मैं ही नहीं, शायद देश में कोई भी व्यक्ति समझ नहीं पा रहा है कि जो सामान्य समस्याएं हैं, जिनके बारे में सोचना और उनका हल निकालना बहुत आवश्यक है, उनके बारे में किन से निवेदन किया जाए।
सबसे पहली समस्या पीने के पानी की और सिंचाई के लिए पानी की है।
जमीन के भीतर का पानी सूख रहा है और पीने के पानी के लिए जमीन को और गहरा खोदने की आवश्यकता पड़ती है। देश के बहुत सारे हिस्सों में अगर 2000 फीट भी खोदे तो पानी उपलब्ध नहीं हो रहा है और देश के ग्रामीण क्षेत्रों को तो छोड़िए, शहरी क्षेत्र में भी पीने के पानी की भयानक समस्या खड़ी हो गई है। जितने भी महानगर हैं, जिनमें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई सहित जितने नाम आपको याद आते हैं, उन्हें इस सूची में आप अपने आप बढ़ा सकते हैं। यहां पीने का पानी उपलब्ध नहीं है और यहां रहने वाले बहुत से क्षेत्र में नगर निगम या नगर पालिकाएं टैंकर से पानी पहुंचा रही हैं। जो अमीर कॉलोनियां हैं वहां तो यह पानी जरूर पहुंच रहा है, लेकिन जो गरीबों की बस्तियां हैं, वहां पर पानी के लिए लड़ाई-झगड़ा, मारपीट और हत्याएं तक हो रही हैं।
आदरणीय प्रधानमंत्री देश को लगातार यह बता रहे हैं कि हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं या बन चुके हैं। अभी हाल में उन्होंने कहा कि हम स्पेस टेक्नोलॉजी में प्रवेश कर रहे हैं और हम दुनिया के मुकाबले अगले 10 सालों में अंतरिक्ष में भी अपना झंडा गाड़ देंगे। उन्होंने इसके लिए देश के सारे उद्यमियों से, विश्व के निवेशकों से और भारत के बैंकों से इस क्षेत्र में इन्वेस्टमेंट करने की अपील की है। इस सत्य ने और इस रहस्य उद्घाटन ने हमारा सर ऊंचा उठा दिया है, पर यहीं पर एक छोटा निवेदन देश के प्रधानमंत्री से करने की इच्छा हो रही है।
हर साल देश में प्रचुर मात्रा में बरसात होती है, बाढ़ आती है, संपत्ति का और मानव जीवन का बहुत ही ज्यादा नुकसान होता है। अंतरिक्ष में जाने की योजना बनाने के साथ अगर सरकार शहरी क्षेत्र में और खासकर ग्रामीण क्षेत्र में रेन हार्वेस्टिंग के साथ पानी के संग्रहण की एक साधारण-सी देशव्यापी योजना बना लेती तो हमारे देश के पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी की समस्या काफी हद तक हल हो सकती थी। शहरों में बावड़ियां थीं, कुएं थे और घरों का पानी जमीन में कैसे जाए इसकी तकनीक थी। ग्रामीण क्षेत्रों में बारिश और बाढ़ का सामना बड़े-बड़े तालाबों को, और जहां भी खेतीयोग्य जमीन नहीं है वहां बड़े-बड़े नए तालाबों का निर्माण करवाने के लिए अगर सरकार लोगों को उत्प्रेरित करती तो बाढ़ के उतरने और बारिश के समाप्त होने के साथ हमारे पास सालभर के लिए पर्याप्त पानी का भंडारण हो सकता था। सरकार का यह तर्क सही है कि बारिश और बाढ़ प्रकृति के ऊपर निर्भर करते हैं। इसमें मानव का कितना हाथ है यह एक अलग सवाल है; इसको लेकर काफी चर्चाएं होती रहती हैं, लेकिन बारिश और बाढ़ के पानी का संरक्षण और भंडारण पूरी तरह से लोगों के हाथ में है।
सरकार को यह बताने की जरूरत नहीं है कि किस तरीके से शहर और गांव में, पानी को संरक्षित करने वाली बावड़ियों, कुओं और तालाबों पर अवैध कब्जा कर वहां मकान बना लिए गए हैं। इन अवैध कब्जों से अनाधिकृत लोगों को हटाना और पानी को संरक्षित करने वाली सारी निर्मित की गई पुरानी अमूल्य संरचनाओं को पुनः जीवित कर उनका जनजीवन के लिए उपयोग करना सिर्फ और सिर्फ सरकार और प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में है। यद्यपि इसकी जड़ में भी प्रशासन और सरकार ही है, क्योंकि यह अपराध इन्हीं में से अनेक लोगों के शामिल होने के कारण हुआ है।
पानी को संरक्षित करने वाली यह प्राचीन तकनीक जमीन के नीचे पानी का स्तर बढ़ाती है और देश की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को पीने का पानी पूरे सालभर उपलब्ध करा सकती है। अभी हमारे देश में प्रकृति के दिए हुए पानी के इस अमूल्य उपहार को पूरी तौर पर व्यर्थ किया जा रहा है और इसे एक विनाश के हथियार के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसलिए इस समस्या को सिवाय देश के प्रधानमंत्री के और कोई हल नहीं कर सकता।

दूसरी सबसे बड़ी समस्या जिसका सामना इस देश के बहुत सारे लोगों को करना पड़ रहा है वह है डिजिटल फ्रॉड।
चाहे बैंक हो, आर्थिक लेन-देन के दूसरे साधन हों, या फिर देश में और विदेश में आर्थिक निवेश के समझौते हों, या व्यापारिक क्षेत्र में हो रही धोखाधड़ी हो; इसकी शिकायत करने की कोई जगह नहीं है। सरकार ने एक नंबर और एक वेबसाइट बना रखी है, लेकिन फोन करने पर कोई उठाता नहीं है और वेबसाइट से कोई जवाब नहीं आता। एक संदेश अवश्य आता है कि आपकी शिकायत दर्ज कर ली गई है, इस पर कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी न कोई बात करने आता है, न शिकायत का कोई परिणाम निकलता है।
पुलिस ने भी कुछ पुलिस स्टेशनों को इस तरह की शिकायतें दर्ज करने का अधिकार दे रखा है, लेकिन वहां जाने पर भी प्राथमिक सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं होती। एक सादे कागज पर शिकायत मांग ली जाती है और कहा जाता है कि हम इस पर कार्रवाई करेंगे। लाखों-करोड़ रुपए का धोखाधड़ी का यह मामला चलता जा रहा है और इसका कोई हल दिखाई नहीं दे रहा है। धोखाधड़ी करने वाले बहुत आराम से अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं और मेहनत से कमाई करने वाले लोग अपना सर पीट रहे हैं। बहुत सारे लोगों ने इस धोखाधड़ी या फ्रॉड से होने वाले नुकसान के कारण आत्महत्या भी कर ली है।
हम रोज देखते हैं कि सरकार डिजिटल इंडिया का प्रचार कर रही है और हर जगह आधार कार्ड और पैन कार्ड मांगा जा रहा है, चाहे बैंक में अकाउंट खोलना हो या मोबाइल का सिम लेना हो। अगर आप नहीं देंगे तो अकाउंट नहीं खुलेगा और न मोबाइल का सिम मिलेगा। यह आंकड़े या डाटा खुलेआम बाजार में बिकता है और धोखाधड़ी करने वाले आसानी से मेहनत करने वाले लोगों को धोखा देते रहते हैं।
इसकी जिम्मेदारी भी सरकार और प्रशासन की है कि वह अपने देश के लोगों को किसी भी प्रकार की आर्थिक धोखाधड़ी से बचाएं और धोखाधड़ी करने वालों को पकड़े, तथा उनसे उस रकम को वापस दिलाए जिनसे यह रकम धोखाधड़ी से छीनी गई है। इसके बारे में भी सिवाय देश के प्रधानमंत्री से और किसे कहें।

अब एक सबसे बड़ा सवाल हमारे मन में और है: क्या यह सारे निवेदन हमारे देश के आदरणीय प्रधानमंत्री के पास पहुंच भी पाते हैं या नहीं?
पुलिस रिपोर्ट नहीं लिखती क्योंकि रिपोर्ट लिखेंगे तो उनके थाने का रिकॉर्ड खराब होगा; अधिकारियों को ध्यान देने की फुर्सत नहीं है और मंत्रियों के लिए यह कोई ध्यान देने का विषय नहीं है। न्यूज़ चैनल और अखबार इस तरह के समाचारों को अपनी रिपोर्टिंग का विषय नहीं बनाते।
इसीलिए मैं यह कह रहा हूं कि हमारी इस हालत की जानकारी और हमारा रोना-धोना क्या देश के प्रधानमंत्री के कानों में पहुंच भी पा रहा है या नहीं। हमारे हाथ में सिर्फ फरियाद करना है, अपना दुखड़ा रोना है और यह आशा करना है कि शायद कभी प्रधानमंत्री जी के पास हमारी यह व्यथा पहुंच जाए और वे देश के लाखों लोगों के साथ हो रहे आर्थिक धोखाधड़ी का भी हल निकालें और देश में पीने के पानी और सिंचाई के पानी के भंडारण की समस्या का भी हल निकालें।
इसी आशा के साथ अपने आदरणीय प्रधानमंत्री के सामने हम अपने यह दो निवेदन रख रहे हैं। देखते हैं, उनके कानों में या उनकी आंखों के सामने देश की यह अर्जी, देश का यह निवेदन कब तक पहुंचता है। पहुंचेगा भी या नहीं , पता नहीं…













