मेरा जन्म 1953 के दिसंबर के आखिरी सप्ताह का है. और मेरा गांव महात्मा ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज से प्रभावित गांव होने की वजह से, उस दौरान मैंने ब्राम्हण और मराठा एक जैसे ही खेती के कामों को करते हुए देखा है. और शादी-ब्याह सत्यशोधक पद्धतीसे ज्योतिबा फुले ने रचे हुए मंगलाष्टक कोई भी व्यक्ति जिसे गाना आता था, वह गाकर शादी संपन्न होती थी. ब्राम्हण का महत्व कुछ भी नहीं था. और गांव के मंदिरों की मूर्तियां हटाकर वहां पर स्कूल चलें है. जिसमें मुझे खुद को पहली क्लास में पढ़ने का मौका मिला हुआ विद्यार्थियों में से एक हूँ. 1957-58 के समय की बात है. बाद में जिला परिषद शायद साठ के दशक की शुरुआत में बनी, और उसने स्कूल की इमारत बनाने का काम किया है. और उस नई ईमारत के स्कूल में भी मै सातवें क्लास तक पढा हूँ.

सत्यशोधक समाज के लोग आजादी के आंदोलन में शामिल नहीं थे. उल्टा वह घोर कांग्रेस के विरोध में, और अंग्रेजों के तरफसे थे. इसलिए उन्हें राव पार्टी के लोग बोला जाता था. मतलब जिन्हें अंग्रेज सरकार के तरफसे राव का खिताब दिया जाता था. ज्यादातर लोग अंग्रेजो की सत्ता के हिमायती थे. शायद मेरे पिताजी पूरे गांव में अकेले ही थे, जो स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे. और कांग्रेस के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता थे. मैंने पैदा होने के बाद, होश संम्हाला तो कांग्रेस का राज था. मेरे पिता खुद प्रतिबद्ध कांग्रेसी थे. इसलिए होश सम्हाला तो कांग्रेस का चुनाव प्रचार करने के लिए पिता के साथ जाने लगा था. और शायद चीनी आक्रमण के आस – पास का चुनाव होगा. सभा पर कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों ने पत्थर फेंकने से, मेरे दाहिनी आंख के कोने में पत्थर का टुकड़ा लगने से, आंख तो बच गई पर खून बहुत बहा था. चीनी आक्रमण के समय हमारे गाँव के और अगल-बगल के कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को जेल में बंद कर दिया था. (1962-63) लेकिन कुछ समय बाद वह जेल से बाहर आने के बाद, बैलगाड़ियों पर बैठाकर बाजे – गाजे के साथ उनका जुलूस निकाला गया. और हर घर से उनकी आरती उतारने, तथा उन्हें नारियल और कोई नया कपडे देने का दृश्य भी मुझे अच्छी तरह से याद है. और आश्चर्य की बात हमारे भी घर के सामने बैलगाड़ी का जुलूस रुकने के बाद, आरती उतारने और नारियल तथा नया कपडा देने का कार्यक्रम हुआ है. क्योंकि जेल से बाहर आने वाले रामराव सिताराम पाटिल धुळे संसदीय क्षेत्र के दो बार भाजपा सांसद रहे डॉ. सुभाष भामरे के पिता, और मेरे पिताजी के भांजे थे. बाद में उन्होंने शिवाजीराव पाटिल के कांग्रेस में रहते समय, कांग्रेस में प्रवेश किया था. स्मिता पाटील के पिता वह भी कभी राष्ट्र सेवा दल और बाद में सोशलिस्ट पार्टी के रहे हैं. यह सब साठ सत्तर के दशक की बातें है.
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उसी दौरान लैटिन अमेरिका के चिली तथा क्यूबा में चे गुवेरा और फिडेल कॅस्ट्रो और उनके साथियों की कोशिश से क्रांतिकारी बदलाव हुए थे. फ्रांस में विद्यार्थियों के आंदोलन ने जोर पकडा हुआ था. और भारत में श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार के रहते हुए, महंगाई, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार को लेकर, सबसे पहले गुजरात के मोरवी के सरदार वल्लभभाई पटेल इंजीनियरिंग कॉलेज की मेस में, एक रुपये की थाली सव्वा रुपया बढ़ाने को लेकर, विद्यार्थियों ने आंदोलन छेड रखा था. जो बाद में नवनिर्माण आंदोलन के रूप में पूरे गुजरात में फैलने की वजह से, तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा था. और उसके बाद हुए चुनाव में, कांग्रेस की हार होकर पहली बार गुजरात में जनता सरकार और उसके मुख्यमंत्री श्री. बाबुभाई पटेल चुने गए थे. और यह सब आपातकाल की घोषणा के पहले की घटनाओं के बारे में मैं लिख रहा हूँ .गुजरात के बाद बिहार में भी विद्यार्थियों के आंदोलन की शुरूआत हुई थी. और उसके भी मुद्दे भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी ही थे. काफी आग्रह करने के बाद सत्तर साल पार कर चुके जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन को नेतृत्व देना स्वीकार किया. गुजरात से लेकर बिहार तक के आंदोलनों का जायजा लेने से पता चलता है कि, भले ही जयप्रकाश नारायण ने शांति सेना और उसके बाद छात्र युवा संघर्ष वाहिनी नाम के संघठन की घोषणा की थी. और मैं खुद महाराष्ट्र संघर्ष वाहीनी की स्थापना करने वाले लोगों में से एक व्यक्ति रहा हूँ. लेकिन संघ के विद्यार्थि परिषद और उनके अन्य संघठनो के तुलना में हमारे संघठन में मतभेदों की भरमार, और एक-दूसरे के हेतु पर शंकाओं का आलम अधिक था. इस कारण हमारे संघठनो में बिखराव भी अधिक था. क्योंकि हमारे साथ आने वाले साथी बहुत से नए, और कुछ पुराने शांति सेना और समाजवादी पार्टी या मेरे जैसे राष्ट्र सेवा दल से आकर, छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के काम को बढ़ाने की कोशिश कम, और एक दूसरे को निचा दिखाने में हमारे सभा संमेलन तथा बैठको का समय ज्यादा बर्बाद हुआ है.

उदाहरण के लिए यूगांडा के तत्कालीन तानाशाह इदि अमिन के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित करने के लिए, एक- एक शब्द को लेकर पूरी रात खत्म हो गई. लेकिन हमारे प्रस्ताव पर विचार विमर्श जारी था. मैंने कहा कि हमारे प्रस्ताव को नही इदि अमिन पढने वाला है. और नहीं यूगांडा में इस प्रस्ताव की वजह से कोई बदलाव होने वाला है, यह एक टोकन गेस्चर है. इसमें कितना समय बर्बाद करोगे ?

कहने का तात्पर्य हम लोग सिकुड़ते गए. नऐ लोग आए नही. और हम अपने दिवानगी के आलम में हमारे देश के असली सवालों को समझने में नाकाम रहे हैं. तथा संघ परिवार जयप्रकाश आंदोलन के बाद सबसे अधिक संसाधन जुटाने में कामयाब रहा. और सक्रिय होकर आदिवासियों के लिए वनवासी सेवा आश्रम, दलितों के लिए समरसता मंच, उत्तर पूर्वी प्रदेशों के लिए विवेकानंद युवा केंद्र, महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिती और बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, विद्यार्थी परिषद तो पहलेसेही थी, लेकिन अस्सी के दशक में धार्मिक ध्रविकरण करने के लिए विभिन्न प्रकार के संघठनो की भरमार करते हुए, दलित, महिलाओं से लेकर आदिवासी और सबसे संगिन बात “सौ में पांवे पिछड़ा साठ” का नारा लगाने वाले समाजवादियों की तुलना में, पिछड़े वर्ग के लोग आज किसके साथ है ? बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने से लेकर गुजरात- भागलपुर के दंगों के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के उपर हमला करने वालों को देखते हुए क्या दिखाई दे रहा है ?


आज नरेंद्र मोदी उसी फसल को काटकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे है. ब्राम्हणों को गालियां देनेवाली बहन मायावतीजी किसके हित में राजनीतिक गतिविधियां कर रही है ? और कांग्रेस को सब से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बॅन लगाने की शर्त रखने वाले डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के वर्तमान वंशज भी पिछले चुनाव और अभी के चुनाव में किस दल को फायदा दिला रहे हैं ? बाबासाहब ने हिंदुत्ववादी तत्वों के बारे में सावधानी के इशारे देने के बावजूद आज उनके नाम पर राजनीति करने वालों को आज क्या हो गया है ? कोई तो हिंदुत्ववादीयो की गोद में जाकर बैठ गए. और कोई दावा तो करते हैं कि वह सांप्रदायिकता के खिलाफ है. लेकिन उनके राजनीतिक चाल – चलन और चरित्र देखकर लगता है, कि वह जाने अनजाने में हिंदुत्ववादीयो की ही मदद कर रहे हैं. अभी हाल ही में नागपुर में रामदास आठवले ने आकर कहा की “भारतीय मुसलमानों के पसमांदा लोगों के लिए वक्फ संशोधन बिल बहुत फायदेमंद होनेवाला है. और उसके खिलाफ न्यायालय ने कोई भी फैसला लेना मतलब कानून बनाने वाली संसद का अपमान है .” रामदास आठवले सचमुच डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के अनुयायी हैं, तो क्या राममंदिर निर्माण का फैसला इसी न्यायालय ने लिया था क्या वह हमारे संसद का मान – सम्मान बढाने का फैसला दिया था ? भाई रामदास आठवलेजी संघ तथा भाजपा को खुश करने का प्रयास कर रहे हों . बाबासाहेब ने भारत के पहले मंत्रीमंडल से हिंदुत्ववादियो ने हिंदुकोड बिल का विरोध करने पर इस्तीफा दे दिया था . और एक आप है जो इस्तीफा देने की जगह हिंदुत्ववादियो के हनुमान बन बैठे हो . कभी आप दलित पैंथर के शुरुआती दिनों के लोगों मे से एक थे . यह याद करते हुए हैरानी हो रही है .













