इस श्रृंखला को शुरू करते समय मैंने लिखा था कि इस शीर्षक के तहत मैं उन राजनेताओं, साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों के बारे में लिखूंगा जो 19वीं, 20वीं और 21वीं सदी में जन्मे हैं । इनमें से कुछ लोगों को मैंने नज़दीक से देखा है,कुछ लोगों से चलते चलते बातचीत की है और कुछ लोगों का बाकायदा इंटरव्यू भी किया है ।मुझे यह सुअवसर लोकसभा सचिवालय में करीब दस बरस (1956-65) तक काम करते हुए प्राप्त हुआ था ।अपनी इस श्रृंखला की पहली किश्तों में कुछ विभूतियों के बाबत सचित्र लिख भी चुका हूं । इनमें महात्मा गांधी (1869) खान अब्दुल गफ्फार खान (1890), डॉ ज़ाकिर हुसैन (1897) पंडित जवाहरलाल नेहरू (1889), सरदार हुकम सिंह (1895), एम ए अय्यंगार (1891), आचार्य जे बी कृपलानी (1888), डॉ राजेंद्र प्रसाद
(1884), डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888), राजकुमारी अमृत कौर (1889), अबुल कलाम आजाद (1888), मोरारजी देसाई (1896), गुलज़ारी लाल नंदा 1898), गोविंद बल्लभ पंत (1887), श्रीपाद अमृत डांगे (1899), चिंतामण देशमुख (1896),टी टी कृष्णमाचारी (1899),सत्य नारायण सिन्हा (1900) ,वी के कृष्ण मेनन (1896) , मेहर चंद खन्ना (1897) सांसद विभूति मिश्र (1900) आदि प्रमुख हैं ।तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर (1888-27 फरवरी,1956) तथा रफ़ी अहमद किदवई (1894-अक्टूबर,1954) को नहीं देख सका ।अपनी पहले की किश्तों में मैंने महात्मा गांधी को रावलपिंडी में देखने के अतिरिक्त बहुत से प्रमुख नेताओं से बातचीत करने और उनसे लिए गये साक्षात्कार का भी वर्णन किया है ।
जिन राजनेताओं को मैंने देखा और उनसे संक्षेप में बात भी हुई है,लेकिन बाकायदा इंटरव्यू नहीं हुआ, उनमें राजकुमारी अमृत कौर, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद,गोविंद वल्लभ पंत प्रमुख हैं ।राजकुमारी अमृत कौर से तो मैं उनके निजी सचिव बलवंत कपूर के सौजन्य से मिल लिया करता था ।एक बार जब उनसे मैंने यह पूछा कि दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के लिए आपने ज़मीन क्यों दान की तो उन्होंने मुझे घूरकर देखते हुए कहा था कि जब मैंने देश सेवा के लिए शाही जिंदगी छोड़ दी तो यह ज़मीन मेरी और मेरे भाइयों के किस काम की थी ।इस पर बनने वाला अस्पताल केवल दिल्ली ही नहीं आसपास से आने वाले रोगियों की सेवा करेगा ।काश मेरे नाम कुछ और संपत्ति होती देश की सेवा करने के लिये ।उस समय राजनेताओं के ऐसे ज़ज्बात हुआ करते थे क्योंकि ज़्यादातर नेता स्वतन्त्रता संग्राम आंदोलन से गुज़रे हुए थे और वे जीजान से अपना सभी कुछ होम कर देश निर्माण में लगाना चाहते थे ।अंग्रेज़ तो ‘कंगाल’ भारत को देशवासियों को सौप गये थे ।एक बार गोविंद वल्लभ पंत से जब मिला तो उन्होंने बताया कि एक बीमारी का शिकार हो जाने से यह सिर हिलता है और फिर हंसकर बोले ‘लेकिन दिमाग स्थिर है और खासा सही है।’ मैंने चिंतामणि देशमुख,मोरारजी देसाई और टी टी कृष्णमाचारी को बजट पेश करते हुए देखा और सुना था । उन दिनों 28 या 29 फरवरी को शाम पांच बजे बजट पेश हुआ करता था ।हम सचिवालय के लोग बजट पेपर लेकर इनर लॉबी में रखते था ।जब बजट का दूसरा भाग यानी ‘अब मैं करों के प्रस्तावों पर आता हूं’ तो हम लोग बोरियों से बजट पेपर के सेट निकाल कर बाहर रख दिया करते थे ताकि बजट भाषण की समाप्ति के बाद सांसद अपना सेट साथ ही ले जायें ।जो सांसद नहीं ले जाते थे उन्हें पब्लिकेशन काउंटर से मिल जाते थे ।रेल बजट अलग से पेश होता था आम बजट से एक दिन पहले जिसे रेल मंत्री पेश किया करते थे ।सत्यनारायण सिन्हा अपनी खुशबू और कोट की ऊपरी पॉकेट में रखे रूमाल से पहचाने जा सकते थे ।उन्हें तेज़ कदमों से चलता देख जब एक बार मैंने उन्हें सतर्क रहने के लिए कहा तो बोले,नौजवान अभी सदन का कोरम पूरा नहीं हुआ है,मैं इधर-उधर बैठे सांसदों को तलाश रहा हूं ।संसदीय कार्यमंत्री का काम बड़ा चुनौती भरा होता है ।इधर कोरम पूरा करो और वोटिंग के वक़्त फिर उनके पीछे भागो । पर मज़ा आता है ।स्वास्थ्य बढ़िया रहता है ।
सरदार हुकम सिंह संसदीय प्रतिनिधिमंडल लेकर विदेश जाया करते थे । चाहे वह लोकसभा के उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) रहे हों या अध्यक्ष (स्पीकर) आम तौर वह संसदीय प्रतिनिधिमंडल के नेता ही होते थे ।इन प्रतिनिधिमंडलों में नये और पुराने दोनों तरह के सांसद रहा करते थे ।कभी कभी कोई ऐसा सांसद भी होता था जो पहली बार न केवल विदेश ही जा रहा होता बल्कि विमान पर भी उसकी पहली यात्रा होती थी ।बातों बातों में उन्होंने मुझे एक बार बताया कि हमारे माननीय सांसद विभूति मिश्र संसदीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्य थे ।वह मेरे साथ वाली सीट पर ही बैठे थे ।क्योंकि वह पहली बार विमान पर बैठे थे इसलिए वह मुझसे तरह-तरह के सवाल पूछ रहे थे जैसे पेटी क्यों बांधी जाती है, कितनी ऊंचाई तक विमान उड़ सकता है,जब घनघोर बादल होते हैं तो उसे रास्ता कैसे दीखता है आदि ।जब विमान उड़ान भरने के लिए टेक ऑफ़ हुआ तो मिश्र जी ने कस कर मेरा हाथ पकड़ लिया कि कहीं वह गिर न जायें ।मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ नहीं होगा ।विमान जब सेट हुआ और लाल बत्ती बुझा दी गयी तो खाना सर्व होना शुरू हुआ ।एयर होस्टेस जब यात्रियों को खाना परोस रही थीं तो मिश्र जी उन्हें बड़े गौर से देख रहे थे। फिर बोले कि इतने लोगों का खाना कहां और कैसे बनता होगा ।उन्हें यह कैसे मालूम होता है कि फलां यात्री शाकाहारी या मांसाहारी है।सरदार हुकम सिंह ने उन्हें समझाया था कि विमान में खाना सप्लाई करने का काम एक बड़े होटल के जिम्मे होता है जो शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह की पैकिंग
कर विमान कंपनियों को देते हैं ।
सी डी देशमुख तो पूर्व आईसीएस अधिकारी थे । उन दिनों एच एम पटेल,धर्मवीर,किशन चंद,कपूर सिंह जैसे कई पूर्व आईसीएस अधिकारी बड़े बड़े पदों पर थे ।एच एम पटेल मोरारजी देसाई की सरकार में पहले वित्तमंत्री और बाद में गृहमंत्री रहे जबकि धर्मवीर काबीना सचिव के अतिरिक्त पंजाब,हरियाणा,कर्नाटक तथा पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे और किशन चंद दिल्ली के उपराज्यपाल रहे।कपूर सिंह 1962-67 में लोक सभा में शिरोमणि अकाली दल के सदस्य थे ।वह बुद्धिजीवी थे और उन्होंने सिख धर्म पर कई पुस्तकें लिखी हैं ।आनंदपुर साहब का प्रस्ताव भी कपूर सिंह ने लिखा था ।वह बहुत बड़ी पगड़ी बांधा करते थे और लोक सभा में उनसे कई बार मुलाकातें हुई थीं ।धर्मवीर से मैं उनके पंजाब में राज्यपाल रहते मिला था जबकि किशन चंद जी से दिल्ली के राज निवास में कई बार लंच करने के अवसर मिले ।नवीन चावला से पहली मुलाकात किशन चंद जी के यहां हुई थी जो उनके निजी सचिव थे ।इसके बाद नवीन जी से मुलाकातें होती रहीं ।जब मदर टेरेसा दिल्ली में आती तो वह मुझे ज़रूर न्योते थे ।मदर टेरेसा पर उनकी एक पुस्तक भी है ।किशन चंद बहुत अच्छे मेजबान थे ।खाने से पहले वह मुझे जिन टॉनिक ज़रूर पिलाते थे।यह शायद आईसीएस अधिकारियों की मेहमाननवाजी का एक तरीका होता था ।
अंग्रेज़ों के समय तो संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में बार हुआ करती थी ताकि सांसद वहीं बैठकर आराम से अपनी ड्रिंक का आनंद ले सकें । मुझे बताया गया कि पश्चिमी देशों में आम तौर पर हर ऑफ़िस और संस्थान में बार रहती है ।वहां की ट्रेनों में भी इसकी व्यवस्था होती है ।यह वहां की संस्कृति का अंग माना जाता है ।केंद्रीय कक्ष में बार के बारे में लोकसभा सचिवालय के एक सहयोगी ने बताया था कि गोरे सदस्य ही इस बार का आमतौर पर प्रयोग करते थे लेकिन कुछ ‘साहिबी’ किस्म के हिंदुस्तानी भी ‘लगा’ लिया करते थे ।जिस तरह से हम लोग चाय या काफी के प्याले पर आम तौर से बातचीत करते हैं ये लोग ड्रिंक पर कोई गंभीर चर्चा करते देखे जाते थे,’हाई’ होते कभी किसी को मेरे सहयोगी ने नहीं देखा था ।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बार हटा दी गयी और उसकी जगह चाय और काफी के काउंटर खुल गये ।
जैसे मैंने पहले कहा है कि जिन दिनों मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता था तब कर्मचारियों की संख्या बहुत ही सीमित थी ।मेरे वहां रहते कुछ नये असिस्टेंट भर्ती हुए थे ।इनमें से ज़्यादातर लोग 22 से 30 वर्ष के बीच थे ।ये ऐसी उम्र होती है जब लोग जगह जगह हाथ पांव मारते रहते हैं ।एक नौकरी हाथ में आ जाने पर उसे हाथ में ले उससे बेहतर स्थान की जुगाड़ में जुट जाते हैं ।ऐसे कुछ लोगों में, मुझे जिनके नाम याद आ रहे हैं, उनमें एक के के कालरा हैं जो शायद साल भर ही लोकसभा सचिवालय में रहे । उन्होंने आईएएस की परीक्षा दी जिसमें उनका चयन हो गया ।वह मेरे बहुत करीबी हो गये थे,कह सकते हैं कि पारिवारिक मित्र ।वह अमृतसर के रहने वाले थे ।उन्होंने अपने परिवार के कुछ चित्र भी मुझसे शेयर किये थे । उनकी तब नयी नयी शादी हुई थी ।उन्होंने अपनी पत्नी और मां के चित्र भी हमें दिखाये थे ।मेरी माँ से वह खूब बतियाया करते थे ।लोकसभा छोड़ने के कई बरसों बाद उनके यहां से उनकी बेटी की शादी का निमंत्रण पत्र आया जो दिल्ली के क्लेरिज होटल में होनी थी।हम सपत्नीक वहां पहुंचे थे ।हमें देखकर वह उनका परिवार खुश हुआ और हम भी काफी समय बाद मिलकर बहुत प्रसन्न थे ।उनकी पोस्टिंग मुंबई में थी,दिल्ली वह बेटी की शादी करने के लिए आये थे।
ऐसे ही एक छाबड़ा जी थे,पूरा नाम भूल रहा हूं ।उनका चयन पीसीएस में हो गया था ।एक बार चंडीगढ़ जाने पर उनसे भेंट हुई थी।एक थे डॉ आर पी आनंद ।दोस्तों के लिए ‘राम’। बहुत ही खुशमिजाज ज़िंदादिल इंसान कद में मार खा गये थे-पांच फीट से थोड़ा ही ज़्यादा रहे होंगे ।जितने दिन लेजिस्लेटिव ब्रांच में रहे हरदिलप्यारे और मिनटों में किसी भी संकल्प या विधेयक की मूल भावना को समझ लेते थे ।कई बार तो सरकारी विधेयकों में गलतियां निकाल कर सेक्शन ऑफिसर के के सक्सेना से कहते थे कि अपनी फ़ाइल में इस बाबत नोटिंग करूंगा ।आप नीचे इनिशियल भर करके उपसचिव को भेज दें ।उन्हें संयुक्त सचिव और सचिव से बात करने दें ।कई बार ऐसा होता था कि उनकी टिप्पणी को सही मानकर मंत्रालय विधेयक का नया ड्राफ्ट भेज दिया करते थे । डॉ आर पी आनंद भी सवा साल में लोकसभा सचिवालय की नौकरी छोड़कर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अन्तरराष्ट्रीय कानून के प्राध्यापक बनकर चले गये थे । 1979 में कई बरसों बाद मेरी उनसे भेंट अमेरिका के हवाई द्वीप की राजधानी होनोलुलू में हुई जहां वह ईस्ट-वेस्ट सेंटर में अनुसंधान कार्य के लिए आये हुए थे ।उनके बारे में अग्रिम जानकारी उनके साले रवि खन्ना ने मुझे मुझे दे दी थी जिनसे वाशिंगटन में वॉयस ऑफ़अमेरिका के ऑफ़िस में मिला था ।
रवि खन्ना से यह मेरी पहली मुलाकात थी ।मुझे वह बहुत ही दबंग पत्रकार लगे वह इसलिए कि जब मैं पूर्व निश्चित कार्यक्रम के अनुसार वीओए ऑफ़िस पहुंचा तो वह समाचार पढ़ रहे थे ।उन्होंने शीशे से मुझे बाहर बैठा देख लिया था और उनके पास मेरे बारे में पूरी जानकारी पहले से थी । समाचार समाप्त करने से पहले मैं यह सुनकर चौंक गया जब उन्होंने कहा ‘आज हमारे लिए प्रसन्नता की बात है कि दिल्ली से ‘दिनमान’ के संवाददाता त्रिलोक दीप हमारे ऑफ़िस में उपस्थित हैं और हमारी यह समाचार बुलेटिन सुन रहे हैं ।हम वीओए में उनका स्वागत करते हैं ।’ समाचार समाप्त कर रवि सीधे मेरे पास आये,हाथ मिलाया और फिर गले मिले यह कहते हुए ‘बादशाहो बहुत देर कर दित्ती ए।’ बाद में मेरे मर्गदर्शक आर्थर डेविस से बोले ‘मैं दीप जी को पहले अपने घर वर्जिनिया ले जाऊंगा और इन्हें पंजाबी खाना खिलाऊँगा,आप भी चल सकते हैं,उसके बाद इन्हें वॉशिंगटन ‘रात की बांहों’ में दिखाऊँगा और उसके बाद उन्हें होटल छोड़ दूंगा ।वह मेरे साथ होटल क़्वालिटी इन गये और मैनेजर से अपना परिचय दे प्रोग्राम बताया और अपने इस नये, अनजान मगर प्यारे और मेहरबान मेजबान के साथ चल पड़ा । हमारे साथ उनके एक सहयोगी अग्निहोत्री भी थे ।वर्जिनिया में उनकी पत्नी वेणु जी से मुलाकात हुई ।बहुत ही सौम्य महिला हैं ।तब उनका एक बेटा था चेतन रवि खन्ना लगभग सारी रात वॉशिंगटन के विभिन्न क्षेत्रों में ले गये ।मार्केट भी सारी रात खुली रहती हैं । बहुत अच्छा अनुभव रहा ।वीओए में ही रहते वह ‘दिनमान’ के लिए लगातार लिखते रहे ।कुछ समय बाद जब वह दिल्ली आये तो हमारे घर डिनर के लिए सपरिवार पधारे ।रवि पहले अमेरिकी भारतीय थे जो दिल्ली में वीओए के प्रमुख बन कर आये थे।उनसे मेरी लगातार मुलाकातें होती रहीं ।करीब डेढ़ दशक पहले वह भारत में आकर बस गये थे ।कई बरस तक दिल्ली में रहे बाद में उनका रंगमंच का शौक उन्हें मुंबई ले गया जहां ‘बजरंगी भाई जान’ जैसी फिल्मों में उन्होंने काम किया ।अमेरिका में रहकर भी वह रंगमंच किया करते थे ।दुख की बात है कि मेरे इस दोस्त का अस्सी वर्ष की आयु में 2023 में मुंबई में निधन
हो गया ।
डॉ आर पी आनंद से अमेरिका में लगभग पंद्रह बरस बाद यह मुलाकात अविस्मरणीय रही। उनके अमेरिका में मौजूदगी के बारे में मुझे रवि खन्ना ने बताया था। उधर रवि खन्ना से मेरी मुलाकात कम दिलचस्प नहीं थी । मैं पहले उनसे कभी नहीं मिला था और न ही उनके बारे में जानता था ।उनका तपाक से मेरा स्वागत करना मुझे अभिभूत कर गया ।दूसरे डॉ आर पी आनंद से उनके रिश्ते की जानकारी पा कर मुझे खुशी भी हुई और आश्चर्य भी ।उन्होंने जब मुझे यह बताया कि होनोलुलू जाने पर आप डॉ आर पी आनंद से मिल लें वहां उनके पास आपके लिए मैंने एक कॉन्सर्ट का कैसट भेजा है ।वह अस्पताल में भर्ती हैंं लेकिन आपसे मिलने के इच्छुक हैं ।जब रवि ने मुझे उनका फोन नंबर दिया तो मैंने यों ही पूछ लिया कि कहीं यह डॉ आर पी आनंद छोटे कद वाले तो नहीं जो कभी लोकसभा सचिवालय में काम करते थे ।अब रवि के चौंकने की बारी थी ।आप उन्हें जानते हैं क्या?मैंने जब रवि को बताया कि जिन दिनों डॉ आनंद लोकसभा सचिवालय की लेजिस्लेटिव ब्रांच में काम करते थे मैं भी उसी ब्रांच में काम किया करता था । रवि ने मुझे तब यह जानकारी दी कि डॉ आर पी आनंद उनके जीजा जी हैं,उनकी बड़ी बहन के पति ।
वॉशिंगटन के बाद मैं कई नगरों से होता हुआ 25 दिनों के बाद होनोलुलू पहुंचा ।वहां पहुंचकर मैंने डॉ राम प्रकाश आनंद से फोन पर बात कर उनसे मिलने का वक़्त तय किया । जब मैं डॉ आर पी आनंद (इसी नाम से प्रसिद्ध परंतु हमारे लिए राम) से मिलने के लिए पहुंचा तो उन्होंने अपनी दोनों बांहें फैलाकर मेरा स्वागत किया ।उठ कर बैठने में उन्हें दिक्कत हो रही थी मैंने उनसे लिपट कर उनका अभिवादन किया जिससे उनकी आंखों के कोर मुझे भीगे हुए नज़र आये ।अस्पताल पर इस बैड पर पड़े होने की वजह के बारे में बताया कि एक दिन उनकी पीठ में बहुत दर्द हुआ जिसके चलते उन्हें पूर्ण विश्राम करने के लिए अस्पताल में इसी तरह से पड़े रहने की ‘सज़ा’ दी गयी है ।दो-तीन में ‘रिहा’ हो जाऊंगा ।मेरे लोकसभा सचिवालय छोड़ने की कहानी के बारे में उन्होंने पूछा तो अज्ञेय से भेंट से लेकर विशेष संवाददाता का टेस्ट देने से लेकर अज्ञेय की ‘मेहरबानियों’ की कथा सुना दी ।उन्हें 1975 और 1977 की पश्चिमी जर्मनी और सोवियत संघ की यात्राओं की दास्तान भी सुना डाली ।मेरे पत्रकारिता में आने के फैसले की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि जिंदगी में जोखिम उठाये बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते ।
डॉ आर पी आनंद ने बताया कि उनकी रुचि सदा अध्यापन कार्य में रही है, फ़ाइलों में सिर गाड़ने की नहीं । क्योंकि जेएनयू में अन्तरराष्ट्रीय अध्ययन में जाने में अभी समय था इस बीच लोकसभा सचिवालय का असिस्टेंट ग्रेड का टेस्ट दे दिया और प्रथम स्थान पर रहा ।वहां बिताये दिनों को मैं अपना ‘स्वर्णिमकाल’ मानता हूं ।उसके दो कारण हैं:एक तो लोकसभा सचिवालय में असिस्टेंट ग्रेड का टेस्ट यूपीएससी के अखिल भारतीय सेवा से किसी मायने में कम नहीं ।दूसरे लोकसभा में काम करना आपके दिमाग के विभिन्न आयामों के किवाड़ खोलता है ।वह बेहद महत्वपूर्ण लर्निंग ग्राउंड है जिसे आप सीखने की प्रयोगशाला और पाठशाला दोनों मान सकते हैं जो आगे चल कर मेरे अध्यापन क्षेत्र में बहुत काम आया ।इसके अलावा टी एस अहलूवालिया,धरममूर्ति चानन,पंडित और आप जैसे प्यारे लोगों की निस्स्वार्थ मित्रमंडली ।बेसख्ता हंसी मजाक जिसमें हमारे एसओ के के सक्सेना भी कभी कभी शामिल हो जाया करते थे ।ऐसा माहौल किसी भी ऑफ़िस का अनोखा, असाधारण और ताउम्र याद रहता है ज़िंदादिल लोगों के बीच का ।और हम सभी लोग काम करने के लिए जब बैठते थे तो भूतों की तरह जुट जाते थे ,एक दूसरे का हाथ भी बंटाते थे और उनके दुख सुख में एक साथ खड़े भी रहा करते थे। ऐसा लगा कि मुझे देख और मिलकर डॉ आनंद कहीं पुराने दिनों में खो गये थे ।
हमारे सबसे करीबी दोस्त थे टी एस अहलूवालिया (तेजिंदर सिंह और दोस्तों के लिए तेज,राम तो उन्हें लाड़ में आकर तेजी भी कह दिया करते थे) जिसे हम दोनों ने बहुत याद किया ।बहुत ही प्यारा और ज़हीन इंसान था ।मैं तो उसकी शादी पर जी एस भसीन, मलिक और सिक्का के साथ पटियाला भी गया था ।वहीं पहली बार मैंने महाराजा के महल के करीब के एक होटल में बियर पी थी ।उसके बाद लोकसभा सचिवालय में रहते कभी नहीं पी लेकिन ‘दिनमान’ में आने के बाद प्रेस सम्मेलनों में अक्सर पीना हो जाता
था ।अहलूवालिया के बारे में मेरी बात सुनने के बाद डॉ आनंद ने भी अपनी स्मरणशक्ति पर ज़ोर डालते हुए कुछ लंचेस का ज़िक्र किया ।लोकसभा सचिवालय छोड़ने के बाद कुछ समय तक तेज से मेरा संपर्क रहा ।मैं उनके घर जनकपुरी भी गया ।उनके और अपने एक पत्रकार मित्र जयप्रकाश भारती के साथ राष्ट्रपति भवन भी गये ।डॉ आनंद ने बताया कि उनकी कई पदोन्नतियां भी हो गयी थीं शायद वह संयुक्त सचिव के पद तक पहुंच गये थे ।मुझे यह भी ज्ञात था कि मेरे और डॉ आर पी आनंद के लोकसभा सचिवालय छोड़ने के बाद वहां खूब विस्तार हुआ था खास तौर पर एस एल शकधर के सेक्रेटरी जनरल बनने के बाद।
मैं दो दिन लगातार डॉ आर पी आनंद से मिला ।उन्होंने झिझकते हुए एक दिन पूछा था कि यदि आपके पास अधिक वज़न न हो तो मैं अपने बच्चों के लिए कुछ सामान भेजना चाहता हूं ।मैंने तुरंत जवाब दिया ‘बाखुशी’। और सचमुच उनका सामान ले जाने में मुझे कोई दिक्कत भी नहीं थी ।उन दिनों पैन अमेरिकन फ्लाइट से दो अटैची ले जाने की अनुमति हुआ करती थी ।हालांकि मुझे रास्ते में हांगकांग रुकना था जहां मुझे काफी शॉपिंग करनी थी लेकिन डॉ आनंद को मैं नाही नहीं कह सकता था ।वह मेरे बहुत प्यारे दोस्त थे ।अपने बिस्तर पर पड़े पड़े ही उन्होंने अपने किसी सहकर्मी की मार्फत अपने बच्चों की ज़रूरत का सामान मंगवाया और एक छोटा सा बैग मुझे दिया जिसे मैंने अपनी एक अटैची के कोने में डाल दिया ।दिल्ली पहुंचने पर उनका बेटा संजय आकर अपने पिता का भेजा सामान ले गया ।आज डॉ आर पी आनंद (1933-2011) हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनकी मधुर यादें आज भी सीने के किसी कोने में ताज़ा हैं ।
(मैटर जारी)













