आपने लाल किला के संबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष के उपलक्ष्य में कुछ तारीफ करने की कोशिश की है और आर एस एस को दुनिया के सबसे बड़े एनजीओ बोला है. और जहां तक मुझे मालूम है कि किसी को भी एनजीओ बनने के लिए रजिस्ट्रेशन करना पड़ता है. और आर एस एस ने रजिस्ट्रेशन किया या नहीं इसको लेकर नागपुर रजिस्ट्रेशन दफ्तर में किसी ने मामला किया है जो अभी तक प्रलंबित है. अगर आपके कहने के अनुसार आर एस एस दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है तो उसका करोड़ों स्वयंसेवक तथा लाखों प्रचार-प्रसार करने वाले प्रचारक और दिल्ली से लेकर नागपुर तथा लगभग भारत के सभी राज्यों में कार्यालय शिक्षा संस्थान तथा समरसता मंच वनवासी कल्याण आश्रम और राष्ट्रीय मुस्लिम मंच और सांस्कृतिक, आरोग्य गोसेवा से लेकर स्वदेशी जागरण मंच जैसे सौ से अधिक गतिविधियों को चलाने के लिए लगने वाले संसाधन के लिए पैसे लगते हैं तो क्या इन सभी बातों को हमारे देश के लोगों को बताना जरूरी नहीं है ? इन सब गतिविधियों के लिए धन की व्यवस्था से लेकर उसका जमा – खर्च काऑडिट किया जा रहा है? जो की हर एनजीओ को करना चाहिए और इसीलिए आपने प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद बहुत ही जल्द जो एनजीओ पैसे के हिसाब से लेकर उनके कामो को देख कर आपने लाखों एनजीओ को डिसक्वालिफाई घोषित कर दिया है . अगर आप एनजीओ के बारे में इतने संवेदनशील है तो क्या आपने जिस आर एस एस को दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ 15 अगस्त 2025 के दिन संपूर्ण देश के नागरिकों को संबोधित किया है तो मेरे मन में कुछ सवाल आर एस एस के बारे में गत बारह दिनों से मंडरा रहे हैं जिन्हें मैं आपके सामने इस पत्र के माध्यम से लिखने की कोशिश कर रहा हूँ.

मै भी मेरे उम्र के 13 वे साल मे (1965-66 ) भारत पाकिस्तान के युद्ध के दौरान ही मेरे भूगोल के शिक्षक के आग्रह पर पहलीबार आर एस एस की शाखा में जाने की शुरुआत की है . और मैनें देखा की शाखा में खेल, कथा कहानियों को सुनाते वक़्त तथा बौध्दिक गितो के माध्यम से सिर्फ अल्पसंख्यकों के खिलाफ सही- गलत जानकारी देने का काम छोडकर कुछ भी अन्य बताया नहीं जाता है . यह देख कर मै बहुत निराश होने के बाद मैंने राष्ट्र सेवा दल की शाखा में जाने की शुरुआत की है. और मै 1973 – 76 आपातकाल में जेल में जाने के पहले तक पूर्ण समय कार्यकर्ता था. और 2017 से 2019 तक राष्ट्र सेवा दल का आखिल भारतीय अध्यक्ष के पद पर कार्यरत दो वर्ष रहा हूँ. इसलिए हमारे जीवन के 72 वर्ष की आयु में से शुरूआत के 13 वर्ष बचपन के छोड़ कर हम भारत की एकता और अखंडता के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं . यहां तक कि भागलपुर दंगे की विभीषिका देखने के बाद मुझे लगा कि अगर इसी तरह आने वाले दिनों में चलते रहा तो भारत को एक और बटवारे का सामना करना पड़ सकता है.तब से लेकर आज तक मै हरतह की सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ काम कर रहा हूँ.

और आपको 15 अगस्त के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जैसे घोर सांप्रदायिक संघठन की भुमिका को लेकर भारत की एकता और अखंडता का महिमामंडन करते हूए देखकर ही, मै आर एस एस के बारे में मेरे अपने खुद के अनुभवों के आधार पर ही कुछ आकलन शेयर करने की कोशिश कर रहा हूँ. कृपया इसे आप अन्यथा नहीं लेंगे क्योंकि आप भी उम्र के 17 वर्ष के रहते हुए आर एस एस के स्वयंसेवक रहे हो लेकिन आप भारत जैसे दुनिया के सभी धर्मों के लोगों के रहने वाले देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी आर एस एस का हिंदुराष्ट्र की संकल्पना को देख कर ऐसा नहीं लगता कि दुनिया में कहीं भी कोई भी जोर-जबरदस्ती से अपने धर्म, जाति, भाषा, खान-पान तथा पहनावे इत्यादि को लेकर एक रंग मे रंगने की कोशिश करने का परिणाम हमारे बगल में 1971 मे बंगला देश पाकिस्तान से अलग होने का ताजा प्रमाण ने बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना की धर्म के नाम पर बटवारे की संकल्पना का सबसे बड़ा फेल्योर और क्या हो सकता है ? क्या हम इस उदाहरण से कुछ सिख नहीं ले सकते ? मनुष्य की सभ्यताओं के विकास की यात्रा हमारे पूर्वजों ने जो भी गलतियां की थी उन्हे न दोहराते हूऐ अपना सफर जारी रखना चाहिए और हमारी अगली पिढी को भी इतने बहुआयामी देश की व्यवस्था चलाने के लिए एकता और अखंडता के लिए हमने प्रेम और विश्वास के साथ चलने की विरासत छोडनी चाहिए ऐसा मुझे लगता है.

मान्यवर प्रधानमंत्री जी, बिलकुल इसके विपरीत गत सौ साल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व, और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ संघ की शाखाओं में गितो से लेकर बौद्धिक, खेल तथा रोजमर्रे की कानाफूसी ( Rumers Spreading Society ) के माध्यम से बिमारी के स्तर पर अतिशयोक्ति से भरी बातें फैलाने के परिणामस्वरूप हमने सबसे पहले हमारे देश के बटवारे तक, और उसिके नाम पर महात्मा गांधी की हत्या करने की साजिश हुई है. और उसके बाद देशमे हो रहे दंगो की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार-प्रसार की करतूतों का असर है. यह 1971-72 के दौरान महाराष्ट्र के जलगांव तथा भिवंडी के जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस मादान साहब ने अपने जांच के रिपोर्ट में लिखा है. कि “दंगे मे कानून की भाषा में सिधे – सिधे आर एस एस के स्वयंसेवक शामिल थे या नहीं यह बात दिगर है. लेकिन आर एस एस अपने रोजमर्रा की शाखाओं के द्वारा जो प्रचार-प्रसार करता है. वह दंगो की मानसिकता तैयार करने के समय प्रस्फुटित होता है. ”

जिसके उदाहरण के रूप में नाथूराम गोडसे को ले सकते, नाथूराम संघ का सिर्फ़ सदस्य ही नहीं था. वह स्थानीय स्तर पर बौद्धिक प्रमुख भी था. तथा ‘अग्रणी’ नाम का अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ विषवमन करने वाली पत्रिका भी चलाया करता था. जिसे शुरु करने के लिए विशेष रूप से बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर ने उसे पैसे दिए थे . और सावरकर के लेख भी वह अग्रणी में छापता था. उसके एक विष्णु करकरे नाम के साथी अहमदनगर (वर्तमान अहिल्या नगर) ने गांधी हत्या के मामले मे शामिल होने के जुर्म की लाइफटर्म सजा पूरी करने के बाद गोपाल गोडसे के जैसे ही जेल से बाहर आने के बाद, एक साक्षात्कार में कहा कि “नाथूराम गोडसे की आंखों में आंख डालकर देखने बाद हम खुद डर जाते थे. क्योंकि वह 24/7 घंटे गाँधी के द्वेष मे ही रहता था. और इस बुढ्ढे को इस दुनिया से समाप्त करने की बात बुदबुदाते रहता था .”
नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी के बारे में इतनी नफरत करने का कुसंस्कार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रचार – प्रसार करने के वजह से ही उसने गांधी हत्या करने के ( 30 जनवरी 1948 ) दुसरे दिन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघने बोलना शुरू किया कि ” हमारा नाथूराम से कोई लेना-देना नहीं है.”वही बात मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस तथा अजमेर शरिफ, हैदराबाद के मक्का मस्जिद और अन्य जगहों पर ब्लास्ट करनेवाले अपराधियों में से एक प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने ब्लास्ट को अंजाम देने के बाद,(यह बात शहिद हेमंत करकरे के जांच के बाद कोर्ट में पेश किया गया आरोपपत्र मे उसके मोटरसाइकिल के सत्यापन किया हुआ सर्टिफ़िकेट के साथ) उसके तुरंत बाद ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघने तुरंत कहा कि “हमारा प्रज्ञा सिंह ठाकुर के कोई संबंध नहीं है. और भोपाल के अखबारों में प्रज्ञा सिंह ठाकुर और शिवराज सिंह चौहान राजनाथ सिंह और संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ अभिनव भारत की बैठकों के फोटो आजसे पंद्रह साल पहले भोपाल के सभी प्रमुख अखबारों में छपे है. और अब एक महीना पहले मालेगाँव विस्फोट के मामले में कोर्ट के फैसले के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री जो गृहमंत्री का भी काम देखते हैं और हमारे देश के गृहमंत्री तक बोल रहे हैं, कि हिंदू कभी भी आतंकवादी नहीं होता है. हालांकि दोनों की जिम्मेदारी देश और प्रदेश के कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी सम्हालना है. आप धर्म के आधार पर इस तरह का बयान देकर किसी भी प्रकार का आतंकवाद का कभी भी मुकाबला नहीं कर सकते. और नाथूराम गोडसे को महात्मा बोलने से लेकर उसका महिमामंडन करने वाले लोग कौन है ?

2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी वुइथ डिफंरस और वर्तमान समय में 130 वा संविधान संशोधन को लाने की पहल और यह पूर्ववर्ती घटनाओं को देख कर आपके इस संविधान संशोधन के बारे में किसी को भी संशय आना स्वाभाविक है. मै दो हफ्तों के लिए (2019) मई के प्रथम सप्ताह में , भोपाल में प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ चुनाव प्रचार में शामिल था. और दुसरी तरफसे प्रज्ञा सिंह ठाकुर के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महिला बिग्रेड राष्ट्र सेविका समिति से लेकर, आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के युवा वर्ग और भाजपा के बुजुर्ग लोगों ने अपने आपको झोंक दिया था. जबकि मालेगाँव विस्फोट के बाद संघ ने कहा था कि हमारे और प्रज्ञा सिंह ठाकुर के कोई संबंध नहीं है.

और इस महिला के खिलाफ शहिद हेमंत करकरे ने अपनी जांच के बाद प्रज्ञा सिंह ठाकुर की मोटर साइकिल से लेकर प्रज्ञा और उसके सभी साथियों के संबंध संघ के साथ निकले हैं. और जब भी प्रज्ञा सिंह और उनके साथ के आरोपियों को जेल से कोर्ट में सुनवाई के लिए लाया जाता था उनके गले में फूलमालाऐ पहनाने से लेकर उनके उपर फूलों की वर्षा की जाती थी. और भाजपा के शिर्षस्थ नेता तथा लोकसभा मे विरोधी दल के नेता श्री. लालकृष्ण आडवाणीजी ने तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटील को प्रज्ञा सिंह ठाकुर के लिए गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर उसे जेल में अच्छी तरह से रखने की शिफारिश की है. और प्रज्ञा सिंह ठाकुर का और क्या योगदान है ? कि उसे भोपाल से भाजपा लोकसभा का टिकट देकर, भले ही आपने अपने आपको उसके प्रचार से अलग रखा हुआ मुझे दिखाईं दे रहां था. लेकिन गृहमंत्री अमित शाह से लेकर वित्त मंत्री निर्मला सितारमण तथा भाजपा के वरिष्ठ नेता भोपाल में प्रज्ञा सिंह ठाकुर के प्रचार-प्रसार के लिए आए हुए मैंने खुद मई के प्रथम सप्ताह में 2019 में भोपाल में देखा हूँ. और मैंने अपने प्रेसकॉंफ्रेस में प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भाजपा ने टिकट देने को लेकर ने चुनाव आयोग से मांग भी की थी कि भाजपा की मान्यता रद्द की जानी चाहिए. और प्रज्ञा सिंह ठाकुर आतंकवाद के केस में जेल में रह चुकी हैं. और उसके उपर चल रहा मामला अभिभी कोर्ट में चल रहा है. प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने प्रचार में गोडसे के महिमामंडन करने से लेकर महात्मा गाँधी जी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणीया की है. और प्रधानमंत्रीजी आपने इस बात को लेकर “मै प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कभी भी माफ नही करुंगा ” ऐसा कहा है. फिर भोपाल से चुनाव जितने के बाद लोकसभा की रक्षा विभाग से लेकर कई संवेदनशील विभागों की कमिटियों में प्रज्ञा सिंह ठाकुर किसके शिफारिश के वजह से रही है ? क्या प्रधानमंत्रीजी आपके माफी नहीं देने का यही तरीका है ? यदि किसी मुसलमान को आतंकवाद के मुद्दे पर आरोप रहते हुए चुनाव में किसी भी दल ने टिकट दिया होता तो क्या भाजपा ने चुपचाप चुनाव प्रचार किया होता ? और वह शख्स लोकसभा में पहुचा होता ? अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है, तो प्रज्ञा सिंह ठाकुर के लिए विशेष रूप से भाजपा का टिकट देना क्या राष्ट्र विरोधी कदम नहीं है ?

वैसे ही नाथूराम के बारे में गांधी जी की हत्या के बाद, नाथूराम के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कोई संबंध नहीं, कहने वाले आज 77 सालों में नाथूराम के मंदिरों का निर्माण करने से लेकर, उसके उदात्तीकरण करने के लिए नाटक- सिनेमा और उसके जन्मदिन से लेकर फांसी की सजा के दिवस को मनाने वाले कौन लोग है ? भिष्म साहनी ने तमस नाम के उपन्यास में संघ के सयंसेवकोके प्रशिक्षण से लेकर मस्जिदों में सूअरों के मांस फेकने, और मंदिरों में गोमांस के टुकड़े फेकने की, हरकतों को अपने उपन्यास में आजसे पचहत्तर साल पहले ही रेखांकित किया है. जिसपर टीवी सिरियल भी बना हुआ है.

और यही हथकंडे गुजरात से लेकर भागलपुर,जबलपूर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, मलियाना, जलगांव, भिवंडी के दंगों में अपनाने वाले लोग कौन थे ? जस्टिस मादान कमिशन ने खुल कर कहा कि “दंगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तांत्रिक रुप से भले ही शामिल नही रहा होगा, लेकिन 1925 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के बाद संघ लगातार अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ नफरत फैलाने का काम करते आ रहा है. जिसकी वजह से लोग पहले से ही अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ नफरत से भरे रहते हैं. और वह हजारों की संख्या में बहुसंख्यक समुदाय के लोगो के हाथों में पारंपरिक हथियार लेकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगो के उपर युध्द जैसा हमला करते हैं. “और आपने भी बडे ही अभिमान के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तारिफ 15 अगस्त के दिन राष्ट्र के नाम संबोधन में लाल किला दिल्ली से करते हूए विश्व का सबसे बड़ा एनजीओ बोला है. और भारत की एकता और अखंडता के लिए भूरी – भूरी प्रशंसा की है.

वैसे ही जिस सरदार पटेल को लेकर आपने केवडिया मे स्थित सरदार सरोवर में दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति की स्थापना की है और आजकल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा महिमामंडन कर रहा है. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में गृहमंत्री के हैसियत से महात्मा गाँधी की हत्या के बाद बंदी की कारवाई करने से लेकर, यह संघठन किस तरह से हमारे संविधान को नकारने से लेकर, तिरंगा झंडा की जगह भगवा झंडा फहराने के उदाहरण नागपुर से लेकर जगह – जगह करने की कृती का सज्ञान लेकर. और संविधानिक रुप से चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेकने के संघ के षड्यंत्र को देखते हुए, उन्होंने संघ के उपर बंदी लगा दी थी. और आर एस एस के तत्कालीन प्रमुख श्री. माधव सदाशिव गोलवलकर के साथ पत्राचार में उन्होंने गोलवलकर गुरुजी को संविधान तथा राष्ट्रीय झंडा तिरंगे के प्रति निष्ठा के लिए और संघ का अपना संविधान लिखित रूप से करने के लिए, अंडरटेकिंग लिखने के लिए कहा था. और गोलवलकर गुरुजी ने अंडरटेकिंग अपने संघठन के उपर लगाया हुआ बैन हटाने के लिए सिर्फ अपनी परंपरा के अनुसार युध्द निति के लिए लिखकर तो दिया भी है. लेकिन कभी भी संविधान के प्रति और राष्ट्रध्वज के प्रति आदर भाव प्रकट नहीं किया. उल्टा मनुस्मृति जैसे कालबाह्य और स्रि-शुद्रो के बारे में अत्यंत हीन स्तर पर अलग – अलग कानून का प्रावधान लिखा हुआ है. ऐसे घटिया कालबाह्य ग्रंथ को संविधान का स्थान देने की पेशकश गुरुजी ने की थी. उन्होंने साफ तौर पर अपने मुखपत्र ऑर्गनायझर में लिखा है कि “स्पार्टा और ग्रिक से भी पुराना मनुस्मृति जैसे आदर्श संविधान के रहते हुए इस देश विदेश के संविधानों की नकल कर के लिखा हुआ गुदडी में भारतीयत्व नही है.” इस तरह से हमारे संविधान के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शुरुआत से ही नकारात्मक भूमिका रही है. घर घर-घर झंडा जैसे पाखंड भी कर रहे हैं. और पिछले ग्यारह सालों से आपके नेतृत्व में अहिस्ता – अहिस्ता संविधान को चुहे के जैसा कुतरना शुरू किया है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ जहरीला प्रचार – प्रसार के बदौलत भारत के सभी सांप्रदायिक दंगों से लेकर मॉबलिंचिंग, तथा मुजफ्फरनगर के स्कूल की शिक्षिका ने अल्प संख्यक समुदाय के छात्र को अन्य विद्यार्थियों से पिटाई करने की कृती से लेकर, जयपुर- मुंबई एक्सप्रेस में एक रेल्वे सुरक्षा गार्ड के तरफसे की गई तीन अल्पसंख्यक समुदाय के प्रवासीयोंकी अपने सर्विस बंदुक से हत्याएं करते समय उसने ‘नरेंद्र मोदी – आदित्यनाथ जिंदाबाद’ के नारे देना किस बात के प्रतिक है ? और इन दोनों घटनाओं के तह में जाने से क्या अर्थ निकलता है ?
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अगर हमारे देश के शिक्षक इस तरह जाती – धर्म के आधार पर बच्चों के साथ व्यवहार करेंगे ? तो आने वाली पीढ़ी किस तरह के संस्कारों को लेकर आगे समाज में आएंगी ? और रेल्वे सुरक्षा के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया दल का सिपाही सुरक्षा की जगह यात्रा कर रहे अल्पसंख्यक समुदाय के प्रवासीयोंकी सिर्फ उनकी वेशभूषा देखकर ही गोली मारकर हत्या कर देना कितना संगीन मामला है ? यह दोनों घटनाओं को देखते हुए मै गत पैतिस सालों से भी अधिक समय से भागलपुर दंगे के बाद ( 1989 ) लगातार बोल लीख रहा हूँ, “कि हमारे देश की आने वाली पचास वर्षों की राजनीति सिर्फ़ और सिर्फ़ सांप्रदायिकता के मुद्दे के ईद – गिर्द ही घुमेगी. और हमारे रोजगार, महंगाई, कृषि तथा दलितों – आदिवासीयो तथा महिलाओं, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषय दोयम दर्जे के हो जाएंगे.” क्या आज का माहौल देखकर ऐसा नहीं लगता ?वाराणसी के सर्व सेवा संघ के परिसर में जबरदस्ती से घुसपैठ करते हुए, वहां की इमारतों को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया. वैसे ही वाराणसी के अगल- बगल के देहातों की किसानों की जमीन को बंजर भूमि घोषित करने के बाद उसे किसी परियोजना के लिए कब्जा करने की कृती यह दोनों उदहारण आपके अपने संसदीय क्षेत्र के दे रहा हूँ. (वाराणसी के गांव के लोग नाम के पोर्टल पर इस बात की विस्तृत जानकारी दी गई है.

भले ही लाल किले की प्राचिर से 2014 पहले ही संबोधन में आपने हमारे देश की आबादी को ‘टिम इंडिया’ और “सबका साथ सबका विकास” जैसे उपमाओं के साथ भाषण दिया था जिसका मैने हृदय से स्वागत किया था. लेकिन ग्यारह सालों में सिर्फ कुछ चंद धन्नासेठों की तिजोरीया भरने के अलावा, सर्व सामान्य लोगों को महिने का पांच किलो सडा हुआ अनाज की भीक, और किसी महिला को लाडली बहना बोलकर शतप्रतिशत चुनाव में वोट देने के लिए सरकारी खजाने से रेवडी बाटना (आपके खुद के वचनों को दोहरा रहा हूँ.) कौनसा पार्टी वुइथ डिफंरस का नैतिक मापदंडों मे आता है ?
ग्यारह सालों में संपूर्ण देश की संपत्ति को प्रायवेट मास्टर्स के हवाले करने के अलावा और कोई महत्वपूर्ण कार्य किया नहीं है . विश्व में भारत की आधी से अधिक आबादी युवाओं की है. लेकिन कितने युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध है ? आपको लगता होगा कि थोडी खैरात बाँटने से लोग खुश हो जाएंगे, तो यह आपकी गलत फहमी है. आम आदमी महंगाई और बेरोजगारी की वजह से परेशान है. कल ही नागपुर में बेरोजगार युवाओं को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री रोजगार अभियान के अंतर्गत शामिल युवाओं को दि जा रही स्कॉलरशिप बंद करने को लेकर संविधान चौकपर धरना – प्रदर्शन किया है. और 140 करोड आबादी के देश मे एक चौथाई से अधिक संख्या में लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा. उन्हें आपने आश्वासन दिया था कि 2014 मे सत्ता में आने के पहले आपने अपने चुनाव प्रचार में बोला है कि “मै हर साल दो करोड़ रोजगार दुंगा.” लेकिन ग्यारह वर्ष मे कभी- कभी कुछ गिने-चुने लोगों को खुद प्रधानमंत्रीजी जो पत्र देने के लिए हमारे देश की डाक विभाग के डाकिए की जिम्मेदारी रोजगार देने के पत्र देने का काम रहते हूऐ आप खुद ही प्रधानमंत्रीजी पत्र देने का लाइव्ह टेलिकास्ट करने का काम क्यो कर रहे हैं ?
सिर्फ राममंदिर और चांद पर यान ले जाने से और चौबीसों घण्टे तथाकथित मिडिया में पाकिस्तानी सेना की तुलना में हमारे सेना कैसी भारी-भरकम है. यह हमारी सुरक्षा को दाव पर लगाने की गलतियाँ करना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करना हो रहा है. जो पहलगाम और पुलवामा में हमारे अपने ही सेना के जवानों और नागरिकों की जानो की किमत को भी आप अपने पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल करना कौनसा पार्टी वुइथ डिफंरस हो रहा है? हमारे देश के संवेदनशील रक्षा के रहस्य ऐसे चिल्ला – चिल्ला कर ढोल पिटकर उजागर करना हमारे रक्षा के लिए खतरनाक है . आमूमन कोई भी सशक्त देश ऐसी गलती नहीं करते हैं. जो कि आप हर बात को चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल करने की कृती कौनसी देशभक्ति का परिचायक है ? और आप इन गलतियों को दिखाने वाले हमारे जैसे लोगों को राष्ट्रद्रोही बोलना कौनसी राष्ट्रभक्ति है ?













