राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय संघ प्रमुख सबसे लंबे समय तक रहे हुए ! (1940 – 73 ) श्री. माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने, आज़ादी के तीन साल के बाद, अपनी खुद की राजनीतिक ईकाई ( 1950 ) जिसका नाम उन्होंने जनसंघ रखा था !
जिसे आज भाजपा बोला जाता है ! और उसके पिछे के उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ पुंजिपति, उच्च वर्ग और उच्च वर्णो की रक्षा करने के लिए स्थापित किया गया है ! जनसंघ के 1950-1977 सत्ताईस साल और बीच के तीन साल जनता पार्टी मे जाकर वापस आने के बाद जनसंघ ने 1980 से अपने नाम को बदल कर भारतीय जनता पार्टी करते हुए दुसरी पारी की शुरुआत की जिसे आज 45 वर्ष हो रहे हैं इस पार्टी का 73 साल का सफर मुक्त अर्थव्यवस्था तथा तथा सवर्ण वर्ग के हितों की रक्षा करने के अलावा और कोई इतिहास नहीं है और यही उसके मातृ संघठन आर एस एस का भी इतिहास है आए दिन दलित अत्याचार की घटनाएं घटित हो रही है और आर एस एस ने कभी उनके खिलाफ आवाज उठाने का उदाहरण एक भी नहीं है. इससे ही साबित होता है कि यह सिर्फ सवर्ण समाज और आर्थिक स्तर पर पुंजिपतियो के हितों की रक्षा करने के लिए ही बना है. भाजपा के दस साल के कार्यकाल में तो और भी साफ नजर आ रहा है कि गरिबो को हजार दो हजारों के लालच के भ्रम में फंसाकर पुंजिपतियो के लिए हमारे देश की नैसर्गिक संपत्ती से लेकर बैंक तथा एल आई सी जैसे वित्तीय संस्थानों को किस तरह पुंजिपतियो के लिए सभी नियम तथा कानूनों को ताक पर रखकर धन मुहैय्या करा रहे हैं. अभी एक हफ्ते भर पहले की खबर है कि अंबानी समुह ने किसी बैंक से 49000 करोड रुपये का कर्जा लिया था और वह अब नहीं दे पा रहा तो उसने 450 करोड रुपये देकर 470550 रुपये माफ किया गया है क्या यही बैंक किसी छोटे कर्जदारों के साथ ऐसा ही व्यवहार करती है ? और इतनी बड़ी रकम हमारे अपने देश की बैंक अंबानी जैसे अपने बेटे की शादी मे लगभग उतना ही पैसा खर्चा करते हुए शादी कर सकता है उसकी संपत्ति रहने वाले मकान से लेकर रिफाइनरी, तथा इतनी बड़े-बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों के रहते हुए उसे इतनी बड़ी रकम माफ कर देना किस बात का परिचायक है ?
और इसिलिये वर्तमान सरकारने समाजवाद और सेक्युलरिज्म शब्दों को संविधान की नई कापी में से हटाकर, नई संसद में पहले ही दिन और पहले ही अधिवेशन में अपने इरादे को स्पष्ट कर दिया है. वैसे भी इस दल की स्थापना से ही राजा, महाजन और मुखतः सवर्ण जाती और सिर्फ पुरुषों का दबदबा रहा है. लेकिन धीरे-धीरे संसदीय राजनीति का तकाजे को देखते हुए सतही तौर पर ही सही महिलाओं से लेकर पिछडी जातीयो के लोगों को भी शामिल किया गया. और अब तो खुद प्रधानमंत्री अपने आप को मै पिछडी जाती से हूँ. ऐसा चुनाव प्रचार में चिल्ला – चिल्लाकर बताने के लिए मजबूर हुए है. लेकिन पिछले दस सालों का ट्रॅक रेकॉर्ड देखने से, उन्होंने सिर्फ चंद पुंजिपतियो की तिजोरीया भरने के अलावा दलितों, आदिवासियों से लेकर महिलाओं के लिए क्या किया है ?
हालांकि अपने संबोधन में 140 करोड आबादी का ‘टिम इंडिया’ बोला करते थे. लेकिन अब कुछ दिनों से ‘इंडिया’ शब्द से नफरत करने लगे हैं. सो ‘टीम भारत’ भी बोला तो भी 140 करोड़ में आधी से अधिक आबादी वाले दलित पंद्रह प्रतिशत, अल्पसंख्यक उसिके आसपास की जनसंख्या है, और आदिवासियों तथा पिछडी जातीयो की जनसंख्या मीला ने से आबादी का तिन चौथाई हिस्सा सिर्फ इन्हीं लोगों का होता है. लेकिन दस सालों में इस आबादी के हिस्से में कुछ भी आया नही. उल्टा उन्हें बेरोजगारी, महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है.
और यही गुरु गोलवलकर है, जिन्होंने 26 नवंबर 1949 के दिन हमारे संविधान के शिल्पकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने और अन्य सदस्यों ने मिलकर, लगभग तीन साल की अथक कोशिश से तैयार किया हुआ संविधान की, हमारी संविधान सभा में घोषणा की थी, तो संघ का अंग्रेजी मुखपत्र ‘ऑर्गनायझरके’ 30 नवंबरके लेख में कहा गया कि, “इस देश- विदेश के विभिन्न संविधानों की नकल करके गुदढी जैसे संविधान जिसमें कुछ भी भारतीयत्वका कुछ भी समावेश नही है.
(“But in our constitution there is no mention of the unique constitutional development in ancient Bharat. Manu’s laws were written long before lycurgus of Sparta or Solon of Persia. To this day his laws as enunciated in the Manusmriti excite the administration of the World and elicit spontaneous obedience and conformity. But to our Constitutional Pundits that means nothing. “)
जिस सत्ताधारी दल की मातृसंस्था हमारे संविधान की घोषणा के तुरंत बाद अपनी राय घोषित कर चुकी है. और उसकी जगह मनुस्मृति जैसे स्रि – शुद्रो के बारे में अमानवीय स्तर के भेदभावपूर्ण नियम और परंपराओं से भरा पडा हजारों वर्ष पुरानी, सडी- गली संहिता को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और उनके सहयोगियों ने मिलकर बनाएं गए नए सविंधान को सिर्फ नकारा नहीं उसके जगह पर मनुस्मृति जैसे विषमता और अमानवीय नियमों को भारत के आदर्श संविधान कहने वाले लोगों की मानसिकता कैसी है ? तो अब उन्होंने सिर्फ समाजवाद या सेक्युलरिज्म शब्द ही नहीं हटाया, बल्कि आने वाले दिनों में संपूर्ण संविधान को ही खत्म कर के मनुस्मृति लाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है. दो शब्दों को निकालने की यह सिर्फ शुरुआत है.
और वह आज चुनावी राजनीति के रहते हुए, कैसे – कैसे मोड ले रहे हैं ? यह वर्तमान समय में भारत की लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण का बिल, और वह भी पूरी गोपनीयता के साथ, और उसमें भी जनगणना और मतदारसंघों की पुर्नरचना, मतलब और पंद्रह से बीस साल इसे लागू करने के लिए लगेंगे. मतलब इस आशा में आप इसी दल को लगातार तबतक चुनकर दिजीए तो, भारतीय जनता पार्टी एक कदम भी संघ की इजाजत के बगैर चल नहीं सकती, भले ही संघ कहता होगा की” हमारा संघठन सांस्कृतिक संघठन है, और राजनीति से हमारा कोई भी संबंध नहीं है. ”
संघ स्वयंसेवक श्री. अटलबिहारी वाजपेयी जब भारत के पहलीबार प्रधानमंत्री बनने के बाद नागपुर आए थे, और तत्कालीन संघ प्रमुख श्री. कप्पू सुदर्शन के साथ मुलाकात की थी. उस समय पत्रकारों ने उन्हें पुछा की “आप भारत के प्रधानमंत्री हो या संघ के स्वयंसेवक ?” तो अटलजी ने जवाब दिया था कि “सबसे पहले मैं संघ स्वयंसेवक हूँ. और बाद में भारत का प्रधानमंत्री”.
और हमारा राजनीति के साथ कुछ भी संबंध नहीं है, कहने वाले संघ के प्रमुख श्री. मोहन भागवत ने इंडिया गठबंधन के नाम को लेकर भारत नाम रहते हुए इंडिया विदेशी नाम की क्या जरुरत थी ? से लेकर अभी हप्ताह भर पहले पुणे में तथाकथित चिंतन बैठक में, शामिल लोगों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा शामिल थे वह क्या पुणे की मशहूर मीठाई श्रीखंड खाने के लिए आए थे ?
1950 में जनसंघ की स्थापना करने वाले द्वितीय संघ प्रमुख, और हमारे संविधान से लेकर समय – समय पर हमारे देश की राजनीतिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय हमारे संघठन का राजनीति से कोई संबंध नहीं है,यह कहना कितना बडा पाखंड है ?
वर्तमान सरकार सत्ता में आने के बाद भारत के सभी संस्थानों में शिक्षा से लेकर, हर संस्थान में, संघ के स्वयंसेवकों को, जिसमें कुलपतियों से लेकर, प्रधानमंत्री के विभिन्न सलाहकारों से लेकर , राज्यपाल, सीबीआई, आई बी, ईडी तथा विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर, सभी क्षेत्रों में सिर्फ वह संघ के स्वयंसेवक है. इस प्राथमिक शर्त पर ही इन लोगों की बहाली की गई है. और इसलिए तथाकथित नई शिक्षानिति से लेकर, विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्हाइस चांसलरो की नियुक्तियां और पाठ्यक्रमों में बदलाव करने से लेकर, हमारे देश के संविधान के बदलने की मांग तथाकथित सलाहकार कर रहे हैं.
इसलिए सत्ताधारी दल (1980) के बाद ‘बोतल नई लेकिन अंदर का माल पुरानी’ कहावत के जैसे, नया नाम भारतीय जनता पार्टी जिसने 1985 के बाद शाहबानो केस के बाद, बाबरी मस्जिद – राम मंदिर विवाद को हवा देकर, और लगातार रथयात्राए तथा विभिन्न पूजा और धार्मिक पाखंड करते हुए, संपूर्ण देश में धार्मिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब हुए हैं. वर्तमान समय में चल रहे कुंभ का ही उदाहरण लिजिए यह कुंभ पहली बार सत्ताधारी दल के तरफ से प्रायोजित कार्यक्रम बनाया गया है और इसिलिये लोगों के शामिल होने के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर प्रसारित किए जा रहे हैं ! भले ही भीड़ का नियंत्रण नहीं हो पा रहा है शेकडो लोग विभिन्न हादसों मे अपनी जान से हाथ धो रहे और प्रधानमंत्री उन्हें पुण्यात्मा बोलते हुए उनके मृत्यु से हाथ झटक रहे हैं . अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करना भारतीय जनता पार्टी की फितरत है आज से 23 साल पहले का गुजरात का दंगा इसका सबसे बड़ा सबूत है.
और भागलपुर (1989) दंगा, उसके बाद बाबरी मस्जिद का विध्वंस, 6 दिसंबर 1992 के दिन ! 6 दिसंबर डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का महानिर्वाण दिवस है. और मेरी मान्यता है कि ” यह तारीख संघ ने सोच-समझकर तय की है. लोकसभा में पूर्ण बहुमत से 2014 के चुनाव से दो बार चुनकर आई और, उसने संविधान के साथ छेडछाड शुरू कर दी है. नई लोकसभा के उद्घाटन समारोह में ब्राम्हण के द्वारा पूजा पाठ करना और संसद सत्र तथा नई संसद भवन में प्रवेश करने के लिए गणेश चतुर्थी तिथि का चयन करना, हमारे देश के संविधान के खिलाफ है.
क्योंकि हमारे देश में विश्व के सभी धर्मों के लोग रहते हैं. और इसलिए हमारे संविधान के निर्माताओं ने सेक्युलर शब्द का प्रयोग किया है. जो नई लोकसभा के प्रथम अधिवेशन में संसदसदस्यो को संविधान की नई कापी दी गई उसमें से सेक्युलर और समाजवाद शब्दों को निकाल कर यह नई कापी देने के पिछे और कौन सा उद्देश्य है ? मैंने अपने पोस्ट की शुरुआत में ही गोलवलकर ने संविधान को नकारा है यह लिखा है. उसी को अमली जामा पहनाने की शुरुआत संविधान के एक – एक प्रावधानों को हटाने की चालाकी संघ की राजनीतिक ईकाई भाजपा कर रही है. इससे हमारे देश की हजारों वर्ष पुरानी गंगा – जमनी संस्कृति को नष्ट करने की बू आ रही है. जिससे हमारे देश की एकता और अखंडता को खतरा है. और समाजवाद शब्द को हटाकर हमें सिर्फ और सिर्फ पुंजिपतियो की तिजोरीया भरना है, यह इरादा डंके की चोट पर घोषित कर दिया है.