भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जिन्होंने 1965 में पाकिस्तान से घुटने टिकवा लिए थे
मैंने जून, 1956 में लोकसभा सचिवालय से दिल्ली में पहली नौकरी की शुरुआत की ।इससे पहले डेढ़ वर्ष तक रायपुर (छत्तीसगढ़) में वनसंरक्षक विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की थी ।वह इसलिए कि 1954 में वहां के माधवराव सप्रे हाई स्कूल से माध्यमिक स्कूल की परीक्षा पास करने के उपरांत अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों टाइपिंग सीख कर काम की तलाश की जो मुझे जल्दी ही मिल गयी। दो बरस पहले बैसाखी के दिन मेरे पिता जी का अचानक निधन हो जाने के बाद मैं किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में था ।घर में हालांकि मैं और मेरी माँ ही थे लेकिन खाने-पीने के लिए पैसों की दरकार तो थी ही ।मेरे चाचा परमानंद जुनेजा मुंबई से ट्रांसफर होकर दिल्ली आ गये थे फारेन पोस्ट में ।वह मेरी योग्यता के अनुसार वहां की अखबारों में जो भी रिक्तियां देखते,उन्हें काट कर मुझे भेज दिया करते थे ।लोकसभा सचिवालय की नौकरी भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा थी ।
आम तौर पर मैं अपनी साइकिल स्टैंड पर खड़ी करने के बाद संसद भवन के गेट नंबर एक से ही तीसरी मंज़िल पर स्थित अपनी ब्रांच में जाया करता था ।उसी गेट का इस्तेमाल अमूमन सांसद भी किया करते थे दोनों लोकसभा और राज्यसभा के भी ।कभी कभार कई मंत्री भी गेट नंबर एक का इस्तेमाल कर लेते थे। शायद इसलिए कि उन्हें केंद्रीय कक्ष में जाना होता था या पीएनओ (पार्लियामेंटरी नोटिस ऑफ़िस) में किसी सांसद से मिलने के लिये।मंत्रियों का गेट अलग था ।ऐसे मंत्रियों में एक बार मुझे लालबहादुर शास्त्री दीख गये ।मैंने उन्हें नमस्ते की और उनके साथ ही कुछ कदम जब चलने लगा तो उन्होंने मुझसे पूछा कि ‘क्या कोई खास बात है’।
मैंने हिचकिचाते हुए उनसे कहा कि पीएनओ में कुछ सांसद चर्चा कर रहे थे कि शास्त्री जी इस्तीफा देने वाले हैं ! उन्होंने मेरी ओर विस्मयभरी नज़रों से देखा लेकिन बोले कुछ नहीं ।मैंने उन के साथ कुछ और कदम चलने की जब इज़ाजत चाही तो उन्होंने सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी ।उन्होंने धीरे से कहा कि पहले एक रेल दुर्घटना हुई,त्यागपत्र देने की इच्छा ज़ाहिर की,पंडित जी नहीं माने ।इतनी जल्दी दूसरा हादसा हो गया ।रेल मंत्रालय का मुखिया होने के नाते मेरा यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि मैं पीड़ितों के संग खड़ा होऊँ। लेकिन इसमें मंत्री को कैसे जिम्मेदार माना जा सकता है ।मेरी तरफ देखे बगैर बोले,परिवार में अगर कोई बच्चा गलती करे तो तोहमत किस पर लगती है,परिवार के मुखिया पर ही न।आशा है आप मेरा आशय समझ गये होंगे।
प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का कमरा आ गया था ।मैं शास्त्री जी को नमस्कार कर तीसरी मंज़िल पर स्थित अपनी पीएमबी (गैरसरकारी सदस्यों के विधेयकों और संकल्पों की शाखा) ब्रांच में पहुंच गया और जाते ही काम में व्यस्त हो गया ।थोड़ी दूर पर बैठे सी के जैन ने आवाज़ मार कर पूछा ‘क्या बात है जुनेजा,बड़े उधेड़बुन में दीखते हो!’ मेरे साथी मुझे इसी नाम से संबोधित किया करते थे ।मैंने कहा,’कुछ नहीं चक्रेश ।’ लेकिन उसे विश्वास नहीं हुआ और वह अपनी सीट से उठकर मेरे पास आकर बोला,’कुछ तो है पार्टनर।’ उन दिनों का कुछ ऐसा ही चलन था दोस्तों के बीच ।ऑफ़िस में मैं जुनेजा के नाम से ही जाना जाता था। सी के जैन और के के कालरा मेरे अच्छे दोस्तों में थे ।यही सी के जैन बाद में लोकसभा के महासचिव के पद तक पहुंचे और कालरा आईएएस बन कर चले गये ।इन दोनों से मेरे संबंध सदा रहे ‘दिनमान’ और ‘संडे मेल’ में जाने के बाद भी ।चक्रेश को मैंने बताया कि अभी अभी लालबहादुर शास्त्री से मुलाकात हुई थी ।उनसे जब मैंने पीएनओ में सुनी उनके इस्तीफे की खबरों के बारे में पूछा तो उनका मुख्तिसर-सा जवाब था कि परिवार के मुखिया को नैतिक जिम्मेदरी तो लेनी ही होती है इतना कहकर वह प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के कमरे में चले गये थे ।और देखिये,थोड़ी देर के बाद ही शास्त्री जी के त्यागपत्र की खबर सार्वजनिक हो गयी जिसे प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया था ।
अब मुझे उनकी उदासी का राज़ पता चला हालांकि आभास तो मुझे पीएनओ में ही हो गया था ।चर्चा कांग्रेस के सांसदों के बीच जो सुनी थी ।1952 में पहले लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कांग्रेस के पहले मंत्रिमंडल में लालबहादुर
शास्त्री पहले रेल और परिवहनमंत्री थे । यह शुद्ध कांग्रेस की पहली सरकार थी ।1952 से पहले वाली सरकार राष्ट्रीय सरकार थी जिसमें जनसंघ के डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी (15 अगस्त, 1947-19 अप्रैल,1950) उद्योग और आपूर्ति मंत्री, स्वराज्य पार्टी के
के. एम. मुंशी कृषि और खद्य मंत्री,स्वतंत्र लेबर पार्टी के डॉ. भीमराव अम्बेडकर,कानून मंत्री, जस्टिस पार्टी के आर के शंमुखम चेटी वित्तमंत्री आदि थे ।पंडित नेहरू के पहले रेल और परिवहनमंत्री के तौर पर लालबहादुर शास्त्री ने जम कर काम किया और विरासत में प्राप्त रेलवे व्यवस्था को आम लोगों के अनुकूल बनाने का प्रयास किया ।लेकिन सितम्बर, 1956 में जब महबूबनगर में रेल दुर्घटना हुई तो शास्त्री जी ने इसकी राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा देने की पेशकश की जिसे पंडित नेहरू ने लेने से इंकार कर दिया लेकिन ढाई महीने बाद आरियालुर का रेल हादसा हुआ तो इस बार पंडित नेहरू पर ज़ोर डाल कर उन्होंने अपना इस्तीफा मंज़ूर करवा लिया ।7 दिसंबर, 1956 को उन्होंने रेलमंत्री का पद छोड़ दिया। किसी रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदरी कोई रेलमंत्री ले यह अपने आप में पहली और आखिरी मिसाल है,जो नज़ीर कभी नहीं बनी । एक तरह से कहा जाये तो शास्त्री जी ने अपने मन की बात प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मिलने के पहले ही बता दी थी ।अगर मैं पत्रकार होता तो मेरे लिए यह बहुत बड़ा स्कूप होता ।
मैं उस समय विधिवत पत्रकार तो था नहीं लेकिन अवसर मिलते ही किसी न किसी प्रसिद्ध सांसद या मंत्री से बेहिचक बातचीत कर लेता था ।कुछ मेरे सहयोगी पूछते भी थे कि तुम इन सांसदों और मंत्रियों से बातचीत करके करोगे क्या!मैं कहता कि न जाने यह बातचीत कब काम आ जाये ।बेशक काम आती भी रही लोकसभा सचिवालय में काम करते हुए और उसके बाद भी ।लिखना तो मैंने लोकसभा में रहते ही शुरू कर दिया था ।धन्यवाद है जयप्रकाश भारती का जो उस समय ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान ‘ में कार्यरत थे।उन्होंने न केवल मुझसे तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के संस्मरण ही लिखवाए अपितु पंजाबी के उपन्यासकार कर्नल नरेंद्रपाल सिंह और पंजाबी की कवयित्री श्रीमती प्रभजोत कौर की कविताओं के हिंदी अनुवाद भी छापे ।इनके अतिरिक्त वह मुझसे कभी किसी सांसद या मंत्री का इंटरव्यू करने के लिए भी कहते ।कहीं एक नाम से लेखन अधिक न हो जाए उन्होंने मेरा एक और नाम रख दिया ‘अंगद’। लोकसभा में रहते हुए मैंने थोक भाव से लिखा था ।
रेलमंत्री पद से लालबहादुर शास्त्री का इस्तीफा उनकी जिद्द की वजह से प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वीकार तो कर लिया था लेकिन ज्यादा दिनों तक उन्हें खाली नहीं बैठने दिया गया । 17 अप्रैल,1957 से 28 मार्च,1958 तक वह परिवहन और संचार मंत्री रहे,उसके बाद शास्त्री जी को वारिज्य और उद्योग मंत्री बनाया गया जहां वह 5 अप्रैल, 1961 तक रहे ।इसके साथ ही उन्हें 26 फरवरी,1961 से गृहमंत्री की अतिरिक्त जिम्मेदरी सौंपी जिसे बाद में विधिवत कर दी गयी जहां वह 1 सितम्बर, 1963 तक रहे ।जब किन्हीं कारणों के चलते उन्होंने गृहमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो उन्हें पंडित जी ने ज्यादा दिनों तक विश्राम नहीं करने दिया ।नेहरू जी ने 24 जनवरी,1964 को शास्त्री जी को बिना विभाग का मंत्री बना दिया ।इस दौर में वह परोक्ष तौर पर केवल पंडित नेहरू का काम ही देखा करते थे,क्योंकि वह अस्वस्थ रहने लगे थे ।27 मई,1964 को पंडित जी के निधन तक वह बिना विभाग के मंत्री ही रहे ।
1964 में ही संसद के बजट सत्र की बात होगी ।मैं अपने उपसचिव पी के पटनायक को लॉबी असिस्टेंट भट्ट के माध्यम से कुछ आवश्यक दस्तावेज भिजवा कर इनर लॉबी से आउटर लॉबी से होता हुआ लिफ्ट नंबर 4 का इंतज़ार कर रहा था ।यह लिफ्ट मंत्रियों के इस्तेमाल के लिए होती है किन्तु कभी कभार हम लोग भी उसका इस्तेमाल कर लिया करते थे ।अभी लिफ्ट नीचे आयी नहीं थी कि देखा कि लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी चले आ रहे हैं । लिफ्ट के रुकते ही मैंने उन दोनों को पहले जाने का संकेत देकर यह सोचकर बाहर खड़ा हो गया कि इन अति विशिष्ट नेताओं को छोड़ने के बाद जब लिफ्ट आयेगी तो मैं चला जाऊंगा ।मुझे बाहर खड़ा देख शास्त्री जी ने मुझे कहा कि आप भी आइये, मैं आपको पहचानता हूं ।इंदिरा जी ने शास्त्री जी की तरफ प्रश्नवचाक दृष्टि से देखा ।शास्त्री जी ने उन्हें बताया कि 1956 में जब मैं रेलमंत्री पद से इस्तीफा देने की बाबत सोच ही रहा था कि इन्होंने यह सवाल पूछ लिया ।शास्त्री जी और इंदिरा जी ने एक साथ ही पूछा कि यहां किस ब्रांच में काम करते हो,मैंने बताया,जी लेजिस्लेटिव ब्रांच में ।बहुत अच्छे ।हां,अपनी यह जिज्ञासा हमेशा कायम रखना ।यह कहते हुए वे दोनों पहली मंज़िल पर उतर गये ।उसके बाद मैं जितनी बार भी शास्त्री जी या इंदिरा गांधी से मिलता वे मुझे तुरंत पहचान लेते ।संसद भवन के लॉन में जब कभी कांग्रेस की हाई टी की पार्टी में इंदिरा गांधी आती तो पार्टी के एक ऑफ़िस अधिकारी पाहवा साहब की सहायता से मैं उनसे मिल लिया करता था, शास्त्री जी से भी ।
एक बार जो शास्त्री जी से मैं मिला तो उसके बाद उनसे मुलाकातों का दौर चल पड़ा । संसद भवन में अक्सर वह दीख जाते थे ।कभी कभी अभिवादन के अतिरिक्त भी बातचीत हो जाया करती थी ।बिना विभाग के जब वह मंत्री थे तो वह अस्वस्थ प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का काम देखा करते थे ।मिलने पर कहते कि सशरीर मैं उनके ऑफ़िस में जरूर जाता हूं लेकिन निर्णय सब पंडित जी के ही होते हैं । यहां तक कि विदेश राज्य मंत्री लक्ष्मी मेनन भी पंडित जी की सहमति के बिना विदेश मंत्रालय का कोई भी फैसला नहीं लेती थीं । पंडित जवाहरलाल नेहरू के देहावसान हो जाने के बाद सौम्य, विनम्र और साफ सुथरी छवि वाले लालबहादुर शास्त्री को देश का दूसरा प्रधानमंत्री बनाया गया ।
27 मई, 1964 में पंडित नेहरू के निधन के बाद मैं जब शास्त्री जी से मिला तो मैंने पंडित जी के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी ।शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनसे मिलने जुलने का दौर जारी रहा। कभी साउथ ब्लाक स्थित उनके दफ्तर में मिल लेता या 10, जनपथ में उनके निवास पर ।प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री जी ने पंडित नेहरू की ही नीतियों का अनुसरण किया लेकिन देश के हालात को देखते हुए स्वतंत्र फैसले भी लिये ।शास्त्री जी के कार्यकाल में दो क्रांतियाँ हुईं- श्वेत क्रांति और हरित क्रांति । लेकिन 1965 में 22 दिनों के इस युद्ध में जिस तरह से उनके नेतृत्व में लड़ी फौजों ने पाकिस्तान को भीतर तक घुसकर मारा उसे याद करके पाकिस्तानी फौज आज भी सिहर उठती है ।यह कम बड़ी क्रांति नहीं बल्कि महान क्रांति कही और मानी जाएगी ।मैं कोई सुनी सुनाई बात नहीं कर रहा हूं ।1990 में मैंने ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के एडिटर अजीज सिद्दीक़ी के साथ वाघा बॉर्डर देखा था ।रास्ते में वह एक जगह अपनी कार खड़ी करके बोले कि यह देखिये बाटा का शोरूम, यहां तक हिंदुस्तानी फौज पहुंच गयी थी ।इसकी खबर पाकर पूरे शहर में हड़कंप मच गया था ।आगे बढ़ती हिन्दुस्तानी फौज को रोकने के लिए पाकिस्तानी फौज के हाथ पांव फूल गये थे ।उधर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर छोड़ने के लिए तैयार रहने के आदेश दे दिए थे ।हमें यह तो पता था कि हिन्दुस्तानी फौज बहुत अनुशासित है और नागरिकों पर कभी हमला नहीं करती ।लेकिन आम आदमी में दहशत कुदरती तौर पर थी । बाटा शोरूम के पास खासी आबादी है ।दोनों तरफ की सीमा के पास रहने वाले किसानों को देखकर कतई नहीं लगता कि ये दो मुख्तलिफ मुल्कों के किसान हैं ।दोनों का एक जैसा पहनावा,कदकाठी और बोलचाल का लहजा । हमें वहां के लोगों से पता चला जब कुछ फौजियों ने शोरूम में घुसकर अपने अपने नाप के जूते देखते हुए अपने अफसर के पैर का भी नंबर पूछा तो उधर से उसे ज़ोर की डांट पड़ी और जवानों को आदेश दिया गया कि जहां वह हैं वहीं खड़े रहें ।इस वक़्त अमेरिका और सोवियत संघ दोनों का ही हिन्दुस्तानी हुकूमत पर सीज़फ़ायर करने का दबाव है ।थोड़ी देर बाद वाकई दोनों मुल्कों की फौजों को अपने अपने ठिकानों पर लौटने का हुक्म मिला ।तब शास्त्री ने सहास्य कहा था कि ‘हम थोड़ा लाहौर टहलने के लिए चले गए तो वे घबरा गये’।भई ऐसी घबराहट क्यों!
यह 1990 की पाकिस्तान की मेरी पहली यात्रा की आंखों देखी और अजीज सिद्दीक़ी की बड़ी शिद्दत से बयानी दास्ताँ है ।उस तरफ का वाघा बार्डर भी देखा जो हिन्दुस्तानी वाघा बार्डर की तुलना में कहीं ठहरता नहीं था । 1997 में पाकिस्तान नेशनल असेंबली का चुनाव कवर करते हुए हम कुछ हिन्दुस्तानी रिपोर्टर जिनमें हरिंदर बवेजा और राजीव साबड़े प्रमुख थे, पाकिस्तान के कुछ रिपोर्टरों के साथ बरकी तक पहुंच गये लोगों की वोट की जानकारी लेने के लिये ।हमें दूर से ही इछोगिल नहर दिखायी दी ।उसके चारों ओर घने पेड़ हैं जो ‘दुश्मन’ की फौज को गुमराह कर सकते हैं । इसी बरकी गांव से ही मेजर जनरल प्रसाद और उनका काफिला लाहौर में घुसा था ।
लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के लिए यह नहर और उसके आसपास के घने पेड़ उनकी हिम्मत के सामने बौने हो गए थे । उनके नेतृत्व में लाहौर की ओर जाने वाले अपने काफिले को एक रणनीति के तहत बरकी गांव के करीब नहर को पार करने में कामयाबी हासिल की थी । इस अप्रत्याशित सफलता से हिन्दुस्तानी फौज न सिर्फ इछोगिल नहर ही पार कर गयी बल्कि लाहौर शहर के करीब पहुंच गयी ।अब लाहौर हवाई अड्डा भारतीय सेना के जद में था ।उस समय सेनाध्यक्ष जे एन चौधरी थे और उनकी टीम में शामिल थे जनरल हरबख्श सिंह जोगिंदर ढिल्लों,हरकिशन सिब्बल,जेड सी बख्शी आदि ।इस पर एक पाकिस्तानी रिपोर्टर बोल पड़ा कि ‘हमारे लंबे तगड़े जनरल अय्यूब खान ठिगने हिन्दुस्तानी वजीरे आज़म के हौसले और बहादुरी को नहीं पहचान पाये और न ही एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह (1919-2017)के सर्रसर्र कर आते नैट लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता को ।’ काफी दिनों के बाद जब एयर चीफ़ मार्शल अर्जनसिंह से मैंने 1965 जंग के अनुभव सुनाने को कहा तो उनका दोटूक जवाब था कि चीन की पराजय हमारे लिए चुनौती बनकर आयी थी और नीचे से स्थल सेना और ऊपर से हम लोगों ने ऐसे हवाई हमले किये जिसकी पाकिस्तान को सपने में भी उम्मीद नहीं थी ।मैं तो धुर भीतर सरगोधा तक पहुंच गया था जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा एयरबेस है और सेंट्रल एयर कमांड का मुख्यालय है ।अब पाकिस्तानी हुक्मरानों को पता चल गया था कि चीनी युद्ध से हमने कितना बड़ा सबक सीखा है और दूसरे उसकी अपनी पहल उसके गले की फांस बन गयी ।अफसोस कि पाकिस्तान ने 1965 की जंग से कुछ नहीं सीखा ।न सिर्फ उन्होंने अपना पूर्व पाकिस्तान (वर्तमान बंगलादेश) खो दिया बल्कि उसे हिंदुस्तानी फौज के आगे आत्मसमर्पण करना पड़ा । जनरल याह्या खान (3-16 दिसंबर, 1971) में हिन्दुस्तानी फौज के जुनून और बहादुरी का कम आकलन करके 1965 वाली गलती दोहरा बैठे। बेशक उन दिनों पाकिस्तान के लोकतंत्र का मीडिया बड़ा बेबाक था ।
मेरे साथ बेबाक तो लालबहादुर शास्त्री भी हुआ करते थे ।मुझे उनके मीडिया सलाहकार कुलदीप नैयर की मार्फत मिलने की ज़रूरत नहीं हुआ करती थी ।मैं कुलदीप नैयर को तब से जानता था जब वह पत्र सूचना ब्यूरो के सूचना अधिकारी के तौर पर गृह मंत्रालय से जुड़े हुए थे और वहां से दस्तावेज लाकर हमें लेजिस्लेटिव ब्रांच में दिया करते थे ।बेशक शास्त्री जी के. कामराज की तरह सादगी का जीवन जीते थे और खादी का कुर्ता और धोती पहनते थे तथा गांधीवादी सिद्धांतों का अनुसरण करते थे लेकिन 1965 में शाम साढ़े सात बजे जब पाकिस्तान के विमानों ने अचानक कच्छ पर हमला कर दिया तब उन्होंने तीनों सेनाओं के प्रमुखों से सलाह मशविरा कर सैनिक वस्तुस्थिति की जानकारी ली ।इसके बाद सेनाधिकारियों ने उनसे पूछा कि हमारे लिए क्या हुक्म है सर ।इस पर शास्त्री जी का तत्काल उत्तर था ‘आप देश की रक्षा कीजिए और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है ।’ इस पर सैन्य अधिकारी बोले थे ‘बस आप सब कुछ हम पर छोड़ दीजिये ।’ यह वाकया खुद शास्त्री जी ने मुझे बताते हुए कहा था कि इसके बाद मैंने राष्ट्र के नाम संदेश देते हुए कहा कि पाकिस्तान ने हमारे देश पर अचानक हमला बोल दिया है ।आप लोग निश्चिंत रहें,हमारी सैन्य शक्ति बहुत मज़बूत है, वह दुश्मन के घर के भीतर घुसकर मारेगी ।आप लोग सीमा की तरफ जाने वाले सैनिकों का नैतिक मनोबल बढ़ायें और रात को ब्लैकआउट पर पूरी तरह से अमल करें ।’ प्रधानमंत्री शास्त्री तो कहा करते थे कि ‘भारत का सीमा पर घटनाओं को भड़काने या संघर्ष का माहौल बनाने में कोई संभावित हित नहीं हो सकता है लेकिन जब संघर्ष या युद्ध हम पर थोपा जाएगा तो हम अपने कर्तव्य का पूरी तरह और प्रभावी ढंग से निर्वहन करेंगे ।’ अपने इसी कर्तव्य के तहत उन्होंने पाकिस्तानी आक्रमण का दिलेरी के साथ सामना किया और उसे खदेड़ दिया ।यह न केवल भारतीय सेना के लिए बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए गर्व की बात है ।
प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व ने दुनिया को यह बता दिया था कि किसी की कद काठी को देखकर उसको अपने से कमजोर आंकने की गलती नहीं करनी चाहिए ।5 अगस्त-23 सितम्बर,1965 के युद्ध ने पाकिस्तान को चारों खाने चित्त कर दिया था ।द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ी टैंक लड़ाई देखी गयी। यह युद्ध कश्मीर,पंजाब और राजस्थान में लड़ा गया।पंजाब की तरफ से स्थल सेना ने इछोगिल नहर के ‘आतंक’ को खत्म कर दिया था,कश्मीर में हाजी पीर को फतेह कर हिन्दुस्तानी फौज ने यह बता दिया था कि पाकिस्तानी गतिविधियों को देखने की इस खिड़की पर उसका अधिकार हो गया है। 26 से 28 अगस्त, 1965 को इस सैन्य युद्ध में भारत ने 8,652 फीट की हिस्सेदारी के साथ पाकिस्तान पर कब्जा कर लिया ।न सिर्फ हाजी पीर दर्रे बल्कि पूरे हाजी पीर ब्लज पर कब्जा कर लिया गया । इसी प्रकार राजस्थान में बाड़मेर के आगे गदरा रोड स्टेशन पर भारतीय सेना का कब्जा था,प्रमाण के तौर पर एक पाकिस्तानी टैंक बाड़मेर में प्रदर्शित था और कच्छ क्षेत्र जस का तस था ।भारत की इस मजबूत स्थिति से अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के नेता भौचक थे ।पाकिस्तान में जनरल अय्यूब खान की छीछालेदर हो रही थी ।अय्यूब खान के कमांडरों में मूसा खान, नूर खान, याह्या खान, अबरार हुसैन आदि थे । इन सबको उससे उबारने के लिए दोनों महाशक्तियों ने एक सोची समझी साजिश के तहत शास्त्री जी को रूस बुलवाया ।क्योंकि रूस के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध थे इसलिए शास्त्री जी मान गये ।शास्त्री जी से सोवियत संघ के प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ने उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में आमंत्रित किया था और वहीं राष्ट्रपति जनरल अय्यूब खान को भी बुलाया गया था ।दोनों देशों के बीच युद्धविराम तो हो चुका था लेकिन भारतीय सेना अभी तक जीते हुए क्षेत्रों में ही तैनात थी ।कोसिगिन की मध्यस्थता से जब समझौता वार्ता शुरू हुई तो शास्त्री जी की एक ही जिद्द थी कि बाकी शर्तें मंज़ूर हैं मगर जीती हुई ज़मीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज मंज़ूर नहीं । बताया जाता है कि इसको लेकर काफी जद्दोजहद चली,शास्त्री जी पर संयुक्तराष्ट्र समेत कई तरह का अंतरराष्ट्रीय दबाव डाला गया जिसके चलते भारत को जीती हुई ज़मीन पाकिस्तान को लौटाने पर सहमत होना पड़ा जिसे शास्त्री जी ने ‘सहअस्तित्व की भावना’ बताते हुए पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब खान के साथ युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़े । इस समझौते के कुछ ही घंटे बाद 11 जनवरी, 1966 की रात को हृदयघात से उनकी मृत्यु हो गयी । लेकिन उनकी मौत का रहस्य आज तक बना हुआ है ।
जब ताशकंद से लालबहादुर शास्त्री का शव भारत आया था तो उस समय मैं भी वहां मौजूद था ।उनकी पत्नी ललिता शास्त्री का विलाप हृदयस्पर्शी था । वहां पर मौजूद कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसकी आंखें नम न हुई हों ।कुछ लोगों के दिलो-दिमाग में यह सवाल उठ रहे थे कि ऐसे कैसा हो सकता है । शास्त्री जी बहुत ही संयमी और अनुशासित व्यक्ति थे ।कुछ लोग उनके चेहरे को भी बहुत गौर से देख रहे थे और कह रहे थे कि उनका चेहरा नीला पड़ गया है ।वहीं खड़े खड़े लोगों के दिलों में शास्त्री जी के निधन पर तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे ।जब ललिता जी शास्त्री जी के चेहरे को देखकर प्रलाप करती थीं तो वह शायद वहां मौजूद लोगों को यह कहना चाह रही हों कि ‘इनका चेहरा देखो’ । शास्त्री जी के शव के पास देश विदेश के तमाम बड़े नेता खड़े हुए थे जिसमें कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलज़ारीलाल नंदा और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य भी थे ।नंदा जी ने वहीं निर्णय लिया कि शास्त्री जी का अंतिम संस्कार नेहरू जी के शांति वन के निकट किया जायेगा । शास्त्री जी का समाधिस्थल विजय घाट के तौर पर प्रसिद्ध है ।
मेरी शास्त्री जी के बड़े बेटे हरिकृष्ण शास्त्री सेमुलाकात होती रहती थी ।एक बार जब मैं उनसे मिला तो वह शास्त्री जी की याद में निकाले जाने वाले स्मृति ग्रंथ में व्यस्त थे ।कुछ दिनों के बाद जब फिर मिला तो उन्होंने शास्त्री जी पर निकला स्मृति ग्रंथ ‘धरती का लाल’भेंट करते हुए बताया कि समाज के विभिन्न वर्गों का इसमें योगदान है ।क्या उनके निधन को लेकर भी किसी ने कुछ लिखा है तो वह चुप्पी साध गये और बोले इस संवेदनशील मुद्दे पर भला खुलकर कोई क्यों लिखेगा और बोलेगा।शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया गया तो इस पर रूसी और भारतीय डॉक्टरों ने इसे ‘कुदरती मौत’ करार दिया।लेकिन ललिता शास्त्री इस थ्योरी को नहीं मानती थीं ।जयप्रकाश भारती और मैं हम दोनों जब ललिता शास्त्री से मिले तो उनका कहना था कि यह उनकी नैसर्गिक मौत नहीं है ।उनका नीला चेहरा बता रहा था कि उन्हें ज़हर दिया गया है ।फिर रोते हुए बोली थीं कि मैंने उनसे मिन्नतें की थी कि मुझे साथ ले चलो, आपको वहां खाने-पीने में तकलीफ होगी ।लेकिन उन्होंने मेरी बात को हंसकर टाल दिया और बोले कि इसमें तीन देशों के बड़े नेता बड़ी गंभीर फैसले लेने वाले हैं ।यह बातचीत बहुत लंबी चल सकती है तुम वहां जाकर क्या करोगी?मैंने उत्तर दिया था,’आपका इंतज़ार ।मैं चाहती हूं कि आप मेरे हाथ का बना सादा खाना खायें ।वहां का खाना तो आपके मन मुताबिक नहीं होगा।लेकिन शास्त्री जी नहीं माने ।यदि मान गये होते तो मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूं कि वह भलेचंगे रहते और हमें ये दुर्दिन न देखने पड़ते ‘।इतना कहते ही वह पुन: सुबकने लगीं ।
शास्त्री जी देश की सैनिक और खाद्य स्थिति से पूरी तरह से परिचित थे ।1962 में अभी तीन बरस पहले ही तो भारत चीन युद्ध से निपटा है । उन ज़ख्मों को अभी वह सहला भी नहीं पाया था कि पाकिस्तान ने भारत पर अचानक हमला कर दिया ।शास्त्री जी ने बताया था कि पाकिस्तान हुकूमत का अपना फैसला नहीं था ।उसे किन्हीं तत्वों द्वारा संभवतः यह कहकर उकसाया गया था कि देखो हिंदुस्तान की सैन्य शक्ति ‘खस्ता हालत’ में है, उसके महान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हो चुका है और नये प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जैसे कमजोर दीखते हैं वैसे ही उनकी हुकूमत भी कमजोर होगी ।’ शास्त्री जी आगे बताते हैं कि उन जाहिलों को क्या पता था कि यहां के देशवासियों का जज़्बा कैसा है ।’
शास्त्री जी आमजन की नब्ज़ से कितने वाकिफ थे ।उनके एक आवाहन पर पूरे देश से लोग एकजुट होकर अपने घरों से बाहर निकल पड़े ।ट्रेनों से सीमा की तरफ जाने वाले सैनिकों के लिए लंगर लग गया,जवानों की कलाइयों पर राखियाँ बांधी गयीं ।मां बहनों ने अपने सोने के जेवर लाकर सरकार को सौंप दिये, जिससे जो भी बन पड़ा देश के नाम न्योछावर कर दिया । जंग के दौर में भारत की एकता और अखंडता देखते ही बनती है ।रातों को ब्लैकआउट का पालन पूरी शिद्दत के साथ हुआ यहां तक कि प्रधानमंत्री आवास भी ब्लैकआउट से अछूता नहीं रहा ।पूर्व निर्वाचन आयुक्त जीवीजी कृष्णामूर्ति (अब दिवंगत), जो मेरे पड़ोसी थे,बताया करते थे कि ‘1965 की जंग में मैं शास्त्री जी का पड़ोसी था ।वह 10, जनपथ में रहते थे तो मैं 8,जनपथ में ।मैं उन दिनों राष्ट्रपति भवन में काम करता था। इससे शास्त्री जी परिचित थे ।कभी वह मेरे यहां आ जाते तो कभी मैं उनके यहां चला जाता ।सीमा से मिलने वाली खबरों के बारे में वह कोई भी निर्णय रक्षामंत्री यशवंतराव चव्हाण से सलाह करके लिया करते थे ।बीच बीच में वह मुझसे भी सलाह कर लेते ।मतलब यह कि शास्त्री जी सभी लोगों को साथ में लेकर चला करते थे ।’ क्योंकि जीवीजी कृष्णामूर्ति मेरे पड़ोसी थे इसलिए उनसे कई मुद्दों पर जानकारियां मिल जाया करती थीं ।उनकी पुष्टि के लिए वह कोई न कोई पुस्तक भी मुझे दिखा देते ।
जब शास्त्री जी ने देश में ‘जय जवान,जय किसान’ का नारा दिया तो शुरू में मुझे इसकी सफलता पर संदेह था ।मेरे संदेह को भांपते हुए उन्होंने कहा था कि ‘हमारे जवान सीमा पर डटे दुश्मन के दांत खट्टे कर रहे हैं और इधर किसान पूरी मेहनत करके खाद्यान्न की आपूर्ति कर रहा है । ज़रूरत है इस समय उनकी पीठ थपथपाने की ।’शास्त्री जी ने कहा कि देश भर में खाद्यान्न की कमी है इसलिये मेरा आग्रह है कि लोग स्वेच्छा से एक समय का भोजन त्यागें ताकि बचा हुआ भोजन प्रभावित लोगों में वितरित किया जा सके ।देशवासियों से अपील करने से पहले उन्होंने अपने परिवार में इस प्रणाली को लागू किया ।शास्त्री जी की इस अपील पर प्रतिक्रिया बहुत बढ़िया रही ।यहां तक कि सोमवार की शाम को रेस्तरां और खाने-पीने की दुकानें भी बंद हो गयीं ।देश के कई हिस्सों में ‘शास्त्री व्रत’ मनाया गया । अब तो लोगों ने स्वतः हफ्ते में एक दिन खाना न खाने का प्रण ले लिया है । जीवीजी कृष्णामूर्ति शास्त्री जी की सोच और देशवासियों में अटूट विश्वास के प्रति उनके ज़ज्बे के वह कायल हो गए और उन्हें याद करते हुए भावुक हो जाया करते थे । जीवीजी के अनुसार न केवल ‘जय जवान जय किसान’ का नारा ही कामयाब रहा बल्कि लोगों ने हफ्ते में एक दिन के खाने को भी त्यगा ।यह था शास्त्री जी का आमजन से जुड़ाव ।
बेशक भारत को आज़ादी मिले करीब सत्रह बरस हो चुके थे लेकिन 1947 में पाकिस्तान के कबाइलियो का कश्मीर पर हमला, 1962 में चीन का आक्रमण और अब 1965 में पाकिस्तान की पुन: आंखें तिरेरने से भारत के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था ।अक्टूबर 1947 में तो भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कबाइलियो को खदेड़ दिया था लेकिन उसके हाथ जो ज़मीन लगी वह आज ‘अधिकृत कश्मीर’ है ।1962 में चीन ने भी खासे भूभाग पर कब्जा कर लिया था जिसे बातचीत के ज़रिये वापस प्राप्त कर लिया गया । लालबहादुर शास्त्री के सामने इन युद्धों के प्रभाव और दबाव के चलते आम लोगों की समस्याओं को भी सुलझाना था ।बेशक ज़रूरत की सभी चीजें उपलब्ध थीं लेकिन उनके वितरण की सुचारू व्यवस्था करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्कयता थी।सबसे पहले 1959 में दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में दूध की निर्विघ्न सप्लाई के लिए दिल्ली के शादीपुर के पास दिल्ली दुग्ध योजना (डीएमसी) बनायी गयी जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने किया था ।प्रधानमंत्री नेहरू की समाजवादी आर्थिक नीतियों का अनुसरण करते हुए लालबहादुर शास्त्री ने गुजरात के आनंद में अमूल दूध सहकारी संस्था का समर्थन करके और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड बनाकर श्वेत क्रांति-दूध का उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान को बढ़ावा दिया ।इसी प्रकार उन्होंने किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार के लिए देश के खद्य उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत की । भारत के कृषि वैज्ञानिक डॉ एम एस स्वामिनाथन को हरित क्रांति का वैश्विक नेता और जनक माना जाता है ।उन्होंने गेंहू और चावल की उच्च उपज देने वाली किस्मों को विकसित किया जिसके चलते खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हुई ।विशेष तौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के किसानों ने इसका खूब लाभ उठाया ।शास्त्री जी की सरकार ने राष्ट्रीय कृषि उत्पादन बोर्ड अधिनियम पारित कर भारतीय खाद्य निगम की स्थापना की ताकि किसान अपनी उपज यहां बेच कर सही कीमत प्राप्त हो सकें ।
घरेलू मोर्चे पर भी 1965 में लालबहादुर शास्त्री को मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन का सामना करना पड़ा।काफी वक़्त से केंद्रीय सरकार हिंदी को एकमात्र राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने की प्रयासरत थी ।लेकिन गैरहिंदी राज्यों विशेष तौर पर मद्रास (वर्तमान तमिलनाडु) ने इसका विरोध किया और इस फैसले के खिलाफ राज्य भर में आंदोलन शुरू हो गये ।हालात कहीं बेकाबू न हो जायें शास्त्री जी ने आन्दोलनकारियों को आश्वासन दिया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे,तब तक अंग्रेज़ी को आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहेगा ।शास्त्री जी के आश्वासन के बाद दंगे शांत हो गये और इसके साथ ही छात्र आंदोलन भी समाप्त हो गया ।निस्संदेह आज भी तमिलनाडु में हिंदी एक संवेदनशील मुद्दा है ।
2 अक्टूबर, 1904 में मुगलसराय में एक कायस्थ परिवार में जन्मे लाल बहादुर प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक लाला शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के पुत्र थे ।वह मुंशी जी के नाम से मशहूर थे,क्योंकि बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक की नौकरी जो कर ली थी ।परिवार में सबसे छोटा होने की वजह से वह उनके लिए ‘नन्हे’ थे ।पिता का साया सिर से जल्दी उठ जाने से लाल बहादुर की परवरिश ननिहाल में हुई जहां उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की लेकिन बाद की शिक्षा उन्होंने हरिश्चंद्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में प्राप्त की ।काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव सदा के लिए हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया । 1928 में मिर्ज़ापुर के गणेश प्रसाद की बेटी ललिता जी से उनकी शादी हुई ।उनकी छह संतानें हैं-चार बेटे और दो बेटियाँ ।उनके बड़े बेटे हरिकृष्ण शास्त्री (1938-1997) ही मेरे मित्र थे,जो अब इस दुनिया में नहीं हैं ।
लालबहादुर शास्त्री ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भारत सेवक संघ से की जिसके चलते उन्होंने अपना सारा जीवन सादगी में बिताया और गरीबों के सेवा कार्यों में जुटे रहे ।अब उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यों और आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की ।1921 का असहयोग आंदोलन,1930 का दांडी मार्च और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन प्रमुख हैं ।शास्त्री जी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में महात्मा गांधी, पुरुषोत्तमदास टंडन, जवाहरलाल नेहरू, जे बी कृपलानी और पंडित गोविंद वल्लभ पंत थे । शास्त्री जी के विचार स्वामी विवेकानंद,महात्मा गांधी और ऐनी बेसेंट जैसी प्रसिद्ध हस्तियों के कार्यों पर आधारित थे जिनका उन्होंने गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित सर्वेंट्स ऑफ़ द पीपल सोसाइटी (लोक सेवक मंडल) के अध्यक्ष के तौर पर भी काम किया ।उन्होंने गांधी जी और पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा बनारस में आयोजित कार्यक्रमों में खुलकर भाग लिया । धीरे-धीरे शास्त्री जी स्वाधीनता संग्राम के आंदोलनों में पूरी तरह से रम गये ।इलाहाबाद में रहते हुए नेहरू जी के साथ उनकी निकटता बढ़ी जो बढ़ती ही चली गयी ।
केंद्र सरकार में आने से पहले शास्त्री जी को उत्तरप्रदेश में संसदीय सचिव नियुक्त किया गया ।रफ़ी अहमद किदवई के केंद्र में मंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में वह पुलिस और परिवहन मंत्री बने ।परिवहन मंत्री रहते हुए शास्त्री जी ने महिला कंडक्टरों की नियुक्ति करने की पहल की थी। इसी प्रकार पुलिस मंत्री होने के नाते भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी की जगह पानी की बौछार की शुरुआत की ।1951 में वह नेहरू जी की अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव बनाये गये ।1952, 1957और 1962 के लोकसभा चुनावों में वह भारी बहुमत से विजयी हुए। लाल बहादुर शास्त्री 1957 और 1962 का लोकसभा चुनाव इलाहबाद से जीते थे ।तब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह ‘दो बैलों की जोड़ी’ हुआ करता था ।यह चुनाव चिन्ह 1952 से 1969 तक रहा ।उन दिनों दीवारों पर स्लोगन लिखकर वोट मांगे जाते थे ।
💐नृत्य: जीवन का उत्सव💐
( 29 अप्रैल अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस)
जीवन में संगीत एवं नृत्य की बड़ी विशेषता और बड़ा महत्व भी है। कोई समारोह हो, विवाह हो, मंगल कार्य हो, नृत्य सदैव किया ही जाता है। नृत्य में मानव के सभी रसों/भावों एवं भाव-भंगिमा को अभिव्यक्त करने के गुण निहित है। नृत्य अमूर्त है। नृत्य करने वाले और साथ ही नृत्य देखने वाले दोनों के मन में एक उमंग और जोश का निर्माण होता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नृत्य से एक तरह से शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है। भारत से लेकर विश्व के सभी राष्ट्रों में उनकी एक विशेष नृत्य शैली होती है। इतना ही नहीं हमारे भारतवर्ष में तो प्रत्येक राज्य और फिर उसके बाद प्रत्येक क्षेत्र के भी अपने विशेष नृत्य हैं। नृत्य तो हमारे भारतीय जीवन का एक अहम हिस्सा है। नृत्य जीवन में आनंद कि अनुभूति लेकर आता है। जब-जब मन अत्यंत प्रसन्न होता है, खुशियों से भरे त्योहार आते हैं , घर-परिवार में विवाह मंगल कार्य के आयोजन होते हैं, इन सभी अवसरों पर नृत्य किया जाता है।
विश्व में सभी राष्ट्रों में नृत्य की इस विशेषता और महत्ता को देखते हुए ‘यूनेस्को’ ने जन साधारण के बीच नृत्य के महत्व और उन्हें सहेजने के लिए 29 अप्रैल 1982 को ‘विश्व नृत्य दिवस’ के रूप में मनाना प्रारम्भ किया। इसे अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान (ITI) की नृत्य समिति द्वारा प्रस्तावित किया गया था। एक महान नृत्यागन ‘जीन जॉर्ज नोवरे’ की जयंती के रूप में भी इसे देखा जाता है। ‘जीन जॉर्ज’ आधुनिक बैले नृत्य के जनक माने गए है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ’लेटर्स ऑन द डांस’ में नृत्य कला की बहुत सारी बारीकियाँ सिखाई गई हैं। यह दिवस समस्त विश्व में बड़े जोश से मनाया जाता है। इसके अंतर्गत विश्व के समस्त नृत्य शैलियों को प्रोत्साहन देना, उनका विकास करना और उनके प्रति लोगों के बीच जागरूकता फैलाना यह उद्देश्य होता है। 29 अप्रैल वर्ष 2007 को इस नृत्य दिवस को विश्व के समस्त बच्चों के प्रति समर्पित किया गया था। इस विशेष दिन के आयोजन में प्रत्येक वर्ष किसी एक उत्कृष्ट नर्तक या नृत्य-निर्देशक का एक संदेश विश्व भर में प्रसारित किया जाता है। वर्ष 2019 का यह विशेष संदेश प्रेषित करने का सौभाग्य मिस्र राष्ट्र की प्रसिद्ध नर्तक एवं नृत्य निर्देशक ‘करीमा मंसूर’ को प्राप्त हुआ था।
भारतीय नृत्य में कथकली 17 वीं शताब्दी में केरल से उभर कर आया। कथकली में चेहरे और विशेषतः आँखों के हावभाव और थिरकन से नृत्य को प्रस्तुत किया जाता है।
ओडिसी नृत्य मुख्यतः ओड़ीशा राज्य का विशेष नृत्य है। इसमें भगवान जगन्नाथ के प्रति अपनी आराधना और समर्पण को दर्शाया जाता है। यह भी बहुत प्राचीन नृत्य शैली है। कथ्थक नृत्य की उत्पत्ति उत्तरप्रदेश की मनी जाती है। इसमें भी राधा-कृष्ण के नाट्य संगीत के साथ नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। किन्तु आज इसमें सभी विषय सम्मिलित हो गए है। मणिपुरी नृत्य जैसे की नाम से ही समझा जा सकता है की यह मणिपुर राज्य का पारंपरिक नृत्य है। यह भी शास्त्रीय नृत्य है। इसे जोगाई भी कहा जाता है। माँ पार्वती के कहने पर मणिपुर में भगवान शिव ने नृत्य किया था ऐसी मान्यता है।
मोहिनीअट्टम भी दक्षिण भारत की ही उत्पत्ति है। यह नृत्य भी विशेषता ईश्वर के प्रति अपनी आराधना प्रस्तुत करने की शैली है।
भारतनाट्यम यह भी तमिलनाडु राज्य से उत्पन्न हुआ है। यह नृत्य मुख्यतः मंदिरों में ही प्रस्तुत किया जाता था किन्तु आज कल यह सभी आयोजनों और समारोहों में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस पारंपरिक नृत्य में मानवीय गुणों का मुख्यतः प्रदर्शन किया जाता है। कुचिपुड़ी मुख्यतः इसे आंध्र प्रदेश का विशेष पारंपरिक नृत्य है। इसे भगवान मेला नट्कम भी कहा जाता है।
इसके अलावा असम का बीहू, पंजाब का भांगड़ा, गुजरात का गरबा, महाराष्ट्र का लावणी और तमाशा, आदि नृत्य बहुत मनमोहक और आकर्षित करने वाले होते है।
हमारे देश के महान नर्तक में गुरु केलुचरण महापात्रा(ओडिशी नृत्य), रुक्मिणी देवी अरुंडले(भरतनाट्यम), मल्लिका साराभाई(कुचीपुड़ी, भरतनाट्यम),सोनल मानसिंह (भरतनाट्यम, कुचीपुडी, छाऊ), पंडित बिरजू महाराज(कत्थक), यमिनी कृष्णमूर्ति (कुचीपुड़ी, भरतनाट्यम) यह सब सम्मिलित है। जिन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शास्त्रीय नृत्यों को स्थापित किया और इतना ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी जाकर उनकी शिक्षा भी दी हैं। गुल वर्धन भी एक ऐसा नाम है जिसने भारत में नृत्य शैली ‘बैले’ की शुरुआत की और जिसके द्वारा रामायण जैसे गाथाओं को ‘बैले’ के रूप में संगीत नृत्य के द्वारा प्रस्तुत किया।
किसी भी संस्कृति, मान्यताएँ, रीति-रिवाज परम्पराएँ इन सबको अभिव्यक्त करने की नृत्य एक सशक्त शैली है। सामूहिक-नृत्य में हाथ में हाथ डाल कर नर्तक एकता, सौहार्द और समानता को भी दर्शाते हैं। गोल वृत्त बनाकर नृत्य करने से नकारात्मकता भीतर प्रवेश नहीं करती, ऐसी भी मान्यताएँ हैं। नृत्य दिन भर की भाग-दौड़, चिंता और तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए भी एक बहुत अच्छा माध्यम है। आज भारत ही नहीं अपितु सभी राष्ट्रों में व्यायाम और शरीर की स्वस्थता को बनाए रखने के लिए नृत्य को एक व्यायाम की तरह प्रस्तुत किया जाता है। हमारे भारतवर्ष में भी 29 अप्रैल को ‘विश्व नृत्य दिवस’ का बहुत बड़ा समारोह होता है। जिसमें देश के सभी प्रसिद्ध और विख्यात नृत्यांगनाओं द्वारा नृत्य-प्रदर्शन किया जाता है एवं इसी दिन उनका सम्मान भी होता है।
भारत में प्राचीन समय में स्त्रियों का नृत्य करना वर्जित माना जाता था। इसलिए उस समय पुरुष ही स्त्री की वेषभूषा धारण कर स्त्री का नृत्य किया करते थे। नृत्य एक ऐसा माध्यम है जो समस्त विश्व को एक रूप में बांध कर रखता है, हालांकि नृत्य की कोई भाषा नहीं होती फिर भी नृत्य अपने भाव-भंगिमा, हावभाव एवं शारीरिक थिरकन से सब कुछ कह देने का सामर्थ्य रखता हैं। यह एक अद्भुत आनंद की स्थिति होती है जब नृत्य करने वाले भी और देखने वाले भी सब कुछ भूल कर नृत्य में मगन हो जाते हैं। जब शब्द काम न आए, संगीत थम जाएं, तब नृत्य ही जीवन में अभिव्यक्ति को साकार करता है। शरीर के सभी अंग नृत्य में जब सम्मिलित हो जाते हैं तो नर्तक सब कुछ भूल कर ईश्वर में लीन हो जाता है इसीलिए नृत्य को देव-आराधना कहा जाता है। अंतर राष्ट्रीय नृत्य दिवस पर आप सभी को शुभकामनाएं।
सुषमा गजापुरे
मुझे ताशकंद जाने के दो अवसर प्राप्त हुए,1977 और 1987 में ।दोनों ही बार उज्बेकिस्तान तत्कालीन सोवियत संघ का एक स्वायत्तशासी गणराज्य था ।1977 में लियोनिद ब्रेजनेव सत्ता में थे तो 1987 में मिखाइल गोर्बाचोव । निस्संदेह 1987 का काल ज्यादा खुला खुला महसूस हो रहा था ।यह स्थिति केवल ताशकंद की नहीं थी बल्कि मैंने मास्को और साइबेरिया के दो नगरों इर्कुत्स्क और नोवोसिबिर्स्क में भी महसूस की ।ताशकंद की अपनी दोनों ही यात्राओं में मैंने लालबहादुर शास्त्री से जुड़े स्थलों को भी देखा ।1977 में मेरे मार्गदर्शक थे मीर कासिमोव । हंसमुख और ज़िंदादिल इंसान ।न केवल वह पूरे उज्बेकिस्तान के इतिहास और भूगोल के ही जानकर थे बल्कि भारत के बारे में वृहत जानकारी भी रखते थे ।उन्होंने बताया कि यहां के लोग हिन्दुस्तानियों को तो प्यार करते ही हैं लेकिन लालबहादुर शास्त्री का वह बहुत सम्मान करते हैं ।कुछ लोगों को 10-11 जनवरी,1966 भी याद थी जब शास्त्री जी ताशकंद आये थे ।उनकी सादगी, विनम्रता और सौम्य स्वभाव कुछ लोगों को अभी भी याद था । सोवियत संघ के प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसीगिन की मध्यस्थता की भी तारीफ की जाती थी क्योंकि उनके प्रयासों से ही भारत और पाकिस्तान के नेताओं के बीच ताशकंद समझौता संभव हो सका था ।लेकिन कुछ गमगीन चेहरो और आंखों को भी मीर कासिमोव ने देखा था जब शास्त्री जी के निधन की खबर आयी ।
मीर कासिमोव ताशकंद समझौते और लालबहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व का यों बयान कर रहे थे जैसे वह उसके चश्मदीद गवाह रहे हों ।हो भी सकता है ।वह मुझे उन्होंने नहीं बताया परंतु इतनी जानकारी जरूर दी कि शास्त्री जी के सम्मान में यहां एक स्कूल है जहां हिंदी की विस्तृत शिक्षा दी जाती है ।उन्होंने हिंदी शास्त्री स्कूल में ही पढ़ी है ।मीर कासिमोव की कद काठी के अलावा उनका हिंदी का उच्चारण ऐसा है जो किसी हिंदी भाषी का भी क्या होगा । इस साफ उच्चारण के बारे में जब मैंने वजह जानी चाही तो मीर कसिमोव हंसकर बोले,हो सकता है हमारे पुरखों का खून हिन्दुस्तानी रहा हो ।तैमूर हिंदुस्तान को अपनी बढ़िया ‘सैरगाह’ मानते थे । स्कूल के बाहर शास्त्री जी की धड़ प्रतिमा (बस्ट) है ।
31 अगस्त, 1991 को उज्बेकिस्तान के पूर्ण स्वतंत्र हो जाने के बाद मीर कासिमोव को भारत में राजदूत बनाकर भेजा गया ।वह बहुत ही सफल राजदूत रहे ।उनके घर लेखकों,कवियों, शायरों की महफ़िलें जमा करती थीं ।अभी इसी बरस अप्रैल में ‘संडे मेल’ (अंग्रेज़ी) में मेरे सहयोगी रहे शरत शर्मा सपत्नीक उज्बेकिस्तान का दौरा करके आये हैं ।उन्होंने बताया कि शास्त्री जी की धड़ प्रतिमा तो वहां पर है (देखें चित्र) पर हिंदी स्कूल उन्हें कहीं दिखायी नहीं दिया ।उनका कहना था कि ताशकंद के लोग लालबहादुर शास्त्री के नाम से परिचित हैं । वहां एक शास्त्री स्ट्रीट है जहां लोग पैदल ही चल सकते हैं,वाहनों की अनुमति नहीं ।एक शास्त्री बस स्टैंड भी है। यह और गंगा आइसक्रीम पार्लर दोनों शास्त्री स्ट्रीट के चौराहे के पास हैं । गंगा आइसक्रीम पार्लर बहुत मशहूर है और युवाओं में लोकप्रिय है ।इन सभी चीज़ों को देखकर लगता है कि ताशकंद के लोग लालबहादुर शास्त्री और भारत का कितना सम्मान करते हैं । शरत शर्मा ने बताया कि आपके हिन्दुस्तानी होने की जानकारी मात्र पाकर ताशकंद के लोग इतना खुश हो जाते हैं मानो उन्हें अपना कोई बिछुड़ा हुआ सगा संबंधी मिल गया हो । शास्त्री जी की मधुर स्मृति को नमन ।













