1963 की बात है ।एक दिन लखनऊ से ‘ज्ञान भारती’ के संपादक लल्लन प्रसाद व्यास का फोन आया कि मॉरिशस से स्वामी कृष्णानंद स्वामी आये हुए हैं और वह पूसा रोड स्थित गिरधारी लाल सर्राफ के यहां ठहरे हुए हैं,आप और जयप्रकाश भारती उनसे आज शाम को मिल लें । वह 17 बरस बाद भारत लौटे हैं ।मैंने आप दोनों के बारे में उन्हें बता दिया है ।वह आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।’ उन दिनों मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता था और जयप्रकाश भारती ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में ।मुझे लिखने का कीड़ा लग चुका था करीब दस बरस बाद लिहाजा मैं ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के लिए निरंतर लिखता था तथा ‘ज्ञान भारती’ के लिए कुछ विशिष्ट लोगों के इंटरव्यू करता था । इस तथ्य से व्यास जी ने स्वामी जी को परिचित करा दिया था ।
लल्लन प्रसाद व्यास का फोन आने के बाद मैंने जय प्रकाश भारती को भी सूचित कर दिया । व्यास जी के बताये समय और पते के अनुसार हम लोगों ने जब घंटी बजाई तो दरवाजा खोलने वाले भगवाधारी संत को देखकर हम एकटक देखते ही रह गये ।क्या आकर्षक व्यक्तित्व था,लंबे चौड़े,चेहर पर तेज और होंठों पर हल्की हल्की मुस्कान ।आओ पधारो युगल जोड़ी ।तुम लोगों को अपना अपना परिचय देने की आवश्यकता नहीं,व्यास जी ने दे दिया है ।भारती जी सक्रिय पत्रकार हैं और दीप जी पत्रकारिता की ओर उन्मुख सरकारी कर्मचारी जो भारत सरकार को रोज़ देखते हैं ।फिर मेरी तरफ मुंह करके बोले,क्यों मैंने ठीक कहा न ।अब भला मैं इसका क्या उत्तर देता ।इस पर भारती जी बोले,महाराज हम तो आपके बारे में जानना चाहते हैं ।स्वामी जी ने पहले हमारा परिचय अपनी दो गोरी शिष्याओं से कराया जो उनके साथ काम करती थीं ।उन्होंने कहा कि मैं कोई यंत्र मंत्र तंत्र देने वाला संत नहीं हूं,मेरे कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकार हैं जिनकी मैं प्रतिपूर्ति करता हूं और मेरा ध्यय है मानव सेवा ।इसे मैं यूँ परिभाषित करता हूं ‘मानव सेवा ही प्रभु सेवा है ‘ जिस की ज़रूरत विश्व भर के लोगों को है विशेष तौर पर समाज के निम्न वर्ग को ।ऐसा वर्ग आपको पूरी दुनिया में मिल जायेगा ।ऐसे लोगों की सहायता के लिए मैं शिविर लगाता हूं ।इनमें मुख्यतः चिकित्सा शिविर हैं ।दूसरे भारतवंशी विश्व के तमाम देशों में फैले हुए हैं,कुछ वहां अंग्रेज़ों द्वारा ले जाये गये हैं तो कुछ स्वयं गये हैं कमाने की गर्ज़ से ।यह तबका अपनी जड़ों से कटता जा रहा है ।ऐसे वर्ग को अपनी संस्कृति से परिचित कराने की आवश्कयता है,उनके लिए मैं भारत से धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथ मंगा कर देता हूं और हर शाम उन्हें भारतीय संस्कृति से परिचित कराने के लिए संबोधित भी करता हूं ।बहुत से सामाजिक सरोकारों से जुड़े दानियों ने हमें लाखों की संख्या में गीता और रामायण की प्रतियां भेजी हैं ।आजकल मेरा कार्यक्षेत्र अफ्रीकी देश हैं लेकिन मैं मानता हूं कि यूरोपीय देशों और अमेरिका को भी ऐसे शिविरों की ज़रूरत है ।मैंने स्वयं इन देशों में जाकर स्थिति का अध्ययन किया है ।इसलिए मेरे साथ ये शिष्याएं मेरे सेवा कार्यों को अपने अपने देशों में कर रही हैं ।अब भारत में भी ऐसे शिविरों की ज़रूरत है और इसी काम के लिए मैं यहां आया हूं ।
स्वामी जी का कार्यक्षेत्र बेशक बहुत ही व्यापक है ।उन्होंने भारत में पहले गुजरात के बडौदा से शुरुआत की और बाद में राजस्थान से ।स्वामीजी के लहजे में राजस्थानी पुट ज़्यादा है ।उन्होंने इस प्रश्न का सीधा उत्तर न देकर व्यापक अर्थों से जोड़ते हुए कहा कि साधु संत सारे देश और विश्व के होते हैं किसी एक स्थान से बंधे हुए नहीं होते ।कुछ विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि 20 अगस्त,1900 में स्वामीजी का जन्म बीकानेर ज़िले के दसौडी गांव में हुआ था ।वह बहुत बड़े जमींदार परिवार से संबंध रखते थे,बहुत शिक्षित थे,अंग्रेज़ी,हिंदी,संस्कृत,उर्दू पढ़े-लिखे थे,बीकानेर के महाराजा उनके मित्रों में थे और वह बड़े पद पर नौकरी करते थे ।फिर ऐसी क्या बात हुई कि अपने दो बच्चों को छोड़ कर स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ने सन्यास ले लिया ऐसे कई मुद्दों पर उनसे 1992 में दिल्ली में मेरी उनसे बातचीत हुई जो हमारी अंतिम मुलाकात सिद्ध हुई ।पहली भेंट के बाद मैं हर साल उनसे दिल्ली आने पर मिला करता था ।अब हम बहुत खुल गये थे जिसका प्रमाण मेरी यह अंतिम भेंट है ।
1992 के शुरू के किसी महीने में दिल्ली के जोरबाग़ स्थित डालमिया गेस्ट हाउस में स्वामी कृष्णानंद सरस्वती से शाम को मिला ।उद्देश्य था ‘संडे मेल’ के लिए इंटरव्यू लेना ।फोटोग्राफर परमेश्वरी दयाल मेरे साथ थे ।हमेशा की तरह हंसते हुए स्वामी जी ने कहा ‘आओ त्रिलोक मेरे पास बैठो ।’ फोटोग्राफर अपना काम कर रहे थे। इंटरव्यू के लिए जब मैंने टेपरिकार्डर निकाला तो स्वामी जी बोले ‘पहले फोटोग्राफर को अपना काम खत्म कर लेने दो।’ फोटोग्राफर के काम खत्म करने के बाद स्वामी जी ने कहा कि कुछ बातें तो तुम रिकॉर्ड कर लो और उसके बाद तुम टेपरिकार्डर बंद कर देना और हम लोग सामान्य बातचीत करेंगे । मेरी कुछ बातें ध्यान से सुनना जो तुम्हारी जानकारी के लिए हैं ।उचित समय पर ही इन्हें लिखना ।यह मैं तुम्हारे विवेक पर छोड़ता हूं ।
हां,अब शुरू करो।स्वामीजी ने कहा कि तुम मुझे लगभग तीन दशकों से जानते हो,तुम से न कुछ छुपा है और न ही कुछ भूला है फिर भी पूछो क्या पूछना चाहते हो । मैंने अपनी बात शुरू करते हुए पूछा,आप सर शिवसागर रामगुलाम के निवेदन पर 1967 में मॉरिशस आ गये थे । यहां आये आपको पच्चीस बरस हो गये हैं यानी रजत जयंती पूरी कर ली है ।इन पच्चीस बरसों में मॉरिशस कहां से कहां पहुंचा है और इसमें आपका कैसा और कितना योगदान है? अपनी आदत के मुताबिक पहले तो स्वामीजी हंसे फिर गंभीर होकर बोले, ‘मुझे इस पचड़े में क्यों डाल रहे हो ।मेरा महज़ इतना भर योगदान रहा कि पहले रामगुलाम और बाद में अनिरुद्ध जगन्नाथ द्वारा कुछ सलाह मांगने पर मैं उन्हें अपने मन की बात बता देता था यह कहकर कि अंतिम फैसला आपको लेना है ।पिछले पच्चीस सालों में मॉरिशस ने बहुत उन्नति और प्रगति की है जिसका श्रेय वहां के राजनीतिक नेतृत्व के साथ साथ वहां की आम जनता को जाता है ।वहां के लोग बहुत समझदार हैं ।’
जहां तक मैं जानता हूं आपने सर शिवसागर रामगुलाम की बहुत सहायता की थी, देश की स्वाधीनता के दौरान और बाद में भारतीय नेताओं से भेंट कराने में भी।अपनी प्रकृति के अनुकूल वह हंस भर दिये। लेकिन अपना अधिकारपूर्ण हक़ जताते हुए मैंने उन्हें बताया कि समय समय पर आप और सर शिवसागर रामगुलाम मॉरिशस में आपकी महती भूमिका की मुझसे चर्चा करते रहे हैं लेकिन अब मैं आपके मुंह से सुनना चाहता हूं ।बहुत ज़िद्दी हो, कहते हुए मेरी पीठ पर प्यार से हल्का सा थप्पड़ मार दिया और बोले,’दरअसल जब वह मुझे नैरोबी में मिले थे वह खासे घबराये हुए थे ।उन्हें दो तरह का डर था: एक, भारतवंशियों का क्रियोल की तरफ बढ़ता हुआ झुकाव और दूसरे स्वाधीनता की राह में उनकी अड़ंगेबाज़ी ।उन्हें शायद यह भरोसा था कि मेरे मॉरिशस आ जाने पर उनकी ये दोनों समस्याएं हल हो जायेंगी । काफी कुछ सोचने के बाद मैंने उन्हें अश्वासन दिया कि अगर मेरे वहां होने से उनका मसला हल हो सकता है तो मैं इसके लिए तैयार हूं ।इस तरह 25 साल पहले मैं मॉरिशस गया तो वहीं का होकर
रह गया ।
आप ने सर रामसागर रामगुलाम के विश्वास को कैसे यकीन में बदला ।स्वामीजी ने बहुत ही सहज ढंग से बताया था कि मुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ा था ।मेरे मॉरिशस पहुंचने की खबर वहां की टीवी और रेडियो पर लोग देख सुन चुके थे ।इसलिए उनके लिए भी मैं अजनबी या बेगाना नहीं रह गया था ।वहां पहुंच कर सबसे पहले मैंने पूरे देश का भ्रमण किया ।आम लोगों से मिला और पूछा कि यहां कितने हिंदू हैं, कितने लोग हिंदी लिख-पढ़-बोल सकते हैं ।अपने त्योहारों के बारे में उन्हें कितनी जानकारी है, अपने घरों में वे किस भाषा में बातचीत करते हैं, क्या हफ्ते में एक बार गांव और शहर के लोग मिलकर अपनी समस्याओं पर चर्चा करते हैं, कौन-सा धार्मिक ग्रंथ पढ़ते हैं आदि ।मुझे लगा कि इन भारतवंशियों को एक सूत्र में पिरोने की आवश्यकता है ।मैंने चालीस नौजवानों की एक टीम तैयार की ।उन्हें दो-तीन दिनों की गहन ट्रेनिंग दी और भारतीय धर्म,संस्कृति,सामाजिक आचार व्यहार के बारे में अच्छी तरह समझा कर पूरे देश में छितरा दिया ।ये एक तो युवा,दूसरे पढ़े लिखे और दूरदर्शी ।आम लोगों को बुनियादी चीज़ें समझाने में उन्हें दिक्कत पेश नहीं आयी ।उनके साथ मिलबैठ कर मैंने प्रवचन किए, उन्हें भारतीय तीज त्योहारों का महत्व समझाया,शिवरात्रि पर वहां एक मेला भरता है, वहां जाकर उनके बीच में रहा ।उनकी शंकाओं-जिज्ञासाओं का निराकरण किया,उन्हें हिंदी देवनागरी लिपि में पढ़ने को प्रेरित किया,भारत से रामायण की प्रतियां मंगाकर बांटी और उनको और दीक्षित करने के लिए धार्मिक शिविर आयोजित किए और इसप्रकार सभी भारतवंशी एकजुट हो गये ।मुझे स्वामी जी के जिन शिष्यों के नाम याद आ रहे हैं वे हैं:धनदेव बहादुर, सूर्यदेव,बिशेसर, राज नारायण गती, प्रेमचंद बुझावन उर्फ मुंशी,जगदीश गोवर्धन आदि ।
12 मार्च,1968 को ब्रिटेन ने मॉरिशस को स्वाधीनता प्रदान करनी थी । यहां के ही कुछ ब्रितानी भक्त आज़ादी के पक्ष में नहीं थे ।रामगुलाम को अंदेशा था कि सत्ता के हस्तांतरण में ये तत्व बाधक हो सकते हैं ।इन्हें संभालने की ज़िम्मेदारी भी स्वामी जी को सौंपी गयी ।इस पर स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ने सर शिवसागर रामगुलाम से चुटकी लेते हुए कहा था कि स्वाधीनता के बाद देश को कैसे संभालोगे तो बताते हैं कि इस पर रामगुलाम ने भी तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया था ‘आप जो हैं’ स्वामीजी ही ने सहज होकर बताया था ‘न जाने रामगुलाम को मुझ पर इतना क्यों भरोसा था ।सत्ता हस्तांतरण में किसी तरह की बाधा न पड़े यह काम भी मैंने अपने चालीस कार्यकर्ताओं के ज़िम्मे लगाया ।उनके साथ गांवों के बहुत से लोग इस पवन समारोह को देखने के उपस्थित थे ।लगता था कि हंगामाखेज़ों को हमारी सुरक्षा व्यवस्था का भान हो गया था । सत्ता हस्तांतरण के बाद सर शिवसागर रामगुलाम ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नवस्वाधीन मॉरिशस के प्रधानमंत्री पद की शपथग्रहण की ।मैं वहां से खिसक गया लेकिन वह मुझे फिर से अपनी कार में बिठाकर अपने साथ ले गया।
देश स्वाधीन हो गया लेकिन अब कई तरह के खतरे थे ।छोटा देश है ।बड़ी शक्तियों की उस पर गिद्द नज़र थी ।मैंने रामगुलाम को भारत के नेताओं से मिलकर उससे करीबी बढ़ाने की सलाह दी ।इसमें भी उन्हें मेरी सहायता चाहिए थी ।क्योंकि मैंने गांधी जी के साथ काम किया था उस समय के छोटे छोटे नेता और कार्यकर्ता अब प्रभावशाली स्थिति में थे ।जब मैंने उनसे मॉरिशस की मदद करने के लिए कहा तो उनका परामर्श था कि यह काम सरकार के स्तर पर होना चाहिए ।मैंने मॉरिशस के कुछ मंत्रियों की मुलाकात भारत सरकार के मंत्रियों से करा दी ।दोनों ओर से समझौते हो गये ।तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मॉरिशस की यात्रा की जो बहुत सफल रही ।अब दोनों देशों के बीच मधुर संबंध हैं ।मैं अपना सेवा काम करता हूं ।सर्दियों के मौसम में भारत आ जाता हूं और यहां भी सामाजिक सेवा कार्यों में जुट जाता हूं ।
अब स्वामी कृष्णानंद सरस्वती से रहा नहीं गया ।बोले ये सब बातें तो हम कई बार टुकड़ों में कर भी चुके हैं ।इन्हें दोहराने का क्या औचित्य है । मैंने भी बड़ी मासूमियत से उत्तर दिया ‘यह तो मुझे भी मालूम नहीं ।यह आपकी ही कोई लीला लगती है जो दैवी शक्ति के रूप में मुझ से कुछ बुलवा रही होगी । यह साल मॉरिशस में आपके आगमन का 25वां वर्ष है,मुमकिन है हम उसी संदर्भ में कुछ बात कर रहे हों ।सुना है मॉरिशस में आपके आगमन की रजत जयंती बड़े उत्सव के तौर पर मनाए जाने की योजनायें बन रही हैं ‘।मैंने सोचा था मेरी इस सूचना से स्वामी जी पुलकित होंगे लेकिन वह चुप रहे ।थोड़ी देर बाद बोले, ‘इसमें ज़्यादा खुश होने की क्या बात है ।मेरे लिए सभी दिन और वर्ष समान हैं ।यह रजत जयंती वर्ष क्या होता है ।’फिर प्रसंग बदल कर बोले,देखो त्रिलोक मेरे हाथ कुछ ज़्यादा कांपने शुरू नहीं हो गये हैं ।मैने स्वामी जी के दोनों हाथों को अपने सिर पर लगा कर उनका आशीर्वाद लेते हुए कहा,’नहीं मुझे तो नहीं लगता ।1990 में जब हमारे चित्र पर आपने हस्ताक्षर किए थे तब भी ऐसे ही थे कमोबेश ।बीकानेर के महंत रामदयाल जी ने आपके हाथों के कंपन का इलाज भी तो किया था ।माहौल को हल्का बनाने के लिए तब मैंने पंडित गोविंद वल्लभ पंत का उदाहरण देते हुए कहा था कि उनका सिर कितना हिलता था लेकिन दिमाग अपने ठिकाने पर ही था।यही हाल आपके हाथों का है जिनका आपके दिमाग और वहां व्याप्त दैवी शक्ति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है । फिर झुंझला कर बोले,’यह दैवी शक्ति क्या लगा रखी है ।’
स्वामी जी की इस झुंझलाहट से मैं परिचित था ।मैं यह भी जानता था कि वह तंत्र-मंत्र-यंत्र वाले स्वामी नहीं,बहुत उच्च कोटि के विद्वान हैं,बहुभाषी हैं,सभी धर्मों के ग्रंथ उन्होंने पढ़ रखे हैं,उस समय विश्व का शायद ही कोई ऐसा राजनेता होगा जो उनके नाम से परिचित न हो और किसी न किसी अवसर पर उनसे भेंट न की हो ।वह राजनीति पर कम बात करते थे लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि वह अपडेट नहीं रहा करते थे ।अधिकांश समय वह आध्यात्मिक, धार्मिक और सामाजिक विषयों पर ही बातचीत करते थे ।आर्थिक विषयों की भी वह जानकारी रखते थे,ऐसा कई अर्थशास्त्रियों ने मुझे बताया था ।बेशक वह ‘पहुंचे’ हुए संत थे ।उन्होंने भैरव घाटी की गुफा में कठोर तपस्या कर यह शक्ति प्राप्त की थी जिसका स्वयं उन्होंने कभी प्रदर्शन नहीं किया ।मेरी जानकारी में कुछ ऐसे मामले आये हैं जिनका अध्ययन करने से पता चलता है कि स्वामी जी में लोगों के मन की सोच और समस्या का पूर्वाभ्यास होता था ।उनकी एक शिष्या हैं श्रीमती कृष्णा पाहवा ।वह बैंकॉक में रहती हैं ।सन्यास लेने के बाद स्वामीजी नेपाल से होते हुए दक्षिणपूर्व एशिया के दौरे पर थे ।बैंकॉक में कुछ दिन वह उनके घर रुके ।एक दिन सुबह क्या देखते हैं कि कृष्णा पाहवा बहुत उदास हैं ।स्वामी जी इसका कारण समझ गये और बोले रात को पाहवा साहब से झगड़ा हुआ है क्या ।जब उन्होंने हां में सिर हिलाया तो स्वामी जी हंस कर बोले,’बस कोई बात नहीं,अभी ठीक हो जायेगा ।’कृष्णा पाहवा पूरे विश्वास से कहती हैं कि स्वामी जी को दैवी और दिव्य शक्तियां प्राप्त थीं ।उनके एक और शिष्य हैं रमेश कुमार पुजारी जो सालासर में रहते हैं और हनुमान सेवा समिति के पूर्व अध्यक्ष हैं ।वह बताते हैं कि जिन दिनों स्वामीजी शेखावाटी में शिविर लगाते थे मैं सदा उनके साथ रहता था ।वह मुझे अपना ‘हनुमान’ कहा करते थे ।वह पूरे दावे के साथ कहते हैं कि उनमें दैवी और दिव्य शक्तियां थीं जो मैंने कई अवसरों पर महसूस कीं ।सालासर बालाजी महाराज के दर्शन करने वाले कुछ साधु संतों का मानना है कि रात को उन्होंने स्वामीजी को यहां विचरण करते हुए देखा है ।बीकानेर में बड़े रामद्वारे के महंत और वैद्य रामदयाल बताते हैं कि यहां आने पर स्वामी जी हमारे यहां ही रहते थे ।उनके लिए दो कमरे हमेशा तैयार रहते थे (आज भी ज्यों के त्यों मौजूद हैं) -एक शयन कक्ष और दूसरा भेंटकर्ताओं के लिये ।महंत जी ने बताया कि सुबह एक घंटा वह अपने कमरे में बंद रहते ।वहां किसी को जाने की अनुमति नहीं थी ।उनके अनुसार वह सम्भवत: समाधि में लीन रहते थे ।घंटे भर बाद जब कमरे का दरवाजा खुलता तो उनका चेहरा दीप्तिमान होता था ।उनके मुख पर दिव्य आभा, अद्भुत कांति और तेज का भाव होता जिसे देखते ही आंखें चुन्दिया जायें ।थोड़ी देर बाद वह अपनी सामान्य स्थिति में लौट आते थे ।
दैवी शक्ति प्रसंग पर बोले तुम और जयप्रकाश भारती इतने सालों से मेरे पास आ रहे हो तुम लोगों को न मैं मॉरिशस भेज सका हूं और न ही और कोई भला कर सका हूं ।मेरी ओर मुखातिब होकर एक बार बोले थे, मॉरिशस के पहले उच्चायुक्त रवींद्र घरभरण तो तुम्हारे अच्छे दोस्तों में थे वह भी तुम्हें अपने देश का न्योता नहीं दे पाये थे जबकि पश्चिमी देशों के तुम कई चक्कर लगा आये हो ।मैंने हंस कर उत्तर दिया यही तो आपकी लीला है ।जब मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता था तब मेरी और भारती जी की आप से पहली मुलाकात हुई थी ।भारती जी ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में थे । आज जब मैं आपसे मिल रहा हूं ‘संडे मेल’ में अच्छे पद पर हूं ।क्लर्क से पत्रकार किसने बनाया।भारती जी को ‘नंदन’ बाल पत्रिका की संपादकी कैसे मिल गयी। यह सब कुछ आपके आशीर्वाद का ही फल था ।आज इस समय हम कई नयी पुरानी घटनाएं जिस तरह से दोहरा रहे हैं इसके पीछे भी आपका ही का कोई करिश्मा लगता है ।हंसकर बोले,’अब तुम चलो कोई मिलने के लिए आने वाला है ।कल सुबह नाश्ता मेरे साथ करना, कुछ और दिल की बातें करनी हैं तुम से ।’
अगले दिन सुबह करीब साढ़े नौ बजे जोरबाग़ स्थित डालमिया गेस्ट हाउस पहुंच गया ।स्वामी जी के साथ डाइनिंग टेबल पर हम लोग बैठ गये।मेरे लिए उन्होंने पराठा बनवाया था और खुद फल लिये ।अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने स्वामी जी से पूछा कि क्या मॉरिशस की सरकार को अब आपकी सेवाओं की आवश्यकता महसूस नहीं होती ? जवाब में स्वामी जी ने बताया कि गत 25 बरसों में वहां कई सरकारें आयीं और गयीं और सभी ने अपनी अपनी तरह से देश को आगे ले जाने में योगदान दिया है ।कभी कभी कोई किन्हीं मुद्दों पर लोग मेरा परामर्श लेने आ जाते हैं । मेरे लिए हर पार्टी और हर फिरके के लोग बराबर हैं ।आज के हालात को देखते हुए जो कुछ मेरी समझ में आता है मैं अपनी राय दे देता हूं ।और हां मैं किसी राजनीतिक पचड़े में नहीं पड़ता।मैं अपने आपको मानव सेवा तक ही सीमित रखता हूं और आम जन के स्वास्थ्य के हित के लिए शिविर आयोजित करता रहता हूं ।
ये शिविर लगाने आपने कब से शुरू किये और इनका विचार आपके ज़ेहन में कहां से आया । यह सवाल सुनकर स्वामी जी कहीं खो गये ।फिर कुछ संभलते हुए बोले, ‘वास्तव में मेरा सन्यास लेने का उद्देश्य ही मानव सेवा था ।इसीलिए कुछ तप किये,समाधि ली ताकि मोह माया से मुक्त हो सकूं ।सबसे पहला काम मैंने अपने पास जमा धन को ऋषिकेश के अस्पताल और मानव सेवा से जुड़ी संस्थाओं में वितरित कर अपने को इस मोह से मुक्त कर लिया।अब मेरे जेब खाली थे ।घर परिवार मैं पहले ही छोड़ आया था ।गांधी जी से जब देशसेवा के बारे में चर्चा की तो उन्होंने मुझे भगवा वस्त्र त्यागने की सलाह दी जिसे मैंने मानने में अपनी असमर्थता जताई ।फिर कुछ राष्ट्रभाषा प्रचार के लिए काम किया और देश के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों के पुनर्वास में अपना योगदान दिया ।बावजूद इसके मेरी संतुष्टि नहीं हुई ।मुझे लगा मेरा मिशन अधूरा है ।प्रभु ने मुझे कुछ व्यापक कार्यों के लिए चुना है ।मैंने अपने आपसे ही सवाल किया कि क्या मैंने इन कार्यों के लिए सन्यास लिया है !
अब मैने गंभीरता से आत्ममंधन और आत्मचिंतन शुरू किया ।सोचते सोचते मेरे दिमाग में सिख गुरुओं,उनकी वाणी, उनके उपदेश और मानव सेवा के प्रति उनके सेवाकार्य आंखों के सामने कौंध गये ।क्योंकि मैंने सिख इतिहास और गुरु ग्रंथ साहब का अध्ययन कर रखा था इसलिए मुझे अपना रास्ता तलाशने और तय करने में दिक्कत पेश नहीं आयी।गुरु नानक देव ने समाज से अन्धविश्वास मिटाने, भाईचारे की भावना बढ़ाने, मेहनतकश इंसान को सराहने और ऊंच-नीच-वंचित के बीच भेदभाव मिटाने हेतु सबके साथ मिलबैठकर खाने की प्रथा की शुरुआत की थी जिसे ‘लंगर’ का नाम दिया गया है। ‘लंगर’ छकने की इस भावना से मैंने ‘शिविर ‘आयोजन की परिकल्पना ग्रहण की।लंगर निर्माण और परोसने से लेकर सभी विधियों का अध्ययन किया ।लंगर की व्यवस्था करने के लिए ‘संगत’ का बहुत बड़ा योगदान रहता है ।कुछ दानी प्रवृति के लोग एकमुश्त बहुत सेवा कर जाते हैं ।इसे आधार बनाकर मैंने शिविर आयोजित करने का निर्णय किया ।पहले मैंने काठमांडू, नेपाल में नेत्र शिविर से शुरुआत की ।शुरू शूरू में लोग झिझके लेकिन जब उन्हें परिणाम तसल्लीबख्श लगे तो मेरे नाम के आगे जुड़ गया ‘आंखें देने वाला बाबा’। मेरा पहला प्रयास सफल रहा और मैंने बाबा नानक का हाथ जोड़ कर स्मरण किया । अब मैं आश्वस्त हो गया ।
स्वामीजी आप जब 1963-64 में हमारे घर पधारे थे तो आपके साथ गोरी शिष्याएं थीं -एक इंग्लिश और दूसरी अमेरिकन ।यह मैं इस लिए जानता हूं कि फरवरी, 1964 में बड़ौदा से कृष्णा (आपका दिया हुआ नाम)का एक पत्र आया जिसमें उन्होंने लिखा था कि मुझे अमेरिका लौटना है, क्योंकि स्वामीजी ने वहां पिछ्ले वर्ष ही सेवा का काम शुरू किया था।स्वामी जी मुस्कराये और बोले ‘तुमने उसका अभी तक पत्र संभाल कर रखा है,अच्छी बात है ।’फिर खुद ही बताया कि एक बार कांगो में फंसे कुछ अमेरिकी बंधकों को वहां के सैनिकों के चंगुल से जब मुक्त कराया था तो तत्कालीन राष्ट्रपति आइजनावर के निमंत्रण पर मैं अमेरिका गया था ।उस समय उन्होंने भी अमेरिका में सेवा शिविर लगाने की इच्छा जताई थी ।उनके बाद जॉन केनेडी ने भी हमें अपना काम करते रहने की छूट दी थी ।यह सारा काम कृष्णा के ज़िम्मे है ।दूसरी इंग्लिश है जो लंदन और उसके आसपास का काम देखती है ।
यह पूछे जाने पर कि अफ्रीकी देशों की तरफ कैसे जाना हुआ तो बोले आज तुम्हें हो क्या गया है,तुम सब कुछ जानते हो,फिर से क्यों मुझसे सुनना चाहते हो ।मैंने कहा ‘कभी कभी घटनाओं को दोहराते रहना अच्छा लगता है ।उनसे एक अजब तरह की ताज़गी मिलती है ।हमेशा की तरह लंदन में गरीबों के लिए एक चिकित्सा शिविर चल रहा था कि अचानक किसी भारतवंशी के मुंह से निकल गया, ‘स्वामी जी इन पश्चिमी देशों में लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था है , दरअसल आपकी सेवाओं की जरूरत अफ्रीकी देशों को ज़्यादा है जहां इस तरह की सुविधाएं नहीं हैं । उसकी बात में दम था । लंदन और उसके आसपास का सारा काम अपनी शिष्या के ज़िम्मे छोड़ मैं नैरोबी पहुंच गया ।वहां कुछ दिन काम करने के बाद फिर करीब सभी अफ्रीकी देशों में चिकित्सा शिविर लगाये और कांगो वाला हादसा ऐसे ही एक शिविर के आसपास हुआ तथा मेरा यह भगवा पहनावा मेरे बहुत काम आया । तुम्हें यह और एक बात बताना चाहता हूं कि सभी अफ्रीकी देशों के नेताओं जैसे उन देशों के प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों तथा अन्य बड़े राजनेताओं और नौकरशाहों के अतिरिक्त संपन्न भारतवंशियों ने भी शिविरों के आयोजन में मेरी भरपूर सहायता की। ऐसे ही एक शिविर में मॉरिशस में लेबर पार्टी के तत्कालीन नेता सर शिवसागर रामगुलाम मिलने के लिए आये थे जिन्होंने हाथ जोड़ कर निवेदन किया कि स्वामीजी इस समय मॉरिशस में आपकी सबसे अधिक आवश्कता है ।हमारे साथ चल कर हिन्दुओं को क्रियोल बनने से बचा लीजिए, हमारी संस्कृति, संस्कार और परंपराएं दांव पर हैं ,आप बचा लीजिए नहीं तो अगले बरस मॉरिशस की स्वाधीनता के साथ साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों से भी हम ‘स्वाधीन’ हो जायेंगे ।समस्या बहुत विकट थी ।मुझे भारत के कुछ बड़े नेता अफ्रीका में ‘भारत का सांस्कृतिक राजदूत’ भी कहते थे ।इस नाते भी मैंने शिवसागर रामगुलाम के अनुरोध को बहुत गंभीरता से लिया जो मुझे 1967 में मॉरिशस ले गया ।अब तो मैं वहीं का होकर रह गया हूं ।वहां हिंदू बहुसंख्या में हैं, अपने धार्मिक ग्रंथों को पढ़ते हैं,पूजा पाठ करते हैं,कीर्तन करते हैं,तीज त्योहार मनाते हैं और सुखी परिवारों की तरह अपना जीवनयापन करते हैं ।दूसरे धर्म के लोगों को भी पूरी आज़ादी है ।रामगुलाम ऐसा ही मॉरिशस चाहते थे जिसे उन्होंने अपने जीते जी बनते हुए देख लिया था
भारत में कैसे आना हुआ और शिविरों की शुरुआत कैसे हुई ।स्वामी जी ने बताया गुजरात के दादू भाई अफ्रीका में अक्सर मिला करते थे और उनसे भारत में भी चिकित्सा शिविर आयोजित करने पर चर्चा होती रहती थी ।इसके फलस्वरूप उन्होंने बड़ौदा में विश्व ज्योति आश्रम शुरू किया और उसके माध्यम से शिविर लगने लगे ।वहीं शेखावाटी, राजस्थान के रेवतमल भाटी मिल गये और उनके साथ मैं राजस्थान के सीकर चला गया और पहले नेत्र और बाद में बवासीर तथा अन्य रोगों के शिविर लगने लगे । इसे आपकी ‘देशवापसी’ भी कहा जा सकता है,बीच में मैंने टोकते हुए कहा।’वह कैसे!’ स्वामीजी ने पूछा ।क्योंकि सन्यास लेने से पहले आपका इसी राजस्थान के बीकानेर ज़िले से जो संबंध था । एक बार उन्होंने मेरी तरफ घूर कर देखा और बोले ‘जब घर का ही जासूस हो तो दूसरे से क्या शिकवा शिकायत ।’ फिर उन्होंने बताया कि सीकर के पास सांवली में 1985 में एक नेत्र शिविर आयोजित किया गया जिस में मेरे साथ दिल्ली से उद्योगपति संजय डालमिया भी आये । उस शिविर का उद्घाटन करते करते मैं भावुक होकर बोला,आज मैं 85 बरस का हो गया हूं,अगर मेरे जाने के बाद ये शिविर बंद हुए तो मेरी आत्मा बहुत दुखी होगी
इस पर संजय डालमिया ने आश्वस्त किया कि मेरे न रहने पर भी सेवा कार्यों को वह जारी रखेंगे। तब से मैं मगन हूं ।और हां, आज मैं तुम्हें यह भी बताना चाहता हूं कि देर सबेर तुम्हें भी संजय इन सेवा कार्यों से जोड़ेगा, मेरी यह बात नोट कर लो ।स्वामी जी की भविष्यवाणी सही साबित हुई। ‘संडेमेल’ का प्रकाशन स्थगित होने के बाद मुझे डालमिया सेवा ट्रस्ट से जोड़ा गया जहां मैं मई, 2017 तक रहा।
क्या आपने सेवाकार्यों से जुड़े कार्यकर्ताओं के लिये कुछ मार्गदर्शक सिध्दांत तय किये हैं ? मोटे तौर पर देश और विदेश के धार्मिक और चिकित्सा शिविरों में कार्यकर्ताओं से रोगियों के प्रति सेवाभाव, समर्पण और मधुर व्यवहार की अपेक्षा की जाती है ।उनसे यह भी आशा की जाती है कि रोगियों के साथ साथ उसके साथी व सहायकों के प्रति भी सौहार्दपूर्ण रवैया अपनाया जाएगा ।कार्यकर्ताओं से यह भी उम्मीद की जाती है कि वह दूरदराज के गांवों में जाकर इन शिविरों की उपयोगिता के बारे में बतायें और इस तरह से शिविरों की कडियां तैयार करते जायें ।उनके मधुर और मृदु व्यवहार तथा रोगियों के प्रति उनकी कोमल भावनाओं से हर शिविर में नये नये रोगी जुडेगे और इस तरह से समाज के एक बड़े दायरे में सेवा करने का अवसर मिलेगा ।यह पूछे जाने पर कि शिविरों,कार्यकर्ताओं,डॉक्टरों और दवाओं के दाम कहां से आयेंगे,इस प्रश्न पर स्वामी जी हंस दिये और बोले,’यदि आप ईमानदारी से समाज सेवा के काम से जुड़ेंगे तो किसी तरह की आर्थिक दिक्कत पेश नहीं आयेगी ।हां मैं कार्यकर्ताओं को स्पष्ट बता देता हूं कि समाज सेवा के कार्यों के लिए प्राप्त पैसे का यदि निजी हितों के लिए इस्तेमाल होगा तो वह उस व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए ‘पारे ‘ के समान होगा ।ज़रूरी नहीं ‘पारा ‘ तुरंत प्रभाव करे लेकिन समाज सेवा के लिए आये धन का दुरूपयोग करने वाले पर ‘पारे का प्रहार’ अवश्य होगा ।आजकल कौन परवाह करता है इन चेतावनियों की स्वामीजी!वह हंसे,’कुदरत कभी किसी को नहीं बख्श्ती ।इसलिए सावधानी ज़रूरी है ।मेरा काम तो कार्यकर्ताओं को आगाह करना होता है,आगे उनकी मर्जी ।’
हम लोगों का नाश्ता भी साथ साथ चल रहा था ।स्वामी जी ने दूध लिया और मैंने चाय ।मेरी नजरें स्वामी जी के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं ।वह सदा की तरह उत्फुल्ल रहने का प्रयास कर रहे थे लेकिन न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि आज वह कुछ असहज हैं ।उन्हें किसी चीज़ का इहलाम हो गया है जिसे वह अपने चेहरे पर नहीं आने देना चाहते ।मैंने जब पूछा कि सुना है कि मॉरिशस में आपके निवास के रजत जयंती समारोह को आपके जन्मदिन पर मनाने की बड़े धूमधाम से तैयारियां चल रही हैं तो बड़ी लापरवाही से बोले कि देश और जीवन में सदा कोई न कोई उत्सव होते रहते हैं और होते रहने भी चाहिए। हमें दुआ यही करनी चाहिए कि वे निर्विघ्न संपन्न हो जायें ।’आप किसी अनहोनी की कल्पना कर रहे हैं क्या’, जब मुझ से रहा न गया तो मैंने सीधा सवाल पूछ लिया।उनका दोटूक उत्तर था:’वर्तमान में जीना सीखो त्रिलोक, भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है उसके लिए सही समय की प्रतीक्षा करो।’ एक तरह से स्वामीजी ने स्पष्ट संकेत दे दिया था ।दिल्ली के बाद वह हमेशा की तरह राजस्थान गये ।चिकित्सा शिविर आयोजित किये । रोगियों से मिलते रहे,कार्यकर्ताओं को हमेशा की तरह निर्देश देते रहे। उन्हें स्वामी जी सामान्य ही लगे ।अंत में बीकानेर के बड़े रामद्वारे गये ।महंत रामदयाल से मिले ।अपने कक्ष में रहे ।बाद में मेरे किसी प्रसंग पर वैद्य रामदयाल
से यह पूछे जाने पर कि आपको स्वामी जी के व्यवहार में कुछ परिवर्तन दिखायी दिया था,उन्होंने नाही में सिर हिला दिया था ।मैं क्या करुँ मेरा मन नहीं मान रहा था ।मेरे दिमाग में बार बार स्वामीजी के वे शब्द गूंज रहे थे ‘भविष्य के गर्भ में झांकने की कोशिश न करो त्रिलोक’ मुझे बेचैन किये जा रहे थे ।
एक दिन महंत रामदयाल ने बताया कि जून या जुलाई में स्वामीजी को मॉरिशस से फ़ोन आया कि वह शीघ्र वापस लौटने का प्रयास करें।कारण यह बताया गया कि रजत जयंती समारोह के लिए देश में आपकी उपस्थिति अनिवार्य है ।लिहाजा स्वामी जी मॉरिशस लौट गये ।देश भर अपने इस ‘धर्मगुरु’ की वापसी पर आल्हादित था, जगह जगह रोशनी हो रही थी, कुछ लोगों के लिए स्वामी जी ‘राष्ट्रपिता’ थे,सर शिवसागर रामगुलाम तो ऐसा माना करते थे ।यह स्पष्ट नहीं कि स्वामी कृष्णानंद सरस्वती मॉरिशस के घोषित ‘राष्ट्रपिता’ थे या नहीं लेकिन उनका सम्मान वहां राष्ट्रपिता तुल्य ही है ।भारत से लौटने के बाद स्वामी जी अपने आश्रम में सभी लोगों से मिला करते थे और प्रवचन भी दिया करते थे । एक दिन आश्रम में लोगों से बातें करते करते अचानक स्वामी जी अपने कमरे में चले गये और जब काफी देर तक बाहर नहीं आये तो उनके कुछ स्वयंसेवकों भीतर पता लगाने के लिए गये ।उन्होंने देखा कि वह ब्रह्मलीन हो गये हैं ।इस खबर के आश्रम के बाहर निकलते ही पूरे देश में मातम छा गया ।खुशी गमी में बदल गयी ।स्वामी जी के कार्यकर्ता फूट फूट कर रोते देखे गये ।सारा देश थम गया और लोगों का रुख स्वामी कृष्णानंद आश्रम हो गया ।सारी सरकार उनके द्वार पहुंच गयी। उन्हें समाधि देने पर चर्चा होने लगी ।विश्व भर से मॉरिशस में संवेदना संदेश पहुंचने लगे ।बेशक वह शांति, सद्भाव,भाईचारे और समाज सेवा के अग्रदूत थे जिनकी सेवाओं को मानवता कभी नहीं भुला पायेगी ।
23 अगस्त, 1992 को सुबह संजय डालमिया ने मुझे फ़ोन करके बताया कि स्वामीजी ब्रह्मलीन हो गये हैं तो उनसे हुई यह आखिरी बातचीत मेरे ज़ेहन में तिरेर गयी ।वह कहते रहे कि पहले कही गयी बातें और जानकारियां क्यों दोहरा रहे हो, मैं उन्हें बताता कि न जाने किस मूड में आकर आप कुछ नयी बातें बता गये हैं जो इतने सालों की मुलाकातों में आपके मुंह से नहीं निकली थीं । खेद है कि हम लोग मॉरिशस में स्वामीजी के अंतिम दर्शनों के लिए नहीं जा पाये ।उस दिन के सान्ध्य ‘समाचार मेल’ में स्वामी जी के ब्रह्मलीन वाली लीड स्टोरी रही और ‘संडे मेल’ में भी । स्वामी कृष्णानंद सरस्वती की मधुर स्मृति में सादर नमन ।













