अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान और चीन का ताजा रवैया बहुत ही तारीफ के काबिल है लेकिन यह रवैया बहुत ही हैरान करनेवाला भी है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मो. हनीफ अतमार के साथ जो संवाद किया, उसमें साफ़-साफ़ कहा कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी में जल्दबाजी न की जाए। यों तो ये फौजें 1 मई को लौटनी थीं लेकिन बाइडन ने इस तारीख को बढ़ाकर 11 सितंबर कर दिया है। पाकिस्तान और चीन उन देशों में से हैं, जो अमेरिकी और नाटो फौजों के अफगानिस्तान में रहने का घोर विरोध करते रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा पोषित तालिबान का उन्मूलन करना उनका मुख्य उद्देश्य रहा है। यदि पाकिस्तान का समर्थन और सक्रिय सहयोग नहीं होता तो क्या मुजाहिदीन और तालिबान काबुल पर कब्जा कर सकते थे ?

बबरक कारमल और नजीबुल्लाह को अपदस्थ करने में उस समय अमेरिका ने भी पाकिस्तान की सक्रिय सहायता की थी लेकिन इस्लामी आतंकवादियों द्वारा अमेरिका में किए गए हमलों ने सारा खेल उलट दिया। अमेरिका ने तालिबान को काबुल से बेदखल कर दिया लेकिन पिछले 20 वर्षो में अफगान जनता द्वारा चुनी हुई हामिद करजई और अशरफ गनी सरकारों के विरुद्ध तालिबान की पीठ कौन ठोक रहा है ? क्या पाकिस्तान की सक्रिय सहायता के बिना तालिबान जिंदा रह सकते हैं? तालिबान के जितने भी गुट हैं, वे सब पाकिस्तान में स्थित हैं। उनके नाम हैं– क्वेटा शूरा, पेशावर शूरा और मिरानशाह शूरा ! पाकिस्तान अब खुले में तो तालिबान का विरोध करता है लेकिन उसने तालिबान को अपनी अफगान-नीति का मुख्य अस्त्र बना रखा है। इसके बावजूद उसे पता है कि गिलजई पठानों का यह संगठन अंततोगत्वा पाकिस्तान के पंजाबी शासकों को धता बता देगा।

जो पठान अंग्रेजों, रूसियों और अमेरिकियों के हौंसले पस्त कर सकते हैं, वे पाकिस्तान के लिए भी बहुत बड़ा सिरदर्द बन सकते हैं। वे पख्तूनिस्तान की मांग फिर से जीवित कर सकते हैं। वे काबुल नहीं, पेशावर को अपनी राजधानी बनाना चाहेंगे। पाकिस्तानियों को यह डर तो है ही और चीनियों को भी यह डर है कि यदि काबुल में तालिबान आ गए तो अफगानिस्तान से लगा हुआ उसका शिनच्यांग प्रांत अस्थिर हो जाएगा। शिनच्यांग के उइगर मुसलमानों को दबाना मुश्किल हो जाएगा। इसीलिए अब इन दोनों देशों के विदेश मंत्री घुमा-फिराकर तालिबानी सत्ता का विरोध कर रहे हैं। यदि इनका विरोध इतना ही प्रामाणिक है तो ये दोनों राष्ट्र अपने लाख-दो लाख सैनिक अफगानिस्तान क्यों नहीं भिजवा देते ? वे वहां लोकतांत्रिक सरकार को कायम रखने में मदद क्यों नहीं करते ? पाकिस्तान बहुत गंभीर पसोपेश में फंसा हुआ है। एक तरफ वह अमेरिकियों को काबुल में टिके रहने को कह रहा है और दूसरी तरफ उनकी वापसी के बाद वे अफगानिस्तान को जो हवाई सुरक्षा देना चाहते हैं, वह भी नहीं दे रहा है।

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