आजही के दिन 2004 में 74 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. 1930 में जन्मे किशन जी की आनेवाले 2030 में जन्मशताब्दी है.

2 अक्तुबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी शताब्दी मनाने जा रहा है. और नागपुर में कम से कम 50 हजार लोगों का शामिल होने की बात है. जिसमें विभिन्न देशों के राजदूत तथा आर एस एस के बाहरी लोगों को भी आमंत्रित करने की घोषणा की है. इस बहाने मुझे याद आ रही है कि, किशनजी की ग्रॅज्युएशन और पोस्ट ग्रॅज्युएशन की पढ़ाई महात्मा गाँधी की हत्या के दौरान नागपुर में हुई है. उस समय 30 जनवरी 1948 के दिन महात्मा गाँधी की हत्या की प्रतिक्रिया मे नागपुर में महाराष्ट्रियन ब्राम्हणों तथा आर एस एस के कार्यकर्ताओं पर हमले हूऐ थे. तब युवा किशन को लगा कि इन हमलो ने गांधीजीकी हत्या के अपराध को हल्का कर दिया. हालांकि उनका कॉलेज और अगल-बगल का माहौल घोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का होने की वजह से वह उब गए थे. उससे तंग आकर उन्होंने वह कॉलेज भी बदला और अंग्रेजी साहित्य की जगह राजनीति शास्त्र की पढाई करने लगे थे. हालांकि तबतक उनका किसी विशेष राजनीतिक विचार – धारा से परिचय नहीं हुआ था. लेकिन उसके बावजूद अपने जीवन के बीस साल की उम्र में भी उन्हें घोर सांप्रदायिक संघठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वितृष्णा थी. यह उनके जन्मना ह्यूमन होने का प्रमाण लगता है.
सेक्युलर फॅनाटिक भी नहीं थे. मुझे उन्होंने खुद कहा की “किसी भी मंचपर अपनी बात रखने के लिए बुलाया तो मै जाता हूँ.” जिसमें उन्होंने उदाहरण के लिए दो प्रसंग बताएं थे. एक था आर एस एस ने उन्हें दिल्ली स्थित झंडेवालान मे बुलाया था .और वह गऐ थे .और दुसरा प्रसंग गुजरात तथा महाराष्ट्र के कोस्टल बेल्ट मे पांडुरंग शास्त्री आठवले नामके एक अध्यात्मिक गुरू स्वाध्याय परिवार नाम से मुखतः मछुआरों के बीच में शराबबंदी तथा गुटखा खैनी जैसे नशा आदि-आदि छुड़ाने के लिए, और पानी के लिए कुंआ खुदवाकर देने का और पेड लगाने का काम करते थे . और उनके प्रवचनों में हजारों की संख्या में लोग शामिल होते थे. तो उन्होंने किशनजी तथा कुछ और भी पूर्व अधिकारीयों को एक साथ उनके कार्यक्षेत्र में आमंत्रित किया था. तो किशनजी बेहिचक चले गए थे. और उन्होंने मुझे बताया की “हम लोग सेक्युलर होने के कारण हमारे उद्बोधन में काफी रुखापन होने के कारण ज्यादा लोग जुडते नहीं. लेकिन मैंने पांडुरंग शास्त्री आठवले के स्वाध्याय परिवार के प्रभाव क्षेत्र में वह भगवान श्रीकृष्ण का आधार लेकर मुख्य रूप से उद्बोधन करते हैं . और उन्होंने बहुत बडे क्षेत्र में पेड लगाने से लेकर कुंऐ खोदकर देने तथा शराब और अन्य नशा करने की आदतों को छुड़ाने मे कामयाबी हासिल की है. मैने उन्हें पुछा की जात और सांप्रदायिकता क्या माहौल है ? यह बातें पिछली शताब्दी के अंतिम दौर की है. जब गुजरात की हिंदुत्ववादी प्रयोगशाला पूरी तरह से बनी नहीं थी. तो उन्होंने कहा कि वह एक तरह से कंडक्टेड टूर था. उनके कार्यकर्ता जहां ले जाते थे वही हमनें देखा. और लोगों से बात करने का मौका नहीं मिला. मैने उन्हें कहा की किशनजी पांडुरंग आठवले या डोंगरे महाराज, आसाराम, मुरारी बापू, सुधांशु महाराज यह सबकेसब बहुजन समाज के लोगों के मानस को लेकर आर एस एस के लिए जमीन तैयार करने का काम कर रहे हैं. इसमे महात्मा गाँधी के जैसा मानवतावादी दृष्टीकोण का अभाव है.
मेरे अपने परिचय में किशनजी जैसे कुजात समाजवादी दुसरा नही देखा. 1962-67 के लोकसभा सबसे कम उम्र के (32) सदस्य रहने के बावजूद, पूर्व संसदसदस्यो को मिलने वाली किसी भी तरह की सुविधाओं को उन्होंने स्वीकार नहीं किया. और देश के एक कोने से दुसरे कोने तक कि यात्रा तिसरे दर्जे से लेकर बसों तक करते थे. और उपरसे दमे के मरिज को भिडभरी यात्रा कितनी तकलीफदेह होती है ? यह मैने उन्हें अपने साथ की कुछ यात्राओं खुद देखा है.
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं मे से डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ उनका संबध अपने युवाकाल से ही आया था. और डॉ . राममनोहर लोहिया द्वारा के शुरु की गई पत्रिकाओं में से अंग्रेजी मैनकाइंड और हिंदी जन तो उनके ही संपादन मे निकालना प्रारंभ हुआ था. इस तरह से उनके सहयोगी के रूप में उन्होंने काम भी किया है. लेकिन लोहिया और महात्मा गाँधी के जीवन के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारतीय तथा वैश्विक स्तर पर भी विकास की अवधारणा को और विस्तार करने का प्रयास किशनजी ने अपने जीवन के अंतिम समय तक, विनाशकारी विकास के खिलाफ देश के हर जगह पर चल रहे आंदोलनों मे खुद की तबीयत की परवाह किए बिना, वह शामिल होते थे.और उसके बाद वह लिखने और बोलने का काम करने वाले चिंतक के नाते मेरे साथ उनका परिचय एन ए पी एम के स्थापना के समय से अधिक रहा है. कभी-कभी वह हमारे कलकत्ता के आवास पर भी ठहरे है. और मुख्यरूपसे हमारी मुलाकातें नर्मदा बचाओ आंदोलन के स्थलों पर और एन ए पी एम की विभिन्न बैठको में अधिकांश समय होते रही है. और मैने देखा कि किशनजी किसी भी नेता के प्रभाव में नहीं थे. वह जनतांत्रिक समाजवादी थे इसमे कोई दो राय नहीं है. लेकिन मैंने उन्हें कभी भी किसी भी नेता को कोट करते हुए या बोलते हुए नही देखा.
जहाँ तक मेरा निरिक्षण है वह खुद एक स्वतंत्र चिंतक थे. उसका जिवंत उदाहरण ‘विकल्पहीन नही है दुनिया’ से लेकर ‘भारत शूद्रों का होगा’ , तथा समाजवाद, किसानों की समस्याओं से लेकर सांप्रदायिकता, सेक्युलरिज्म, जनतंत्र तथा स्त्री-पुरुष संबंधों जैसे आज के अत्यंत संवेदनशील विषयों पर उन्होंने जो भी रोशनी डाली हैं. वह देखने के बाद मुझे लगता है कि उसमें भी मुझे उनके लेखों को पढ़ने से लेकर उनके साथ की बातचीत में कभी भी किसी को कोट करते हुए नही देखा. यह देखने के बाद मेरे जीवन में और एक चिंतक विश्वभारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर अम्लान दत्त को भी मैने मेरे कलकत्ता के पंद्रह साल के सहवास मे काफी नजदीकी से संबध आने के कारण, मैं आज बेहिचक कह सकता हूँ कि यह दोनों वरिष्ठ मित्रों के शुरुआती जीवन में उदाहरण के लिए किशनजी के जीवन में डॉक्टर राममनोहर लोहिया और अम्लान दत्त के जीवन में एम. एन. रॉय और जयप्रकाश नारायण आऐ थे. उस वजहसे उनके जीवन का आगे का रास्ता प्रशस्त होने मे इन सभी क्रांतिकारी लोगों के सहवास का निश्चित रूप से योगदान रहा है. लेकिन समय सापेक्षता का सिद्धांत के अनुसार भारत में किसी भी और समाजवादी की तुलनामे किशनजी ने अपने चिंतन का और विस्तार किया है. इस बात का मेरे लिए ज्यादा महत्व है. उन दोनों वरिष्ठ मित्रों के लेखन में वर्तमान समय की आर्थिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक और प्रमुखता से विकास की अवधारणा को लेकर निर्माण हुई समस्याओं का समाधान खोजने के लिए किऐ गए चिंतन की झलक देखने को मिलती है.
आपातकाल के बाद बना भानामती का कुनबा जिसका नाम जनता पार्टी रखा गया था. जिसमें समाजवादी नेताओं में किशनजी एकमात्र नेता थे, जिन्होंने जनता पार्टी के जनसंघ जैसे दक्षिणपंथी पार्टी के साथ एक पार्टी बनने का सिर्फ विरोध ही नहीं किया, उस पार्टी में शामिल भी नहीं हुए. और एक बार तो उन्हें नवंबर 1989 के संबलपुर लोकसभा चुनाव में, ओरीसा से जनता पार्टी के संस्थापकों मे से एक नेता बिजू पटनायक ने किशनजी को सिर्फ जनता पार्टी के सिंबल देने की पेशकश की तो उन्होंने ठुकरा दी. जबकि वह उस सिंबल को ले लिए होते तो शतप्रतिशत लोकसभा में दोबारा पहुंचे होते. लेकिन 1962 – 67 का तिसरी लोकसभा को छोड़कर वह दोबारा लोकसभा में नहीं जा सके. अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी भी तरह का अपने मुल्यो को लेकर समझौता नहीं करना जिसके लिए चाहे वह किमत क्यों न देनी पड़े . और इसको लेकर दिखावा तो बहुत दूर की बात है इस कान से उस कान को भी खबर नहीं चलनी चाहिए इस बात का विशेष ध्यान रखते हुए मैंने खुद देखा है.
लेकिन मेरी मान्यता है कि वह संसदीय राजनीति के तुलनामे सबसे ज्यादा पर्यायी राजनीति के हिमायती थे. उनके ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ शिर्षक की किताब में पर्यायी विकास से लेकर पर्यायी राजनीतिक चिंतन दिखाई देता है.
उसीमे उन्होंने ‘बैलगाड़ी चाहिए या इंटरनेट’ शिर्षक से एक लेख लिखा है. जो उसके पहले उन्होंने बनारस के लोकविज्ञान संमेलन मे सबसे पहले अपने भाषण में प्रकट किया था. और भाषण के बाद के भोजन में हम दोनों साथ ही बैठकर भोजन कर रहे थे. तो उन्होंने मुझे पुछा की “सुरेश आपको मेरा भाषण कैसे लगा ?” तो मैंने तपाक से कहा कि “आपने तो मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मारा है. इसलिए आपको इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के लिए सबसे पहले मैं आपको नागपुर में आमंत्रित कर रहा हूँ. और कम-से-कम आपको सिर्फ इसी विषय पर तीन दिन नागपुर में रहना होगा. “तो वह बनारस के बाद चंद दिनो के भितर ही नागपुर आए. और मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन आयोजनों में से वह आयोजन था . जिसमें किसनजी ने वर्तमान टेक्नोलॉजी के बढ़ते हुए प्रभाव को लेकर बहुत ही विस्तृत रोशनी इस विषय पर डाली है. उस समय की बहस भी बहुत बढ़िया हुई थी. लेकिन आज मुझे यह लिखते हूऐ बहुत दुःख हो रहा है इतना अच्छा कार्यक्रम के नोट्स तथा अन्य कागज- पत्र तथा कुछ पुस्तके भी उसके बाद आए बारिश मे हमारे घर में पानी घुसने की वजह से और पुरानी पत्र- पत्रिकाओं का संग्रह तथा किताबे लुगदी हो गई. इसे याद करते हुए बहुत दुखी हो जाता हूँ जैसे आज उनके 21 वे पुण्यस्मरण दिवसपर हो गया हूँ. विनम्र अभिवादन.
डॉ. सुरेश खैरनार, 27 सितंबर 2025, नागपुर.
Adv from Sponsors