लोकसभा सचिवालय की इतनी यादें हैं कि उनमें से बाहर निकल पाना मुश्किल है ।ऐसा पाता हूं कि यदि मैंने लोकसभा सचिवालय में काम न किया होता तो पत्रकारिता के मैं जिस मुकाम तक पहुंचा वह शायद संभव नहीं था ।मैंने पहली,दूसरी और तीसरी लोक सभा में करीब पौने दस बरस तक काम किया था।उस समय के सांसदों की सोच और कार्यशैली पर स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव महसूस किया जा सकता था ।अपने कार्यों और लक्ष्यों के प्रति सभी सांसद समर्पित रहते थे और सदन में पूरी तैयारी के साथ आया करते थे ।जब वह प्रधानमंत्री सहित किसी भी मंत्री से कोई प्रश्न पूछते थे तो उस प्रश्न की पृष्ठभूमि से वह स्वयं भी परिचित रहा करते थे इसलिए कोई भी मंत्री उन्हें न भटका सकता था और न ही उलझा सकता था ।इस बात से प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी परिचित हुआ करते थे और उनकी मंत्रिपरिषद के सदस्य भी ।आप चाहें तो पार्लियामेंट लाइब्रेरी में बैठकर उस समय की डिबेट देख सकते हैं और वास्तविकता से आप स्वयं रूबरू हो सकते हैं । उस समय के लाइब्रेरी प्रमुख पृथ्वीनाथ शकधर मुझे अक्सर बताया करते थे ।

ऐसी ही समर्पण की भावना लोकसभा सचिवालय में काम करने वाले कर्मचारियों की रहा करती थी ।मैं उस समय के ही दृश्य और माहौल का विवरण प्रस्तुत करूंगा जो मैंने अपने करीब पौने दस साल के कार्यकाल में देखा और महसूसा था ।मेरी नियुक्ति मध्य 1956 में लोकसभा सचिवालय में हुई थी और 31 दिसंबर, 1965 में मैंने त्यागपत्र दिया था ।इस दौरान सभी कार्यालय संसद के गोल भवन में थे ।मेरे समय तो सर्वोच्च न्यायालय भी उसी बिल्डिंग में था जो 28 जनवरी, 1950 से वहां काम कर रहा था ।1958 में वह अपनी नयी बिल्डिंग में शिफ्ट हुआ ।उस खाली स्थान को लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय ने आपस में बांट लिया ।संसदीय कार्यमंत्री सत्यनारायण सिन्हा का ऑफ़िस भी संसद भवन की दूसरी मंज़िल पर हुआ करता था ।लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय दोनों के कर्मचारी और अधिकारी तीसरी मंज़िल पर ही बैठा करते थे ।उस समय संसद भवन और केंद्रीय सचिवालय के पास बैरकों यानी हटमेंट्स में भी कुछ सरकारी दफ्तर होते थे ।संसद भवन के निकट ‘पी’ ब्लॉक हुआ करता था जहां प्रतिरक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय की भी शाखाएं कार्यरत थीं ।ये वह शाखाएं होती थीं जिनका सदन से सीधा संबंध नहीं रहता था उदाहरण के तौर पर प्रिंटिंग ब्रांच ।इसका काम होता था अगले दिन की कार्यसूची और बुलेटिन छापना । यह बुलेटिन मुख्यतया तारांकित और गैर तारांकित प्रश्नों की हुआ करती थी जो सांसद द्वारा संबंधित मंत्रालय के मंत्री से संबद्ध होते थे ।वहां चाय की एक कैंटीन भी होती थी जहां कभी कभी हम लोग चाय पीने के लिए चले जाया करते थे ।थोड़ी दूर पर सीएसआईआर की कैंटीन में लंच करने के लिए भी ।संसद भवन में शशि राम की कैंटीन में अक्सर भीड़ रहती थी इसलिए थोड़ी चहलकदमी को ध्यान में रखकर भी हम लोग तीसरी मंज़िल से उतर कर बाहर आ जाया करते थे ।यह ‘आजादी’ इंटरसेशन में ही मुमकिन हो पाती थी,सत्र के दिनों में तो ‘होश’ नहीं रहती थी ।

खैर संसद भवन के बाहर का जुगराफिया भी आज की बनिस्पत कुछ अलग था ।संसद भवन चारों ओर से घिरा हुआ है ।गेट नंबर एक के ठीक सामने लोकसभा और राज्यसभा दोनों के स्वागत कक्ष अर्थात रिसेप्शन ऑफ़िस एक दूसरे के आमने-सामने थे ।लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित साहित्य वहीं से खरीदा जा सकता था ।इसकी अलग बाउंडरी थी । उन दिनों दो-चार अधिकारियों के पास ही कारें होती थीं जो स्वागत कक्ष के बाहर खाली जगह में खडी रहती थीं ।बाहरी गेट से थोड़ा पहले साइकिल स्टैंड हुआ करता था ।ज़्यादातर लोग साइकिल से ही आया जाया करते थे ।स्कूटर की आमद तो काफी समय बाद हुई जब सांसद कमल नयन बजाज (उद्योगपति राहुल बजाज के पिता) अपने नवगृहीत वेस्पा स्कूटर के परमिट सांसदों में बांटा करते थे ।सचिवालय के कुछ स्टाफ ने भी परमिट ले लिया था क्योंकि उन दिनों स्कूटर का बहुत टोटा था और अधिकांश लोगों की पसंद लम्ब्रेटा स्कूटर की हुआ करती थी ।संसद भवन के बाहर के दोनों गेट खुले होते थे इसलिए कारों की आवाजाही की छूट थी ।संसद भवन के भीतर जाने के लिए कई गेट थे शायद आठ ।गेट नंबर एक सामान्य गेट था स्टाफ और सांसदों का ।सांसद इसलिए इससे आना पसंद करते थे क्योंकि पार्लियामेंट नोटिस ऑफ़िस (पीएनओ) गेट से घुसते ही सामने पड़ता था।यहां सांसदों के लिए हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध रहती है । वे अपने प्रश्न यहां दे सकते हैं,संकल्प या विधेयक भी ।उनके दिये गये नोटिस संबंधित शाखाओं में स्वतः पहुंच जाते हैं ।यदि भत्ते-भाड़े की बात हो तो वहां लोकसभा सचिवालय से संबंधित किसी भी ब्रांच के कागज़ात सौंप सकते थे और ज़रूरत पड़ने पर उस शाखा से किसी कर्मचारी को बुलाकर अपनी समस्या का समाधान भी कर सकते थे । उनके लिए टाइपिंग की व्यवस्था भी पीएनओ का शाखा अधिकारी कर देता है ।

वैसे सांसद तीसरी मंज़िल पर भी अक्सर आते जाते देखे जाते हैं ।हमारी शाखा में उमाचरण पटनायक, चिंतामणि पाणिग्रही,मनीराम बागड़ी,रघुनाथ सिंह,इंद्रजीत मल्होत्रा आदि आम तौर पर आ जाया करते थे ।लक्ष्मीमल्ल सिंघवी हमारी बगल की शाखा
कॉन्फरेंस ब्रांच में सुभाष कश्यप से मिलने के लिए आते तो हमारी ब्रांच में भी आकर अपने संकल्पों या विधेयकों की स्थिति के बारे में पूछ जाते ।उन दिनों सांसद बहुत सक्रिय होते थे और शुक्रवार को गैर सरकारी कार्यसूची में दर्ज अपने विधेयक या संकल्प के आने की बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे ।इन गैर सरकारी विधेयकों और संकल्पों को सरकार भी हल्के में नहीं लिया करती थी ।आम तौर पर किसी भी सांसद का संकल्प या विधेयक की प्राप्ति के बाद वह संबंधित मंत्रालय को उचित कार्यवाही के लिए भेजा जाता था ।कभी कभी सांसदों के इन संकल्पों और विधेयकों उनकी स्वीकार्यता को लेकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू या अन्य मंत्रियों की टिप्पणी नीली नोट शीट्स पर आया करती थी ।ऐसी नोट शीट्स पर पंडित जी ‘जे नेहरू’ दस्तखत किया करते थे ।मोरारजी देसाई के हस्ताक्षर बहुत ही सुंदर थे ।

सारे ऑफ़िस तीसरी मंज़िल पर ही थे,कहीं कहीं तो संसदीय समितियों के अध्यक्षों के भी ।उनकी मीटिंग्स पहली मंज़िल के हाल्स में हुआ करती थी ।ऑफ़िस के नाम पर प्रेस के लिए सूचना शाखा थी जहां मीडिया की सुविधाओं का ख्याल रखा जाता था और अधिकृत संवाददाताओं के कार्ड भी वहीं बना करते थे ।ग्राउंड फ्लोर में पीएनओ के बाद टेबल ऑफ़िस और उसके आगे उपसचिव (एल) एन सी नंदी का कमरा होता था ।1956 में सचिव थे एम एन कौल (पूरा नाम महेश्वरनाथ), संयुक्त सचिव एस एल शकधर (पूरा नाम श्यामलाल) जबकि उपसचिव तो यानी एन सी नंदी और अवतार सिंह रिखी थे तथा अवर सचिव पांच वी.
नरसिंहन,पी के पटनायक,बी बी तिवारी,आर पी कौशिक और अमृतचंद्र राय। ये सभी तीसरी मंज़िल पर बैठते थे ।कुछ विषयों को लेकर दो दो शाखाएं थीं जैसे प्रश्न शाखा एक और दो,टेबल ऑफ़िस एक और दो,लेजिस्लेटिव ब्रांच तथा गैर-सरकारी विधेयकों और संकल्पों की शाखा अर्थात पीएमबी ।पीएमबी और टेबल ऑफ़िस-2 एक कमरे बैठा करते थे । मेरी नियुक्ति पीएमबी ब्रांच में हुई थी ।उन दिनों किसी भी ब्रांच में ज़्यादा कर्मचारी नहीं हुआ करते थे ।जैसे हमारी ब्रांच में सेक्शन ऑफिसर मनमोहननाथ घासी थे तो सांसदों और संकल्पों को जांचने के लिए असिस्टेंट पद के दो कर्मचारी एन एन मेहरा और ओ पी खोसला थे, एक अंग्रेजी टाइपिस्ट कश्मीरीलल भांबरी था और एक डायरी क्लर्क ।सांसदों के पास से जो संकल्प और विधेयक आते पहले वे डायरी हुआ करते थे ।ऐसे ही टेबल ऑफ़िस-2 में एस. दयाल एसओ थे तो असिस्टेंट पी सी चौधरी,लक्ष्मण सिंह तोमर और आर सी माथुर थे और टाइपिस्ट शर्मा जी। बेशक जगह और कर्मचारी दोनों कम थे लेकिन कार्मिक विभाग ने सभी शाखाओं को बता रखा था कि असिस्टेंट पद की नियुक्ति का विज्ञापन दिया जा चुका है,शीघ्र ही खाली पद भरे जायेंगे ।उन दिनों लोकसभा सचिवालय अपने कर्मचारियों की नियुक्ति स्वयं किया करता था ।उसका तर्क था कि लोकसभा का विशिष्ट कार्य है किसी दूसरे मंत्रालय से हम लोगों की सहायता नहीं लेते ।हमारा अपना काडर है ।पहले क्लर्कों और टाइपिस्टो की नियुक्तियां हुई थीं जिसमें मैं आया था ।
असिस्टेंट पदों की नियुक्ति के फलस्वरूप पीएमबी को के के कालरा और एम जी अग्रवाल नये सहयोगी मिले ।वह ज़माना लैंडलाइन फोन का हुआ करता था और कहीं कहीं सेक्शन और अपर सचिव का सामान्य कनेक्शन होता था,शाखाओं के बीच बात करने के लिए रैक्स फ़ोन होते थे ।आम तौर सेक्शन में एसओ या कोई अन्य व्यक्ति फोन उठा लेता और जिसका होता उससे बात करा देता और यदि अपर सचिव का होता तो उधर बजर दे देता ।हमारे अग्रवाल जी की शेयर बाज़ार में रुचि हुआ करती थी ।अपने दफ्तर के फोन से ही शेयरो की खरीद फरोख्त किया करते थे ।एक दिन फोन बजा तो कई घंटियों के बाद अपर सचिव बी बी तिवारी ने उठा लिया ।उधर से किसी ने पूछा कि आज फलां शेयर का भाव इतना है बेच दूं,तिवारी जी को यह खेल समझ में नहीं आया और उन्होंने कह दिया कि बेच दो ।बाद में उन्होंने एसओ घासी से जब यह पूछा कि यह सब क्या मामला है तो उन्होंने बताया कि नये असिस्टेंट अग्रवाल आये हैं जिनकी शेयर बाज़ार से बातचीत होती रहती है ।तिवारी जी उन्हें यह जानकारी दी कि किसी ने उनसे फलां शेयर बेचने की बाबत पूछा है तो उन्होंने कह दिया कि बेच दो ।इससे एम जी अग्रवाल को नुकसान हुआ लेकिन इस घटना के बाद संभल गये और ब्रांच का माहौल देखकर ही शेयरो की सौदेबाज़ी किया करते थे ।

लोकसभा सचिवालय काम के विभिन्न आयामों को सीखने के लिहाज़ से एक बेहतरीन स्थान है ।मैं उस समय की बात कर रहा हूं जिन दिनों मैं वहां करता था 1956 से 1965 के बीच अर्थात् पहली लोकसभा और तीसरी लोकसभा के मध्य । कई कारण रहे:
खुशगवार माहौल, पद को लेकर कोई भेदभाव नहीं,सभी को सभी काम करने की छूट और जानकारी ।यदि कोई असिस्टेंट ज़्यादा व्यस्त है तो क्लर्क भी किसी संकल्प या विधेयक पर अपनी टिप्पणी लिख एसओ को दे सकता था जिसे पढ़कर अपने दस्तखत कर फ़ाइल अपर और उपसचिव तक बढ़ा दिया करता था।इससे हरेक में आत्मविश्वास की भावना पैदा होती थी ।कोई छोटा बड़ा व्यक्ति नहीं माना जाता था और न ही कोई या किसी का काम छोटा बड़ा ।वहां पदोन्नति के अवसर जल्दी जल्दी मिलते थे ।तीन साल के बाद टेस्ट होता था सफल होने पर अगली सीढ़ी आपके तैयार थी ।मैंने अपने कार्यकाल में दो पदोन्नतियां प्राप्त की: एलडीसी से यूडीसी और अनुवादक की ।अनुवादक का वेतनमान असिस्टेंट के बराबर हुआ करता था ।आप सोचिये जब आज का असिस्टेंट कल लोकसभा सचिवालय के सबसे बड़े पद महासचिव यानी सेक्रेटरी जनरल के पद तक पहुंच सकता है ऐसा किसी और सरकारी विभाग में होता होगा इसकी मुझे जानकारी नहीं थी ।।मैंने जिन सी के जैन (मेरे लिए चक्रेश) के साथ एक टेबल पर बैठकर काम किया हो उन्हें सबसे बड़े पद पर बैठा देख मैं गौरान्वित हो गया था ।मैं उन्हें चक्रेश कह कर बुलाता था और वह मुझे जुनेजा ।वह जबाकुसम तेल का इस्तेमाल किया करते थे जिसकी महक उनके पास बैठने से महसूस की जा सकती थी । सेक्रेटरी जनरल की कुर्सी पर चक्रेश को बैठा देखकर मुझे कैसा लगा होगा और कितना गर्व महसूस हुआ होगा इसकी कल्पना सहज की जा सकती है।इस कुर्सी पर कभी एम एन कौल,एस एल शकधर, अवतार सिंह रिखी और सुभाष कश्यप बैठ चुके थे ।सुभाष कश्यप एसओ से महासचिव के पद तक पहुंचे थे ।

वहां काम करते हुए मैंने यह भी महसूस किया था कि काम और परिश्रम की इज़्ज़त और सम्मान है। यह भी जाना कि जो भी भर्ती होती है वह शुद्ध योग्यता के आधार पर होती है ।कुछ ऐसे मामले भी मेरी नज़र में आये जब कुछ युवा शौकिया असिस्टेंट के टेस्ट में बैठ गये शायद यह जानने और जांचने के लिए कि देखें यहां का टेस्ट कैसा होता है और संघ लोक सेवा आयोग की अखिल सेवाओं के टेस्ट की तुलना में कितना मुश्किल या आसान है ।नये नये असिस्टेंट भर्ती हुए के. के. कालरा ने मुझे एक बार बताया था कि लोकसभा सचिवालय का असिस्टेंट ग्रेड का टेस्ट यूपीएससी से कम कठिन नहीं होता और जिनका चयन होता है उन्हें यूपीएससी पास करने में ज़्यादा दिक्कत पेश नहीं आयेगी ।अमृतसर के रहने वाले कालरा जी से मेरे पारिवारिक संबंध थे ।उन्होंने कुछ समय बाद यूपीएससी क्लियर कर ली ।काफी दिनों बाद उनकी बेटी की शादी पर क्लेरिज होटल में उनसे मुलाकात हुई थी ।उनके व्यवहार में मैंने किसी प्रकार का फर्क नहीं पाया।मेरे और परिवार के लिए वह पहले जैसे कृशन ही थे।

अब धीरे-धीरे लोकसभा सचिवालय का विस्तार होने लगा ।ज्यों ज्यों कर्मचारियों की संख्या बढ़ रही थी जगह की कमी का अनुभव होने लगा ।लिहाजा कुछ शाखाओं का दूसरी शाखाओं में विलय होना शुरू हुआ जैसे पीएमबी का लेजिस्लेटिव ब्रांच में,टेबल ऑफ़िस-2 का टेबल ऑफ़िस-1में, प्रश्न ब्रांच भी एक कर दी गयी ।इन शाखाओं के कक्ष काफी बड़े थे इसलिए विलय होने वाली शाखाओं के लोग खप गये ।इस विलय को यह कहकर उचित ठहराया गया कि दोनों शाखाओं का काम तो कमोबेश समान ही है ।जैसे पीएमबी और लेजिस्लेटिव ब्रांच ।एक सरकारी एजेंडा डील करती है और दूसरी गैर-सरकारी ।इस नाते दोनों में तारतम्य बना रहेगा और तालमेल भी ।मेरे लिए तो कोई फर्क इसलिए नहीं पड़ता था कि मेरी तकरीबन सभी लोगों से जान पहचान थी डॉ आर पी आनंद,टी एस अहलूवालिया, डी एम चानन आदि ।इनके अतिरिक्त डी के वाही,एस एन खन्ना और कुलदीप सहाय मेरे पुराने सहयोगी थे ।एक बात तब मैंने लोकसभा सचिवालय में एक और महसूस की कि अधिसंख्य लोग कश्मीरी,कायस्थ थे तो कुछ पुराने पंजाबी ।यहां तक कि कश्मीरी और सिख चपरासी भी थे ।उन दिनों शाखाओं में चपरासी नहीं हुआ करते थे । सामूहिक चपरासी हुआ करते थे जो हर शाखा में एसओ की आउट ट्रे से फ़ाइलें निकाल कर संबंधित शाखाओं और अधिकारियों तक पहुंचाते थे ।एसओ की इन ट्रे में उस ब्रांच के कर्मचारी अपनी फ़ाइलें उनके अवलोकनार्थ रखा करते थे ।सरदार हुकम सिंह का चपरासी अनूप सिंह की ड्यूटी हर किस्म की हुआ करती थी । वह जरूरी कागज़ात भी संबंधित अधिकारियों को देने जाता था और सरदार साहब के धुर निजी कार्य भी किया करता था ।

उन दिनों मैन्युअल टाइपराइटर ही चलन में होते थे, इलेक्ट्रानिक टाइपराइटर नहीं आये थे,कंप्यूटरों के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी ।हर टाइपिस्ट की टेबल पर कार्बन,पिन कुशन,स्टेंसिल,फ्लूड वाली लाल रंग की शीश रहती थी जिससे स्टेंसिल काटते वक्त होने वाली गलती को सुधारा जा सकता था ।दूसरे शब्दों में इसे आप स्टेंसिल का रबड़ कह सकते हैं । स्टेंसिल्स मोम जैसे होते थे जिन पर बिना रिबन के टाइप करना होता था और उस स्टेंसिल को एक मशीन पर ले जाकर कापियां निकाली जाती थीं,फोटो कॉपी की शुरुआत नहीं हुई थी ।लोकसभा के सदन में एक साथ दो रिपोर्टर बैठते थे,एक अंग्रेजी का और दूसरा हिंदी शार्टहैंड का जानकार ।ये दोनों रिपोर्टर सांसदों और मंत्रियों के भाषणों को नोट किया करते थे और रिपोर्टर कक्ष में जाकर सीधे स्टेंसिल काटा करते थे ।एक रिपोर्टर 15-20 मिनट तक सदन में बैठता था ।उस समय करीब एक दर्जन रिपोर्टर थे जिनकी 15-20 मिनट की ड्यूटी लगा करती थी ।सदन की समाप्ति के बाद मुख्य रिपोर्टर इन सभी स्टेंसिल्स की जांच कर उनकी प्रतियां बनाने के लिए ‘डी’ अर्थात डिस्ट्रीब्यूशन ब्रांच में भेज देता था ।इस तरह पूरे दिन की डिबेट के स्टेंसिल स्टैपल किये जाते थे ।हर सदस्य का भाषण उनके अवलोकनार्थ उनके निवास पर भेजा जाता था ।उस सांसद/मंत्री की पुष्टि के बाद उस दिन की डिबेट की बाउंड कॉपी बनती थी ।संभव है ऐसे कई बाउंड वॉल्यूम आज भी संसद की लाइब्रेरी में उपलब्ध हों नयी पीढ़ी की जानकारी के लिये ।क्योंकि उस वक़्त फोटो कॉपी की व्यवस्था नहीं थी इसलिए हर पत्र की दो प्रतियां बनती थीं ।कार्बन कॉपी रिकार्ड में रहती थी और कुछ प्रमुख पत्रों की कार्बन कॉपी सहेज कर रखी जाती थीं । ऑफ़िस की नोटिंग के लिए दो किस्म की शीट्स हुआ करती थीं पीली और नीली ।पीली शीट की नोटिंग संयुक्त सचिव तक जाती थी ।यदि किसी विषय पर सचिव और माननीय स्पीकर की अनुमति लेनी होती थी तो नीली शीट का इस्तेमाल होता था ।पंडित नेहरू के किसी गैर सरकारी संकल्प या विधेयक पर मत नीली शीट पर ही आया करते थे ।

लोकसभा सचिवालय के प्रबंधन का सारा ज़िम्मा संयुक्त सचिव एस एल शकधर पर था ।वह सचिव एम एन कौल के नंबर दो थे ।कौल साहब ऑफ़िस के कामों से अक्सर दूर रहते थे ।वह कर्मचारियों की भर्ती के इंटरव्यू बोर्ड में नहीं बैठते थे और अधिकारियों से भी कम ही मिलते थे ।हां, लोकसभा के सत्र के समय सेंट्रल टेबल पर बैठे किसी अधिकारी से ज़रूरत पड़ने पर कुछ जानकारी प्राप्त कर लिया करते थे ।उनकी कुर्सी माननीय स्पीकर के आसन से ठीक नीचे होती थी ।माना जाता है कि उनके पंडित जवाहरलाल नेहरू से करीबी रिश्ते थे । उनसे कई बार सदन में कौल साहब बातचीत करते देखे भी जाते थे ।ऐसी ही निकटता उनकी माननीय अध्यक्षों के साथ भी हुआ करती थी ।स्पीकर साहब को 11 बजे सदन में जाने से पहले कौल साहब उनकी चैंबर में जाकर ब्रीफ किया करते थे । मावलंकर,आयंगार और सरदार हुकम सिंह की कार्यशैली से वह संविधान सभा से ही परिचित थे ।

16 सितम्बर,1901 को श्रीनगर,कश्मीर में जन्मे महेश्वरनाथ कौल की शिक्षा कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स में हुई थी तथा मिडिल टेम्पल से उन्होंने लॉ की डिग्री प्राप्त की थी ।वह तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के गवर्नर मनमोहन नाथ कौल के बेटे थे और उनकी शादी 1926 में उदयपुर के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर सुखदेव प्रसाद काक की बेटी सुखराज काक से हुई थी । शुरू शुरू में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वह वकालत करते थे तभी से पंडित नेहरू और उनके परिवार से परिचित थे ।कौल साहब 1947-50 तक संविधान सभा में सचिव रहे, 1950-52 में अंतरिम संसद में तथा 1952 से 31 अगस्त तक लोकसभा में सचिव पद पर रहे । 1962 में सचिव पद को महासचिव अर्थात सेक्रेटरी जनरल कर दिया गया जिसे सुशोभित करने वाले वह पहले अधिकारी थे ।17 बरसो तक सचिव पद पर आरूढ़ रहने के बाद 31 अगस्त,1964 में 63 वर्ष की उम्र में उन्होंने अवकाश ग्रहण किया ।उनके स्थान पर एस एल शकधर सेक्रेटरी जनरल बने जो 1977 तक इस पद पर रहे यानी तीसरी,चौथी और पांचवीं लोकसभा में कुल 13 बरसों तक ।सेक्रेटरी जरनल का पद भारत सरकार के काबीना सचिव के समतुल्य होता है । अप्रैल,1966 में एम एल कौल को राज्यसभा में नामजद किया गया और 1970 में वह पुन: मनोनीत हुए ।1973 में इंस्टीटयूट ऑफ़ कांस्टीट्यूशन और पार्लियामेंटरी स्टडीज के डायरेक्टर जनरल बने। संसदीय इतिहास पर उनकी कई पुस्तकें हैं ।एस एल शकधर के साथ मिलकर उन्होंने प्रैक्टिस प्रोसीजर ऑफ़ पार्लियामेंट भी लिखी है जिसे इरिस्किन मे के समकक्ष माना जाता है । इरिस्किन मे के पार्लियामेंटरी प्रोसीज़र को ब्रितानी संसद में बाइबल की भांति समझा जाता है ।20 नवंबर,1984 को एम एल कौल का निधन हो गया ।

एम एन कौल के बाद एस एल शकधर दूसरे सेक्रेटरी जनरल बने जिन्हें संवैधानिक मामलों का विशेषज्ञ माना जाता था ।कौल साहब की रहनुमाई और छत्रछाया में उन्होंने न केवल संविधान के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि संसदीय प्रक्रियाओं में भी महारत हासिल कर ली थी ।लोकसभा सचिवालय के अधिकारी अक्सर उन्हें ‘कड़क’ अफसर कहा करते थे ।यह पूरी तरह से सच नहीं है ।शकधर काम में किसी काम की कोताही बर्दाश्त नहीं करते थे क्योंकि लोकसभा के काम को कल तक टाला नहीं जा सकता था । वह चाहते थे कि उनके पास जो भी फ़ाइल जाये उसपर ‘ऐक्शन टुडे’ का फ़्लैग लगा हो ।उन दिनों तीन तरह के फ़्लैग प्रचलित थे ‘अर्जेंट’, ,’इमीडियेट’ और ‘ऐक्शन टुडे’।ये फ़्लैग उन फ़ाइलों का महत्व बता दिया करते थे ।लोकसभा सचिवालय के हरेक कक्ष में पंडित नेहरू के दस्तखत के साथ एक उद्धरण लगा था ‘मेरा यकीन काम को अंजाम तक पहुंचाना है,बहानेबाज़ी में नहीं।’ इस उद्धरण का शकधर साहब अक्षरशः पालन किया करते थे ।

एस एल शकधर में मानवीयता और संवेदनशीलता भी भरपूर थी जो मुझसे बढ़ कर शायद ही कोई अनुभव कर सकता हो ।मेरी नौकरी के लिए मेरा 11 बजे का इंटरव्यू और मैं पहुंचा शाम चार बजे,मेरी आपबीती सुनकर मुझे नौकरी देना उनके मानवीय गुण ही तो माने जायेंगे ।बेशक इसमें उस समय के कार्मिक शाखा के एसओ ए के जुत्शी की कम महत्वपूर्ण भूमिका नहीं थी ।वह चाहते तो कह सकते थे ‘आई एम सॉरी’ लेकिन उन्होंने ऐसा न कहकर सहानुभूति का परिचय दिया था ।यह थी उस दौर की सोच एक दूसरे की समस्या समझ कर समाधान करने की ।यह वाकया 1956 का है ।मैं रायपुर से दिल्ली लोकसभा सचिवालय में इंटरव्यू देने के लिए आया था और ट्रेन आठ घंटे देरी से दिल्ली पहुंची थी ।क्या आज यह मुमकिन है । उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष का बोध तब भी होता था जब वह हर साल इंटर सेशन के दिनों में लोकसभा सचिवालय की हर ब्रांच का निरीक्षण किया करते थे ।तब वह संयुक्त सचिव थे और हर ब्रांच को चुस्त दुरुस्त रखना उनकी जिम्मेदारी थी ।शकधर के निरीक्षण की तारीख और समय की अग्रिम सूचना हर ब्रांच को होती थी ताकि हर कर्मचारी का टेबल साफ सुथरा हो और उस पर करीने से फ़ाइलें रखी हों ।जिस डायरी में सांसदों से प्राप्त होने वाले संकल्प और विधेयक दर्ज हों उसकी भाषा स्पष्ट होनी चाहिए ।सत्र के समय की फ़ाइलों को रिकार्ड रूम में भेज दिया जाता था जो सांसदों के सदन जाने के रास्ते में बेसमेंट में था जहां एक दफ्तरी बैठता था । स्टोर रूम से पहले एक बड़ा सा कमरा था जिसमें लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के निजी सचिव बैठा करते थे ।तब पंडित नेहरू के निजी सचिव शायद एन राम थे और स्पीकर साहब के मिस्टर शेषाद्री

1918 में जन्मे एस एल शकधर लोकसभा सचिवालय में बहुत शक्तिशाली अधिकारी के तौर पर जाने जाते थे । उन्हें बेशुमार अधिकार सचिव एम एल कौल ने दिए थे जो ऑफ़िस के पचडो से हमेशा दूर रहे ।बताया जाता है कि वह उनके पूरे नाम श्यामलाल कहकर बुलाया करते थे ।लोकसभा के सत्र के दिनों में हर शाम कौल साहब एस एल शकधर से अगले दिन की कार्यसूची पर विस्तृत चर्चा किया करते थे और सुबह का अधिवेशन शुरू होने से पहले कौल साहब माननीय स्पीकर को ब्रीफ कर दिया करते थे ।कौल साहब ने गणेश वासुदेव मावलंकर,एम अनंतसायनम अय्यंगार और सरदार हुकम सिंह के साथ काम किया था । मावलंकर जी के साथ तो वह संविधान सभा में भी थे और तभी से वह सरदार हुकम सिंह से भी परिचित थे जो संविधान सभा सदस्य थे ।सभी माननीय अध्यक्ष साढ़े दस बजे तक अपने चैंबर पहुंच जाया करते थे और उसके तुरंत बाद कौल साहब उन्हें ब्रीफ करने के लिये ।सदन में ज़रूरत पड़ने पर भी कौल साहब उपलब्ध रहते थे तो कौल साहब को उपसचिव तथा ऑफ़िस के दूसरे अधिकारी ।जबकि एस एल शकधर ने सरदार हुकम सिंह के अतिरिक्त नीलम संजीव रेड्डी,गुरदयाल सिंह ढिल्लों, बलिराम भगत जैसे माननीय अध्यक्षों के साथ काम किया था । शकधर साहब 1 सितम्बर,1964 से 18 जून,1977 तक कुल जमा 12 साल 290 दिनों तक लोकसभा के महासचिव रहे।उनके नंबर दो थे अवतार सिंह रिखी जो 18 जून,1977 से 31 दिसंबर,1983 तक,सुभाष कश्यप 31 दिसंबर, 1983 से 20 अगस्त,1990 तक,के सी रस्तोगी 21 अगस्त,1990 से 31 दिसंबर,1991 तक,सी के जैन 1 जनवरी,1992 से 31 मई,1994 तक तथा आर सी भारद्वाज 1 जून,1994 से लेकर 31 दिसंबर, 1995 तक लोक सभा सचिवालय के सेक्रेटरी जनरल रहे ।ये नाम मैंने इसलिए लिखे हैं क्योंकि इन सब लोगों से मेरा परिचय था जिन दिनों मैं लोकसभा सचिवालय में काम किया करता था,यारी मेरी बेशक सी के जैन से थी क्योंकि हम दोनों साथ साथ कई बरसों तक एक ही ब्रांच में रहे। सेक्रेटरी जनरल बनने पर मैं उन्हें तीन-चार बार मिला था और उनकी देखरेख में उस समय लोकसभा सचिवालय की जितनी भी पुस्तकें छ्पी थीं,मुझे भेंट की थी यह कहते हुए कि जुनेजा अब तुम पत्रकार हो इन्हें तुम अपनी निजी लाइब्रेरी में संदर्भ पुस्तकों के तौर पर रखना ।
(मैटर जारी)

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