तेज दौड़ लगा रहे मसूद पर सियाी वार, किया रीढ़ पर हमला कई दिनों से चल रही हलचल का पड़ाव कॉलेज ढ़हाने पर आकर रुका – खान अशु

भोपाल। प्रदेश में उपचुनाव की हलचल खत्म हो गई है, मतदान के बाद अब परिणाम पर सबकी नजरें लगी हुई हैं। इस खाली वक्त का इस्तेमाल एक उस रुकी हुई सियासी फाईल को निपटाने की शासन-प्रशासन ने ठानी, जो लंबे समय से कई दिलों में नासूर की तरह खटक रही थी। राजधानी के मध्य विधानसभा के कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद के कॉलेज पसिर में गुरूवार सुबह से बुलडोजर और निगम के तोडू दस्ते की रेलमपेल दिखाई देने लगी थी। बुधवार देर रात हुए फैसले के बाद गुरूवार को कॉलेज का एक बड़ा हिस्सा अतिक्रमण करार देते हुए धराशायी कर दिया गया है। बाकी के लिए भी कार्यवाही जारी है। बात महज अतिक्रमण, परमिशन या पढ़ाई के जरिये आमदनी करने तक सीमित नहीं है, इसके पीछे छिपी सियासी जंग से शहर वाकिफ है। जो कार्यवाही हुई, उसके होने की कल्पना कई लोगों के जहन में पहले से ही बनी हुई थी। एक के बाद एक पुलिसिया शिकायतें और उनके आधार पर की गई एफआईआर के बाद मसूद को पस्त करने के लिए की गई यह कार्यवाही कई सवालों को जन्म दे रही है, जिनके जवाब सियासी गुदड़ी में छिपे हुए हैं।
दसों पाठ्यक्रम और हजारों स्टुडेंट्स की मौजूदगी वाले इंदिरा प्रियदर्शिनी कॉलेज पर गुरूवार को नगर निगम का बुलडोजर चला। कारण बताया गया अनुमति की कमी और इसका बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया में खड़ा होना। हालांकि कॉलेज संचालक आरिफ मसूद कहते हैं कि परमिशन की वैद्यता कभी भी चैक की जा सकती है और इसके कैचमेंट एरिया में होने का मामला अदालत की दहलीज पर मौजूद है। सवाल उठाए जा रहे हैं कि राजधानी की नगर निगम ने तालाब की फिक्र में कभी उस अस्पताल की तरफ नजर नहीं उठाई, जो हर बारिश में चीख-चीखकर कहता है कि मेरा असल घर बड़ा तालाब है। कार्यवाही उन पर बरसों से लंबित है, जिन्होंने जिम और व्यायामशाला का नाम लगाकर तालाब की छाती पर बड़े शादी हॉल और मैरिज गार्डन तान लिए हैं। कार्यवाही शहर के बड़े नेतााओं के अवैध निर्माणों और सरकारी कब्जों पर भी लंबित है। जिनके खिलाफ निगम ने न कभी कोई योजना बनाई और न ही किसी जिम्मेदार को नोटिस थमाया। गुरूवार को कॉलेज प्रांगण में की गई कार्यवाही किसी खास विचारधारा और एक तयशुदा राजनीति के साथ की गई और इससे सियासत के एक नए संदेश का प्रसारण भी किया गया है।

टॉरगेट पर मसूद
इंदिरा प्रियदर्शिनी कॉलेज पर चला बुलडोजर एक सप्ताह बीतने के दौरान आरिफ मसूद के खिलाफ लगातार तीसरी कार्यवाही है। पिछले गुरूवार को राजधानी के इकबाल मैदान पर फ्रांस के राष्ट्रपति के खिलाफ किए गए प्रदर्शन को लेकर बिना इजाजत भीड़ जमा करने का एक मामला मसूद के खिलाफ दर्ज किया गया था। मामले में मसूद और उनके समर्थक थाने में पेश होकर जमानत हासिल कर चुके हैं। दूसरी कार्यवाही बुधवार की रात में आनन-फानन में की गई और मसूद को धार्मिक भावनाएं भड़काने का दोषी करार दिया गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति के खिलाफ अपने मजहब की खातिर आवाज उठाने को लेकर की गई इस कार्यवाही पर सरकार का ऐतराज लोगों को हजम नहीं हो रहा था और इसी रात एक स्क्रिप्ट तैयार होकर गुरूवार सुबह कॉलेज को धराशायी करने की सियासी कार्यवाही अंजाम दे दी गई। गौरतलब है कि आरिफ मसूद लगातार सरकारों के टॉरगेट पर रहे हैं। उनकी धार्मिक छवि और अपनी कौम के लिए आवाज उठाने की आदत उन्हें बार-बार मुश्किल में डालती रही है। लेकिन देखने में यह भी आया है कि जितना दबाने की कोशिश की गई है, मसूद उतनी ही तेजी से ऊंचाई की तरफ उछाल भरते दिखाई दिए हैं।

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राष्ट्रीय छवि बन रही मुश्किल
किसी दौर में 22 से 25 तक मुस्लिम उम्मीदवारों का मैदान में होना और इनमेंं से 18 से 20 तक सीटें जीतकर आ जाना इस प्रदेश ने देखा है। धीरे-धीरे सियासी दलों की बदली मानसिकता ने मुस्लिम दावेदारी का आंकड़ा कम कर दिया और हालात अब महज दो सीट पर आकर टिक गए हैं। ऐसे में आरिफ मसूद का अपने विधानसभा से निकलकर आसपास के शहरों और फिर पूरे प्रदेश में खुद को साबित कर लेना कई लोगों के लिए किरकिरी बना हुआ है। हाल ही में कांग्रेस की स्टार प्रचारक टीम में मिले स्थान के बाद मसूद को राष्ट्रीय स्तर तक पहचान मिलने लगी है। जिस समय उनके कॉलेज पर दमन की कार्यवाही की जा रही है, वे बिहार चुनाव में धुंआधार सभाएं कर रहे हैं। मसूद की बढ़ती ख्याति और उनका बढ़ता कद सियासी वातावरण में कई लोगों के लिए कसैलापन पैदा करने लगा है, जिसके चलते ऐन-केन प्रकारेण उनको नीचे की तरफ सरकाने के कुत्सित प्रयास तेज होने लगे हैं।

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एक तीर से निशाने कई
देश सहित प्रदेश में चल रहे हालात के बीच मप्र की राजधानी भोपाल से दिए गए एक सियासी संदेश ने एक तीर से कई निशाने किए हैं। मसूद पर शिकंजा कसने की कवायद इस बात का घोतक है कि एक रसूखदार विधायक पर इतना प्रशासनिक दबाव बनाया जा सकता है तो आम लोग भविष्य में किसी तरह की आवाज बुलंद करने की जुर्रत न कर सकें। फ्रांस के राष्ट्रपति के व्यवहार को लेकर देशभर में उबल रहे गुस्से को शांत करने का यह आसान तरीका भी शासन-प्रशासन को सूझा। जिसका असर राजधानी भोपाल में तत्काल दिखाई देने लगा है और लोगों ने कौम के हक में आवाज उठाने की अपनी योजनाओं का बस्ता बंद कर लिया है। कॉलेज प्रांगण को धराशायी करने की कार्यवाही उस दौर में की गई है, जब राजधानी में संघ के बड़े नेता मौजूद हैं। इन नेताओं को खुश करने के लिए सरकार ने सीधा सा संदेश दिया है कि वे मुस्लिम सियासत, मुस्लिम एजुकेशन, मुस्लिम यूथ की बढ़ती सोच को आगे नहीं बढऩे देंगे। हालांकि कॉलेज धराशायी करने का साइड इफेक्ट यह आया है कि बिल्डिंग भले न रहे, पढ़ाई खुले आसमान के नीचे भी जारी रहेगी।
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