस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ कैसे- कैसे अन्याय किया है ? लेकिन उन्होंने खुद उनके साथ कौन सा बर्ताव किया है ? नेताजी सुभाष चंद्र बोस. आजाद हिंद फौज का गठन करने के तैयारी के दौरान भूमिगत रुप से कलकत्ता से मुंबई रेल से यात्रा करते हुए, नागपुर रेल्वे स्टेशन के पहले वाले आउटर में तकनीकी वजह से ट्रेन कुछ देर के लिए खड़ी थी . तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने कंपार्टमेंट की खिड़की के बाहर देखा की खुले मैदान में एक डंडे पर भगवा झंडा फहराकर, खाकी हाफ चड्डी और सफेद शर्ट तथा सरपर काली टोपी पहने हुए, कुछ युवाओं का समुह लाठी से कुछ मार्शल आर्ट्स का प्रदर्शन कर रहे थे. तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किसी सहप्रवासी से पुछा की यह कौन सा संगठन है ? उस प्रवासी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक है. यह देखकर वह प्रभावित हुए. और मन-ही-मन में सोचा की अपने आजाद हिंद सेना के लिए इसका उपयोग हो सकता है .और उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और प्रमुख डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार नासिक में थे. इसलिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस डॉ. हेडगेवार से मिलने के लिए मुंबई में ठहरकर अपने सहयोगी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों मे से एक बालाजी हुद्दार को मिटिंग की तैयारी करने के लिए विशेष रूप से नासिक भेजा था. इस प्रसंग पर श्री. बालाजी हुद्दार ने खुद इलेस्ट्रेटेड विकली में लिखा हुआ लेख से उजागर किया है. लेख में उन्होंने विस्तार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक तथा प्रथम प्रमुख डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिलने से किस तरह झुठे बिमारी का बहाना बनाकर टालने का काम किया है.

श्री. बालाजी हुद्दार के इस लेख से साफ हो जाता है .यह प्रसंग 1939 के दौरान नेताजी भारत को स्वतंत्र करने के लिए विदेश जाने के पहले का है. जिसका मुख्य उद्देश्य था ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आई एन ए में शामिल कराना . इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से मिलने के लिए की गई कोशिश का यह प्रसंग है . और इस कोशिश में मध्यस्थता करने वाले बालाजी हुद्दार जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक का कहना था कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सिर्फ हिंदू धर्म में की गौरवशाली अतीत के चर्चाओं में व्यस्त रहता है, लेकिन वर्तमान स्वतंत्रता के आंदोलन से तय करते हुए दूर रहता है.” यह देखकर बालाजी हुद्दार ने कहा कि “संघ अपने खुद के ही इर्द – गिर्द घुमने के अलावा कुछ नहीं कर सकता”.

बालाजी हुद्दार ने स्पेन के तानाशाह फ्रॅंको के खिलाफ स्पेन में जाकर, आंतराष्ट्रीय ब्रिगेड के साथ मिलकर लड़ाई में हिस्सा लिया था. और यह बात नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी मालूम थी. इसलिए नेताजी ने आई एन ए की स्थापना करने की कोशिश करने के क्रम में, उन्होंने त्रिपुरी कांग्रेस के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. और आजाद हिंद फौज की स्थापना करके उसके द्वारा अंग्रेजी राज के खिलाफ डायरेक्ट युद्ध करने की तैयारी शुरू कर दी थी . और उसमे शामिल करने के लिए सबसे पहले भारत में कोशिश शुरू की थी. और इसिलिये वह मुंबई आए हुए थे. और उन्होंने बालासाहब हुद्दार को एक दिन रात के समय मिलने के लिए बुलाया था. और बालाजी हुद्दार ने देखा कि कोई शाह नाम के सज्जन भी नेताजी के साथ थे, नेताजी ने कहा कि मैने नासिक में जाकर डॉ. हेडगेवार से मिलकर सुभाष बाबु के साथ मुलाकात तय करने के लिए कहा. हेडगेवार उस समय नासिक में ठहरे हुए थे. इसलिए मैं और शहा मिलकर नाशिक गए,और मै हेडगेवार से मिलने के लिए उनके कमरे में अकेला चला गया, तो देखा कि हेडगेवार अन्य स्वयंसेवकों के साथ हास्य – विनोद कर रहे थे. मैंने स्वयंसेवकों को थोडी देर के लिए बाहर जाने के लिए कहा, और हेडगेवार जी को कहा कि “मैं मुख्य रूप से आपको नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कहने पर मिलने आया हूँ. और नेताजी आपसे मिलने के लिए काफी इच्छुक है ,और इसलिए उन्होंने मुझे भेजा है .” तो हेडगेवार बोले कि “मैं बहुत बिमार हूँ ,और मै बोल भी नहीं सकता .इसलिए मैं किसी से भी मिलने के लिए असमर्थ हूँ .” मैंने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की “कि कांग्रेस के इतने बड़े नेता को मिलने का मौका गवाना नही चाहिए” तो वह बार-बार अपनी बिमारी का बहाना बता रहे थे. मैंने कहा कि बाहर उनके करीबी शाह नाम के सज्जन खड़े है, कम-से-कम उन्हें यह सब आप खुद बता दिजिए, अन्यथा नेताजी को लगेगा कि यह भेट मैने ही नहीं होने दी . लेकिन यह बात भी उन्होंने नही मानी, और बिस्तर पर सोते हुए अपने सरपर चादर ओढ ली, इसलिए मैं मजबुरन बाहर चला आया. और जो लोग जो पहले से ही हेडगेवार के साथ हास्य-व्यंग्य कर रहे थे. वह मेरे कमरे से बाहर निकल ने के बाद तुरंत उस कमरे के अंदर जाते ही पुनः हास्य – व्यंग्य के फव्वारे फुट रहे थे. और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की यह पहल जापान और जर्मनी में मदद के लिए जाने के पहले की है .”
वास्तव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आजादी के आंदोलन में शामिल होकर अंग्रेजोंकी नाराजगी मोल लेना नहीं चाहता था. उल्टा अंग्रेजी सेना तथा पुलिस में भर्ती करने के अभियान में जुटा हुआ था. और अंग्रेजी सरकार मुस्लिम लीग तथा हिंदू महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का फायदा उठाकर बाटो और राज करो निति के अंतर्गत उन दोनों संगठनों का इस्तेमाल कर रहे थे. आंदोलनकारियों की गतिविधियों पर नजर रखते हुए अंग्रेजोंकी मदद करने में व्यस्त होने की वजह से, उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल नहीं होने का निर्णय अपने संघठन को कोई आंच नहीं आनी चाहिए इस लिए अंग्रेजो की मदद कर रहे थे.
हालांकि बालाजी हुद्दार के जैसे और भी स्वयंसेवक स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए छटपटा रहे थे. तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें संगठन से हटाने का काम किया है. जिसमें बालाजी हुद्दार संस्थापक सदस्य रहते हुए उन्हें संगठन से निकाल बाहर किया है.

वैसे ही इस 14 अगस्त को बटवारे का दिवस मनाया गया है. बटवारे को रोकने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उस समय भाजपा का जन्म नहीं हुआ था. तो हिंदू महासभा यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक ईकाई थी. उन्होंने बटवारे को रोकने के लिए कौन-सा प्रयास किया ? उल्टा भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कॉंग्रेस ने सभी राज्यों की सरकारों से इस्तीफा देकर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ घोषणा देते हुए आंदोलन किया. उसमे शामिल होना तो दूर, उल्टा मुस्लिम लीग जिसने पाकिस्तान बनने का लाहोर प्रस्ताव 1940 मे पारित करने के बावजूद. अखंड भारत का मंत्र का जप करने वाले हिंदू महासभा और बटवारे का प्रस्ताव पारित करने वाली मुस्लिम लीग के साथ हिंदू महासभा का भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कॉमनमिनिमम प्रोग्राम क्या तय हुआ था ? कौन से आधारपर उन्होंने मुस्लिम लीग जैसे पाकिस्तान की मांग करने वाली पार्टि के साथ विभिन्न राज्यों में सरकारों का गठन किया गया ? और बंगाल सरकार में शामिल डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने तो तत्कालीन व्हायसराय को दस मुद्दों का पत्र लिखकर भारत छोड़ो आंदोलनकारियों को कैसे रोका जा सकता है ? इस आशय का प्रस्ताव दिया था. क्या इन प्रसंगों को देखने के बाद आर एस एस को कोई नैतिक अधिकार है ? कि वह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन तथा बटवारे के खिलाफ किसी भी गतिविधियों में में शामिल था ? और आज बटवारे के दिवस मनाने से लेकर तिरंगा यात्रा का पाखंड करना कहातक उचित है ?
आर एस एस की स्थापना 1925 मे हुई है. इसलिए यह वर्ष आर एस एस की शताब्दी मनाने का वर्ष है. और इसी महीने के अंत में मोहन भागवत दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिन की गोष्ठी करने जा रहे हैं. जिसमें देश के जाने-माने व्यक्तियों को आमंत्रित किया गया है. तो मेरा आर एस एस के प्रमुख श्री. मोहन भागवत को विनम्र सुझाव है कि सौ वर्ष की यात्रा कैसे पार की है ? और उस कारण उसे क्या – क्या उपलब्धियां प्राप्त हुई है ? इसपर ईमानदारी से आत्मचिंतन करे. और जब आजादी के आंदोलन के सब से बडे दौर (1920-47) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जमीन पर खडा हो चुका था. और उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को 23 साल होने के दौरान उन्होंने सचमुच ही क्या योगदान दिया था ? इसपर अवश्य मंथन करे, क्योंकि आज देशभक्ति का सब से अधिक प्रदर्शन करने वाले संगठनने हमारे देश की आजादी के लिए सचमुच क्या योगदान दिया है ? और देश को बटवारे से रोकने के लिए क्या किया है ?
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