यह समय राहुल गांधी के ऊपर बात करने का है। पहले राहुल गांधी के दुश्मनों को देख ले कि उनकी संख्या कितनी है। उनके सबसे बड़े दुश्मन खुद प्रधानमंत्री मोदी हैं, जो हर चीज का जिम्मेदार राहुल गांधी को ठहराते हैं, पूरी भारतीय जनता पार्टी है जो संपूर्ण सूचना तंत्र के जरिए से जिसमें न्यूज़ चैनल और अखबार शामिल है, और शामिल है पूरा सोशल मीडिया, के द्वारा राहुल गांधी के ऊपर पिछले कई वर्षों से आरोप लगाती आ रही है, और हर समस्या के जड़ में, या तो राहुल गांधी को या उनके परिवार को जिम्मेदार ठहरती आ रही है। राहुल गांधी का एक और सबसे बड़ा दुश्मन खुद देश का न्यूज़ चैनल नाम का तंत्र है, जिसके एंकर अपने आप राहुल गांधी को प्रधानमंत्री मोदी की समस्या का जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। राहुल गांधी को पिछले 10 सालों से पप्पू नाम के संबोधन से लगातार अपमानित किया गया है । राहुल गांधी कुछ भी कहें लेकिन सत्ता दल से जुड़े लोग उनके कहे हुए को काट छांट कर, आधी बात यहां की, आधी बात वहां की ,जोड़कर उसका वीडियो बनाकर देश के लोगों के सामने पेश करते आ रहे हैं। राहुल गांधी की सफाई ना सोशल मीडिया पर आती है, ना अखबार और ना न्यूज़ चैनल पर कोई जगह पाती है। सत्ता रूढ दल से जुड़े लोगों ने देश के लोगों के सामने यह माहौल बना दिया है कि राहुल गांधी में कभी भी परिपक्वता नहीं आएगी और वह कभी प्रधानमंत्री पद के योग्य अपने को नहीं साबित कर पाएंगे। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं उनके गृहमंत्री श्री अमित शाह भी हर जगह राहुल गांधी को राहुल बाबा के रूप में संबोधित कर उनकी छवि को पूरी तरह मालिन करने के काम में लगे रहते हैं।
इतने सारे दुश्मनों के बीच में राहुल गांधी अकेले हैं । इतना ही नहीं कुछ संवैधानिक संस्थाएं, जिनमे चुनाव आयोग और निचले स्तर की न्यायपालिका भी शामिल शामिल है जो ऐसे फैसले देते है जो कानून सम्मत नहीं है। उनके दुश्मन उन्हें अदालत के चक्रव्यूह में फसाने की हमेशा साजिश रचते रहते हैं। अगर गलती से कभी सोशल मीडिया पर कोई पत्रकार सार्थक विश्लेषण करे तो उस पत्रकार को कांग्रेस का दलाल या देश विरोधी साबित करने की होड़ लग जाती है।
इन सारी परिस्थितियों के बीच में राहुल गांधी ने सबसे साहसिक फैसला भारत यात्रा का लिया। वे दिल्ली तक पैदल चलकर आए, लोगों से मिले, बातचीत की और पूरे रास्ते जो भी उनके साथ चले उनके साथ उन्होंने हर तरह का संवाद करने की कोशिश की। उन्होंने ज्यादातर सफेद टी-शर्ट पहनी, जो राजनीति का आम पहनावा नही है, कुर्ता पजामा, उसे उन्होंने बहुत कम पहना। इस यात्रा ने राहुल गांधी का ज्ञान भी बढ़ाया और उनके ऊपर लगे पप्पू नाम को भी धो दिया। इस यात्रा ने राहुल गांधी को एक परिपक्व राजनीतिक नेता के रूप में रूपांतरित कर दिया। लेकिन राहुल गांधी की परेशानियां समाप्त नहीं हुई क्योंकि उन्होंने राजनीतिक रूप से सत्ता का विरोध करने में जनता का साथ नहीं बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस और ट्विटर का सहारा लिया। राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के भी सारे नेताओं को सक्रिय करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। उनके पार्टी के नेता जो छोड़कर उन्हें चले गए , उन्हें भी रोकने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। परिणाम स्वरूप कई राज्य जिनमे मध्य प्रदेश प्रमुख है ,उनके हाथ से निकल गया। उनके विश्वसनीय साथी उन्हें छोड़कर जाने लगे। उनके नए सिपहसालार बने ही नहीं, उन्होंने जिन लोगों को अपने दाएं बाएं संगठन में रखा है, उन्हें उत्तर भारत की कोई समझ ही नहीं है, और वह ना हिंदी भाषा जानते हैं ,ना यहां के नेताओं को और कार्यकर्ताओं को पहचानते हैं। कांग्रेस कार्यकारिणी में कई बार खबरें आई कि राहुल गांधी बहुत नाराज होकर कार्यकारिणी के सदस्यों से बात कर रहे हैं। राहुल गांधी ने संगठन की शैली ना तो अपनी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी से सीखी और ना ही अपने पिता राजीव गांधी से सीखी। उनकी मां सोनिया गांधी जब तक कांग्रेस के अध्यक्ष रही कब तक कांग्रेस पार्टी एक जुट रही, इसमें श्री अहमद पटेल का बहुत बड़ा हाथ था। सोनिया गांधी उन पर आंख बंद कर विश्वास करती थी, और वह कांग्रेस के हर नेता और कार्यकर्ता से बहुत आसानी से मिलते थे। शायद इसीलिए राहुल गांधी ने एक नई रणनीति अपनाई । यह वही रणनीति है जो श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1987 और 88 में अपनाई थी ।
संगठन अगर नहीं है तो संगठन बनाने में समय मत बर्बाद करो। इसकी जगह सीधे जनता के पास जाओ और जनता से सीधे संवाद करो। अगर जनता आपकी बात समझे तो वह आपकी ताकत बन सकती है । इसलिए पिछले 1 साल में उन्होंने जो मुद्दे उठाए, वह मुद्दे उनकी पार्टी के किसी नेता ने नहीं उठाये , लेकिन राहुल गांधी लगातार उन मुद्दों को उठते रहे। जब भारत में उन्हें मीडिया का साथ नहीं मिला तो उन्होंने विदेश में जाकर मुद्दों को उठाया जिसने विदेशी मीडिया में काफी स्थान पाया। इस रणनीति ने देश में सत्तारूढ़ दल ने उनका विरोध करने की जो योजना बनाई उसने राहुल गांधी को बहुत फायदा दिया। पिछले दिनों भारत के चुनाव आयोग ने जिस तरह के फैसले लिए , उन फैसलों ने राहुल गांधी को जनता के बीच जाने का एक स्वर्णिम अवसर दे दिया । बिहार में चुनाव होने वाले हैं और वहां पर 65 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग हटाए गए 65 लाख लोगों के नाम अपनी वेबसाइट पर डालें और कारण बताएं कि उन्हें क्यों हटाया गया है। राहुल गांधी चाहते तो अपने पार्टी के वकीलों के साथ सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ लड़ सकते थे लेकिन उन्होंने जिंदगी में सही फैसला लिया और इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से लड़ने का निर्णय लिया। वे बिहार की जनता के बीच 17 तारीख से यात्रा पर निकल गए। उनके साथ बिहार के नौजवान नेता और बिहार के भूतपूर्व उपमुख्यमंत्री, और मौजूदा समय में बिहार विधानसभा में विरोध पक्ष के नेता तेजस्वी यादव भी भी यात्रा पर निकल गए ।
इस समय बिहार में श्री राहुल गांधी और श्री तेजस्वी यादव की यात्रा चल रही है, अपार भीड़ उनका स्वागत कर रही है और इस यात्रा ने दलों की सीमाएं तोड़ दी हैं, जनता स्वयं इस यात्रा का हिस्सा बन रही है। 17 तारीख को रविवार था और उसी दिन यात्रा शुरू हुई, चुनाव आयोग ने पहली बार रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसका नेतृत्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने किया । उन्होंने जिस तरह से प्रेस कॉन्फ्रेंस की, पत्रकारों के सवालों का जिस तरह से जवाब दिया, जिस तरह के आरोप लगाए, और अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी को चेतावनी दी, बहुत सारे लोग इसे मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा दी गई धमकी के रूप में देख रहे हैं। इस प्रेस कांफ्रेंस ने खुद प्रधानमंत्री को एक अजीब स्थिति में पहुंचा दिया। जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे लग रहा था कि वे किसी राजनीतिक दल विशेष के प्रवक्ता है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अगर दो जगह वोटर लिस्ट में किसी का नाम है तो वह वोट तो एक ही जगह डालेगा.. उन्होंने यह भी कहा कि अगर समय रहते यह सवाल उठाए गए होते तो उनका निराकरण हो जाता। उनका इशारा भूतपूर्व चुनाव आयुक्त राजीव कुमार जी की तरफ था, कि अगर कोई गलती हुई है तो उनके समय हुई है। वह भूल गए की चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसके ऊपर चुनाव कराने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है । चुनाव आयुक्त आते जाते रहेंगे लेकिन चुनाव आयोग बना रहेगा । उन्होंने किसी सवाल का जवाब नहीं दिया बल्कि यह और कह दिया की बहुत सारे लोगों के घर नहीं है, उनका वोटर आईडी कार्ड बना हुआ है और उनके घर के पते की जगह शून्य लिखा हुआ है। उन्होंने प्रधानमंत्री के इस दावे का भी मजाक उड़ा दिया कि देश के सभी गरीब लोगों को रहने के लिए घर दिया जा चुका है। मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस का सिर्फ अपने देश में ही नहीं सारी दुनिया में मजाक उड़ रहा है । मुख्य चुनाव आयुक्त की इस प्रेस कांफ्रेंस ने बिहार में श्री राहुल गांधी और श्री तेजस्वी यादव को अतिरिक्त ताकत दे दी, और वह बिहार की जनता के बीच हिम्मत के साथ अपने सवाल उठा रहे हैं ।
इस समय राहुल गांधी एक बड़े जन नेता के रूप में उभर आए हैं जिसने सत्ता रूड दल को एक बड़ी परेशानी में डाल दिया है। चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से लगाए हुए आरोपी के बारे में हलफनामा मांगा है लेकिन भारतीय जनता पार्टी के सांसद द्वारा रायबरेली अमेठी और प्रियंका गांधी के चुनाव क्षेत्र वायनाड में लाखों नकली वोट होने के आरोप के ऊपर उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया। चुनाव आयोग की निष्पक्षता वैसे ही संदेह के घेरे में थी लेकिन इस घटना ने उसे पूर्ण रूप से पक्षपाती सिद्ध कर दिया।
राहुल गांधी का यह कहना कि मैं कोई हलफनामा नहीं दूंगा, इसने उन्हें एक और परिपक्व नेता के रूप में देश के सामने प्रस्तुत कर रहा है, जो सिर्फ परिपक्व ही नहीं है बल्कि जनता के लिए लड़ने वाला भी है। उनके इस स्वरूप ने सारे विपक्षी दलों को उनके साथ खड़ा कर दिया है। इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे लोग नहीं चाहिए जो उनके लिए समस्या बने बल्कि ऐसे लोग चाहिए जो समस्या न पैदा करें और अगर कोई समस्या हो तो उसका तत्काल स्वयं समाधान कर ले । लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने तो उनके लिए, ऐसा लग रहा है कि एक बड़ी समस्या पैदा कर दी है । मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस की रिकॉर्डिंग देश के गांव-गांव में पहुंच गई है, जिसने प्रधानमंत्री मोदी की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है। यही वह बिंदु है जहां से बिहार चुनाव में एक नया मोड़ आ गया है। शायद बिहार में एनडीए के लिए मुश्किलों का दौर प्रारंभ हो चुका है। इसका हल भाजपा अध्यक्ष निकलेंगे, गृहमंत्री अमित शाह निकलेंगे या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निकलेगा, कहां नहीं जा सकता। लेकिन इतना साफ है कि लोकतंत्र में ना सर्वोच्च न्यायालय महत्वपूर्ण है, ना कोई सरकार महत्वपूर्ण है, और ना कोई संवैधानिक संस्था महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में अगर कोई महत्वपूर्ण है तो वह भगवान है और लोकतंत्र में भगवान स्वयं जानता है। यहां एक और ध्यान देने की बात है कि जिस तरह चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्थान है इस तरह लोकसभा में नेता विरोधी दल भी एक संवैधानिक पद है। मुख्य चुनाव आयुक्त अगर चाहते, तो लोकसभा में नेता विरोधी दल को अपने यहां चाय पर बुलाते और उनसे सारी बात बंद कमरे में कर लेते , पर उन्होंने राजनीतिक होने का सबूत देते हुए नेता विरोधी दल पर प्रेस के जरिए बात की, मैं फिर दोहराता हूं कि संवाददाताओं के किसी सवाल का उन्होंने जवाब नहीं दिया, उनका पूरा रुख धमकी देने वाला था। यह मुख्य चुनाव आयुक्त की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। बिहार में चल रही श्री राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा किस परिणाम पर पहुंचेगी, यह चुनाव में पता चलेगा लेकिन इस वोट अधिकार यात्रा ने राहुल गांधी को एक परिपक्व, समझदार, और संघर्षशील नेता के रूप में देश के सामने अवश्य प्रस्तुत कर दिया है । और यही बिहार में चल रही वोट अधिकार यात्रा का तार्किक परिणाम भी है।।
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