दिसंबर, 1974 को मैं ‘दिनमान’ के अपने एक सहयोगी महेश्वरदयालु गंगवार (अब दिवंगत) के साथ दिल्ली के नए उपराज्यपाल कृष्ण चंद से मिला था ।वह पुराने आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विस)थे ।उन दिनों देश का राजनीतिक माहौल खासा सरगर्म था । सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन (संपूर्ण क्रांति के नाम से प्रसिद्ध ) की शुरुआत हो गयी थी जिससे दिल्ली समेत पूरा देश राजनीतिक तौर पर प्रभावित था ।1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1973 में तेल संकट के चलते देश में आर्थिक समस्याएं,उच्च मुद्रास्फीति और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण राजनीतिक अशांति का माहौल था ।18 मई,1974 को भारत द्वारा राजस्थान के पोखरण में पहले सफल परमाणु परीक्षण (नाम दिया गया स्माइलिंग बुद्धा) कर वह विश्व का छठा परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया जिसे ‘शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट’ कहा गया। इससे देश भर में खुशी तो थी बावजूद इसके नवगठित जनता मोर्चा ने एकजुट होकर इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन का मानस बना लिया था ।उसी दौर में दिल्ली के सदर बाज़ार में सांप्रदायिक दंगों की वजह से भी तनावपूर्ण स्थिति थी। इसमें 11 लोग मारे गए थे और 92 घायल हुए थे । उस समय का यह गंभीर सांप्रदायिक दंगा था ।तब दिल्ली में महानगर परिषद हुआ करती थी जहां कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी ।दिल्ली को राज्य का दर्जा फरवरी,1992 को प्राप्त हुआ था। इन तमाम समस्याओं के बारे में उपराज्यपाल कृष्ण चंद से चर्चा हुई, दिल्ली के मसलों पर उठाए जाने वाले कदमों के बारे में उन्होंने आश्वस्त किया कि राजधानी की स्थिति को बेकाबू नहीं होने दिया जाएगी और न ही अशांति फैलने दी जाएगी ।देश की राजनीति पर भी उन्होंने बात की लेकिन उद्धृत करने से मना कर दिया। दिल्ली के बारे में उन्होंने अपनी प्राथमिकताओं के बारे में भी हमें बताया ।बातचीत बहुत ही सद्भावना और सद्भावपूर्ण वातावरण में हुई ।

उपराज्यपाल कृष्ण चंद जी ने हमें लंच पर न्योता था। आईसीएस का लंच भी उनके रुतबे के अनुकूल था ।उन्होंने अपने निजी सचिव से हमारा परिचय कराते हुए बताया कि यह नवीन चावला,आईएएस हैं ।बहुत ही होनहार अफसर हैं ।1969 बैच के आईएएस नवीन चावला दिल्ली के जिलाधीश रह चुके हैं और वह यहां की रोजमर्रा की समस्याओं से परिचित हैं ।इस लिहाज़ से यह मेरे बहुत मददगार हैं ।मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे इतना प्रतिभाशाली निजी सचिव मिला है ।नवीन चावला से हम दोनों ने हाथ मिलाया ।मैंने उनसे पंजाबी में कहा कि ‘मिलदे रहाँ दे’।और वह मुस्कुरा दिये ।उपराज्यपाल ने लंच की शुरुआत करने के लिए नवीन चावला से कहा ।आईसीएस शैली में पहले ड्रिंक पेश की गयी। उसके बाद राज निवास में विशेष शेफ की देखरेख में बना स्वादिष्ट भोजन परोसा गया । लंच बहुत स्वादिष्ट था और खिलाने वाले बहुत विनम्र और मृदुभाषी ।चलते चलते नवीन चावला ने मेरा फोन नंबर ले लिया। ऑफ़िस पहुंचकर हमने स्टोरी फ़ाइल की जिसे प्रकाशित होने पर पाठकों की खूब सराहना प्राप्त हुई और उपराज्यपाल कृष्ण चंद और उनके निजी सचिव नवीन चावला की भी ।

नवीन चावला से अब मेरी नियमित तौर पर बातचीत होने लगी । ऐसे ही पहले पहल जब गोपी कृष्ण अरोड़ा और विजय कपूर की दिल्ली के जिलाधीश की नियुक्ति हुई थी तो उनसे भी मुझे मिलने के कई अवसर मिलते थे और ‘दिनमान’ के लिए एक्सक्लूसिव स्टोरीज़ भी मिल जाया करती थीं । एक बार नवीन चावला ने बातचीत में बताया था कि वह मदर टेरेसा से बहुत प्रभावित हैं और उन्होंने कोलकाता में रहकर उनके काम को नज़दीक से देखा है ।मदर टेरेसा से कई बैठकों में उनके जीवन,उनके कार्यक्षेत्र,उनका गरीबों की सेवा की ओर उन्मुख होना और भारत में बस कर,और वह भी कोलकाता में, मिशनीरीज़ ऑफ़ चैरिटी की स्थापना करना आदि पर चर्चाएं हुईं । इतनी विस्तृत जानकारी के आधार पर उन्होंने मदर टेरेसा की जीवनी लिखी है । एक दिन नवीन चावला का फोन आया कि शाम को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आ जायें वहां मदर टेरेसा मेरी किताब का लोकार्पण करेंगी । मैंने मदर टेरेसा की जीवनी लिखी है। उस कार्यक्रम में दिल्ली के बुद्धिजीवी, सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोग,बड़े बड़े नौकरशाह आदि उपस्थित थे ।उन्होंने मदर टेरेसा की जीवनी की एक प्रति मुझे भेंट की जिस पर मैंने मदर टेरेसा के हस्ताक्षर लिये जिस पर उन्होंने लिखा था कि ‘प्रेम और सेवा ही जीवन का मूल मंत्र है ।इसका सदा अनुसरण करें ।’

नवीन चावला अपनी पुस्तक को ‘मदर टेरेसा की अधिकृत जीवनी’ बताते थे जिसे मदर टेरेसा ने पूरा पढ़ा है ।उन्होंने लिखा है कि मदर टेरेसा कहा करती थीं कि ‘हम सभी जीवन में महान कार्य नहीं कर सकते,लेकिन हम जो भी कार्य करें उसे प्रेम से कर सकते हैं । यदि हमारे बीच में कोई शांति नहीं है,तो वह इसलिए,क्योंकि हम भूल गए हैं कि हम एक दूसरे से संबंधित हैं ।’ मदर कहती हैं कि ‘अगर आप मेरे बारे में कुछ लिखना चाहते हैं तो आप सिर्फ मेरे कार्यों पर लिखो ताकि लोगों को प्रेरणा मिले ।हमें सफल होने के लिए,बल्कि वफादार रहने के लिए बुलाया गया है।आज के समाज में सबसे बड़ी बीमारी कुष्ठ रोग या तपेदिक नहीं है,बल्कि अवांछित रहने की भावना है ‘। नवीन चावला मदर टेरेसा को उन दुर्लभ आत्माओं से एक मानते थे जिन्होंने जाति,धर्म,पंथ और राष्ट्र की सभी बाधाओं को पार कर लिया है ।मदर टेरेसा को पूरी दुनिया ‘एक दयालु और मानवीय व्यक्तित्व के लिए जानते हैं ।वह ज़रूरतमंदों और असहाय लोगों के प्रति अपने निस्वार्थ भाव के लिए जानी जाती हैं ‘।नवीन चावला के अनुसार वह कैसे ईश्वर पर निर्भर थीं और दान के रूप में मिली आय का उपयोग गरीब लोगों की मदद के लिए करती थीं,न कि अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिये । नवीन चावला उनके विश्वास, उनके काम और उनकी विचारधारा को दर्शाते हैं, जैसे कि उन्होंने धन की कभी मांग नहीं की और गरीबों की सेवा के लिए हर तरह की आलोचना को नज़रंदाज़ किया ‘। ये पहले के अंश नवीन चावला की पुस्तक से उद्धृत किए गए हैं ।इनके अतिरिक्त पुस्तक के कुछ और अंश हैं: ‘मदर टेरेसा कहती हैं कि मैंने कभी किसी से पैसे नहीं मांगे ।मैं न कोई वेतन लेती हूं,न कोई सरकारी अनुदान,न कोई चर्च की सहायता,कुछ भी नहीं ‘।चावला ने मदर टेरेसा की मितव्ययता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि मदर टेरेसा कहती थीं कि “जब एक छोटा बच्चा भी अपनी बचत से एक रूपया दे सकता है,तो वह उस ‘बलिदान’ के पैसे को बेवजह खर्च नहीं कर सकतीं ।” नवीन चावला ने अपनी पुस्तक में मदर टेरेसा के काम की आलोचना करने वालों को जवाब देते हुए लिखा है कि ‘वह सड़कों पर छोड़ दिए गए गरीबों की देखभाल करती थीं । यह काम आसान नहीं है, खास कर उन लोगों के लिए जिनके लिए उन्होंने मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की है ।इस पुस्तक में मदर टेरेसा के निस्स्वार्थ सेवा के प्रति समर्पण को उजागर किया गया है।

नवीन चावला मदर टेरेसा के निस्स्वार्थ सेवा कार्यों से इतने मुतासिर हुए थे कि उन्होंने एकबारगी सिविल सेवा से इस्तीफा देकर उनके साथ काम करने की मंशा ज़ाहिर की थी लेकिन मदर टेरेसा ने उन्हें इस्तीफा न देने की सलाह देते हुए कहा था कि नौकरी करते हुए भी आप हमारे सेवा कार्यों से जुड़ सकते हैं ।नवीन चावला द्वारा लिखी मदर टेरेसा की जीवनी की बिक्री ने कई रिकार्ड स्थापित किये ।उसका अनुवाद 14 भाषाओं में हुआ है ।इसकी पांच लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं ।नवीन चावला ने बताया था कि इस किताब से मिलने वाली रॉयल्टी को वह कुष्ठ रोग के निवारण के लिए मुफ्त दवाइयां देते हैं तथा कुष्ठ माता पिता के बच्चों को मुफ्त व्यवसायिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं । इसी प्रकार गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के विकलांग बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है ।

दूसरी बार मदर टेरेसा से मेरी भेंट समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया के एनजीओ ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग ऐंड फ्रेटरनिटी (ओयूएफ) द्वारा आयोजित रामकृष्ण जयदयाल सद्भावना पुरस्कार समारोह में हुई ।उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था ।मुख्य अतिथि को निमंत्रित करने का ज़िम्मा ओयूएफ की महासचिव श्रीमती नफ़ीस खान का होता है ।उन्होंने ही मदर टेरेसा से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और एच डी देवगौड़ा,उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव,सिने अभिनेता दिलीप कुमार, पवन पावन दलाईलामा, सरदार भगत सिंह के भाई सरदार कुलतार सिंह,राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एम एन वेंकटचलिया, श्री श्री रवि शंकर आदि को निमंत्रित किया था । श्रीमती नफ़ीस खान ने मदर टेरेसा को जब यह बताया कि संजय डालमिया मंदबुद्धि बच्चों के लिए विशेष स्कूल ‘मासूम’ चलाते हैं और कुष्ठ रोगियों का पुनर्वास करने के साथ साथ उनके स्वस्थ बच्चों को शिक्षा दिलाते हुए उनके परिवार के लिए राशन की व्यवस्था करते हैं तो वह इस कार्यक्रम में आने के लिए राज़ी हो गयीं ।

मदर टेरेसा ने विभिन्न भाषाओं के लेखकों,पत्रकारों और स्वयंसेवी संस्था को सम्मानित किया जिन्होंने राष्ट्रीय अखंडता, सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारे की भावना को विकसित करने के लिए इस दिशा में काम किया था ।पुरस्कृत लेखकों और पत्रकारों में थे:
डॉ कन्हैयालाल नंदन (हिंदी), बलराज पुरी (अंग्रेज़ी), फुज़ैल जाफरी (उर्दू), किरन नागरकर (मराठी), के एम मैथ्यू (मलयालम), हरि मोटवानी (सिंधी), अशोकमित्रन (तमिल), अरुण कौल (मीडिया) तथा भारतीय पतिता उद्धार सभा (स्वयंसेवी संस्था)।

मदर टेरेसा ने मुस्कुराते हुए और आशीर्वाद की मुद्रा में सभी पुरस्कृत हस्तियों को सम्मानित करते हुए कहा कि जीवन में अनेक चुनौतियों और असफलताओं का सामना करना पड़ता है,लेकिन इन बाधाओं को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के आड़े नहीं आने देना चाहिए ।अपने लक्ष्य को पाने के लिए दृढ़संकल्प की आवश्यकता होती है जिसे हमें कठिन से कठिन परिस्थिति में मज़बूती से हासिल करना चाहिए,वह चाहे देश की एकता और अखंडता हो,सांप्रदायिक सद्भाव हो और भाईचारे की भावना हो ।आप लोग ज़रूरतमंदों की देखभाल की तरफ़ ध्यान देते हुए असहाय लोगों को भोजन,आश्रय और उनके आराम को यकीनी बनायें ।दया,सेवा और सवेदनशीलता जैसे गुणों का स्वयं अंगीकार करते हुए उसे अपनी लेखनी में भी उजागर करें । आप लोग संघर्ष से न घबराएं,अपनी परिस्थितियों से लड़ने और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयास करते रहें,क्योंकि संघर्ष ही जीवन की प्रगति और विकास का आधार है ।मुझे खुशी है कि श्री संजय डालमिया सेवा,दया और करुणा जैसे मानवीय गुणों का अनुसरण करते हुए मंदबुद्धि के बच्चों को सामान्य बच्चों की श्रेणी में लाने का काम कर रहे हैं ।जिस तरह से उन्होंने कुष्ठ रोगियों के पुनर्वास और उनके बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठा रखा है वह ईश्वरीय वरदान है ।मैं सभी पुरस्कृत विद्वानों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देती हूं ।

वास्तव में नीले बॉर्डर वाली सफ़ेद साड़ी में मदर टेरेसा का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक लग रहा था ।इस कार्यक्रम के बाद वह डालमिया हाउस गयीं डालमिया परिवार से मिलने के लिये ।परिवार के सदस्यों के साथ भी उन्होंने काफी समय व्यतीत किया । मुझे भी उन्होंने देखकर पहचान लिया और बोलीं कि आप तो नवीन चावला के मित्र हैं न।मुझे मालूम है उन्होंने आपको मेरी जीवनी की प्रति दी थी जिस पर आपने मेरे दस्तखत लिए थे ।आपने वह पुस्तक पढ़ी कि अपनी लाइब्रेरी में सजा कर रख दी ।जब मैंने उन्हें बताया कि मैंने दो दिन में पूरी पुस्तक पढ़ ली थी और नवीन चावला को बधाई भी दे दी थी तो यह जानकर वह खुश हो गयीं ।

26 अगस्त, 1910 को कोसोवर अल्बानियाई परिवार में जन्मी मदर टेरेसा का मूल नाम अंजेज़े गोंक्से था । गोंक्से का अल्बानियाई अर्थ है ‘फूल की कली’।अंजेज़े ने बचपन में ही बंगाल में मिशनरियों के जीवन और उनकी सेवा की कहानियां सुन रखी थीं । लिहाजा उन्होंने अपने आपको धार्मिक जीवन की ओर समर्पित करने का फैसला कर लिया ।मिशनरी बनने के इरादे से उन्होंने 1928 में 18 साल की उम्र में घर छोड़ दिया ।आयरलैंड में लोरेटो एबे में लोरेटो की बहनों में शामिल हो अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा प्राप्त की ।वह 1929 में भारत आ गयीं और दार्जिलिंग में बंगाली सीखी और सेंट टेरेसा स्कूल में पढ़ाया ।यहीं उन्होंने अपना नाम टेरेसा की स्पेनिश वर्तनी को चुना और 14 मई,1937 को पूर्वी कलकत्ता (अब कोलकाता) के एंटाली में लोरेटो कान्वेंट स्कूल में शिक्षिका के रूप में काम किया ।लेकिन कलकत्ता और उसके आसपास की गरीबी देखकर वह परेशान हो गयीं और वह स्कूल छोड़ 1946 में दार्जिलिंग से कलकत्ता आ गयीं गरीबों की सेवा करने के लिए ।1950 में उन्होंने मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की और दो नीले किनारों वाली सफ़ेद साड़ी को अपनी परंपरा के रूप में अपनाया और 1951 में भारत की नागरिकता ग्रहण कर ली ।

कलकत्ता आने से पहले मदर टेरेसा ने पटना में होली फैमिली अस्पताल में बुनियादी चिकित्सा प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कई महीने वहां रहकर गंदी बस्तियों में काम किया ।अपनी शुरुआती कठिनाइयों का ज़िक्र करते हुए अपनी एक डायरी में लिखा कि उन्होंने भोजन के लिए भीख मांगी ।उन पर जासूस होने का संदेह तक किया गया ।लेकिन वह अपने निर्णय पर अडिग रहीं ।वेटिकन की अनुमति से मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी बन गयी और उन्हें भूखे,नंगे,बेघर,अपंग,अंधे,कुष्ठ रोगियों आदि की देखभाल करने की जिम्मेदारी मिल गयी जिन्हें समाज में अवांछित,अप्रिय,उपेक्षित महसूस किया जाता है ।समाज ऐसे लोगों को बोझ मान कर त्याग देता है । मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी ने पूरे कलकत्ता में कुष्ठ रोग क्लिनिक स्थापित किये जहां दवा,ड्रेसिंग और भोजन उपलब्ध कराया गया ।अनाथों और बेघर युवाओं के लिए एक आश्रय स्थल के रूप में निर्मला शिशु भवन खोला गया ।1960 तक पूरे भारत में
अनाथालय और कुष्ठरोग गृह खुल गये ।कोलकाता स्थित 13 सदस्यों वाली समिति की देखरेख में मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी के मिशन हैं जहां पांच हज़ार के करीब नन एचआईवी/एड्स,कुष्ठ रोग और तपेदिक से मरने वालों के लिए घरों का प्रबंध करती हैं ।इसके साथ ही सूप किचन,औषधालय,चलती फिरती क्लिनिक, अनाथालय और स्कूल भी चलाती हैं।

मदर टेरेसा कहती थीं कि ‘मैं खून से अल्बानियाई हूं,नागरिकता से भारतीय हूं। आस्था से मैं कैथलिक नन हूं ।जहां तक मेरा उद्देश्य है, मैं सारी दुनिया की हूं ।जहां तक मेरा हृदय है, मैं पूरी तरह से यीशू के हृदय की हूं ।’ मदर टेरेसा पांच भाषाएं बोल सकती थीं अंग्रेज़ी,हिंदी,बंगाली,अल्बानियाई और सर्वो-क्रोशियाई मदर टेरेसा को राजनयिक पासपोर्ट जारी किया गया था । कई सम्मान प्राप्त हुए हैं जिनमें प्रमुख हैं 1962 में पदमश्री और रेमन मैग्सेसे शांति पुरस्कार,1969 में अंतरराष्ट्रीय समझ के लिए जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार, 1971 में पोप पॉल VI ने उन्हें पोप जॉन XXIII शांति पुरस्कार प्रदान किया, 1979 का नोबेल शांति पुरस्कार ,1980 में भारत रत्न,1982 में ऑर्डर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया का मानद साथी नियुक्त किया गया,1983 में ऑर्डर ऑफ मेरिट और 16 नवंबर,1996 को संयुक्त राज्य अमेरिका की मानद नागरिकता के रूप में हुआ जबकि अल्बानियाई मातृभूमि ने 1994 में राष्ट्र का स्वर्ण सम्मान दिया ।1979 में मदर टेरेसा को ‘गरीबी और संकट,जो शांति के लिए भी खतरा है,पर काबू पाने के संघर्ष में किए गए कार्यों के लिए’ नोबेल शांति पुरस्कार मिला तो उन्होंने पुरस्कार विजेताओं के लिए आयोजित पारंपरिक औपचारिक भोज को अस्वीकार कर दिया यह कहकर कि इसकी 192,000 डॉलर की राशि भारत के गरीबो को दी जाये ।उन्होंने कहा कि सांसारिक पुरस्कार तभी महत्वपूर्ण हैं जब वे दुनिया के ज़रूरतमंदों की मदद करने में उनके मददगार हों । दूसरों के लिए न जिया गया जीवन,जीवन नहीं है।आप दयालुता में गलतियां करें बजाय निर्दयता में चमत्कार करने के।

5 सितम्बर,1997 को मदर टेरेसा का कोलकाता स्थित उनके मुख्यालय में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया । बिगड़ती हृदय की स्थिति के कारण उन्हें सेवानिवृत होना पड़ा और अपनी मृत्यु से पहले मदर टेरेसा ने मार्च,1997 में भारत में जन्मी सिस्टर निर्मला को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुना और इस प्रकार वह मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की प्रमुख बन गयीं ।सिस्टर निर्मला पूर्व हिंदू हैं जिन्होंने रोमन कैथलिक धर्म अपना लिया था ।मदर टेरेसा जब जीवित थीं तो उन्हें ‘जीवित संत’ कहा जाता था । मदर टेरेसा की मृत्यु के समय 90 से अधिक देशों में हज़ारों केंद्र शामिल थे जिनमें लगभग चार हज़ार नन और लाखों आम कार्यकर्ता थे ।अब यह संख्या बहुत बढ़ गयी है ।देश के सभी धर्मों के गरीबों के प्रति उनकी सेवा के लिए आभार स्वरूप भारत सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार दिया ।कुछ राजनेताओं ने मदर टेरेसा को ‘एक दुर्लभ और अद्वितीय व्यक्ति’ कहा तो पूर्व संयुक्तराष्ट्र महासचिव जेविएर पेरेज़ डी कुएलर के अनुसार ‘वह संयुक्तराष्ट्र हैं ।वह दुनिया में शांति हैं ।’

मदर टेरेसा को उनकी मृत्यु के बाद ‘संत’ घोषित किया गया । इससे पहले उनके दो चमत्कार देखे गये । वेटिकन द्वारा अनुमोदित चमत्कारों में एक भारतीय महिला मोनिका बेसरा का उपचार शामिल था जिसके पेट का ट्यूमर तब गायब हो गया जब उसने मदर टेरेसा के फोटो की लॉकेट पेट पर रखी थी ।उनके अनुसार लॉकेट से तेज रोशनी निकली और धीरे-धीरे ट्यूमर ठीक हो गया ।दूसरे चमत्कार का संबंध ब्राज़ील से है ।दिसंबर,2008 में मार्सिलियो नामक एक व्यक्ति वायरल ब्रेन इन्फेक्शन की वजह से कोमा में चला गया ।जब सब तरफ़ से उम्मीदें खत्म हो गयीं तब उनकी पत्नी कैथलिक पादरी की शरण में गयी ।पादरी ने उन्हें मदर टेरेसा से प्रार्थना करने को कहा ।लिहाजा मार्सिलियो की पत्नी ने प्रार्थना की जिसकी वजह से उनके पति की बीमारी ठीक हो गयी ।इन दो चमत्कारों को देख पोप फ्रांसिस ने 4 सितम्बर,2016 को वेटिकन सिटी में मदर टेरेसा को ‘संत’ की उपाधि दी थी ।इससे पहले 19 अक्टूबर,2003 को पोप जॉन पॉल द्वितीय द्वारा उन्हें ‘कलकत्ता की धन्य टेरेसा’ की उपाधि से सम्मानित किया था जबकि भारत में उन्हें ‘कलकत्ता की संत टेरेसा’ कहा जाता है । दिल्ली में विलिंगडन क्रेसेंट सड़क का नाम बदलकर मदर टेरेसा क्रेसेंट कर दिया गया है ।मदर टेरेसा को ‘सेवा भाव का पर्याय’ और ‘मानवता के प्रति करुणा और सेवा का जीवन’ के रूप में चित्रित किया जाता है ।

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