जब पंडित नेहरू ने अटल जी की पीठ थपथपायी
शायद 1960 की बात है ।मैं तत्कालीन लोकसभा उपाध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के कक्ष में एक मीटिंग के सिलसिले में गया था ।सरदार साहब गैरसरकारी सदस्यों के विधेयकों और संकल्पों (पीएमबी) की समिति के अध्यक्ष थे ।बिज़नेस एडवाइज़री कमेटी के अध्यक्ष लोकसभा के माननीय स्पीकर होते हैं ।बिज़नेस एडवाइज़री कमेटी सदन में जहां सरकारी कामकाज के लिए समय तय करती है वहां गैरसरकारी विधेयकों और संकल्पों पर बहस करने का समय उपाध्यक्ष वाली समिति तय करती है ।बेशक हर शुक्रवार को आधा दिन ही गैरसरकारी बिज़नेस के लिए आरक्षित होता है लेकिन इसका एजेंडा तो पीएमबी शाखा को ही तैयार करना होता है ।यह मीटिंग हर हफ्ते होती है ।
एक दिन मीटिंग समाप्त होने के बाद मैं अपने कागज समेट रहा था कि सरदार हुकम सिंह के कक्ष के दरवाजे पर किसी के दस्तक देने की आवाज़ आयी और साथ ही दस्तक देने वाले की सूरत भी ।’क्या मैं आ सकता हूं सरदार साहब!’ दस्तक देने वाली आवाज़ ने पूछा । ‘आइये आइये वाजपेयी जी ।मेरे साथ प्रकाशवीर जी भी हैं ।आइये पधारिये।ये दोनों सांसद थे अटलबिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री । अटल जी के हाथ में ‘धर्मयुग’ पत्रिका का ताज़ा अंक था ।उसे दिखाते हुए अटल जी ने कहा कि सरदार साहब ये संस्मरण आप कब लिख लेते हैं ।क्या आप हिंदी में लिखते हैं?’ सरदार हुकम सिंह ने उन्हें बताया कि जब मैं किसी संसदीय दल के साथ जाता हूं तो उस देश की न केवल संसदीय प्रणाली पर ही बात करता हूं बल्कि उस देश के भूगोल और इतिहास को भी समझने की कोशिश करता हूं । लौट कर सुबह सुबह बैठकर अंग्रेज़ी में लिख कर ‘स्पोकस्मैन वीकली’ में छपने के लिए भेज देता हूं ।मेरे आलेखों का हिंदी और पंजाबी में अनुवाद यह नौजवान करता है ।सरदार साहब ने मेरी तरफ हाथ का इशारा करते हुए कहा । इसका नाम है त्रिलोक दीप ।यहीं काम करता है ।अभी अभी गैरसरकारी विधेयकों और संकल्पों की समिति की मीटिंग खत्म हुई है ।यह भी जाने वाला था लेकिन मैंने आपके हाथ में पत्रिका देखकर इसे रोक लिया ताकि मैं आप लोगों से इस नौजवान का परिचय करा सकूं ।आप लोग इसके काम के बारे में मुझे बताइयेगा तो मुझे अच्छा लगेगा और इस नौजवान को भी, उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा।इस प्रकार सरदार हुकम सिंह के सौजन्य से मेरा अटलबिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री से परिचय हुआ ।
अब अटलबिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री से नियमित तौर पर मुलाकातें होने लगीं ।जब कभी इनर लॉबी में किसी काम से जाना होता तो सदन के भीतर झांक लेता ।दोनों में से किसी को भी यदि बोलता हुआ देखता तो वहां रुक जाया करता था ।दोनों ही बहुत अच्छे वक्ता थे।अटलबिहारी वाजपेयी सभी विषयों पर बोल सकते थे लेकिन उन्हें विदेश और शिक्षा जैसे मुद्दों पर महारत हासिल थी ।अटल जी हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों धाराप्रवाह बोल लेते थे जबकि प्रकाशवीर शास्त्री की रुचि शिक्षा और कृषि जैसे विषयों में थी।वह बहुत सुंदर धाराप्रवाह हिंदी बोलते थे जिसे सुनकर आनंद आ जाता था ।
उन दोनों से जुड़े कई प्रसंग याद आ रहे हैं ।एक बार मैं इनर लॉबी से आउटर लॉबी से होता हुआ लिफ्ट की तरफ जा रहा था कि अटलबिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री को सदन से निकलते हुए देख मैं रुक गया ।दोनों का अभिवादन किया ।अटल जी ने पूछा कि आपने हिंदी कहां पढ़ी है! हम तो हिंदी जानने वाले सिखों में सिर्फ महीप सिंह को जानते हैं ।वह कानपुर जन्मा हैं इसलिए हिंदी में पले-बढ़े-पढ़े हैं ।और…जी मैं जहां पैदा हुआ हूं वह क्षेत्र पाकिस्तान के हिस्से में चला गया ।1947 में मैं रावलपिंडी के डेनीज स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ता था और पढ़ाई का माध्यम था उर्दू, अग्रेज़ी भी पढ़ाई जाती थी ।वहां से हम लोग टिनिच (बस्ती के पास) आये जहां मेरे पिता के कुछ परिचित रहते थे ।हिंदी की वर्णमाला मैंने वहां सीखी और साल भर के भीतर हिंदी भाषा लिखनी- पढ़नी शुरू कर दी और 1949 में जब मैं रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) के माधवराव सप्रे स्कूल में भर्ती हुआ तो मुझे यह भाषा अच्छी खासी आ गयी थी ।यहां तक कि नवीं कक्षा में पहुंचने पर हिंदी के हमारे अध्यापक पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने मुझसे कई विषयों पर लिखवाना और उस समय के प्रसिद्ध दैनिक समाचारपत्र ‘महाकोशल’ में छ्पवाना शुरू कर दिया था ।1949 के मध्य में हम लोग टिनिच छोड़कर रायपुर आ गये थे और मध्य 1956 में लोकसभा सचिवालय में नौकरी लगने के बाद दिल्ली । आज स्थिति यह है कि मुझे उर्दू भूल-सी गयी है । यहीं काम करते करते मैंने 1959 में पी.यू. कैंप कॉलेज से राजनीतिशास्त्र में बी ए (आनर्स) की डिग्री भी प्राप्त कर ली । काम के साथ साथ अब मैं लेखनकार्य भी करता हूं । इसीलिए सरदार हुकम सिंह के रोचक संस्मरणों का हिंदी और पंजाबी में अनुवाद करके छपवाता रहता हूं ।कभी कभी अफसोस इस बात का होता है कि काश मैंने उर्दू की उपेक्षा न की होती वर्ना उस भाषा के पाठकों के लिए भी यह दिलचस्प संस्मरण लिखता रहता।
दोनों सांसदों ने बड़े सब्र से मेरी आत्मकथा सुनी और पीठ थपथपाते हुए कहा कि जिस व्यक्ति ने उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में हिंदी का अध्ययन किया हो उसकी भाषा में रवानगी कैसे नहीं होगी ।इसीलिए हमने सरदार हुकम सिंह से यह पूछा था कि कहीं आपने खुद तो हिंदी में नहीं लिखा है ।अब पता चल गया कि एक तो आप सरदार साहब की सोच से परिचित हैं और दूसरे अंग्रेज़ी से अनुवाद करते समय सही और सटीक हिंदी शब्दों के आप जानकार भी हैं ।अटल बिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री दोनों ने ही मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा कि आशा है आने वाले दिनों में सरदार हुकम सिंह के कुछ और रोचक संस्मरण पढ़ने को मिलेंगे । मैंने उन्हें निराश नहीं किया ।पहले लोकसभा के उपाध्यक्ष और 1962 में अध्यक्ष (स्पीकर साहब) के समय भी सरदार हुकम सिंह की लेखनी जारी रही ।सरदार साहब ने हर हफ्ते मेरे घर ‘स्पोक्समैन वीकली’ भिजवाने का इंतजाम कर दिया था ताकि बिना विलंब मैं उनके संस्मरणों का अनुवाद करके विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं को भिजवा सकूं ।प्रकाशित संस्मरणों की मैं तीन प्रतियां खरीदा करता था-एक सरदार हुकम सिंह के लिए,दूसरी अटल जी और प्रकाशवीर जी के लिए तथा तीसरी अपने रिकार्ड के लिए । करीब करीब प्रत्येक सप्ताह मैं सरदार साहब के अलावा अटल जी को कोई न कोई पत्रिका देता-‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘नवनीत’, ‘कादम्बिनी’ या किसी दैनिक समाचारपत्र का रविवारीय संस्करण ।अटल जी और प्रकाशवीर जी दोनों मिलकर ये पत्र-पत्रिकायें देखा करते थे।
सरदार हुकम सिंह 1956-62 तक लोकसभा के उपाध्यक्ष रहे और 1962-67 तक लोकसभा के अध्यक्ष।अटलबिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री दोनों कहते और मानते भी थे कि लोकसभा के तीसरे स्पीकर का कार्यकाल जितना चुनौती भरा रहा है उतना शायद ही आने वाले किसी स्पीकर का हो । अटल बिहारी वाजपेयी विपक्षी सांसदों की सबसे अगली कतार में बैठते थे जबकि प्रकाशवीर शास्त्री सबसे अंत वाली सीटों में ।1977 से पहले तक अटल जी जनसंघ के नेता थे जबकि शास्त्री जी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर आते थे । लेकिन 1974 का चुनाव वह जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में लड़े और जीते थे। प्रकाशवीर शास्त्री (30 दिसंबर, 1923-23 नवंबर,1977) हालांकि जाति से त्यागी थे लेकिन उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री की डिग्री प्राप्त कर उसे अपने नाम का अंग बना लिया ।उन्हें आर्य समाज समर्थक माना जाता था ।शास्त्री जी एक बेहतरीन वक्ता थे ।अटल जी और शास्त्री जी की जोड़ी इसलिए भी चर्चित थी कि जब वे सदन की बहस में भाग लेते थे तो वे अपने पॉइंट्स टांक कर लाया करते थे ।अटल जी और शास्त्री जी की शिक्षा के क्षेत्र में समान रुचि थी इसलिए समय की कमी के कारण किसी का कोई बिंदु यदि छूट भी जाता था तो वह अपना कागज दूसरे की तरफ बढ़ा दिया करते थे । ऐसा दोनों में तालमेल हुआ करता था ।
अटलबिहारी वाजपेयी की विदेशी मामलों में बहुत दिलचस्पी थी ।प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विदेश मंत्रालय अपने पास ही रखा हुआ था । विदेश मंत्रालय की मांगों पर हुई बहस का उत्तर देने से पहले पंडित नेहरू अक्सर अटलबिहारी वाजपेयी का भाषण बहुत ध्यानपूर्वक सुनते थे । वह ऐसा दौर था कि जब सदन में शोरशराबा कम ही होता था और सांसद एक दूसरे के भाषण बड़े गौर से सुना करते थे ।विदेशनीति पर पंडित नेहरू का भाषण सुनने के लिए दर्शक दीर्घायें खचाखच भरी रहती थीं ।डिप्लोमेटिक दीर्घा के तो पीछे तक राजनयिकों को खड़े हुए भी देखा जा सकता था ।पंडित नेहरू के अतिरिक्त विदेशनीति पर अटल जी समेत दूसरे विपक्षी सांसदों के भाषणों को भी बहुत तवज्जो से सुना जाता था ।क्योंकि देश की विदेशनीति के प्रति राजनयिकों की विशेष रुचि रहती थी इसलिए अमूमन सभी सांसद अंग्रेज़ी में ही अपनी बात सदन में रखा करते थे ।लेकिन पंडित नेहरू और अटलबिहारी वाजपेयी बीच बीच में अपने भाषण का कुछ हिस्सा हिंदी में भी बोल जाते थे । वैसे भारत की पोस्टिंग पर आने वाले राजनयिक आम तौर पर हिंदी बोलना और समझना जानते थे बावजूद इसके ये दोनों नेता 10-15 मिनट हिंदी में भी बोलते थे ।कभी कभी सांसद और अन्य लोग भी पंडित नेहरू और अटल जी की वाकपटुता की शैली में कुछ साम्य तलाशने का प्रयास किया करते थे जबकि दोनों नेताओं के विचारों के प्रस्तुतिकरण की शैली जुदा जुदा थी ।मुझे लगता है कि अटल जी की अपनी अलग एक विशिष्ट शैली थी जिसमें बीच बीच में थोड़ा रुकना या विराम देना उनके भाषण को विशेष बनाता था ।जगह जगह रुकते तो पंडित नेहरू भी थे लेकिन वह प्राय: इतने पाज़ नहीं लेते थे जीतने अटल जी लिया करते थे ।
पंडित जवाहरलाल नेहरू सदन को बहुत समय दिया करते थे ।दोनों सदनों के लिए उन्होंने समय बांट रखा था ।उन्हें यह ज्ञात होता था कि किस सदन में उनके मंत्रलाय के प्रश्न लगे हुए हैं इसलिए वह उसी सदन में पहले जाया करते थे आम तौर पर केंद्रीय कक्ष यानी सेंट्रल हाल के बीच से होकर ।एक बार लोकसभा में उन्होंने अटलबिहारी वाजपेयी को देश में शिक्षा की कमजोर स्थिति पर बोलते हुए सुना और मेज़ थपथपा कर उसे सराहा ।दूसरी बार पंडित जी ने अटल जी को विदेशनीति पर बोलते हुए सुना ।अटल जी ने विशेष तौर पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन को लेकर चार प्रमुख देशों मिस्र, युगोस्लाविया,घना और भारत के बीच लचर तालमेल का मुद्दा उठाते हुए अपने तर्कों, उदाहरणों और उद्धरणों के साथ जब सदन में रखा तो पंडित जी इससे बहुत प्रभावित हुए यह सोच कर कि कोई सांसद तो है जो विदेशनीति के मामले में इतनी गहन और बारीक नज़र रखता है ।सदन की बैठक समाप्त होने के बाद वह अपनी सीट से उठकर सीधे अटलबिहारी वाजपेयी की मेज़ पर गये और उनके बेहतरीन विवेचनात्मक और विश्लेषिकी भाषण पर बधाई देते हुए कहा कि विदेशनीति पर आपकी पकड़ बहुत मजबूत है,जारी रखियेगा ।वैसे गुटनिरपेक्ष देशों के बीच आज भी एकता बरकरार है,लचर स्थिति तो नहीं है जैसे कि आपने अपने भाषण में कहा है लेकिन यकीन रखिये कि आपके द्वारा दी गयी मिसालों और उद्धरणों की मैं ज़रूर जांच कराऊँगा ।
पंडित नेहरू ने अलबत्ता अटल जी के शिक्षा की समस्या पर उनके विचारों की तारीफ करते हुए कहा कि अच्छा हो आप लोग समस्याओं के साथ समाधान भी सुझाया करें। बहरहाल, इस बाबत शिक्षामंत्री एम. सी. छागला ने मुझसे मिलकर खास तौर पर इस समस्या के बारे में बताया है ।पंडित नेहरू ने अटल जी से कहा कि एक दिन ज़रूर आप शिखर पर पहुंचेगे।और हां, विभिन्न विषयों पर मुद्दों को उठाने और उनके प्रस्तुतिकरण की शैली भी कमाल की है आपकी।लगता है कि अपनी बात सदन में रखने से पहले खूब अध्ययन करते हैं ।हर सांसद की ऐसी आदत होनी चाहिए। पंडित नेहरू ने अटल जी की पीठ थपथपाई ।वैसे भी पंडित जी कहा करते थे कि संसद में अगर विपक्ष मजबूत नहीं होगा तो सत्तापक्ष निरंकुश हो जाएगा जो किसी भी लोकतंत्री देश के विकास के लिए घातक है ।इसलिए मैं विपक्ष को बड़े गौर से सुनता हूं। उनकी नज़र प्रकाशवीर शास्त्री पर भी पड़ी ।पंडित नेहरू ने उनकी भाषण शैली की तारीफ करते हुए कहा कि आप गज़ब के वक्ता हैं, आपकी धाराप्रवह शुद्ध हिंदी में गजब की मिठास है ।आपने कृषि क्षेत्र की जो समस्याएं बतायी हैं वह सरकार के जहन में भी हैं ।निश्चिंत रहें हम केवल गन्ना किसानों का ही नहीं बल्कि सभी प्रमुख उपजें पैदा करने वाले किसानों की खरीद भी उचित मूल्यों पर करेंगे ।प्रकाशवीर शास्त्री ने गन्ना किसानों की बदहाली का मुद्दा सदन में उठाया था । पंडित नेहरू ने शास्त्री जी को आश्वस्त किया कि जिन किसानों की फसलें बाढ़ या अकाल से नष्ट हो जाती हैं ऐसे किसानों को यथोचित मुआवजा दिया जाएगा । यह पंडित नेहरू की विपक्ष से तालमेल बनाये रखने की शैली थी ।सदन की बैठक समाप्त होने पर वह दफ्तर की तरफ नहीं भागते थे बल्कि विपक्ष के सांसदों से वार्तालाप किया करते थे ।
मैं जितने भी प्रसंग लिख रहा हूं वे सुने सुनाये नहीं अपितु आंखों से देखे हुए हैं ।पंडित नेहरू का अटल जी की पीठ थपथपाना भी आंखों देखा मंजर है और प्रकाशवीर शास्त्री से सदन में उठाए गये उनके मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट करना भी ।अब अटल जी से मेरे ‘दोस्ती’ जैसे तल्लुकात बन गये थे । मैं उनसे अक्सर मज़ाक भी कर लिया करता था और कहा करता था कि ‘अब आपका प्रधानमंत्री बनना तय है ।पंडित जी की बहुत पारखी नज़र है ।देखिये पंडित जी खुद चलकर आप की मेज़ तक आये हैं । 1977 में जब मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार में अटल जी विदेशमंत्री बनाये गये तो मैंने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि शिखर पर पहुंचने की यह पहली सीढ़ी है । मेरी बात सुनकर वह ज़ोर से ठहाका मार कर हंस दिए थे ।
वक्ता तो प्रकाशवीर शास्त्री भी बहुत अच्छे थे ।विपक्ष के साथ साथ सत्तापक्ष भी उन्हें पूरे मनोयोग से सुना करता था ।प्रकाशवीर शास्त्री आर्य समाज आंदोलन से जुड़े थे और वैदिक मूल्यों से प्रेरित थे । उनके प्रयासों से स्वामी दयानंद सरस्वती का चित्र संसद के केंद्रीय कक्ष में लगाया गया था ।शास्त्री जी वैदिक संस्कृति के रक्षक थे और वेदों की महिमा से पूरे विश्व को परिचित कराना चाहते थे ।लिहाजा वेदों के अंग्रेज़ी अनुवाद उन्होंने करवाये । संसद के अपने चार कार्यकालों में (तीन लोकसभा और एक राज्यसभा) प्रकाशवीर शास्त्री ने कई महत्वपूर्ण कार्य किये: राष्ट्रभाषा हिंदी के संरक्षण के लिए 1957 में पंजाब में हिंदी सत्याग्रह का संचालन किया जिसके चलते 1961 की जनगणना में बहुत से पंजाबी भाषियों ने अपनी मातृभाषा पंजाबी के बजाय हिंदी लिखवायी ।संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत किये ।इनमें प्रमुख थे संविधान में अनुच्छेद 370 समाप्त करना,
धार्मिक स्थानों-मथुरा,काशी अयोध्या के पुन: संस्थापन संबंधी विधेयक, मार्च,1960 में धार्मिक संरक्षण विधेयक,जिसमें उस समय देश भर में हो रहे गरीबों, विशेष तौर पर अल्पसंख्यकों,के जबरन धर्म परिवर्तन रोकने और उनकी सुरक्षा की बात कही गयी थी। क्योंकि मैं उन दिनों गैरसरकारी विधेयकों और संकल्पों की शाखा से जुड़ा हुआ था,मुझे भी शास्त्री जी के इन विधेयकों की प्राप्ति की याद ही नहीं बल्कि उन पर बहस के लिए सरदार हुकम सिंह की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा समय आवंटित किये जाने की भी जानकारी है । हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग भी वह अक्सर उठाते रहते थे इसकी शुरुआत उन्होंने 1974 में जर्मनी में आयोजित अंतर संसदीय संघ के सम्मेलन में हिंदी में अपने भाषण से की थी ।उनके ही प्रयासों का परिणाम था कि उत्तरप्रदेश,राजस्थान, मध्यप्रदेश,दिल्ली के उच्च न्यायालयों ने अपने निर्णय हिंदी में देने शुरू किये थे।उन्होंने मेरठ,कानपुर तथा वाराणसी में आर्य समाज शताब्दी समारोहों का सफल आयोजन किया और गंगा तट पर आर्य समाज मंदिर का निर्माण करवाया। अफसोस कि 23 नवंबर,1977 को 53 वर्ष की आयु में एक रेल दुर्घटना में प्रकाशवीर शास्त्री का निधन
हो गया ।
अटलबिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री की जोड़ी उन दिनों लोकसभा में बहुत मशहूर थी ।दोनों की करीबी का एक कारण यह भी बताया जाता है कि प्रकाशवीर शास्त्री की तरह अटलबिहारी वाजपेयी की सक्रियता ग्वालियर में आर्य समाज आंदोलन की युवा शाखा आर्य कुमार से हुई जिसके वह 1944 में महासचिव बने ।उसके बाद वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए।अटलबिहारी वाजपेयी और प्रकाशवीर शास्त्री कई समितियों के भी सदस्य थे इसलिए कि दोनों का अलग-अलग दलों से संबंध था ।उनके निवास भी करीब थे ।अटलबिहारी वाजपेयी फिरोज़शाह रोड पर रहते थे जबकि प्रकाशवीर शास्त्री उस रोड के पीछे वाली पटौदी हाउस वाली लेन में । उसका नाम शायद पंडित रविशंकर शुक्ल लेन है । मेरी दोनों से ही भेंट हुआ करती थी।1966 में ‘दिनमान’ में नियुक्ति के बाद मैंने लोकसभा सचिवालय वाले अपने संपर्कों का खूब लाभ उठाया था ।मेरे ये दोनों ‘मित्र’ खुलकर मन की बातें कर लिया करते थे ।’दिनमान’ दोनों की प्रिय पत्रिका होती थी ।कभी कभी वह मुझसे पूछ लेते कि सरदार हुकम सिंह के यात्रा संस्मरणों का अब अनुवाद नहीं करते क्या! मैंने उन्हें बताया कि सरदार हुकम सिंह वाला काम तो जारी है, अब मैं पंजाबी की एक साहित्यिक दंपति श्रीमती प्रभजोत कौर और कर्नल नरेंद्रपाल सिंह की क्रमश: कविताओं और उपन्यासों और उनके अफगानिस्तान के यात्रा संस्मरणों का भी हिंदी में अनुवाद कर रहा हूं ।एक दिन मैंने उन्हें सरदार हुकम सिंह के संस्मरणों के साथ साथ इस साहित्यिक दंपति की भी कुछ अनुदित रचनाएं भेंट कीं ।क्योंकि अटलबिहारी वाजपेयी स्वयं कवि थे उन्होंने प्रभजोत जी की कविताओं को बहुत सराहा ।जब प्रकाशवीर शास्त्री ने भी प्रभजोत जी की कविताओं की प्रशंसा की तो यह सुनकर मुझे खटका हुआ ।इसका निवारण करते हुए अटल जी ने बताया कि प्रकाशवीर जी भी कवितायें लिखते हैं । इसके साथ ही प्रकाशवीर जी ने मुझे यह भी बताया कि जिन दिनों वह पंजाब में हिंदी आंदोलन से जुड़े हुए थे तब उन्होंने अमृता प्रीतम के साथ साथ प्रभजोत कौर के बारे में भी सुना था। दोनों नेताओं ने मुझे बताया कि थोड़ी थोड़ी पंजाबी वह समझते हैं ।
अब क्योंकि मैं सक्रिय पत्रकारिता में आ गया था इसलिए किसी न किसी संवाद के लिए अटलबिहारी वाजपेयी के या तो इंटरव्यू या किसी स्टोरी पर उनकी प्रतिक्रिया की ज़रूरत पड़ जाया करती थी ।उनके निजी सचिव शिव कुमार अटल जी के साथ मेरी निकटता से परिचित थे,इस वास्तविकता से संभवतया अटल जी ने उन्हें अवगत करा दिया था ।जब कभी भी मैं अटल जी को फोन करता तो शिव कुमार जी पूछते कि फोन पर बात करनी है या मिलना है ।अपने संवाद की ज़रूरत के हिसाब से मैं उन्हें बता दिया करता था ।अटल जी के साथ बैठने से एक अद्भुत प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती थी ।
धीरे-धीरे मुझे अटलबिहारी वाजपेयी के प्रारंभिक राजनीतिक जीवन की जानकारी प्राप्त हो गयी थी ।एक तो लोकसभा द्वारा प्रकाशित ‘हूज हू’ से और दूसरे उनसे बातचीत करके भी । संघ में प्रचारक रहते हुए 1947 के दंगों में उनकी कानून की पढ़ाई छूट गयी थी लिहाजा उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय (25 सितम्बर,1916-11फरवरी,1968) के साथ उनके समाचारपत्रों ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक और साप्ताहिक ‘पांचजन्य’ में काम करना शुरू कर दिया ।दीनदयाल जी एक दैनिक पत्र ‘स्वदेश’ भी निकाला करते थे।ये सभी पत्र तब लखनऊ से प्रकाशित होते थे। इस तरह से पत्रकारिता जगत में प्रवेश कर वाजपेयी जी ने इस विधा में भी महारत हासिल कर ली ।21 अक्टूबर, 1951 में दीनदयाल उपाध्याय के साथ संघ द्वारा नवगठित भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में अटल जी भी थे ।एकात्म मानववाद उपाध्याय जी द्वारा एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में तैयार की गयी अवधारणाओं का एक समूह था जिसे1965 में जनसंघ के आधिकारिक सिद्धांत के रूप में अपनाया गया था । उन्हें ‘राष्ट्रजीवन दर्शन’ का निर्माता माना जाता है ।
अटलबिहारी वाजपेयी जनसंघ में उत्तरी क्षेत्र के प्रभारी राष्ट्रीय सचिव बनाये गये । अब उनकी पार्टी के प्रमुख नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी (6 जुलाई 1901-23 जून,1953) से अक्सर मुलाकातें होने लगीं जिसके कारण वह उनके अनुयायी और सहयोगी बन गये । श्यामाप्रसाद मुखर्जी अटल जी की कार्यशैली और पार्टी के प्रति समर्पण की भावना से इतने प्रभावित हुए कि 1957 के लोकसभा चुनाव में उन्हें दो स्थानों से खड़ा किया गया मथुरा और बलरामपुर से ।मथुरा से वह राजा महेंद्र प्रताप से हार गये और चौथे स्थान पर रहे जबकि बलरामपुर की सीट जीत गये ।इस चुनाव में जनसंघ ने चार सीटें जीती थीं ।इस प्रकार वाजपेयी जी का राष्ट्रीय राजनीति में आगाज़ हुआ ।इसके बाद अटलबिहारी वाजपेयी दस बार लोकसभा का चुनाव जीते लखनऊ,ग्वालियर,नई दिल्ली और बलरामपुर निर्वाचन क्षेत्रों से ।आखिरी लोकसभा चुनाव उन्होंने लखनऊ से जीता था ।आजकल लखनऊ का प्रतिनिधित्व प्रतिरक्षामंत्री राजनाथ सिंह कर रहे हैं । दो बार अटल जी राज्यसभा के भी सांसद रहे।
1957 में लोकसभा का सदस्य चुने जाने के बाद अटलबिहारी वाजपेयी ने प्रखर वक्ता के रूप में अपना परिचय दिया तथा जनसंघ की नीतियों के सबसे मुखर रक्षक के रूप में ख्याति प्राप्त की । उनकी भाषण शैली और विषयों के प्रस्तुतिकरण को सर्वत्र सराहा गया ।वह एक ऐसा दौर था जब हर किसी पार्टी के बेहतरीन वक्ता की दिलखोल प्रशंसा की जाती थी ।अपने पहले कार्यकाल में ही लगता है अटलबिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का मन मोह लिया था ।दूसरी तरफ वाजपेयी जी भी पंडित नेहरू की विद्वता,उनके आकर्षक व्यक्तित्व तथा भाषण की शैली से बहुत प्रभावित हुए थे ।यही कारण है कि 27 मई,1964 को पंडित नेहरू के निधन पर अपनी श्रृद्धांजलि में वाजपेयी जी ने उन्हें ‘असंभव और अकल्पनीय का संचालक’ करार दिया था । अटलबिहारी वाजपेयी पंडित नेहरू को कांग्रेस के नेता के तौर पर नहीं देखते थे बल्कि एक प्रबुद्ध और दूरदर्शी प्रधानमंत्री मानते थे जिनके सीने में भारत को विकसित देशों की अग्रिम पंक्ति में बिठाने का जज़्बा था ।मैंने वैसे ही एक बार अटल जी से पूछ लिया था कि जनसंघ जैसी धुर दक्षिणपंथी पार्टी का सदस्य होते हुए आप के मन में पंडित नेहरू के प्रति श्रद्धा, आस्था और अनुराग का भाव क्यों था,बिना हिचकिचाये अटल जी ने कहा था ‘क्योंकि वह सदा उज्ज्वल और विकसित भारत का सपना देखा करते थे ।आप उनकी आंखों और बॉडी लैंग्वेज से इसे समझ सकते थे ।’
बहरहाल, दीनदयाल उपाध्याय के निधन के बाद जनसंघ का नेतृत्व अटलबिहारी वाजपेयी के हाथ में चला गया ।वह 1968 में जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये और 1972 तक इस पद पर रहे ।उन्होंने नानाजी देशमुख,बलराज मधोक और लालकृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर पार्टी का संचालन किया । जनसंघ को तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक ईकाई माना जाता था ।सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण (11 अक्टूबर, 1902-8 अक्टूबर,1979) के आवाहन पर 1977 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विरोध करने के लिए वाम, दक्षिणपंथी और केंद्र दलों में विलय हुआ तो जनसंघ भी उसका प्रमुख हिस्सा थी ।इन सभी दलों को मिलाकर जनता पार्टी का गठन किया गया ।ऐसा करके जेपी भारत में दो दलीय शासन प्रणाली का निर्माण करना चाहते थे । जनता पार्टी ने अपनी एकजुटता का परिचय देते हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पराजित कर जीत हासिल की ।यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनका बेटा संजय गांधी भी चुनाव हार गया ।मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जो सरकार बनी उसमें अटलबिहारी वाजपेयी विदेशमंत्री और लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारणमंत्री बनाये गये ।विदेशमंत्री के तौर पर वाजपेयी ने सितम्बर,1977 में संयुक्तराष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित किया था ।ऐसा करने वाले वह भारत के पहले राजनेता थे ।
लेकिन बहुत जल्दी जनता पार्टी की एकता में सेंध लग गयी और जेपी मायूस होकर रह गये ।वह अस्वस्थ चल रहे थे और बेबस थे । अपने जीवनकाल में ही उन्होंने दो दलीय शासन प्रणाली का ख्वाब चूर होते हुए देख लिया था ।उसमें फूट पड़ गयी ।जेपी निराश हो गये और कहा कि जिन देशों में भी आज दो दलीय शासन प्रणाली है वहां भी कभी दर्जनों अलग-अलग पार्टियाँ हुआ करती थीं । हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे यहां के नेता अपने निजी स्वार्थों से ऊपर नहीं उठ पाये । 8 अक्टूबर, 1979 को जेपी का निधन हो गया । उनके निधन के बाद न केवल एकजुट और संगठित जनता पार्टी बिखर गयी बल्कि उसने कांग्रेस को फिर सँभलने का अवसर प्रदान कर दिया । 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने और मजबूती से वापसी की ।इस हार के बाद तत्कालीन जनसंघ के सदस्यों ने जनता पार्टी छोड़ 6 अप्रैल,1980 को भारतीय जनता पार्टी बनायी जिसके पहले अध्यक्ष बने अटलबिहारी वाजपेयी ।लेकिन बलराज मधोक (25 फरवरी, 1920-2 मई,2016) ने 1979 में जनता पार्टी से इस्तीफा देकर अखिल भारतीय जनसंघ के नाम से जनसंघ को पुनर्जीवित करने की कोशिश की ।उनकी यह पार्टी सफल नहीं हो पायी ।
अटलबिहारी वाजपेयी से जुड़ी इन राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख करना लाजिमी था । लोकसभा सचिवालय में काम करते हुए अटलबिहारी वाजपेयी से बातचीत का दायरा मुख्यतया सरदार हुकम सिंह के संस्मरणों के अनुवाद या लोकसभा में उनके भाषणों की विषयवस्तु और उसके प्रस्तुतिकरण की शैली तक सीमित रहता था।कभी कभार उन्हें प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मिलने वाली प्रशंसा पर भी चर्चा हो जाती जबकि 1966 में ‘दिनमान’ में आने के बाद बातचीत उनके जनसंघ से भाजपा तक के सफर पर भी होती थी।इस बीच मुझे रेडियो के राष्ट्रीय प्रोग्रामो का संचालन करते हुए उनसे कई विषयों पर प्रश्न कर जानकारी प्राप्त करने का ज़िम्मा भी रेडियो के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. आर. के. माहेश्वरी ने सौंप रखा था । रेडियो में मुझे देखकर अटल जी बोले,’महाराज यहां!’ मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर देते हुए कहा,’कुछ अच्छी जानकारी बेहतरीन शैली में सुनने को मिलेगी।’ रेडियो में मैंने अटल जी के साथ अकेले साक्षात्कार किये और कई ऐसे कार्यक्रम भी किए थे जिनमें उनके साथ इंदरकुमार गुजराल, मार्क्सवादी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह भी हुआ करते थे।यह प्रोग्राम पंजाब में आतंकवाद पर होता था ।इसी प्रकार दूरदर्शन में भी अटलबिहारी वाजपेयी से इंटरव्यू करने का अवसर मिला केंद्र निदेशक नंदलाल चावला के सौजन्य से ।उन दिनों अमृतसर दूरदर्शन के लिए दिल्ली से ही प्रोग्राम बनकर जाया करते थे,शरद दत्त के कारण मैं अटल जी से इस केंद्र के लिए भी प्रोग्राम कर लिया करता था ।
मेरी ज़िंदगी का वह ऐसा दौर था कि मैं कई क्षेत्रों में सक्रिय रहता था ।अनुवाद, मूल लेखन, रेडियो, दूरदर्शन आदि में । ‘दिनमान’ के लिए रिपोर्टिंग कार्य भी होता था। मेरी निश्चित बीट तो विदेश और प्रतिरक्षा थी लेकिन मैं स्थानीय समाचार और क्राइम
भी कवर किया करता था ।लोकसभा सचिवालय से जुड़ाव के चलते कुछ इंटरव्यू करने का दायित्व भी मिल जाता ।राजनीतिक नेताओं में अटलबिहारी वाजपेयी, हरकिशन सिंह सुरजीत, इंद्रजीत गुप्ता, इंदरकुमार गुजराल,राव वीरेंद्र सिंह, भानुप्रताप सिंह,पीलू मोदी,बलराम जाखड़ जैसे नेताओं तक मैं किसी वक़्त भी पहुंच सकता था । इतनी लंबी पत्रकारीय पारी में मुझे नहीं लगता कि मुझे किसी भी पार्टी के किसी भी नेता से कभी किसी किस्म की दुश्वारी पेश आयी हो ।अपने विदेशी दौरों में भी किस्मत ने हमेशा मेरा साथ दिया और मेरी महत्वपूर्ण हस्तियों से भेंट होती रही ।
जैसा मैंने कहा कि मुझे अटलबिहारी वाजपेयी से मिलने और उनके एक्सक्लूसिव इंटरव्यू लेने में कभी कोई दिक्कत पेश नहीं आयी ।चाहे पंजाब में आतंकवाद की बात हो, 1984 में स्वर्ण मंदिर में ब्लू स्टार आपरेशन और उसके बाद की राजनीतिक स्थितियों की,भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों के साथ उनके ‘उदार’ व्यवहार को लेकर चर्चाओं की, पाकिस्तान से संबंध सुधार प्रयासों की,विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच ‘मधुर’ संबंधों की उनके विचार हमेशा सटीक रहते थे ।उन्होंने कभी नहीं कहा ‘नो कमेंट’। उन्होंने पोखरण में बम विस्फोट करने से पहले ‘भारत के मिसाइलमैन’ के नाम से प्रसिद्ध अपने वैज्ञानिक सलाहकार एपीजे अब्दुल कलाम (बाद में देश के राष्ट्रपति) से लंबी बातचीत के बारे में बताया कि इसकी जानकारी बहुत ही गोपनीय रखी गयी ।यहां तक कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीक से संपन्न पश्चिमी देशों के कानों तक में इसकी भनक नहीं पड़ी । 11 और 13 मई,1998 को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया । इसके फलस्वरूप पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाये गये जिसका सामना उन्होंने उसी दृढ़तापूर्वक किया जिस तरह 1974 में पहले परमाणु विस्फोट पर इंदिरा गांधी ने किया था ।1974 के पहले परीक्षण का कोड नाम स्माइलिंग बुद्धा (मुस्कुराते बुद्ध) था जबकि पोखरण-2 का नाम ‘आपरेशन शक्ति’ रखा गया । जहां परमाणु परीक्षण किया गया उसका नाम ‘बुद्ध स्थल’ है ।यह पूछे जाने पर कि 1974 की तुलना में 1998 का परमाणु विस्फोट कैसा था,वाजपेयी जी ने बताया था कि इंदिरा जी ने पहल कर विश्व के परमाणु संपन्न देशों को ये चेता दिया था कि भारत को आप हल्के में न लें ।हमारा परमाणु विस्फोट किसी पर आक्रमण की दृष्टि से नहीं किया गया है बल्कि देश के विकास को दृष्टिगत रखकर किया गया है ।’आपरेशन शक्ति’ के परीक्षण के बाद अटलबिहारी वाजपेयी ने देश को नया नारा दिया ‘जय जवान,जय किसान और जय विज्ञान’।
इन दो सफल परमाणु परीक्षणों के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाये गए प्रतिबंधों के बारे में जब पूछा तो अटल जी हंसे और बोले,यह तो 1974 में भी लगाये गये थे ।धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया,अब भी हो जाएगा । परमाणु विस्फोट की चर्चा तो प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव के शासनकाल में भी थी,क्या वह साहस नहीं जुटा पाये,वाजपेयी जी ने हंसते हुए उत्तर दिया,इसका जवाब नरसिंह राव जी ही दे सकते हैं ।जब मैंने कहा कि वह तो आपके मित्र हैं,इस पर ठहाका लगा कर बोले,’जब मित्रों की तरह बैठते हैं तो ऐसी बातें नहीं करते।’ राजनीतिक क्षेत्रों में पी वी नरसिंह राव, अटलबिहारी वाजपेयी और सोमनाथ चटर्जी की दोस्ती की चर्चा अक्सर होती है ।सूत्रों के अनुसार यह बात सही है कि पी वी नरसिंह राव ने परमाणु सुरक्षा और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को ऊर्जा दी थी और 1995 में वह परमाणु परीक्षण करना भी चाह रहे थे लेकिन इसकी भनक अमेरिकी खुफिया विभाग को हो गयी और उसके दबाव में आकर उन्हें यह कार्यक्रम रद्द करना पड़ा ।1998 में जब अटलबिहारी वाजपेयी सत्ता में आये तो नरसिंह राव ने अपनी दोस्ती का निर्वाह करते हुए उन्हें सलाह दी कि ‘सब कुछ तैयार है,अब आप आगे बढ़ सकते हैं’। ऐसा तालमेल रहा करता था सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच ।
पोखरण का परमाणु स्थल मुझे कई बार देखने का मौका मिला है ।पहली बार 1975 में सेना मुख्यालय के सौजन्य से ।वह दिल्ली से पत्रकारों की एक टोली ले गये थे । उसमें ‘राजस्थान पत्रिका’ के मिलाप कोठारी और कुछ दूसरे स्थानीय पत्रकारों को भी शामिल कर लिया गया ।जहां परमाणु परीक्षण हुआ था उससे थोड़ी दूरी से ही हमें विस्फोट वाला स्थान दिखाया गया हालांकि विकिरण आदि का तब कोई खतरा नहीं था बावजूद इसके सेना अधिकारियों ने पूरी चौकसी और सतर्कता बरती । पोखरण जोधपुर से 177 किलोमीटर दूर है ।यहां मुस्लिम आबादी खासी है । परमाणु परीक्षण तो हाल की घटना है लेकिन पोखरण से 10
किलोमीटर दूर रामदेवरा मंदिर स्थित है जहां अगस्त-सितम्बर में बहुत बड़ा मेला लगता है ।यहां राजस्थान के अलावा पंजाब,गुजरात,हरियाणा, मध्यप्रदेश आदि से श्रद्धालु आते हैं । रामदेव को कई नामों से जाना जाता है जैसे रामदेव पीर,रामशा पीर
(1352-1385) जो चौदहवीं सदी के राजपूत थे।जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके पास चमत्कारी शक्तियां थीं और उन्होंने अपना जीवन दलितों,वंचितों और गरीब लोगों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया ।रामदेव जी छुआछूत व भेदभाव मिटाने वाले देवता माने जाते हैं ।यह एक ऐसे लोक देवता हैं जिनकी पूजा संपूर्ण राजस्थान,गुजरात तथा अन्य कई राज्यों में की जाती है ।राजस्थान के मेघवाल समुदाय के लोग रामदेव के कट्टर भक्त माने जाते हैं ।कई सामाजिक समूह उन्हें इष्ट देव के रूप में पूजते हैं ।उन्होंने 33 वर्ष की उम्र रामदेवरा में समाधि ली ।इस समाधि को मंदिर का स्वरूप 1931 में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने दिया ।यहां एक सीढ़ीदार कुआं भी है जिसे परचा बावड़ी के नाम से जाना जाता है ।यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि सामाजिक सद्भाव और समानता का भी प्रतीक है ।
रामदेवरा मंदिर के दर्शन करने के मुझे कई अवसर मिले हैं ।वहां के महंत प्रेमनाथ जी से कई मुलाकातें हुई थीं ।उन्होंने मंदिर के इतिहास के बारे में तो बताया ही बल्कि यह भी बताया कि जब अटलबिहारी वाजपेयी परमाणु परीक्षण स्थल देखने आये थे तो उनके किसी सलाहकार ने रामदेवरा मंदिर की भी जब चर्चा की तो वह भी इस मंदिर के दर्शन करने के लिए आये थे ।महंत जी ने बताया कि 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण के विस्फोटो की आवाज़ दूर दूर तक सुनाई दी थी जिसके फलस्वरूप कुछ लोगों ने आंखों में जलन महसूस की थी तो कुछ की त्वचा पर भी असर हुआ था । पोखरण के कई घरों की दीवारों में दरारें पड़ गयी थीं ।।महंत प्रेमनाथ से जब मैंने रामदेवरा मंदिर से सिखों के जुड़ाव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि कुछ मेघवाल सिख धर्म को भी मानते हैं ।इनके मुख्य आराध्य बाबा रामदेव जी, संत कबीर, ऋषि मेघ आदि हैं ।इनका पारंपरिक व्यवसाय बुनाई रहा है ।मेघवालों को कृषक जाति के तौर भी देखा जाता है ।संत कबीर की वाणी तो गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित है।
पोखरण की प्रसिद्धि परमाणु परीक्षण और रामदेवरा मंदिर को लेकर है ।ये दोनों ही स्थान आज पर्यटन स्थल बन गए हैं ।यहां से जैसलमेर 111 किलोमीटर दूर है पोखरण से 41 किलोमीटर दूरी पर स्थित भादरिया माता का मंदिर है ।श्रद्धालु मंदिर के दर्शनों के अतिरिक्त संत हरबंससिंह निर्मल का आश्रम भी देखते हैं जहां बहुत बड़ी गौशाला है ।यहां पर ज़्यादातर वह गायें हैं जिन्हें पाकिस्तान के बॉर्डर से पकड़ कर लाया गया है । यहां एक भूमिगत लाइब्रेरी है जिसे एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत लाइब्रेरी माना जाता है ।इसे थार रेगिस्तान की एक धरोहर के रूप में भी देखा जाता है ।हरबंससिंह निर्मल पंजाब से भादरिया गांव माता मंदिर शक्तिपीठ का दर्शन करने 1960 में आये और फिर यहीं के हो कर रह गये थे ।भदरिया राय माता मंदिर भाटी वंश की कुलदेवी है ।मंदिर का निर्माण जोधपुर के महाराजा गजसिंह ने किया। हरबंससिंह निर्मल को पढ़ने का बहुत शौक था ।उन्हें अक्सर लेखक-प्रकाशक पुस्तकें भेंट किया करते थे ।मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरी उनसे भेंट हुई थी जिसमें उन्होंने एक अद्भुत लाइब्रेरी के स्थापन की चर्चा की थी ।भादरिया महाराज के नाम से मशहूर संत हरबंससिंह निर्मल से मैं पंजाबी में ही बात किया करता था ।उन्हें ‘लस्सी’वाला बाबा भी कहा जाता था ।उनके सेवकों को यह हुक्म था कि यहां जो भी आये उसे लस्सी पिलाए बिना मत जाने देना ।लाइब्रेरी की कल्पना के बारे में मुझे भदरिया महाराज ने बताया था कि यहां की बला की गर्मी में मैं जिज्ञासु और शोधार्थी छात्रों के लिए ऐसे पुस्तकालय का निर्माण करना चाहता हूं जहां दुनिया के हर विषय की पुस्तकें उपलब्ध हों ।भदरिया माता मंदिर के 16 फीट नीचे लाइब्रेरी का निर्माणकार्य 1998 में पूरा हो गया था। परमाणु परीक्षण के बाद एपीजे अब्दुल कलाम (तब वह राष्ट्रपति नहीं थे) इस लाइब्रेरी को देखने के लिए आये थे और विभिन्न विषयों की नायाब पुस्तकें देखकर बहुत प्रभावित हुए थे ।उन्होंने भदरिया महाराज को शुभकामनाएं देते हुए कहा था कि आज देश में शिक्षा की हर दिशा के महत्व को प्रचारित करने की बहुत ज़रूरत है । ऐसे दुर्गम क्षेत्र में आपने तो ‘ज्ञान की गंगा’ बहा दी है ।कलाम साहब ने इस लाइब्रेरी के बारे में अपनी एक किताब में लिखा भी है ।बताया जाता है कि यहां पर 515 विषयों की 9 लाख से अधिक पुस्तकें हैं जिनमें में विज्ञान,खगोल विज्ञान, ज्योतिष,इतिहास,भूगोल,कृषि तथा प्राचीन भारतीय ग्रंथों और धर्म ग्रंथों से संबंधित पुस्तकें भी हैं ।ये पुस्तकें देश और विदेशों में आयोजित पुस्तक मेलों से खरीदी गयी थीं ।वहां तैनात सेवाकर्मियों से पता चला कि जब पुस्तकों से भरे ट्रक आते थे तो महाराज जी स्वयं पुस्तकों को उतारने में भाग लेते थे ।50 हज़ार वर्ग फीट में फैले एशिया के सबसे बड़े इस भूमिगत पुस्तकालय में तीन फीट चौड़ी और छह फीट लंबी किताबों से भरी 562 कांच की आलमारियां हैं।किताबों को रखने के लिए 16 हज़ार फीट लंबी शेल्फ भी है ।इन किताबों के अतिरिक्त एक हज़ार साल पुरानी पांडुलिपियां भी संरक्षित हैं । इस लाइब्रेरी में चार हज़ार लोग एक साथ बैठकर पुस्तकें पढ़ सकते हैं। उनके लिए दो जून के भोजन की व्यवस्था है ।उन्हें लस्सी, दूध और मक्खन भी दिया जाता है ।जब मैंने उनसे पूछा,’महाराज,इतनी दूर तपती रेत में कौन इस लाइब्रेरी में आयेगा!’महाराज जी मुस्कराये और बोले, हर वह ज्ञान पिपासु,जिज्ञासु और शोधार्थी इस लाइब्रेरी की दुर्लभ और विरल पुस्तकों का लाभ उठाकर अपने ज्ञान में वृद्धि करेगा ।जो पुस्तक कहीं नहीं मिलेगी वह इस लाइब्रेरी में उपलब्ध होगी ।फिर बोले तक्षिला और नालंदा में कहां कहां से लोग शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे ।दूरदृष्टि वाले महाराज जी शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति के लिए यहां एक विश्विद्यालय स्थापित करने के बाबत भी सोच रहे थे । ज्ञान अर्जन चुम्बिकीय आकर्षण-सा होता है । अपने सपनों को साकार करने से पहले ही 2010 में वह हमसे बिछड़ गये ।जब उन्हें जोधपुर में उपचार के लिए लाया गया तो मैं वहीं पर ही था ।दरअसल,मैं हर महीने समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया के एक एनजीओ डालमिया सेवा ट्रस्ट के सौजन्य से आयोजित चिकित्सा शिविरों का अवलोकन करने के लिए जोधपुर जाया करता था ।जब तक मैं अस्पताल पहुंचा तो मुझे बताया गया कि महाराज को वापस भदरिया ले जाया गया है संभवतया वह ब्रह्मलीन हो गए थे । लाइब्रेरी की देखभाल ग्रामीण और मंदिर के भक्तों के द्वारा जगदंबा सेवा समिति नामक एक ट्रस्ट के माध्यम से की जा रही है ।इसे भदरिया मंदिर ट्रस्ट भी कहा जाता है ।
इस सिलसिले में एक प्रसंग और याद आ रहा है । पीवी नरसिंह राव और अटलबिहारी वाजपेयी अलग-अलग राजनीतिक दलों का होते हुए भी दोनों के बीच सम्मानजनक और मैत्रीपूर्ण संबंध थे । अटल जी उन दिनों विपक्ष के नेता थे ।यह प्रसंग मुझे अटलबिहारी वाजपेयी ने खुद बताया था ।एक बार पीवी नरसिंह राव ने मुझे चाय पीने के लिए बुलाया ।तब वह प्रधानमंत्री थे ।उन्होंने कहा कि आपको जिनीवा जाना है संयुक्तराष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेता बनकर ।मैं चौंका ।ऐसा क्यों! नरसिंह राव जी ने कहा कि संयुक्तराष्ट्र में कश्मीर मुद्दे पर आपसे बेहतर भारत के पक्ष का प्रस्तुतिकरण और कोई नहीं कर सकता ।अटल जी हमेशा ‘दल से बड़ा देश’ के सिद्धांत में विश्वास किया करते थे ।27 फरवरी, 1994 को पाकिस्तान ने संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार आयोग में इस्लामी देशों के समूह (ओआईसी) के ज़रिए एक प्रस्ताव रखा जिसमें कश्मीर में हो रहे कथित मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर भारत की निंदा की गयी थी।अगर यह प्रस्ताव पारित हो जाता तो भारत को संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता ।लेकिन वाजपेयी ने आयोग के समक्ष ऐसे तर्क पेश किए जिनसे यह पता चला कि मानवाधिकार का उल्लंघन भारत नहीं अपितु पाकिस्तान कर रहा है । उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल फारूक अब्दुल्ला और सलमान खुर्शीद वाजपेयी जी की कार्यशैली से इतने मुतासिर हुए कि उन्हें लगा ही नहीं कि वह उनसे वरिष्ठ हैं ।दिलचस्प बात यह रही कि जिस ओआईसी के बलबूते पर आयोग के समक्ष पाकिस्तान ने भारत की निंदा का प्रस्ताव रखा था उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिये जिसके चलते पाकिस्तान ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया और इस प्रकार भारत की जीत हुई ।
उन दिनों क्या देश की स्वस्थ राजनीति देखने को मिलती थी ।1991 का लोकसभा चुनाव चल रहा था ।हैदराबाद में मैंने राजीव गांधी की एक सार्वजनिक सभा को कवर किया था,दूसरी रैली कवर करने के लिए बंगलूरू गया था लेकिन वहां उनकी हत्या की खबर सुनने को मिली ।इस पर अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि ‘अगर राजीव गांधी न होते तो मैं आज जीवित न होता ।’ यह चुनावी दौर था और भाजपा राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की जद्दोजहद में लगी थी ।अपनी बात स्पष्ट करते हुए वाजपेयी जी ने 1988 की एक घटना का उल्लेख किया ।उस समय वाजपेयी को किडनी की गंभीर बीमारी थी जिसका देश में उपचार संभव नहीं था ।डॉक्टरों ने उन्हें अमेरिका जाकर इलाज कराने की सलाह दी लेकिन वाजपेयी जी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह अमेरिका जाकर अपना इलाज करा सकें ।उन दिनों राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे और वाजपेयी जी राज्यसभा के सदस्य ।वाजपेयी जी की समस्या का जब उन्हें इल्म हुआ तो राजीव गांधी ने इसका एक तरीका ढूंढ निकाला ।राजीव जी ने अटल जी को बुलाकर कहा कि आपको संयुक्तराष्ट्र जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया है ।आपको अमेरिका जाना है ।उम्मीद है आप इस मौके का लाभ अपनी सेहत के लिए भी उठाएंगे। साथ ही राजीव गांधी ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जब तक अटल जी की किडनी का इलाज न हो जाये, अमेरिका में ही उनके रुकने का इंतजाम किया जाए ।इस तरह से वाजपेयी जी की किडनी का इलाज हो पाया और उन्हें नयी ज़िंदगी मिली । बेशक अटल जी ने इस चुनावी माहौल में राजीव गांधी की इंसानियत की तारीफ करने की हिम्मत की थी ।इसके साथ ही उन्होंने दूसरा खुलासा करके सभी को चौंका दिया था ।अटल जी ने कहा कि सबसे ज़्यादा तारीफ के हकदार राजीव गांधी हैं जिन्होंने अपने जीते जी कभी इस घटना का ज़िक्र तक नहीं किया कि किस तरह उन्होंने मेरी मदद की थी ।न ही उन्होंने कभी मुझे संयुक्तराष्ट्र भेजने का किसी को असली कारण ही बताया ।इसे ही तो कहते हैं कि दाएं हाथ की खबर बाएं हाथ को नहीं होनी चाहिए ।ये थे उन दिनों सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच स्वस्थ राजनीति के रिश्ते ।
उस दौर में सत्तापक्ष विपक्ष को ‘केवल आलोचक’ की दृष्टि से नहीं देखता था बल्कि उसके ‘कहे और सलाह’ को स्वस्थ लोकतंत्री सोच का ज़रिया मानता था ।दोनों पक्षों में बुनियादी शिष्टाचार की भावना हमेशा रहती थी ।2001 में संसद पर जब आतंकी हमला हुआ तो उसकी निंदा सत्तापक्ष और विपक्ष ने एकसुर में की ।दोनों पक्षों के सांसदों और नेताओं ने एक दूसरे की कुशलक्षेम के बारे में पूछा । कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अटलबिहारी वाजपेयी को फोन करके उनकी खैरियत पूछी तो अटल जी ने सोनिया गांधी को फोन किया । ऐसी हुआ करता था सत्तापक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच सद्भावना का माहौल ।
अटल जी हम पत्रकारों से भी बहुत खुले रहते थे ।एक बार जब मैं उनका इंटरव्यू कर रहा था तो कहीं मैं कुछ उलटा सीधा न लिख दूं वह मुझे अपने विचार डिकडेट करके लिखाया करते थे। मुझसे वह पूरी साफगोई से बातचीत किया करते थे । इसका प्रमुख कारण था लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के सौजन्य से हम दोनों का एक दूसरे से परिचित होना ।अटल जी कई बार विभिन्न मंचों पर भी कह चुके थे कि सरदार हुकम सिंह ने लोकसभा सदन में जितनी अलग-अलग प्रकार की चुनौतियों का सामना किया शायद ही किसी दूसरे माननीय स्पीकर ने किया होगा ।वह कहते थे कि सरदार हुकम सिंह ने पंडित जवाहरलाल नेहरू,लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी जैसे प्रधानमंत्रियों की शासन शैली को देखा। बीच में 13-13 दिनों के लिए गुलज़ारीलाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे । 1962 में भारत-चीन युद्ध और 1965 में भारत-पाकिस्तान जंग को लेकर सांसदों के आक्रोश को जिस कुशलता और समझदारी के साथ संभाला इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं ।वह सही मायने में सदन के अभिभावक थे।शायद ही किसी पार्टी के सांसद को उनकी रूलिंग्स को लेकर एतराज रहा हो ।उनके स्पीकरकाल में पंडित नेहरू के विरुद्ध पहला अविश्वास प्रस्ताव आचार्य जे बी कृपलानी लाये,सभी पार्टियों के सांसदों को बोलने का अवसर दिया, डिफेंस ऑफ़ इंडिया कानून भी उन्हीं के समय बना ।सांसदों के विशेषाधिकार का वह इस कद्र ख्याल रखते थे कि उनकी सदन में कही गयी बात को अगर कोई पेपर तोड़मरोड़ कर लिखे तो उसे दंडित करने में वह नहीं चूकते थे ।ऐसा ही एक बार ‘ब्लिट्ज’ वीकली ने आचार्य जे बी कृपलानी के कथन को अमर्यादित ढंग से छाप दिया ।उसके संपादक रूसी करंजिया को तलब किया गया ।लोकसभा को अदालत में बदल दिया गया ।माननीय स्पीकर के आसन के सामने एक कटघरा बनाकर रूसी करंजिया को उसमें खड़ा करके सरदार हुकम सिंह ने उसे पूरे दिन तक वहां खड़े रहने की सज़ा सुनायी । यह अपने आप में एक अविस्मरणीय घटना है ।इतना ही नहीं उन्हीं के समय आटोमेटिक वोटिंग मशीन लगी और उन्हीं ने सांसदों के लिए अंग्रेज़ी से हिंदी और हिंदी से अंग्रेज़ी भाषणों के अनुवाद के लिए द्विभाषीयों की व्यवस्था की ।सदन के काम के अतिरिक्त तीनों प्रधानमंत्रियों ने अकाली नेताओं की पंजाबी सूबे की मांग का समाधान निकालने का ज़िम्मा भी सरदार हुकम सिंह को सौंपा ।यह उन्हीं के सतत प्रयासों का फल था कि न केवल पंजाबी सूबे का हल निकला बल्कि पंजाब में समाहित हिंदी भाषियों को बिन मांगे अलग हरियाणा राज्य मिल गया ।दोनों राज्य 1 नवंबर, 1966 को अस्तित्व में आ गये ।अब मैं बड़ी विनम्रता से आप लोगों से पूछ रहा हूं कि बताइये ऐसा कोई सर्वगुणसंपन्न माननीय स्पीकर अभी तक हुआ है ।यह तो मैंने उनके कुछ चुनिंदा कार्य बताए हैं ।
अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़े बहुत प्रसंग हैं,औरों के भी होंगे, लेकिन मैंने कुछ चुनिंदा प्रसंगों का ही उल्लेख किया है ।अब उस आत्मीय प्रसंग का ज़िक्र कर रहा हूं जिसे याद करके मैं आज भी अभिभूत हो जाता हूं ।घटना है अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर की ।मैं कुल फख्त दो बार अमेरिका गया हूं,पहली बार 1979 में तीस दिनों के अमेरिकी सरकार के निमंत्रण पर और दूसरी बार 1983 में जर्मनी,बेल्जियम और नीदरलैंड्स की यात्रा के बाद । इस बार मैं अपने साढू भाई देसराज तलवार का मेहमान बनकर गया था ।एक दिन लंच करते समय उन्होंने बताया कि आज शाम को भारतीय नेता अटलबिहारी वाजपेयी का भाषण है,चलेंगे ।मैंने तुरंत हामी भर दी ।वहां पहुंचकर देखा तो हाल श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था ।वह अपना भाषण अंग्रेज़ी में दे रहे थे ।मैं जानता था कि अटल जी का हिंदी के साथ साथ अंग्रेज़ी भाषा पर भी समान अधिकार है ।उस समय देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी । उन्होंने अमेरिका और भारत के सौहार्दपूर्ण संबंधों का उल्लेख किया और वहां रहने वाले अप्रवासी भारतीयों को सलाह दी कि आपका पहला कर्तव्य उस देश के नियमों और कानूनों के पालन के प्रति है जहां आप लोग रहते हैं ।उस देश के विकास में अपना पूरा योगदान दीजिये ।भारत के प्रति आपके जज़्बातों की हम कद्र करते हैं ।काफी देर तक अटल जी वहां बोले जिसे लोगों ने पूरे मनोयोग से सुना ।हालांकि भाषण के बाद वह लोगों से घिर गये लेकिन न जाने कहां से उन्होंने मुझे देखकर आवाज़ दी,’दीप’।मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो अटल जी मुझे अपने पास आने का इशारा कर रहे थे ।हम दोनों ने तपाक से हाथ मिलाया और अटल जी अपने प्यार भरे अंदाज़ में बोले,’यहां कैसे महाराज,दिल्ली में तो मिलते नहीं’।मैंने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया,’इसीलिए तो यहां मैं आपसे मिलने के लिए आ गया हूं ।’ अटल जी के साथ मेरी यह बेतकल्लुफी देख नज़दीक खड़े लोग मंद मंद मुस्कुरा रहे थे ।उनसे मैंने अपने साढू भाई का परिचय करते हुए कहा कि इन्हीं की बदौलत आज आपसे मुलाकात हुई ।अटल जी ने देसराज तलवार से भी हाथ मिलाया ।फिर मुझसे पूछा कि कल का क्या कार्यक्रम है,मैंने बताया कि कल सुबह मुझे लंदन के लिए निकलना है ।अटल ने बताया कि ‘मैं न्यूजर्सी में रुका हूं,अगर आपका जाना स्थगित हो जाए तो कल शाम को मिलेंगे ।’ उन्होंने मुझसे संपर्क करने वाले व्यक्ति से भी मिलवाया।लेकिन मेरा प्रोग्राम पूर्वनिश्चित था,क्योंकि मैं ब्रिटिश सरकार का सात दिनों के लिए मेहमान था ।दिल्ली लौटने पर अटल जी से मेरी लंबी बात हुई और मुझे एक्सक्लूसिव स्टोरी भी मिल गयी ।
25 दिसंबर,1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर में ही हुई थी ।हिंदी,अग्रेज़ी और संस्कृत में कला स्नातक की डिग्री उन्होंने ग्वालियर के ही विक्टोरिया कॉलेज (अब महारानी लक्ष्मी बाई कॉलेज ) से प्राप्त की जबकि कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की । लेकिन कानून की पढ़ाई बीच में ही छोड़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य में जुट गये और 1940 से 1944 के दौरान संघ के अधिकारी प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया और 1947 में प्रचारक बन गये ।1951 में भारतीय जनसंघ के साथ जुड़ गये जिसके वह 1968 से 1973 तक अध्यक्ष रहे । हिंदी और ब्रज भाषा के कवि,लेखक और राजनेता अटलबिहारी वाजपेयी 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार में विदेशमंत्री रहे,1996 में 13 दिन और फिर 1998-1999 में 13 महीने तक प्रधानमंत्री रहे ।इसके बाद 1999 से 2004 तक वह पूर्ण कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री रहे,पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री ।उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनायी जिसमें 81 मंत्री थे और लालकृष्ण आडवाणी उपप्रधानमंत्री ।अविवाहित अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने वाले मध्यप्रदेश के पहले व्यक्ति थे ।1992 में पद्म विभूषण तथा 27 मार्च, 2015 को उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।
प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने 1998 में पोखरण रेगिस्तान में पांच भूमिगत परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया ।19 फरवरी,1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा का उद्घाटन किया और उसके पहले यात्री स्वयं प्रधानमंत्री बने ।उनके साथ पत्रकारों और राजनेताओं की एक टीम थी ।कश्मीर और अन्य संघर्षों का स्थायी हल तलाशने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ के साथ बड़े पैमाने पर कूटनीतिक शांति प्रक्रिया की दिशा में बातचीत की।इसके फलस्वरूप लाहौर घोषणा हुई जिसके तहत विस्तरित व्यापार संबंधों और आपसी मित्रता के प्रति प्रतिबद्धता की पुष्टि की गयी । लेकिन यह सारी कवायद धरी की धरी रह गयी, क्योंकि सेनाध्यक्ष परवेज़ मुशर्रफ की शह पर सेना व उग्रवादियों ने करगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया ।लेकिन वाजपेयी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए अपनी धीरज का परिचय देते हुए घुसपैठियों के खिलाफ आपरेशन विजय के साथ जवाब देकर कड़ी कार्रवाई की । करगिल युद्ध तीन महीने चला और भारतीय सेना अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए कब्ज़ियाये हुए क्षेत्र को मुक्त कराने में सफल हुई ।जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने 12 अक्टूबर, 1999 में सैनिक क्रांति करके नवाज शरीफ को सत्ताच्युत कर दिया ।लिहाजा अटलबिहारी वाजपेयी के नवाज शरीफ के साथ हुए समझौते ठंडे बस्ते में चले गये ।वाजपेयी जी की सदाश्यता देखिये कि करगिल युद्ध को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का विकल्प तलाशते हुए पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ के साथ आगरा में संयुक्त शिखर सम्मेलन कर दोनों देशों के बीच संबंध सुधार कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन मुशर्रफ ने कश्मीर मुद्दे को अलग रखने से इंकार कर दिया इसलिए यह सम्मेलन कामयाब नहीं हो सका ।परवेज़ मुशर्रफ ने भारत की इस यात्रा का लाभ उठाते हुए दिल्ली के दरियागंज (गोलचा सिनेमा के पास) अपना जन्मस्थान देखा ।जनरल मुशर्रफ का जन्म 11 अगस्त, 1943 को पुरानी दिल्ली में हुआ था ।
अटलबिहारी वाजपेयी के शासनकाल के महत्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख करना अभीष्ट होगा ।उन्होंने भारत भर के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरुआत की जिसके अंतर्गत दिल्ली,कोलकाता,चेन्नई व मुम्बई को राजमार्गों से जोड़ा गया ।एक सौ वर्ष से भी अधिक पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाया । 1999 में करगिल आपरेशन के बाद हुए लोकसभा चुनाव में एनडीए ने 543 सीटों में से 303 सीटें जीतकर स्थिर बहुमत प्राप्त कर लिया । 22 वर्षों के बाद 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत की राजकीय यात्रा की ।1978 में राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर आये थे।तब मोरारजी देसाई की सरकार थी और अटलबिहारी वाजपेयी विदेशमंत्री थे। वाजपेयी प्रशासन ने 2002 में आतंकवाद निरोधक अधिनियम लाया । वाजपेयी सरकार ने कई घरेलू आर्थिक और ढांचागत सुधार किये,निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया, सरकारी फिजूलखर्ची कम की,अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करना और कुछ सरकारी स्वामित्व वाले निगमों का निजीकरण, राष्ट्रीय राजमार्ग विकास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सर्वशिक्षा अभियान की शुरुआत करके प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना भी शामिल हैं ।
2002 और 2003 में आर्थिक सुधार, विदेशी निवेश में वृद्धि, सार्वजनिक और औद्योगिक बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण, नौकरियों का सृजन, उभरता हुआ हाई टेक और आईटी उद्योग आदि ने देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को बेहतर बनाया ।अच्छी फसल की पैदावार और मजबूत औद्योगिक विस्तार ने भी अर्थव्यवस्था में मदद की । वाजपेयी ने अपनी चीन यात्रा के दौरान तिब्बत को चीन का हिस्सा बताया और चीन ने सिक्किम को भारत के हिस्से के रूप में मान्यता दी ।1999 में करगिल युद्ध और 2001 में संसद पर हमले के बावजूद अटलबिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार के अनेक प्रयास किये ।शायद तभी भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष वैंकैया नायडू ने अटलबिहारी वाजपेयी को ‘विकास पुरुष’ और लालकृष्ण आडवाणी को ‘लौहपुरुष’ का खिताब दिया था ।राजस्थान,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ विधानसभा चुनावों में जीत से भी भाजपा के हौसले बुलंद थे और देश में ‘फील गुड फ़ैक्टर’ का माहौल था । अटलबिहारी वाजपेयी सरकार की इन तमाम उपलब्धियों को ‘इंडिया शाइनिंग’ के तौर पर प्रस्तुत करते हुए लोकसभा के चुनाव उसकी अवधि पूरी होने से छह माह पहले कराए गये। यह ‘अतिमहत्वाकांक्षा’ भाजपा को ले डूबी ।543 में से उसे 138 सीटें ही मिलीं, कई मंत्री चुनाव हार गये,145 सीटों के साथ कांग्रेस बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी ।दूसरी पार्टियों के समर्थन से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) वजूद में आया।डॉ मनमोहन सिंह को यूपीए का नेता चुना गया ।वह देश के नये प्रधानमंत्री बने ।अटलबिहारी वाजपेयी ने दिसंबर,2005 में सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया ।
2009 में उन्हें स्ट्रोक हुआ ।16 अगस्त,2018 को 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया ।उनकी समाधि ‘सदैव अटल’ के नाम से जानी जाती है और उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में चिन्हित किया गया है । अटल जी की मधुर
स्मृतियों को सादर नमन ।













