इस बार मैं राजीव गांधी से अपनी पहली मुलाकात से लेकर आखिरी मुलाकात तक के सफर को याद करने की कोशिश करूंगा ।राजीव गांधी ही क्यों मैं उन कुछ चुनिंदा लोगों में अपने आप को पाता हूं जो उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर उनकी माँ इंदिरा गांधी,पिता फिरोज गांधी,भाई संजय गांधी से न केवल मिला था,बातचीत भी हुई थी और उनकी स्मृतियों को मैंने अपने संस्मरणों के तौर पर साझा भी किया था। भेंट तो मेरी सोनिया गांधी और मेनका गांधी से भी थी लेकिन दुआ सलाम जैसी । लोकसभा सचिवालय (1956-65) में काम करते समय पंडित नेहरू से लेकर फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी से अनेक मुलाकातें हुई थीं जबकि संजय गांधी और मेनका गांधी से भेंट ‘दिनमान’ के दिनों में हुई थी ।सोनिया गांधी से मैं राजीव गांधी के जीवित रहते हुए भी मिला था और बाद के दिनों में भी । इन मुलाकातों से जुड़े संस्मरण मैं गाहेबगाहे लिखता रहा हूं ।

23 जून,1980 में संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में अप्रत्याशित रूप से मृत्यु के बाद राजीव गांधी को इंडियन एयरलाइंस की अपनी पायलट की नौकरी छोड़ माँ इंदिरा गांधी के इसरार पर राजनीति में प्रवेश करना पड़ा । उन दिनों दो एयरलाइंस थीं-इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया ।इंडियन एयरलाइंस मुख्य रूप से घरेलू मार्गों तक ही केंद्रित थी मगर कुछ पड़ोसी एशियाई देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय सेवाएं भी संचालित करती थी ।लेकिन 2007 में इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया का विलय करने की घोषणा हुई और 26 फरवरी,2011 को विलय पूरा होने के बाद यह एयर इंडिया बन गयी ।उस समय संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार थी और नागरिक उड्डयन मंत्री थे प्रफुल्ल पटेल ।

मुझे याद पड़ता कि 1972 में प्रगति मैदान का जब निर्माणकार्य चल रहा था तो मैंने राजीव गांधी को भारतीय व्यापार मेला प्राधिकरण के प्रमुख मोहम्मद यूनुस खान के ऑफ़िस में दो-तीन बार देखा था ।क्योंकि प्रगति मैदान के निर्माण से पूर्व और बाद में व्यापार मेले के दौरान मोहम्मद यूनुस से करीब करीब रोज़ मुलाकात हुआ करती थी,एक दिन मैंने उनसे पूछ ही लिया कि राजीव गांधी अक्सर आपके पास आते रहते हैं,वह हंसकर बोले, ‘वह युवा हैं,जिज्ञासु हैं, आज़ादी के 25 बरस बाद पहला अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला आयोजित हो रहा है,कभी कभी शिष्टाचारवश चले आते हैं ।वैसे भी मेरे बेटे आदिल शहरयार के बचपन के दोस्त हैं और मुझे चचा कहते हैं ‘।क्या प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रतिनिधि के तौर पर आते हैं, बात को टालते हुए बोले,’नहीं भई, मेला शुरू होने पर वह सपरिवार भी आते रहते थे ।’

मोहम्मद यूनुस खान (26 जून,1916-17 जून,2001) को मैं प्रगति मैदान से पहले से जानता था । उनका जुड़ाव सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ था जो रिश्ते में उनके मामा लगते थे ।उन्हीं से मुझे पता चला था कि शुरू शुरू में मोहम्मद यूनुस ने भी खुदाई खिदमतगार के तौर पर 1947 तक काम किया था।खान अब्दुल गफ्फार खान से जब मैंने मोहम्मद यूनुस का ज़िक्र किया तो उन्होंने बताया कि हमारी संस्था खुदाई खिदमतगार का वह समर्पित कार्यकर्ता था ।’भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उसे कैद करके जेल में डाल दिया गया था ।उसकी रिहाई के बाद मैंने जवाहरलाल (नेहरू) से कहा कि इसे तुम अपने पास रख लो,बहुत पढ़ा-लिखा है,पाकिस्तान में रहा तो उसका हश्र भी मेरे जैसा ही होगा ।लिहाजा जवाहरलाल ने मेरे भांजे मोहम्मद यूनुस को मुलाज़मत दे दी।उन्हें भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में 1948 की परीक्षा पास करने के बाद ले लिया गया ।मोहम्मद यूनुस कई देशों में भारत के राजदूत रहे तथा बहुत से देशों में गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया । जब भारतीय उत्पादों और कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले के आयोजन पर विचार हुआ तो इसका दायित्व मोहम्मद यूनुस खान को सौंपा गया जिनके निर्देशन में 1972 में प्रगति मैदान का निर्माण हुआ और पहले अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले का आयोजन ।

सोनिया गांधी अपने पति के राजनीति में शामिल होने के खिलाफ थीं शायद किसी भावी डर की वजह से लेकिन राजीव गांधी ने माँ,देश और भाई के ‘अधूरे कामों को पूरा करने’ के नाम पर उन्हें राज़ी कर लिया । अभी तक राजीव और सोनिया गांधी अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ ‘शुद्ध निजी जिंदगी’ जी रहे थे,प्रधानमंत्री निवास में रहते हुए भी वह राजनीति से दूर रहे । लेकिन उनके राजनीति में प्रवेश करने से उनके पारिवारिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । राजीव गांधी का पहला काम अपनी माँ इंदिरा गांधी को सदमे से उबारना था।बेशक वह एक ‘मज़बूत महिला’ थीं लेकिन ‘वह माँ भी थीं’ एक बार राजीव गांधी ने बताया था । प्रधानमंत्री निवास में रहने के बावजूद वह राजनीति में ‘नौसिखिया’ और ‘अराजनीतिक’ थे अपनी माँ इंदिरा गांधी की तरह नहीं जिन्होंने अपने पिता पंडित नेहरू के निवास में रहते रहते राजनीति के सभी तरह के दांवपेच सीख लिए थे। इंदिरा गांधी के आग्रह पर राजीव गांधी को कांग्रेस पार्टी के कुछ अनुभवी राजनीतिकों द्वारा दीक्षित किया गया ।लिहाजा अगस्त, 1981 में अमेठी में जो उपचुनाव हुआ उसमें राजीव गांधी को चुनावी मैदान में उतारा गया । सक्रिय राजनीति में यह उनका पहला इम्तहान था।अमेठी में ही राजीव गांधी से मेरी पहली मुलाकात हुई थी । साल भर के भीतर उन्होंने राजनीति के कुछ गुर सीख लिए लगते थे ।भाषण देने में उनमें राजनीतिकों जैसा कौशल नहीं था ।हालांकि उन्होंने साल भर तक भाषण देने का अभ्यास किया था लेकिन आमजन को संबोधित करने में उन्हें झिझक महसूस हो रही थी ।क्योंकि मैं कई सार्वजनिक सभाओं में उनसे मिला था लिहाजा उनके भाषणों में आने वाले सुधारों को मैं अनुभव कर सकता था राजीव गांधी आम राजनीतिकों से अलग थे इसलिए लोगों की उन्हें देखने और मिलने की ज़्यादा दिलचस्पी रहती थी ।उनका आकर्षक व्यक्तित्व, मुस्कान और विनम्रता के लोग कायल हुआ करते थे ।उन चुनावी सभाओं में पत्रकारों के साथ और अलग मुलाकातों में उनकी साफगोई और मृदु भाषा ही सुनने को मिलती थी । उनकी मोहक मुस्कान, आकर्षण और शालीनता उनके व्यक्तित्व का अंग थे ।बेशक वह बहुत ही मिलनसार राजनेता थे ।

17 अगस्त,1981 को लोक दल के शरद यादव को भारी मतों से पराजित कर अमेठी से पहला लोकसभा का चुनाव जीते थे । इसके बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ गयी थी ।वह अपनी माँ इंदिरा गांधी की सहायता करते ही थे,इसके अतिरिक्त उन्हें भारतीय युवा कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया तो उनसे मिलने का अक्सर मौका मिल जाता ।1982 में नवें एशियाई खेल आयोजन समिति के 33 सदस्यों में राजीव गांधी भी थे ।वहां वह इतने सक्रिय थे मानो खेलों के आयोजन का दायित्व उन्हीं पर हो ।पूछने पर वह बोलते भी कि ‘यह खेल देश के लिए बहुत महत्व रखते हैं,हम नहीं चाहते कि कहीं किसी प्रकार की चूक हो।’ लगता था वह चौबीसों घंटे एक जूनुनी की तरह उसमें जूटे हुए हों ।क्योंकि मैं ‘दिनमान’ में खेल और खिलाड़ी भी कभी कभी देखा करता था इस नाते राजीव गांधी से मिलने के अवसर मुझे मिल जाया करते थे ।उनकी संगठनात्मक क्षमता और खेलों के प्रति समर्पण की भावना देखने को मिलती थी ।उनकी प्रेरणा, उत्साह और उपलब्धता से खेलों में भारत को उत्कृष्ट सफलता मिली । 13 स्वर्ण और 19 रजत पदकों समेत 57 पदक जीतकर भारत पांचवें स्थान पर रहा । इस पूरे दौर में राजीव गांधी से मेरी अच्छी जान पहचान हो गयी थी ।

मैं उन दिनों ‘दिनमान’ में काम करता था ।मेरे तब के संपादक डॉ कन्हैयालाल नंदन ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की शव यात्रा को कवर करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी थी ।पहले 30 अक्टूबर, 1984 को पुलिस मुख्यालय आदि से फीडबैक लेकर अगले दिन सुबह तीन मूर्ति भवन में जाना था जहां उनका शव आम लोगों के दर्शनार्थ रखा जाना था ।तीन मूर्ति भवन पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का सरकारी आवास था ।उनके निधन के बाद न तो लाल बहादुर शास्त्री और न ही इंदिरा गांधी ने वहां रहना स्वीकारा ।शास्त्री जी ने 10, जनपथ को अपने आवास के लिए चुना और इंदिरा गांधी ने 1,सफदरजंग मार्ग को ।तीन मूर्ति को पंडित नेहरू के संग्रहलय के तौर पर परिवर्तित कर दिया गया । इंदिरा गांधी के शव की अंतिम यात्रा के लिए तीन मूर्ति का चयन शायद इसलिए किया गया, क्योंकि एक तो यहां से इंदिरा गांधी का भावनात्मक लगाव था,क्योंकि पंडित नेहरू के अंतिम दिनों तक वह एक ‘परिचारिका’ के तौर पर अपने पिता जी के साथ रहीं और दूसरे यह काफी बड़ा और विशाल क्षेत्र था जहां लोग बड़ी संख्या में आकर इंदिरा गांधी के अंतिम दर्शन कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दे सकते थे ।

हमारे संपादक ने मुझे सुबह जल्दी तीन मूर्ति पहुंचने का निर्देश देते हुए कहा कि ‘आप से बढ़िया आंखों देखी’ और कोई नहीं लिख सकता ।उन दिनों मैं सुदर्शन पार्क में रहता था।छह बजे सुबह तैयार होकर निकलने के लिए स्कूटर निकाला तो देखा मेरा छोटा बेटा अमरदीप सिंह भी तैयार होकर मेरे साथ चलने की जिद्द कर रहा है ।हम लोग साढ़े छह बजे तीन मूर्ति भवन पहुंच गये ।अभी इक्का दुक्का लोग ही वहां आये थे,क्योंकि इंदिरा गांधी का शव आठ बजे के आसपास आने की उम्मीद थी ।लिहाजा मैं और मेरा बेटा उस कक्ष में जाकर जम गये जहां इंदिरा जी का शव रखा जाना था ।आठ बजे के थोड़ा बाद बाहर हलचल हुई ।देखा कि एक गाड़ी उस कक्ष के सामने खड़ी हुई है जिसमें से चार लोग उतरे राजीव गांधी,राहुल गांधी,अमिताभ बच्चन और रोमी चोपड़ा ।इन चारों ने इंदिरा गांधी का शव एक निश्चित स्थान पर रख दोनों हाथ जोड़कर उन्हें श्रद्धांजलि दी ।मैं और मेरे बेटे ने भी इंदिरा जी को सिर झुकाकर श्रद्धांजलि दी ।उसके बाद मैं और बेटा राजीव गांधी के पास गये और उनसे संवेदना व्यक्त की।राजीव गांधी और राहुल गांधी ने भी दोनों हाथ जोड़ दिये ।तब राहुल 14 बरस से कुछ अधिक (जन्म 19 जून,1970) रहे होंगे और वह अपने पिता राजीव गांधी से चिपक कर खड़े हुए थे ।अमिताभ बच्चन और रोमी चोपड़ा राजीव गांधी के बहुत करीबी मित्र थे ।राजीव गांधी ने धीरे से मेरे कान में कहा कि ‘आपका यहां से निकल जाना ही सेफ़ है ।’हमारे कक्ष में रहते बाहर का माहौल शांत था ।

बाहर निकलते ही भीड़ उग्र हो गयी और सिखों के खिलाफ नारे लगने लगे ।हम दोनों के अलावा वहां के एसएचओ इंस्पेक्टर भल्ला भी मौजूद थे ।वह भी सिख थे ।उनके खिलाफ भी नारे लगने शुरू हो गये ।भीड़ को कक्ष के भीतर जाने की छूट नहीं थी ।कक्ष के दरवाजे खोल दिए गये जहां इंदिरा गांधी का शव रखा था।लोगों को बाहर से ही दर्शन करने की अनुमति थी ।क्योंकि राजीव गांधी ने 31 अक्टूबर, 1984 को ही प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली थी लिहाजा कोई मंत्री या विदेशी नेता या राजनयिक इंदिरा गांधी को श्रद्धांजलि देने के लिए आता, उन्हें ही कक्ष में जाने की अनुमति थी। बिना कांग्रेस संसदीय पार्टी की मीटिंग के राष्ट्रपति ज़ैल सिंह ने राजीव गांधी को जब प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलायी तो बताया जाता है कि पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने दबे स्वर में अपना ‘विरोध’ प्रकट किया था लेकिन उस भावनात्मक माहौल को देखते हुए इस तथकथित विरोध पर कोई तवज्जो नहीं
दी गयी ।

क्योंकि हमारी मौजूदगी को लेकर भीड़ उग्र होती जा रही थी लिहाजा दिल्ली पुलिस के उपायुक्त हरिदेव पिल्लै और गौतम कौल ने हमें वहां से खिसक जाने के लिए कहा ।हमने घर जाते हुए भी महसूस किया कि लोग हमें घूर घूर कर देख रहे हैं ।एक महिला ने तो बड़ी ऊंची आवाज़ में हमें लक्ष्य करते हुए कहा कि ‘मार दिया न हमारी लीडर को’।इतना कहकर वह तीन मूर्ति भवन की तरफ़ बढ़ गयी ।मैंने घर पहुंचकर बेटे को छोड़ा और स्वयं ऑफ़िस की तरफ़ रवाना हो गया ।सुबह का समय था मुझे नयी बिल्डिंग 7,बहादुर शाह जफर मार्ग तक तो कोई अनहोनी घटना देखने को नहीं मिली लेकिन जब मैं तीसरी मंज़िल पर अपने बिलों का भुगतान लेने के लिए पहुंचा तो वहां का वातावरण खासा तनावपूर्ण था ।वहां से जल्दी से मैं नीचे उतर के आया और स्कूटर उठाकर पुरानी बिल्डिंग 10, दरियागंज की ओर रवाना हुआ तो मुझे तनाव का बोध हुआ ।दिल्ली गेट चौराहे पर लालबत्ती थी ।लालबत्ती पर मुझे खड़ा देखकर एक पुलिसकर्मी तेज़ी से मेरे पास आया और बोला कि ‘सीधा मत जाइयेगा।वहां का माहौल अच्छा नहीं है,लूटपाट और मारधाड़ चल रही है ।आप तेज़ी से दाएं तरफ़ से अंसारी रोड से होते हुए 10, दरियागंज जायें ‘।लेकिन तनाव तो यहां भी था ।हमारे दफ्तर के बाहर भी सिख विरोधी भीड़ जमा थी लेकिन अच्छी बात यह थी कि ‘दिनमान’ के मेरे साथियों और वहां के स्टाफ की मदद से मैं सकुशल दूसरी मंज़िल के अपने ऑफ़िस पहुंच गया था ।सबसे पहले मैंने घर फोन करके सुकुशल ऑफ़िस पहुंचने की सूचना दी ।मेरी सहयोगी बनाम मित्र श्रीमती शुक्ला रुद्र ने कहा कि ‘मैंने आपको रात को फोन करके बता दिया था कि आप का घर से निकलना सेफ़ नहीं है ।पता नहीं आपको अपनी बहादुरी दिखाने का क्यों जुनून चढ़ा रहता है ।’ अच्छी मित्र थी और उनका हक़ भी बनता था ।मना तो मुझे उदय प्रकाश ने भी किया था।लेकिन ड्यूटी तो ड्यूटी होती है ।खैर, मैंने टाइपराइटर पर बैठकर ‘आंखों देखी’ रिपोर्ट खुद टाइप करके संपादक डॉ कन्हैयालाल नंदन को सौंप दी जिस पर उन्होंने अपनी ओर से संपादकीय नोट लगाकर मेरी वह रिपोर्ट छपने के लिए भेज दी।

उसके बाद की कहानी भी सुखकर नहीं थी ।जिस तरह से मुझे और मेरे एक अन्य साथी परमजीत सिंह को 4, तिलक मार्ग स्थित टाइम्स ऑफ इंडिया के गेस्ट हाउस में पहुंचाया गया । वहां महाप्रबंधक साहू रमेश चंद्र और उनके दोनों बेटों अखिलेश और शैलेश ने हमरा पूरा ख्याल रखा ।मेरे घर से आने वाले फोनों पर बात भी कराते रहे ।वह मंजर मुझे कुछ कुछ मार्च,1947 की याद दिला गया जिसे मैं ‘पाकिस्तान निर्माण का ट्रेलर’ मानता हूं । हम लोगों को करीब दो हफ्ते अपने घर के बाहर सेना के संरक्षण में रहना पड़ा था।खैर,अगले दिन 2 नवंबर को अलसुबह हम दोनों को सही सलामत अपने अपने घरों में पहुंचा दिया गया। लेकिन मेरे घर पहुंचते ही शुभचिंतकों के फोन रुकने का नाम नहीं ले रहे थे ।सभी ने मुझे घर से बाहर ताकने तक की मनाही की थी । फोन लगातार घनघनाता रहता था ।सुकून इस बात का था कि इस मुसीबत के समय मेरी कुशलक्षेम पूछने वाले लोग असंख्य थे ।मुझे आज भी जिन शुभचिंतकों और हितैषियों के नाम याद पड़ते हैं, वे हैं शांता सरबजीत सिंह और उनके पति सरबजीत सिंह, खुशवंत सिंह,भीष्म साहनी, डॉ महीप सिंह, बगदाद में बैठे मेरे बड़े बेटे मनदीप सिंह, ऑफ़िस के महाप्रबंधक साहू रमेशचंद्र,संपादक कन्हैयालल नंदन,सहयोगी उदय प्रकाश,माहेश्वरदयालु गंगवार,श्रीमती शुक्ला रुद्र,सुषमा जगमोहन आदि । शुक्ला जी तो घर आने का इसरार करती रहीं लेकिन मैंने उन्हें मना कर दिया ।दोनों पुलिस आयुक्त हरिदेव पिल्लै और गौतम कौल की यह हिदायत थी कि जब तक हम ‘हरि झंडी’ न दें, आपका घर से निकलना वर्जित है । इनके अतिरिक्त पुलिस के बड़े अधिकारियों जैसे पी एस भिंडर,भवानी मल और वेद मारवाह के भी फोन आये । लखनऊ से जयंतनाथ चतुर्वेदी ने भी फोन करके हालचाल पूछा ।चतुर्वेदी दिल्ली के पहले पुलिस आयुक्त थे और मेरे बड़े प्यारे मित्र । उनसे पहले दिल्ली में इंस्पेक्टर जनरल बड़ा पुलिस पद हुआ करता था।

खैर, ये भी दस दिन ‘घर की कैद’ में बीत गये ।फिर ‘दिनमान’ ऑफ़िस पहुंचकर सामान्य और सहज होने का प्रयास किया,धुंधलका छंट चुका था कमोबेश । राजीव गांधी ने देश की बागडोर संभाल ली थी।उन्होंने सत्ता की बागडोर संभालने के बाद लोकसभा भंग करने की सिफारिश की जिसके फलस्वरूप 24,27 और 28 दिसंबर, 1984 को नयी लोकसभा के चुनाव हुए ।इस बार उन्होंने राय बरेली से चुनाव लड़ा और अमेठी से सतीश शर्मा ने । यहां की चुनावी सभाओं में भी राजीव गांधी से मेरी मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा ।कभी कभी वह अलग से भी बातचीत कर लिया करते थे, खास तौर पर सिखों की नाराज़गी के मुद्दे को लेकर ।यदाकदा मुझे आश्वस्त भी कर जाते थे कि चुनाव से निपट जाने के बाद वह पंजाब समस्या के हल करने को तरजीह देंगे और सिखों का पुन: विश्वास पाने का भरसक प्रयास करेंगे । इस चुनाव में कांग्रेस को 541 सीटों में से 414 सीटें प्राप्त हुईं । दिलचस्प बात यह रही कि एक क्षेत्रीय पार्टी तेलुगू देशम ने 30 सीटें जीतकर दूसरा स्थान हासिल किया।मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 22 सीटें मिलीं जबकि भाजपा को मात्र दो ।

अपने बलबूते पर राजीव गांधी का यह पहला चुनाव था ।कांग्रेस की इतनी बड़ी और भारी जीत इंदिरा गांधी के प्रति सहानुभूति की लहर से हुई थी ।लेकिन यह जीत राजीव गांधी के लिए चुनौतियों का पहाड़ लेकर भी आयी थी । चुनावी परिणामों के बाद जब मैंने उन्हें बधाई दी तो बोले,बहुत बड़ी जिम्मेदारी है ।देश में समस्याएं भी बहुत हैं खास तौर पर पंजाब और असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों की । इनके समाधान के लिए मुझे अनुभव और युवा विचारों की भी सलाह लेनी होगी ।कभी कभी आ जाना, पंजाब पर बात करेंगे ।अभी तक राजीव गांधी उस तरह से व्यस्त नहीं हुए थे,खास तौर पर मेरे लिए,जैसे इतना भारी बहुमत मिलने के बाद कोई नेता हो जाता है । जब उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की पहली खेप की घोषणा की तो उसमें पुरानों और अनुभवियों के अलावा उन्होंने दून स्कूल के कुछ अपने दोस्तों को भी सरकार में लिया।दो शक्तिशाली मंत्रियों वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और रेलमंत्री एबीए गनी खान चौधरी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया ।विश्वनाथ प्रताप सिंह को वित्त तथा पीवी नरसिंह राव को रक्षामंत्री बनाया । बाद में इनके विभाग भी बदले गये ।

युवा पीढ़ी के राजीव गांधी की अपनी कार्यशैली से कुछ नया और ‘क्रांतिकारी’ करना चाह रहे थे ।पहले उन्होंने पंजाब और नगालैंड की समस्याओं को हल करने की पहल की ।जैसा कि उन्होंने मुझे एक बातचीत में संकेत दिया था कि वह पंजाब में आतंकवाद का खात्मा कर अमन चैन कायम करना चाहते थे ।1985 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में अर्जुन सिंह ने कांग्रेस को जीत दिलायी और वह फिर चुरहट से जीत गए थे लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें पंजाब का 16वां राज्यपाल नियुक्त कर उन्हें चौंका दिया था।अर्जुन सिंह को पंजाब में शांति स्थापित करने की दिशा में काम करने की राजीव गांधी ने उन्हें पूरी छूट दी । 14 मार्च,1985 में अर्जुन सिंह ने पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक का कार्यभार संभाल लिया ।क्योंकि पंजाब का आतंकवाद मैं ‘दिनमान’ के लिए कवर किया करता था, उनके राज्यपाल बनने के बाद मैं अर्जुन सिंह से मिला,जिन्हें मैं पहले से जानता था। उन्होंने कहा कि अपने नेता द्वारा व्यक्त किए गए विश्वास को मैं पूरी शिद्दत के साथ पूरा करूंगा ।उन्होंने तो मुझे अपनी रणनीति के बारे में ज़्यादा विस्तार से नहीं बताया लेकिन मेरे सूत्रों से पता चला कि वह देर रात अकाली नेताओं से मिला करते थे ।अकाली दल प्रमुख संत हरचंदसिंह लोंगोवाल से उनके ‘करीबी’ और ‘मधुर’ संबंध हो गए थे ।पंजाब में अमन के महत्व को समझाते हुए अर्जुन सिंह ने संत लोंगोवाल को राजीव गांधी से मिलकर एक शांति समझौते पर दस्तखत करने के लिए मना लिया ।

इससे पहले राजीव गांधी ने उन सभी अकाली नेताओं को रिहा कर दिया जो आपरेशन ब्लू स्टार से जेल में बंद थे । आल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन पर से प्रतिबंध हटा लिया गया और 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए गठित जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग का अधिकार क्षेत्र बोकारो और कानपुर तक बढ़ा दिया गया।सेना से भाग जाने के कारण बर्खास्त किए गए लोगों का पुनर्वास और उन्हें रोज़गार उपलब्ध कराने का भी भरोसा दिलाया गया । इनके अतिरिक्त अगस्त,1982 के बाद आंदोलन या किसी कार्रवाई में मारे गए निर्दोष व्यक्तियों के परिवारों को मुआवजा,साथ ही क्षतिग्रस्त संपत्ति के लिए मुआवजा देने का भी वादा किया गया। सेना में चयन का मानदंड योग्यता रखने को भी स्वीकार किया ।अर्जुन सिंह ने मुझे बताया था कि राजीव गांधी ने पंजाब में आतंकवादी आंदोलन समाप्त कर शांति स्थापना को तरजीह देते हुए संत हरचंदसिंह लोंगोवाल की सभी मांगें स्वीकार करते हुए जनवरी, 1985 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसे राजीव-लोंगोवाल पंजाब शांति समझौता कहा जाता है ।इस समझौते पर दस्तखत करने के अगले दिन मेरी संत लोगोंवाल से दिल्ली के पंजाबी बाग के एक गुरुद्वारे में विशेष मुलाकात हुई ।उन्होंने मुझे बताया था कि ‘राजीव गांधी बड़ा बीबा (भला) बंदा है ।हमारी सभी मांगें मान ली हैं लेकिन..चुप्पी साध गये ।कुरेदने पर बोले,’खाड़कुओं (चरमपंथियों) का डर है ।’ उनका यह डर सही साबित हुआ और 20 अगस्त (राजीव गांधी का जन्मदिन) 1985 को संत हरचंदसिंह लोंगोवाल की हत्या हो गयी

जैसा मैंने कहा कि वह राजनीति का ऐसा दौर था कि हमें किसी भी बड़े से बड़े नेता से मिलने में कभी दिक्कत पेश नहीं आयी और न ही बड़े उच्च अधिकारियों से ।वह परस्पर विश्वास,भरोसे और तालमेल का दौर था ।आप पर किसी राजनेता या नौकरशाह का विश्वास है तो वह आपकी चाही सारी जानकारी आपको दे देगा इस भरोसे के साथ कि आप किसी भी सूरत में उसका नाम या सूत्र उजागर नहीं करेंगे ।इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कुछ छुटभैये नेता हमसे कतराते थे, सिख होने के नाते,लेकिन राजीव गांधी सहित किसी बड़े नेता को हमसे मिलने में न कोई परहेज था और न ही गुरेज।

एक दिन लोकसभा अध्यक्ष डॉ बलराम जाखड़ के यहां से फोन आया कि शाम को ‘साहब ने आपको हाई टी’ के लिए न्योता है ।जाखड़ साहब से हमारे पारिवारिक संबंध थे ।20,अकबर रोड (स्पीकर निवास) पहुंचे तो जाखड़ साहब ने बताया कि आज तुम्हारी मुलाकात एक अज़ीम शख्सियत से करायेंगे ।उन दिनों सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव भी दिल्ली में थे ।यह 1988 की बात है ।मैं खुश हो गया क्योंकि साल भर पहले अगस्त, 1987 में ही तो मैं साइबेरिया से होकर आया था ।गोर्बाचोव तब कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे । उन दिनों सोवियत संघ में जो खुलापन और ताज़गी देखने को मिली वह मुझे 1977 की अपनी पहली मास्को यात्रा में नहीं मिली थी ।तब वहां के राष्ट्रपति लियोनिद ब्रेझनेव थे ।वहां के एक खूबसूरत शहर इर्कुत्सक,जिसे साइबेरिया का पेरिस’ भी कहा जाता है। पता चला कि मिखाइल गोर्बाचोव कभी यहां श्रमिकों के बीच रहकर उनकी भलाई की योजनाओं पर काम किया करते थे ।उन्हें बहुत उदार और खुले विचारों का व्यक्ति माना जाता था ।वहां के लोगों ने मुझे बताया था कि गोर्बाचोव सामाजिक सरोकारों के साथ साथ लोगों को पूंजी निवेश के तरीके भी बताया करते थे ।इर्कुत्स्क के पास बैकल झील है जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी झील है ।यहीं पर ट्रांस-साइबेरियन ट्रेन का स्टॉप भी है ।यह ट्रेन मास्को और व्लादिवोस्टोक के बीच चलती है ।

थोड़ी देर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी आये अकेले ।जाखड़ साहब ने जब उनसे पूछा कि मिस्टर गोर्बाचोव भी तो आपके साथ आने वाले थे,राजीव जी ने उन्हें बताया कि ‘उन्हें ऐन वक़्त पर ऐंबेसी से अर्जेंट मैसेज आ गया था,इसलिए वह नहीं आ सके,आपसे क्षमायाचना की है ।’ खैर,राजीव गांधी से मिलने के लिए भी लोग बहुत लालियत थे ।लेकिन बलराम जाखड़ ने सबसे पहले मेरा परिचय राजीव गांधी से कराते हुए कहा कि ‘यह त्रिलोक दीप है,मेरे छोटे भाई जैसा ।इस समय ‘दिनमान’ में काम करता है । पिछ्ले बरस ही साइबेरिया से होकर आया है जहां मिखाइल गोर्बाचोव के बारे में लोगों ने उनके सामाजिक सरोकारों के बारे में बताया था ।इनका आपसे एक सवाल है ।मैंने राजीव जी से पूछा कि ‘इस समय आपकी प्राथमिक योजना क्या है?’ तुरंत उत्तर मिला, ‘संचार व्यवस्था को अति आधुनिक बनाकर आईटी की दुनिया में अपना अहम स्थान बनाना ।’ इसकी सफलता के लिए क्या हमारे यहां निरंतर बिजली सप्लाई का इंतजाम है ‘ मेरे सवाल के जवाब में मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले,’बेफिक्र रहें,इंतजामात हो रहे हैं ।और विस्तार से जानने के लिए सैम पित्रोदा से मिल लें,मैं उन्हें आपके बारे में बता दूंगा ।’ राजीव गांधी ने बलराम जाखड़ को भी बताया कि हम एक-दूसरे को काफी वक़्त से जानते हैं ।

राजीव गांधी चाहे प्रधानमंत्री रहे हों या नहीं भी किसी न किसी समारोह में हम लोग कुछ मिनटों के लिए मिल ही जाया करते थे ।’दिनमान’ छोड़कर मैं ‘संडे मेल’ में कार्यकारी संपादक हूं इसकी भी उन्हें जानकारी थी ।22-26 नवंबर1989 में लोकसभा में अपनी पार्टी की हार के बाद वह विचलित नहीं हुए थे क्योंकि उनके बाद की सरकारें टिकाऊ साबित नहीं हुई थीं ।वह सरकारें कुल 565 दिन चली थीं -341 दिन विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री रहे और 224 दिन चंद्रशेखर।1991 में लोकसभा के नये सिरे से चुनाव कराये गये ।इसे कवर करने के लिए 17 व 18 मई, 1991 को मैं हैदराबाद में अपने एक स्थानीय पत्रकार मित्र एम ए माजिद के साथ राजीव गांधी की एक जनसभा में गया । रात करीब बारह बजे वह जनसभा को संबोधित करने के लिए पहुंचे ।क्या मजाल जो भीड़ इधर से उधर हुई हो ।जनसभा की समाप्ति के बाद जब वह पत्रकारों से मिले तो मुझे वहां देखकर उन्हें हैरानी हुई ।बोले,’आप यहां कैसे!’ मैंने कहा कि आपकी जनसभा देखने के लिए ।जब मैंने राजीव गांधी से चुनाव प्रचार के बारे में पूछा तो उन्होंने जनसभा समाप्ति के बाद जाती हुई भीड़ की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ‘जवाब आपके सामने है ।’ उन्होंने बड़ी बेबाकी से बताया कि ‘मैं चार सौ सीटों का दावा नहीं करता हां,कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा।’ यह पूछे जाने पर कि जिन चुनावी मुद्दों के आधार पर आपको 1989 में हराया गया था,क्या किसी स्तर पर उन मुद्दों को उठाया गया ।राजीव गांधी ने बड़े सहज भाव से बताया था कि ‘आज न तो किसी को वो मुद्दे याद हैं और न ही कहीं उनका ज़िक्र हो रहा है ।’ रात का एक बज रहा था ।राजीव गांधी ने खुद ही मुझे सलाह दी कि 21 मई, 1991 को बंगलूरू आ जाना,वहां और लंबी और खुलकर बातचीत करेंगे ।

मैं 20 मई, 1991 को बंगलूरू पहुंच गया और ‘विंडसर मैनोर’ होटल में रुका ।उस समय वहां के जनरल मैनेजर थे नकुल आनंद (बाद में आईटीसी के बड़े अधिकारी बने) । वह बहुत ही बेहतरीन और मददगार इंसान थे ।जब मैंने उन्हें बंगलूरू आने का अपना उद्देश्य बताया तो उन्होंने कहा कि वह भी राजीव गांधी के प्रोग्राम से परिचित हैं ।बंगलूरू में ‘संडे मेल’ के संवाददाता श्रीकांत पाराशर को मैंने अपनी पहुंच की जानकारी दे दी और उनसे सुबह मिलने के लिए कहा ।अभी मैं सोकर उठा भी नहीं था कि नकुल आनंद ने फोन करके बताया कि ‘आपके लिए एक बुरी खबर है ।तमिलनाडु के श्रीपेरुमदूर में राजीव गांधी की हत्या हो गयी है ।’

मेरे हाथ पांव फूल गये । होटल में जितने भी पत्रकार राजीव गांधी को कवर करने के लिए आये थे नीचे हाल में जमा हो गये ।श्रीकांत पाराशर भी आ गए, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के अजय सिन्हा तथा अन्य बहुत सारे स्थानीय पत्रकार भी ।हम सभी लोग विधान सौध गये ।वहां भी स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के गमगीन चेहरे दीखे।बहुत से नेताओं को तो मैंने रोते हुए भी देखा ।आंखें तो कमोबेश वहां उपस्थित सभी लोगों की नम थीं । मैं बड़े चाव से राजीव गांधी का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू लेने के लिए बंगलूरू पहुंचा था लेकिन लौटा दहशत, गम और दर्द लिए हुए ।

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