नरेंद्र मोदी की राजनीतिका सफर अंग्रेजी भाषा के सफर, और उर्दू भाषा का सफर का मतलब जिन्हे मालुम है, बिल्कुल उसी सफर के जेसा ही उनका भी 8 अक्तूबर 2001 से, गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी रजनितिक जमिन बनानेके लिए उन्होंने क्या – क्या नहीं किया ? और कीस कीमत पर ? जींदगी का आधासेभी ज्यादा समय संघ के प्रचारक के रूप में गुजारने के बाद संघके आदेशानुसार बीजेपी के काम के लिये भेजा गया एक कार्यकर्ता कभी-कभी प्रवक्ता के रूप में, टी वी चैनलों पर अन्य दलों के प्रवक्ताओं बीच में, हाफ बाही का कुर्ता पजामा पहना हुआ, देखा था. और एक दिन अचानक, नरेंद्र मोदी को गुजरातमे 2001 के 8 अक्तूबर को उम्र के पचास साल पार करने के बाद केसुभाई पटेल के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में भाजपा की, अंदरूनी कलह की वजह से, क्रिकेट में जैसे श्यामको खेल समाप्त होने के पहले अगर कोई नया बैट्समैन को भेजा जाता है, तो उसे नाइट वॉचमन कहते हैं. वैसा ही नरेन्द्र मोदी को तात्कालिक रूप से, गुजरात में मुख्यमंत्री के बतौर भेजा गया था. जिस समय तक वह विधान सभा चुनाव तो दूर, ग्राम पंचायत का भी चुनाव नही लडे थे.

इस कारण छह महीने के भीतर विधान सभा चुनाव लड़कर सभागृह का सदस्य होना जरूरी होता हैं. तो उन्होंने एलिस्ब्रिज अहमदाबाद शहर का एक विधान सभा क्षेत्र पडता है. जहासे हरेन पंड्या नामके, विधायक रेकॉर्ड मार्जिन मतों से चुनकर आये हुए थे. तो नरेंद्र मोदी ने उनको सिट खाली करने के लिए कहा, तो हरेन पंड्या ने मना कर दिया. मतलब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री तो बन गये थे पर पुरे गुजरात में उनके लिए एक भी विधान सभा का सुरक्षित क्षेत्र नहीं था. कयोंकि उनकी उस समय गुजरातमे राजनैतिक हैसियत नहीं के बराबर थी. वे जन्मना जिस तेली जाति से है. उसकी संख्या पूरे गुजरातमे 2% भी नहीं है. और तबतक के नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में ऐसी कोई भी बडी उपलब्धि नहीं थी, कि वह आसानी से कही से भी खड़े हो गए, और चुनाव जीत गए. यह बात इस शताब्दी के शुरुआती दौर में संभव नहीं थी. लेकिन मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण लेने के, डेढसौ दिनों के भीतर, 27 फरवरी के दिन 2002 को गोधरा कांड के बाद हुए दंगे को , उन्होंने अपने राजनीतक करिअर बनाने के लिए बहुत बेरहमी से इस्तेमाल किया है. जिस कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि “आपने राजधर्म का पालन नहीं किया है. ” और नरेंद्र मोदी ने उन्हें उसी क्षण जवाब दिया “कि साहब मैं वही तो कर रहा हूँ.” मतलब उनके राजनीतिक धर्म का प्रयोग गुजरात गुजरात से शुरू हो गया था. जिससे उनकी बनियान 44 इंच की होने के बावजूद, उन्होंने 56 इंच छाती का जुमला उछालने की बात उसीकी देन है. और फिर उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री बनने के लिए, अपनी ‘हिंदूहृदयसम्राट’ वाली प्रतिमा स्थापित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. इसके अलावा उन्हें मरने-मारने के नाम पर, कुछ एंन्कौन्टर, जिसमे ईशरत, सोहराबुद्दीन, कौसरबी और तुलसी प्रजापति के अलावा अन्य एंन्कौन्टरो को भी उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की जगह, पक्की करने के लिए बखुबी इस्तेमाल किया. और यह बात तत्कालीन डी आई जी, डी. जी. वंजारा ने सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के बाद हुए गिरफ्तारी के बाद साबरमती जेल से सात पन्ने के पत्र में विस्तार से लिखा है. और उसीके साथ- साथ कुछ उद्दोगपति, जिन्हें नरेंद्र मोदी की सरकार ने सभि नियम कानून को ताक पर रखकर खुली छूट दी गई है उनमे पहले से ही मौजूद अंबानीबंधू ,टाटा और विश्व के औद्योगिक जगत में, शायद ही कोई और उदाहरण होगा कि, 40 साल से भी कम उम्र के गौतम अदानी नामके आदमी को लगभग जमीन से उठाकर आसमान तक पहुँचाने के लिए , पहले पूरे गुजरातमे और अब विश्व में, सभी नियम कानूनों को ताक पर रखकर, सहूलियत देकर ऊर्जा,पोर्ट और भी अन्य उद्योग-धंधों में फलने – फूलने में मददगार साबित हो रहे हैं. और इसिलिये औद्योगिक जगत से लेकर राजनीति के क्षेत्र में भी नरेंद्र मोदी अदानी कनेक्शन एक रहस्य बना हुआ है.

सभी नियम कानून की अवहेलना करने का उदहारण के लिए, कांडला पोर्ट भारत का पहला पोर्ट है. जो अदानी उद्योग समूह के प्रायवेट सेक्टर को सौपा गया है. जो आने वाले समय में विभिन्न सरकारी प्रतिष्ठान औने पौने दामौमे बेचने के अभि दर्जनो उदहारण मौजूद है. हमारे नॅशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एन सी एल टी) ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलांयस कम्यूनिकेशन लिमिटेड के 47,251 करोड़ रुपए की डुबने वाली कंपनी को बडे भाई मुकेश अंबानी को सिर्फ 455 करोड़ रुपए में बेचने की अनुमति दी गई है. और इस तरह के व्यवहार करने के लिए वर्तमान केंद्र सरकारने सत्ताधारी बनने के बाद इस तरह की कंपनियों के लिए विशेष कानून पास किया है. तब लगता था कि सरकार ऐसी कंपनियों को कब्जे में लेकर बाजार में उनकी संपत्तियों को बेचकर पैसा वसूल करेंगी. लेकिन 47,251 करोड़ की कंपनी का व्यारान्यारा करते हुए, इस तरह की कोई बात नहीं की गई. अनिल अंबानी की इस कंपनी को बडे भाईसाहब मुकेश अंबानी को, सिर्फ 455 करोड़ रुपये में बेचने की अनुमति हमारे सरकारी बैंकों से लिए गए कर्ज पर पानी छोड़कर जो कि एक सामान्य आदमी अपने घर – परिवार के लिए छोटे- मोटे कर्ज लेने के बाद, वहीं सरकारी बैंकों के अधिकारियों के तरफ से वसूली के लिए, कैसे अपमानजनक तरीके अपनाए जाते हैं ? यह सभी जानते है. लेकिन चुनिंदा उद्योगपतियों के लिए यही बैंक इतने उदार होकर, लाखो करोड़ रुपए के कर्ज माफ करने की कृपा कैसे कर सकते हैं ? जो कि सर्वसाधारण लोगों के बैंकों में जमा पूंजी निवेश, बहुत ही मामूली ब्याज दरों को लेकर रखा गया पैसा ही तो है. और आराम से सरकारी बैंकों के तरफसे उद्योगपतियों को दिया जाने वाला लाखों करोड़ रुपए का कर्ज माफी करने की बात कही चर्चा में भी नहीं आती है. नही विरोध किया जाता है. मतलब सरकारों को सर्वसाधारण मतदाता चुनकर दे रहे हैं. लेकिन उसे इन सब बातों की भनक तक नहीं लगने देना. और हमारी सरकार का कारोबार पारदर्शी होने का दावा करना, कितना बडा पाखंड है ?

इसी तरह अदानी उद्योग समुह को कांडला पोर्ट सौपना, और उसने अपने हाथ में लेतेही पर्यावरण के नियमोका उल्लंघन किया है. भारत के समुद्री क्षेत्र में पर्यावरणीय कुछ नियम है. जिसमें ‘मैनग्रोह वनस्पतिको ‘ विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है. उनका संवर्धन करना चाहिए ऐसा हमारे समुद्री क्षेत्र के लिए नियम बना हुआ है. और उसे नष्ट करने की कृतियां करने वाले लोगों को दंडित करने का प्रावधान है. उसके लिए ग्रीन ट्राइब्यूनल बना हुआ है. जिसने अदानी समुह पर कुछ करोड रुपये का जुर्माना भी लगाया था. लेकिन हमारे देश के पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाया गया पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी, सम्हालने वाले मंत्री महोदय ने ग्रीन ट्रिब्यूनल की क्या आवश्यकता है ? अदानी उद्योग समूह के उपर लगा जुर्माना देखते हूऐ बयानबाजी कि है. मतलब हमारे देश और दुनिया के पर्यावरण संरक्षण के लिए 1972 के जिनेवा कन्वेंशन से तैयार किए गए, कई महत्वपूर्ण निर्णयों में से, एक निर्णय भारत के इतिहास में पहली बार पर्यावरण मंत्रालय का निर्माण किया जाना है. और उस मंत्रालय ने तिस साल के भीतर हमारे देश के और दुनिया के पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत महत्वपूर्ण नियमों को बनाने का काम किया है. जिसमें समुद्र के तटीय क्षेत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण नियम बनाए गए हैं. और उनके उल्लंघन करने वाले लोगों के उपर दंडात्मक कारवाई करने के अधिकार दिए गए हैं. लेकिन गौतम अदानी के लिए नरेंद्र मोदी ने किसी भी कानून और नियमों की परवाह किए बगैर, उसे हर उद्योग में कुछ भी करने की छूट देने की बात शुरू से ही उद्योग जगत मे भी विवाद का विषय रही है. ‘हिंडेनबर्ग’ रिपोर्ट उसका का परिचायक है. लेकिन इस हेराफेरी को, हमारे देश के सर्वोच्च सभागार लोकसभा में, इसपर सवाल करने वाले सदस्यों को अपनी सदस्यता गवाने की नौबत आ रही है. राहुल गांधी और महुआ मोइत्रा इसके उदाहरण है. और संसद के शितसत्र के आखिरी चरण में 150 से भी अधिक विरोधी दलों के संसद सदस्यों को, सदन से निष्कासित करने की कृति भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार देखने में आ रही है?

आज अदानी उद्योग समूह हमारे देशकी आधी बिजली का उत्पादन कर रहा है. और 2014 के चुनाव में 400 से अधिक चुनावि रैलीयोमे पूरे देश में घुमने के लिए नरेंद्र मोदी जी को अपना प्रायवेट जेट विमान अदानी ने ही उप्लब्ध किया है. अन्य उद्दोगपतियोने भी धन मुहैया कराया है. अंबानी समूह ने कई प्रायवेट टी वी चानेल चुनावको मद्देनजर रखते हुए, पहले से ही अंबानी समुह ने उप्लब्ध कर दिये थे. और वे नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री वाली इमेज बनानेमे रातदिन जूट गये. और आज तो संपूर्ण मिडिया को ही गोदी मिडिया बोला जा रहा है. क्योंकि पिछले 11 सालों से नरेंद्र मोदी को छोड़कर किसी भी नेता के नाही फोटो छपते है. और नही कोई खबर.

उसमे आन्ना हजारे का तथाकथित जन लोकपाल आंदोलन, अरविंद खेजरिवाल,किरण बेदी और अन्य अपने आप को राजनितिके भाष्यकार बोलने वाले लोगों ने, बड़ा योगदान देकर शूरू किया गए आंन्दोलनों ने भी नरेंद्र मोदी को सत्ता के पायदान तक लाने के लिए काम किया है. और नरेंद्र मोदी का ‘सबका साथ सबका विकास’ वाला जुमला, और ‘सिर्फ एक बार हमारी सरकार’ वाले लोकलुभावन नारोसे लोगों को आकर्षित करने में मदद मिली है. और 2014 के चुनाव में, 280 के ऊपर लोकसभा की संख्या तक पहुंच गए. उसमे मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंन्गेकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उत्तर प्रदेश में 70 से ज्यादा संख्या में लोकसभा की सीटे मिलने के लिए, इस दंगेने बहुत योगदान दिया है. जैसा की 2002 के दंगेने गुजरातमे नरेंद मोदी जी को तिन बार मुख्यमंत्री पद देनेका काम किया है. और वही भुमिका मुझफ्फर नगर और अन्ना हजारे के आंदोलन पुलवामा की आतंकवादी घटना ने की है.

इतिहास में पहली बार बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिये और केंद्र में सरकार बनाने के लिए अमेरिका की तरह एक व्यक्ति केंद्रित प्रचार किया गया था. और इसिलिए बी जे पी की सरकार से ज्यादा मोदी सरकार बोला जाता हैं. और उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. जिसके परिणामस्वरूप सबसे पहले योजना आयोग को खत्म करने से शुरुआत हुई थी. जिसका किसिने भी विरोध किया हुआ, मुझे याद नहीं आ रहा है. फिर क्या था ? नरेंद्र मोदी को जैसे अगले सभी निर्णय लेने के लिए लायसंस ही मिल गया, तो उन्होने नोटबंदी की.

लगभग सभी बड़े बैंको में जमा राशि कूछ चंद धन्नाशेटोके हवाले कर देने से लेकर और 100 वर्ष उम्र वाली भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व मुद्रा कोश को हाथ लगाया जो बैंक के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, कि 28000 करोड़ से भी अधिक जमा पूंजी को लेकर सबसे पहले रघुरामन, बादमे उर्जित पटेल नामके दो गवर्नर को इस्तीफे देनेके लिये मजबूर किया गया था. और संसद से लेकर सभी संविधानिक संस्थाएँ ईडी, आई बी, सी बी आई,सर्वोच्च न्यायालय,चुनाव आयोग और विरोधी दलों के नेताओं, तथा अपने विरोध में लिखने – बोलने वाले लोगों के उपर, कार्रवाईयों करने के लिए, भारतीय दंड संहिता के आड मे शुरू कर दिया.
पुलवामा के बाद की सच्चाई सुषमा स्वराज ने खुद कह दिया था, कि कोई भी पकिस्तान के सैनिक या नागरिक बालकोट ऑपरेशनमें मरा नहीं है. लेकिन नरेंद्र मोदी पूरे देश में चुनाव के सभाओं में बढा- चढ़ाकर बोल रहे थे “कि मेरी सेनाने पाकिस्तान के इतने लोग मारे और इतने विमान गिराये तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइकके नामप. और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल श्री. सतपाल मलिक ने तो इस बात को लेकर मुहिम छेड दी थी. और खुलेआम बोल रहे थे कि “पुलवामा के चालिस जवानों की शहादत पर नरेंद्र मोदी ने 2019 का चुनाव जीता है.” अन्यथा नोटबंदी, किसानों का आंदोलन तथा एन आर सी के खिलाफ चले आंदोलन और आसमान को छूने वाली महंगाई और बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार की वजह से लोगों का गुस्सा सर चढकर बोल रहा था. लेकिन पुलवामा का पुल नरेंद्र मोदी की राजनीतिक नैया पार करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिध्द हुआ.

अब काला धन विदेशों से वापस लाने के लिए किये गये नोटबंदी से, एक रुपये का भी काला धन वापस नहीं आया, उल्टा उसके असर में छोटे ऊद्दोग से अबतक 50 लाख लोगों को रोजगार से वंचित होना पड़ा है. 2014 के चुनाव प्रचार में हर साल दो करोड़ लोगो को रोजगार देने का एलान किया था. लेकिन पुरे 11 साल में भी इतने रोजगार देने के बजाय 45 % बेरोजगारी हो गई है. और कृषि क्षेत्र लगभग खत्म होने के कगार पर पहुँच गया है. किसानों की आत्महत्या रुकने बजाय हर रोज देशके किसी भी हिस्से में आत्म हत्या की खबर आना जारी है. और यह सब कम लग रहा था, सम्पूर्ण भारत की कृषी को, तथाकथित नए उदारवादी आर्थिक सुधारों के हवाले करने हेतु संसद के सत्र में राज्य सभा में अपना बहुमत नहीं है, यह देखकर, तथाकथित आवाजी मतदान पर जो निर्णय लिया गया है, जो भारत की बची खुची कृषीको भी खत्म करने वाला कानून था वह भी भारत के संसदिय इतिहास का, सबसे बड़ा संसदिय लोकतंत्र का गला घोटने का, उदहारण के रूप में दर्ज हो गया है. और भारत की बची खुची कृषी के क्षेत्र को धन्ना शेठो की सुविधा के लिए कानून बदलकर दे रहे हैं.

भुक,भय,भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सपने की जगह भय,भ्रष्टाचार और भुकमरी बदस्तूर जारी है. देश की एक चौथाई अल्पसंख्यक आबादी को असुरक्षा की भावना मे डालकर देश के समाज स्वास्थ के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. आये दिन अल्प संख्यक समुदाय के लोगों को बार-बार बदनाम करने के लिए, कोरोना फैलाने वाले ऊल-जलूल आरोप करके क्या सिद्द करना चाहते हैं ? केरल के पत्रकार वह भी मुसलमान तो फिर घोषित कर दिया की, यह इसिस का आतंकवादी है. लगभग सभी क्षेत्रों में अफ़रातफरिका माहौल बना, तो पुलवामा के पुलसे पूरे चुनाव प्रचार देश भक्ति,और पाकिस्तान की आडमे पूरा चुनाव लड़ने की कोशिश की है. और वह कम लगा तो कश्मीर का 370 आर्टिकल को खत्म करके, राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील कर के लेह-लद्दाख को अलग कर के क्या हासिल किया है ? जिस लद्दाख के लोगों ने 370 हटाने का स्वागत किया था. आज वह राष्ट्रद्रोही हो गएँ ?
प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के पहले, राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति के सामने, “मैं नरेंद्र दामोदर दास मोदी आजसे भारत का प्रधान-मंत्री पद ग्रहण करते हुए, यह शपथ लेता हूं, कि मैं भारतीय सविंधान के तहत, किसी भी तरह का धर्म,जाति,भाषा,प्रांन्त,लिन्ग भेद भाव नहीं करते हुए, सिर्फ और सिर्फ भारतीय सविंधान की संम्प्रभुता की रक्षा करने की शपथ लेने के बावजूद अल्पसंख्यकों को लक्ष्य करना तथा कश्मीर, लद्दाख, मणिपूर, आसाम जैसे सिमावर्त इलाके के लोगों के साथ जो बर्ताव गत कुछ दिनों से चल रहा क्या उसे देखते हुए संविधान के अनुसार ली हुई शपथ का सही अनुपालन किया जा रहा है ?
भारत जैसे बहु धार्मिक,बहू भाषिक,और सांस्कृतिक विभिन्नता वाले देश में सिर्फ हिन्दुओ को एकजुट कराकर एक-दूसरे से लड़ने के लिए उकसाने का काम जारी है. सर्वोच्च न्ययालय का सिर्फ आसाम के 44 सालों पुराने आंदोलन के कारण नागरिकताको लेकर दाखिल 15 सालों पुराने केस पर असामसे आये हुए, मुख्य न्यायाधीश महोदय की अध्यक्षता वाली बेंच का निर्णय पूरे देश के लिए थोपने की रजनिति से एन आर सी का नाम देकर खुलेआम बाटो और राज करो की नीति अपनाकर जोर जबरदस्ती से थोपने का काम वर्तमान सरकार कर रही है. और चुनाव आयोग को लोकतंत्रात्मक गणराज्य के चुनाव प्रक्रिया को निस्पक्ष होकर संपन्न करने के लिए बनाया गया था उसके चयन प्रक्रिया में सत्ताधारी दल का बहुमत बना कर गठन किया गया चुनाव आयोग आज 73 साल से चले आ रही चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पहलीबार दांव पर लगा देना कौनसा पारदर्शिता का परिचायक है ?
बगल के देशों में सेना का हस्तक्षेप राजनीति में लगातार जारी है और हमें वहाँ के लोगों ने कहा था कि भाई कुछ भी हो लेकिन इतनी बड़ी जनसंख्या के भारत में निस्पक्ष चुनाव होते हैं यह सबसे बड़ी बात हम सेना के साए में रहने को मजबूर है. ऐसी प्रतिक्रियाएं सुनकर हमारा सीना चौड़ा हो जाता था. लेकिन वर्तमान समय में सेना के पराक्रम को चुनाव प्रचार में भूनाना देखकर लगता है कि भारत की सेना को भी पकिस्तान की तर्जपर ले जाने वाली बात है. इसलिए देश की रक्षा के साथ ज्यादा खिलवाड करना चल रहा है.

वही बात 2019 के नवम्बर माह के अंतमे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महोदय की अध्यक्षता वाली बेंच का राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू करनेका फैसला और उसके एवज में उन्हें, रिटायर्ड होने के बाद, एक महीनके भीतर, राष्ट्रपति महोदय द्वारा राज्य सभा में मनोनीत करनेवाला निर्णय भी, भारतीय न्यायपालिका की बची खुची आबरू को खत्म करने की बात, नरेंद्र मोदी जी के 25 सालों के सत्ता के राजनीतिक उपलब्धियोमे ही गिनाई जा सकती हैं. लाखो की संख्यामे छोटे उद्योग खत्म करने की विधि के तौरपर नोट बंदी इतिहास में याद रखा जाएगा. और उस कारण करोडो लोगों को बेरोजगारीका सामना करना पड़ा रहा है, सो अलग अब इस विषय पर इतने सारे अर्थतज्ञोने बोला है, लीखा है. पर नरेंद्र मोदी जी के कानोपर जू भी नहीं रेंगी. यह बात उनके 25 सालों के राजनितिके उपलब्धिया में किसीको गिनना हो तो जरुर गिना सकते. लेकिन मै तो बोलकर रहूँगा, यह भारत की आजादी के बाद सबसे बड़ा अर्थव्यवस्था की कमर तोडने का फैसला किया है. जिसकी किमत पूरा देश चुका रहा है.

इतना भयंकर अनुभव से कुछ भी नहीं सीखे और मार्च के 22 तारीख को 2019 में, नोटबंदी की तर्जपर अचानक लॉक डाऊन की घोषणा कर दी. और संपुर्ण देश में जो अफ़रातफ़रि मची, वह नोटबंदी की रही सही कसर भी पूरी करने के लिए काम आई. जिस तरह से करोडो की संख्यामे मजदूरों का पलायन हुआ, वह भी भारत के मजदूरों के इतिहास का, सबसे भयावह काल के रूप में याद किया जायेगा. एप्रिल, मई की 45 डिग्री सेल्सियस की गर्मिमे हजारो किलोमीटर की दूरी पैदल, अपना सामान सरपर उठाकर, और नंगे पांव लहुलुहान होकर, देश के एक कोने से दुसरे कोने पर के, अपने गांवों के तरफ चले जाने वाली, तस्वीरों को भी, नरेंद्र मोदी जी के सत्ता के 25 सालों की उपलब्धियो मे किसी को गिनना हो तो जरुर गिना सकते हैं.

और इस तरह अर्थव्यवस्था जो चौपट हो गई है. और हमारे जी डी पी तथा तथाकथित हेपिनेस इंडेक्स का क्या कहना ? अबतक लाखों की संख्या में जो लोग इस महामारी के शिकार हो गये हैं, सो अलग. लेकिन महामहिम नरेंद्र मोदी जी को इस बात का कितना गम है ? पता नहीं. क्योकिं वह कोरोना की आडमे देश के महत्वपूर्ण सार्वजनिक उद्योगों को बेचना, जिसमे रेल,एयरपोर्ट और विमान सेवा,रक्षा सामान के उद्योग और खनिक उद्यम,शिक्षा,कृषी,आरोग्य जैसे महत्वपूर्ण विभागो में प्रायवेट सेक्टर को सौंपने का काम करते रहे. क्या यही आपके 25 सालों की उपलब्धियों गिना जायेगा ?

अंतिम बात जिस गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी जी को मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनो के भीतर जो कुछ मार्च 2002 के पहले दिन से ही हुआ है. वह अब ओपन सीक्रेट के रूप में ‘क्राईम अगेन्स्ट हूम्यानिटी’ और राना आयुब,आर बी श्रीकुमार ,सिद्दार्थ वर्धराजन,मनोज मित्ता,लेफ्टनंट जनरल झमीरउद्दिन शाह आशिष खैतान, और दर्जनो रिपोर्ट के अनुसार नरेंद्र मोदी जी को, मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के पहले, राज्यपाल महोदया के सामने शपथ ग्रहण समारोह में “मै नरेंद्र दामोदर दास मोदी आजसे गुजरात के मुख्यमंत्री बनते हुए, यह शपथ लेता हूँ, कि मैं गुजरात राज्य में रहने वाले, हर नागरिक का बगैर किसी भेदभाव से सुरक्षा और सम्मान पूर्वक जीने के लिए काम करूँगा और संविधान के अनुसार काम करुंगा.”

27 फरवरी की सुबह गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस- 6 कोच में आग लगने के बाद, 59 अधजले शवोका पोस्टमार्टम रोककर गोधरा की कलेक्टर जयती रवि के मना करने के बावजूद उन अधजले शवोको, विश्व हिंदू परिषद के लोगों को देने वाला कौन था ? और उन शवोको खुले ट्रको पर अहमदाबाद शहर के सड्कोपर, 28 फरवरी को जुलूस की शक्ल देने के लिए, कौन-सी लॉ एंड आर्डर की रक्षा होना था ? क्या यह भी 25 साल के उप्लब्धीयों में गिना जायेगा ? उसी दिन रातमे केबिनेट बैठक में “कलसे लोगों को कोई नहीं रोकेगा.” कहने वाले मुख्यमंत्री पद पर के व्यक्ति कौन थे ? और 28 फरवरी की शाम को अहमदाबाद एयरपोर्ट पर भारत की सेना के 3000 जवानोको लेकर भेजे गए लेफ्टिनेंट जनरल जमीरऊद्दीन शाह ने अपने ‘सरकारी मुसलमाँ’ नामकी किताब मे जो विवरण दिया है, कि” हम उतरकर काफी समय हो गया था,और अहमदाबाद पुलिस कमिशनर से लेकर गृह मंत्रालय के, और मुख्य मंत्री कार्यालय से, कोई भी मेरे फोनको जवाब नहीं दिया. तो मै अपने साथ लाई जिप्सी पर, लोकल गाईड को लेकर रातके दो बजे सीधा गाँधीनगर स्तिथ मुख्यमंत्री आवास पर पहुचा,तो देखा, नरेंद्र मोदी और जॉर्ज फर्नांडीस, जो उस समय देश के रक्षा मंत्री थे, खाना खा रहे थे. तो जॉर्ज फर्नांडीज उठकर मेरे से हाथ मिलाया. और बोले कि “जनरल साहब बहुत सही समय पर आप आ गये अब गुजरात दंगों को रोकने के लिए लग जाईये.” तो मैंने कहा कि “मैं अहमदाबाद एयरपोर्ट पर उतरनेके पहले अपने विमान से देखा हूँ.” कि लगभग पुरा गुजरात जल रहा है, और मै उतरनेके बाद श्याम से लेकर अभि यहा आने के पहले सभी पदाधिकारियों को फोन करके थक गया था, और मजबुरी में अभि यहा तक आया हूँ, मुख्यमंत्रीजिको बोलिए हमे लोजेस्टीक प्रोव्हाईड करे.” और जॉर्ज फर्नांडीज ने मेरे सामने नरेंद्र मोदी जी को कहा कि ” आप इनको हर तरह की मदद दिजिये. ”


लेकिन 24 घंटों तक, 3000 की संख्या में भारत सरकार की तरफ से भेजी गई सेना को अहमदाबाद एयरपोर्ट के बाहर नहीं निकलने दिया गया है. यह यू ट्यूब पर लेफ्टिनेंट जनरल जमीरऊद्दीन शाह के वीडियो रेकार्ड को भी देख सकते हैं. जिस सेना को लेकर, उठ छुट नरेंद्र मोदी जी विपक्ष पर सेना के मनोबल गिर जाने का, और अपमानित करने का आरोप लगाया करते है. क्या उन्हे याद आ रहा है कि, 2002 साल मे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए खुद आपने भारत के गृहमंत्री को पत्र लिखकर सेना को भेजने का अनुरोध किया था . और उसी सेना को अहमदाबाद में आने के बाद लॉजिस्टिक नही देकर बहुत सम्मानित काम कर रहे थे ? जो कि आपके खत की वजह से तत्काल भारतीय सेना जो अपनी जान जोखिम में डालकर गुजरात दंगों को रोकने के लिए ही आपने पत्र लिखकर बुलाने के बावजूद भी उसे लॉजिस्टिक्स नहीं देना किसका निर्णय था ?

और अब तो पूरे देश के मुख्य पदपर तिसरी बार पहुच गए हैं . और दिल्ली दंगों से लेकर निजामुद्दीन के तब्लिगी जमात के मुख्यालय में लाॅकडाऊन के पहले से जमा लोगों के तरफ से बार-बार निकालने के लिए की जाने वाली विनती को दिल्ली पुलिस किसके इशारे पर अनदेखा कर रहे थे ? और उन्हे कोरोना फैलाने वाले बोलकर मिडिया की मदद से, और दिल्ली पुलिस के अफसरों ने अपने आप को इस्तमाल करने के लिए, औरंगाबाद हाईकोर्ट ने किसे दोषी ठहराया ?क्या बात है ? प्रधान-मंत्री पदपर पाहूचनेकी यह कुंन्जी है क्या ? श्रीमती इंदिरा गाँधी जी को भी जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन के बारे में भी यही जुमला इस्तेमाल करते हुए देखा है ! की विदेशी षड्यंत्र. और आप तो गुजरात दंगों से लेकर, गोधरा कांड से लेकर, आपकी हत्या करने के लिए भेजे गए, लोगों को, बार-बार पकिस्तान का नाम लेते हुए देखा है.

देखिए आप लोग, दूसरोको उठते बैठते हुए, देश द्रोही करार देने का, काम कर रहे हो, लेकिन आपका और अन्य आप के सिपहसलारों के काम को देखकर लगता नहीं कि यह शब्द इस्तेमाल करने का थोडा सा भी नैतिक अधिकार आप लोगो को है. क्योंकि 1946-47 के दौरान कौनसा कारण विशेष रूप से बटवारे के लिए काम आया था ? द्विराष्ट्र का सिद्दांत, जो 1917 मे बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर जी ने पहलीबार कॉइन किया था. और 1925 मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हिन्दूओं का संघठन करने के लिए की गई है. और उन्हिके मुस्लीम कॉऊंटर पार्ट बैरिस्टर मौहम्मद अली जिन्ना ने अपने रजनितिक महत्वकांक्षा के लिए उसे बखुबी इस्तेमाल किया, वह भी 23 साल बाद .

अब उस बात को 78 साल से अधिक समय हो गया है. और आज भी भारत में 30 करोड़ से भी अधिक संख्या में मुसलमान रह रहे हैं. क्या आप भागलपुर,गुजरात जैसे दंगोमे इन्हे समाप्त कर सकते ? दुनियाँ के इतिहास मे इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे गए ऐसा एक भी उदहारण नहीं है. और यह मुसलमान आप लोगोको अच्छे लगे या ना लगे लेकिन ये कही भी नहीं जायेंगे. और जाना चाहेंगे तो भी कोई इन्हें लेने वाला नहीं है. तो फिर आपको इनके साथ जिनेका तरीका इजाद करना होगा. और रोज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शाखाओं में मुसलमानों का ड़र दिखाकर उपाय नहीं हो सकता, कोई भी समूह डर के माहौल में जी नहीं सकता है, यह विभिन्न तरह के, वंशजों को बार-बार खत्म करने के इतिहास को देखते हुए, यही सही है, कि उनके साथ प्रेम, मुहब्बत और सम्मान पूर्वक जीने की कला इजाद कर के सहजता से रहना चाहिए. तो सही मानेमे राष्ट्र की एकता और अखंडता कायम रह सकती हैं. और आतंकवाद का भी खात्मा हो सकता है.

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