पहलगाम का आतंकवादीयों के द्वारा किया गया हमला शतप्रतिशत सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जिता जागता उदाहरण नजर आ रहा है. गोली चलाने के पहले धर्म पुछना या कलमा पढने के लिए कहना इसका मतलब क्या है ? लेकिन कश्मीर के आम लोगों ने इसे पुरी तरह से नकार दिया है. वहां पर विभिन्न प्रकार की सेवा देने वाले कश्मीरी लोगों ने अपनी जान पर खेलकर यात्रीयो को बचाने की कोशिश की है. इस हादसे के बाद श्रीनगर के अटो ड्राइवरों ने अपने अटो के उपर आए हुए यात्रीयो को वापस जाने के लिए हवाई अड्डे से लेकर रेल्वे स्टेशन पर छोडने के लिए फ्री सर्विस देने की पहल उसका प्रमाण है. उन्होंने अपने अॉटो के कांचपर फ्री सर्विस के स्टिकर लगाए हैं.
सबसे अहम बात हादसे की जगह पर मारे गए 26 यात्रीयो मे एक नाम आदिल हुसैन शाह है. जो अपने टट्टू से यात्रियों को ले-आने की सवारी करता था. मंगलवार को आतंकियों के हमले के दौरान वह खुद आतंकवादीयों से भिड गया और उन्हें बोला कि “इन्हें मत मारो, कश्मीर के मेहमान है”. और उसने आतंकवादीयों के पास की एके – 47 बंदूक छिनने की कोशिश की तो आतंकवादीयों ने उसकी छाती पर तीन बार गोली दागकर उसे मार डाला. आदिल अपने माँ बाप का इकलौता बेटा था. इसी तरह और दुसरे ने भाजपा के पार्षद और उसके परिवार को सहीसलामत बचाने मे भुमिका निभाई है .
हमारे देश में पिछले कुछ सालों से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बहुत बडे पैमाने पर करने मे सांप्रदायिक तत्वों को कामयाबी मिली है. लेकिन मैने पचास वर्ष से अधिक समय से कश्मिर मे आने – जाने के दौरान काजीगुंड से लेकर श्रीनगर तथा विभिन्न जगहों पर यात्रीयो को विभिन्न प्रकार की सेवा देने वाले होटल वाले से लेकर दुकानदार, टॅक्सी – ड्रायवरो से लेकर नौकाचालको से लेकर श्रीनगर विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षकों से लेकर वकिल डॉक्टरो तथा हूरियत कॉंफ्रेंस के नेताओ, जिनमे मिरवाईज उमर फारुख से लेकर अन्य कश्मीर के नागरिकों साथ बातचीत में हमेशा ही आतंकवादीयों के खिलाफ बोलते हुए देखा है . क्योकिं कश्मीर की अर्थव्यवस्था का दारोमदार पर्यटन व्यवसाय ही है. और कश्मीर सरकार के विभागों में पर्यटन मंत्रालय को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है . इसलिए आतंक के माहौल में कोई भी पर्यटक नहीं जाता. इसलिए कश्मीर के ज्यादा तर लोग लोग शांति और सद्भाव ही चाहते हैं .
2016 के अगस्त में बुरहान वणी की हत्या के बाद हूए बंद मे मै दो हफ्ते जम्मू-कश्मीर मे रह कर आया हूँ. उस दौर में मुझे कश्मीर टाइम्स के श्रीनगर एडिशन के संपादक जहूर साहब ने कहा कि “आप इतने नाजुक हालात में कश्मीर के चप्पे-चप्पे मे घुम रहे हैं. यह देख कर सिनियर गिलानी आपसे मिलना चाहते हैं. तो आप उनसे मिलकर ही कश्मीर छोडिए. “और मैं कश्मीर छोड़ने के पहले गिलानी के साथ मिलने के लिए उनके घर चला गया. तो वह हाउस अरेस्ट थे. तो सिक्युरिटी अफसर ने वायरलेस से अपने वरिष्ठ अफसर को फोन कर के मेरा पहचान पत्र पढकर मेरा नाम और पता बताया और उसने कहा “कि हमारे वरिष्ठ अफसर ने आपको गिलानी से मिलने की इजाजत दी है. लेकिन बडी हैरत की बात है कि आपसे कुछ समय पहले ही यशवंत सिन्हा आकर गए. लेकिन उन्हें नहीं जाने दिया. और आपको मिलने दे रहे हैं.” और उसने खुद ही कहा कि आपके साथ मुझे सेल्फी लेना है .” हो सकता यह सेल्फी भी उसके ड्यूटी का हिस्सा हो .

खैर मै गिलानी से मिलतेही उन्होंने कहा कि ” अल्लाह आपको सलामत रखे. आप अपनी जान की परवाह किए बिना इतने कडे बंद मे भी दो हफ्ते से व्हॅली मे खेत – खलिहानों से लेकर लोगों को मिल रहे हैं. यह बहुत ही अच्छि बात है”. मैंने उन्हें कहा कि “आज अगस्त से लेकर अब तक दो महीने हो गए हैं. बंद चल रहा है. लोगों को अस्पताल में ले जाने वाले वाहनों को भी रोका जा रहा है. क्या आपको लगता नहीं की अब बंद समाप्त होना चाहिए ?” तो उन्होंने कहा कि अब लोग मेरी बात नहीं मान रहे हैं .” यह बात उनके मुंह से सुनकर मै समझ गया था कि तथाकथित कश्मीरी अलगाववादियों से लोगों का विश्वास कमजोर हो गया है. और कुछ लोगों को तो मैंने इन सभी को कोसते हुए भी देखा है.” कि इन्हें इस तरह के बंद से कोई परेशानी नहीं है. परेशान तो हम लोग है. यह तो दोनो सरकारों से मिले हुए हैं इनके बालबच्चे विदेशों में पढ रहे हैं “. परेशानी तो हम लोग झेल रहे हैं . हमारे बच्चों के स्कूल बंद है, और रोजी-रोटी के लिए रोजगार के लिए घर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं . नेताओं को सब कुछ घरों में रहते हुए भी सब सुविधाएं मिल रही हैं . और ए. एस. दुलात जो आई बी के प्रमुख थे, और उसके पहले पच्चीस साल से अधिक समय तक कश्मीर में तैनात रहे हैं. अपनी किताब ‘कश्मीर द वाजपेयी इयर्स’ मे आतंकवाद के बारे में जो लिखा है. वो बहुत ही चौंकानेवाला है . उन्होंने दोनों सरकारी एजेंसियों की साठगांठ से क्या – क्या किया है. इसका खुलासा किया है. जो पढने के बाद 2016 से ही मैनें उनपर कारवाई करने की मांग की है. लेकिन कारवाई तो दूर की बात है. उन्होंने और पाकिस्तान के आईएसआई के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी ने मिलकर लिखि हुई ‘स्पाई क्रॉनिकल ‘शिर्षक की किताब में तो और भी हैरतअंगेज तत्थो को उजागर किया है . और दोनों लेखक अपने – अपने देश की सबसे बड़ी एजेन्सियों के सर्वोच्च पदो पर अपने जीवन का सबसे बड़ा समय देकर काम कर चुके हैं .

मै इस बहाने पाकिस्तान के आम लोगों को भी निवेदन कर रहा हूँ कि पिछले 78 सालो से दोनों देशों के बीच मे बटवारा होने के बावजूद सुरक्षा के लिए जो बजट में खर्च हो रहा है. और दोनों तरफ के लोगों की जाने जा रही है. वह और भी संगिन बात है. क्या हम एक दूसरे से आपस में बात कर के जो भी विवाद है. उन्हें हल नहीं कर सकते ? दोनों देशों की अपने देश के लोगों के लिए, प्राथमिकता में अपने – अपने देश के लोगों को बेहतर जीवन देने के लिए यह रक्षा के लिए अपना संसाधन बर्बाद करना कब तक चलेगा ? राजनीति करने वाले लोगों की राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही है लेकिन किस किमत पर ?













