27 मई, 1983 में सरदार हुकम सिंह के निधन के बाद मैं बहुत समय तक 20, अकबर रोड नहीं गया और न ही उनके रिंग रोड स्थित उनके निवास पर ही । उनकी अनुपस्थिति में परिवार में भी बिखराव पैदा हो गया और काफी समय तक किसी माननीय स्पीकर से भी वैसी निकटता नहीं रही जैसी सरदार हुकम सिंह के साथ थी ।मेरी भांजी वीना का अपने पति जे पी सिंह से संबंध विच्छेद हो गया था और वह दोनों बच्चों के साथ अपने माता पिता के घर आ गयी थी जो उन ।दिनों डिफेंस कॉलोनी में रहते थे ।काफी दिनों के बाद जे पी सिंह अपनी बेटी मीशिका की शादी के स्वागत समारोह में दीखे थे ।हालांकि मैं भी उन्हें निजी तौर पर जानता था लेकिन उनसे मेरा औपचारिक परिचय भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) के तत्कालीन अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अनिल भंडारी ने कराया जो मेरे बहुत पुराने मित्र थे ।अपनी बहन प्रभजोत कौर और बहनोई कर्नल नरेंद्रपाल सिंह के इसरार पर मैं अपनी पत्नी मोहिंदर कौर को भी साथ ले गया था ।प्रभजोत कौर जी की नातिन मीशिका की शादी का स्वागत समारोह था इसलिए सभी के चेहरों पर रौनक थी। लेकिन वीना अपने मन की पीड़ा भीतर छुपाये सभी मेहमानों का दिल से स्वागत कर रही थी।

जहां तक 20,अकबर रोड की बात है मैंने वहां जाना,और वह भी नियमित तौर पर,तब शुरू किया जब बलराम जाखड़ लोकसभा के अध्यक्ष बने । वैसे वह माननीय स्पीकर तो जनवरी, 1980 में बन गये थे लेकिन मेरी उनसे निकटता सरदार हुकम सिंह के निधन के बाद हुई थी ।बेशक मेरी उन्नीसवीं सदी के पैमाने में वह नहीं आते हैं लेकिन लोकसभा सचिवालय और वहां के अध्यक्ष होने के नाते इसे आप सरदार हुकम सिंह के कार्यकाल का विस्तार मान सकते हैं ।दोनों में एक और चीज़ जो सामान्य है वह है मिंटगुमरी।बलराम जाखड़ के पिता चौधरी राजाराम जाखड़ और उनकी माता पातो देवी मिंटगुमरी जन्मा हैं इसलिए परोक्ष तौर पर उनका सरदार हुकम सिंह से ‘रिश्ता’ तो बनता ही है ।उनके पिता चौधरी राजाराम सन 1900 में मिंटगुमरी छोड़ कर पंजाब के फज़िल्का के पंकोसी में आकर बस गये थे । यहीं पर 23 अगस्त, 1923 को बलराम जाखड़ का जन्म हुआ था ।सरदार हुकम सिंह से एक समानता यह भी है कि उन्होंने लाहौर में स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी जबकि सरदार हुकम सिंह ने एलएलबी की ।

बहरहाल मेरा बलराम जाखड़ के यहां आना जाना शुरू हो गया पहले पहल ‘दिनमान’ के संवाददाता के तौर पर । उनसे संसदीय कार्यों को लेकर विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुआ करती थी जो कभी संवाद तो कभी इंटरव्यू के तौर पर ‘दिनमान’ में छपा करती थी ।एक बार उन्होंने मुझे अपने हाथ की उंगलियों में पड़ी गांठों को दिखाते हुए कहा कि देखो दीप, खेतों में जम कर काम करने का यह नतीजा जिसके चलते मुझे ‘कृषक पंडित’ का पुरस्कार प्राप्त हुआ है ।मैंने कीनू की एक नयी प्रजाति विकसित की है जिस की मिठास लाजवाब है।उन्होंने 1965 में भारतीय कृषक समाज नामक एक किसान संगठन की स्थापना की किसानी को आधुनिक रूप स्वरूप देने के बाद मैंने 1972 में कांग्रेस पार्टी की टिकट पर पंजाब विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीता ।1977 में दूसरी बार भी विजयी रहा और विपक्ष का नेता बना ।1980 में पहली बार फिरोजपुर से मैं सातवीं लोकसभा के लिए चुना गया। घर और निजी जिंदगी से जुड़े सारे काम निपटाने के बाद ही मैं राजनीति में आया ताकि मैं दिल से लोगों की सेवा कर सकूं और उनकी समस्याओं के समाधान पर अपनी पूरी तवज्जो दे सकूं ।

करीब साढ़े छह फुट लंबा उनका गोरे चिट्टा व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था और उनके चेहरे का नूर और उस पर तिरेरती हुई मुस्कान उसे और मोहक बनाती थी ।मुझसे वह अक्सर पंजाबी में ही बातचीत किया करते थे ।उन्होंने मुझे एक बार बताया कि जब मैं पहली बार लोकसभा के लिए चुनकर आया तो साथी सांसदों का खूब प्यार मिला ।कुछ तो मुझे ‘कृषि पंडित’ के तौर पर जानते थे जबकि कांग्रेस के सांसद मुझे पंजाब के मंत्री और विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता के रूप में भी। सांसद चुने जाने के बाद जब
मैंने पार्टी अध्यक्ष श्रीमती इंदिरा गांधी से भेंट की ।उन्होंने मुझसे छूटते ही पूछा कि वकालत वगैरह का भी कुछ ज्ञान है कि नहीं, क्योंकि हम आपको लोकसभा का अध्यक्ष बनाने पर विचार कर रहे हैं ।आपके आकर्षक व्यक्तित्व और हाज़िरजवाबी के तो सभी लोग कायल हैं और इसीलिये आप इस महत्वपूर्ण पद के लिए मुझे बहुत सही व्यक्ति लगते हैं। बेशक लोकसभा के अध्यक्ष का दायित्व बहुत ही चुनौतीपूर्ण होता है ।मैंने उन्हें इतना विश्वास दिलाया कि बेशक तकनीकी तौर पर मैंने वकालत नहीं पढ़ी है लेकिन उसके दांवपेंच से पूरी तरह से बाखबर हूं और दूसरे मैं किसान का बेटा हूं इतना तो सामान्य ज्ञान रखता ही हूं कि विषम परिस्थितियों से कैसे निपटा जाता है ।लगता है कि श्रीमती गांधी मेरी हाज़िरजवाबी से खासी मुतासिर हो गयीं और इस प्रकार मुझे लोकसभा का अध्यक्ष बनाया गया था ।

सातवीं लोकसभा का चुनाव वह फिरोजपुर से जीते थे जबकि 1984 का चुनाव सीकर से ।उनके पहले कार्यकल से प्रसन्न होकर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी उनसे लोकसभा के माननीय स्पीकर का पद संभालने का जब आग्रह किया तो बलराम जाखड़ उन्हें मना नहीं कर सके ।इस प्रकार बलराम जाखड 1980 से 1989 तक इस पद पर रहे और इतिहास में सबसे लंबे समय तक लोकसभा अध्यक्ष रहने वाले व्यक्ति बन गये ।उनका कार्यकाल कुल 9 साल और 329 दिन रहा। वैसे कई अन्य सांसद भी दो कार्यकाल के लिए लोकसभा अध्यक्ष चुने जाते रहे हैं लेकिन सिवाय बलराम जाखड किसी दूसरे स्पीकर का दूसरा कार्यकाल पूरा नहीं हुआ। बलराम जाखड़ के स्पीकरकाल में संसदीय कार्यों के स्वचालन और कंप्यूटरीकरण को बढ़ावा दिया गया।संसद के पुस्तकालय,संदर्भ, अनुसंधान और सूचना सेवाओं में वृद्धि हुई तथा संसद संग्रहलय उन्हीं के समय की देन है ।जाखड़ राष्ट्रमंडल संसदीय कार्यकारी मंच के अध्यक्ष चुने जाने वाले पहले एशियाई थे । लोकसभा के वर्तमान अध्यक्ष ओम बिड़ला भी दूसरी बार माननीय स्पीकर चुने गये हैं ।यदि उनका कार्यकाल 2029 तक बिना किसी अवरोध और व्यवधान के चला तो वह बलराम जाखड़ के अब तक के स्थापित रिकार्ड को तोड़ने में सक्षम हो सकते हैं ।

अब बलराम जाखड़ के यहां मेरा नियमित तौर पर आना जाना शुरू हो गया।घर में भी और ऑफ़िस में भी ।अपने निजी सचिव बाली जी से कहकर उन्होंने मेरा लोकसभा का पास भी बनवा दिया लिहाजा मुझे रिसेप्शन ऑफ़िस जाने की दरकार नहीं पड़ती थी ।उनके निवास स्थान पर एक दिन मेरी एक विदुषी महिला से मुलाकात हुई ।उनका नाम है श्रीमती नफ़ीस खान ।वह कनाडा निवासी हैं लेकिन उनका भारत नियमित तौर पर आना जाना लगा रहता है ।वह उद्योगपति संजय डालमिया के ऑफ़िस में महाप्रबंधक थीं और बलराम जाखड़ उन्हें अपनी बेटी की तरह मानते थे ।धीरे-धीरे उनसे मेरी दोस्ती हो गयी ।इसलिए भी क्योंकि मैं संजय डालमिया से हफ्ते में कम से कम एक बार ज़रूर मिला करता था। तब वह मेरे मित्र थे ।

संजय डालमिया से मेरा परिचय संस्कृतिप्रेमी तथा तत्कालीन आयकर आयुक्त ठाकुरप्रसाद झुनझुनवाला (दोस्तों के लिए टीपी भाई साहब और मेरे लिए भैया) और उनकी पत्नी श्रीमती शीला झुनझुनवाला ने 1972 में कराया था । शीला जी दिल्ली आने से पहले मुंबई में ‘धर्मयुग’ पत्रिका में महिला पृष्ठ की संपादक थीं और इन दिनों ‘अंगजा’ नामक महिला पत्रिका का संपादन कर रही थीं । ‘दिनमान’ में हड़ताल होने की वजह से मैं ‘अंगजा’ में शीला जी की सहायता किया करता था ।इस कारण मैं उनके रवींद्र नगर सरकारी आवास पर काफी देर तक रहा करता था ।उनके सौजन्य से संजय डालमिया से पहले मेरा परिचय हुआ जो बाद में मित्रता में तब्दील हो गया ।कहीं कहीं तो वह मेरे छोटे भाई की भूमिका भी निभाया करते थे ।संजयजी के साथ मेरे इन रिश्तों से नफ़ीस जी वाकिफ थीं और अब बलराम जाखड़ के साथ मेरी करीबी को भी उन्होंने देख लिया था । नवंबर, 1989 में संजय डालमिया के पेपर ‘संडे मेल’ का जब मैं कार्यकारी संपादक बना तो नफ़ीस जी से अक्सर मुलाकातें होने लगीं और देखते ही देखते हम एक दूसरे बहुत ही अज़ीज़ दोस्त बन गये ।यह दोस्ती आज भी बरकरार है ।बेशक आजकल वह कनाडा में रहती हैं लेकिन फोन पर बातचीत होती रहती है ।वह भी मेरी पारिवारिक मित्र हैं ।

एक दिन बलराम जाखड के निजी सचिव बाली जी का फोन आया कि साहब पंजकोसी जा रहे हैं और वह चाहते हैं कि आप भी उनके साथ चलें ।कल सुबह की फ्लाइट से हम लोग बठिंडा चलेंगे और वहां से गाड़ी से पंजकोसी ।आप सुबह समय पर 20, अकबर रोड पहुंच जायें ।मैंने अपने संपादक श्री रघुवीरसहाय को सूचित कर उनकी अनुमति प्राप्त कर ली ।मुझे देखकर जाखड़ साहब बहुत खुश हुए और पंजाबी में बोले, मैनू पता सी तू मेरे नाल चलेंगा।तू हमेशा मेरे नाल ही रवीं ।’ उन्होंने बाली जी को भी यह हिदायत दे दी। बठिंडा एयरपोर्ट पर जो उनका शानदार स्वागत हुआ वह काबिलेतारीफ था।उसके बाद पंजकोसी जाते हुए रास्ते में लोगों की भीड़ हाथ हिला हिला उनका स्वागत कर रही थी ।कई स्थानों में उनके आगमन की खुशी में स्वागत द्वार बनाये गये थे ।चार-पांच जगहों पर वह गाड़ी से उतरकर लोगों से मुखातिब भी हुए ।क्या इज़्ज़त थी बलराम जाखड़ की ।

पंजकोसी पहुंच कर सबसे पहले वह अपनी माँ के घर गये जो अकेली रहती थीं ।बलराम जाखड ने झुक कर उनके पांव छुए ।कुछ देर उनके पास बैठे,हालचाल पूछा और फिर अपनी हवेली की तरफ चले गये ।खूब बड़ी और शानदार हवेली है ।उनके साथ चल रहे एक अधिकारी ने जाखड़ साहब से कहा कि दीप जी को सर्किट हाउस में ठहरा देते हैं,उनके लिए कमरा बुक है ।जाखड़ साहब उनका इशारा समझते हुए बोले,तुम लोग मेरे भाई को बिगाड़ना चाहते हो ।याद रहे कि दीप पत्रकार के अलावा मेरा छोटा भाई भी है ।यह भी बाली जी के साथ हवेली में ही रहेगा । थोड़ी देर में तैयार होकर बलराम जाखड़ बाहर आये और बोले चलो दीप तुम्हें पंजकोसी दिखाता हूं ।वह झक सफ़ेद कुर्ता और धोती पहने हुए थे ।छोटा सा लेकिन साफ सुथरा गांव है ।एक घर में पहुंच कर परिवार से मिले और ज़मीन पर बिछी हुई दरी पर ही बैठ गये ।उनके घर कोई मातम हुआ था।वह परिवार से अपनी संवेदना व्यक्त करने के आये थे।बाली जी ने बताया कि यह साहब का उसूल है कि गांव आने पर वे वहां के सारे परिवारों से मिलते थे ।जिनका यहां गमी होती है तो उन्हें दिलासा देते हैं और परिवार की अगर आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती तो उनकी मदद भी करते हैं ।खुशी वाले घरों में भी जाकर उन्हें बधाइयां और शुभकामनाएं देना वह कभी नहीं भूलते ।

करीब डेढ़ घंटे बाद हम हवेली लौट आये ।बोले तुम मेरे साथ ही आ जाओ ।उन्होंने अपना कमरा दिखाया जो अच्छी तरह से सुज्जित था ।उनके नाप का ही एक बड़ा से पलंग था ।उस पर बैठते हुए बोले,तुम्हें यहां रात में रहने से कोई तकलीफ तो नहीं है ।तुम चाहो तो बाली जी के साथ उनके कमरे में रह सकते हो,अलग से कमरा चाहिए तो उसका इंतजाम भी हो सकता है ।मैंने बाली जी के साथ रहना ही उचित समझा ।एक तो उन्हें मैं अच्छी तरह से जानता था और दूसरे अपनी स्टोरी के लिए उनसे इनपुट भी लेना था ।जाखड़ साहब ने बाली जी को सावधान करते हुए कहा कि दीप को ‘कड़ी’ (बड़े) वाले गिलास में दूध मत देना,शहरी बाबू पचा नहीं पायेगा यहां का खालिस दूध,छोटे गिलास में ही देना ।जाखड़ साहब ने मेरी हर छोटी बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखा ।वह यह भलीभांति जानते थे कि उनके साथ चलने वाले सरकारी अधिकारी मेरा किस तरह का अतिथित्य सत्कार करेंगे । मुझे वह अपने साथ रखना चाहते थे इसलिए भी क्योंकि अपने संवाद लिखने के लिए सही माहौल भी मिल जाये ।

अगले दिन सुबह बलराम जाखड़ मुझे अपने खेत दिखाने के लिए ले गये । एक जगह खड़े होकर उन्होंने हाथ के इशारे से खेतों को दिखाते हुए बोले ये सारे खेत मेरे तीनों बेटों के हैं ।फिर एक एक कर मुझे तीनों के घर ले गये जो खेतों में ही बने हुए थे ।पहले बड़े बेटे सज्जन कुमार के घर ले गये और उनके परिवार से मिलाया ।यह भी बताया कि सज्जन की पत्नी राजस्थान के नेता राम निवास मिर्धा की बेटी है ।वहां हमें कीनू का रस पिलाया गया जो सचमुच बहुत मीठा था ।दूसरे बेटे सुरिन्दर कुमार और उनके परिवार स मिलवाते हुए कहा कि मेरे इस बेटे ने सारा बिज़नेस संभाल रखा है ।तीसरा बेटा सुनील जाखड़ सबसे छोटा है ।जिन दिनों मैं मिला वह अविवाहित ही था ।वह तभी से राजनीति की ओर उन्मुख था और जाखड़ साहब के राजनीतिक कार्यों को देखा करता था ।इन तीनों भाइयों के अपने अपने खेतों के पास ही कोठीनुमा मकान थे ।सज्जन कुमार पंजाब सरकार में मंत्री भी रह चुके थे ।

उसके बाद हम लोग बठिंडा से फ्लाइट लेकर दिल्ली के लिए निकल पड़े ।बलराम जाखड़ के साथ उनकी पत्नी भी थीं ।उनसे मेरा परिचय कराते हुए कहा कि है तो यह पत्रकार लेकिन मेरा छोटा भाई है ।मैंने उनके पांव छू कर आशीर्वाद लिया ।’दिनमान’ में मैंने ‘एक दिन बलराम जाखड़ के साथ’ की आँखों देखी रिपोर्ट लिखी जिसे काफी पसंद किया गया ।बलराम जी ने फ़ोन करके मुझे बधाई देते हुए कहा कि पत्रकार तुम्हारे जैसा होना चाहिए जो निर्भीक होकर लिखने का दमखम रखता हो ।बेशक तुम्हारी यह प्रायोजित यात्रा थी लेकिन तुम्हें जो कमियां-खामियां महसूस हुईं उन्हें बेहिचक होकर लिखा । तुम्हारे कुछ नुक्ते और सुझाव मुझे रुचे हैं ।खुश रहो ।

बलराम जाखड़ से अक्सर मिलना लगा रहता था ।लोकसभा सचिवालय का पास बन जाने से अधिवेशन के दिनों में तो मैं करीब करीब रोज़ ही पहुंच जाता था ।संसद भवन के भूगोल में तब तक कोई खास बदलाव नहीं आया था ।मैं ज़्यादातर तो जाखड़ साहब के स्टाफ के पास ही बैठता था। बाली जी के अलावा हरबीर सिंह से भी दोस्ती हो गयी थी ।उनसे मिलने आने वाले सांसदों और ‘बड़े लोगों’ से भी मुलाकातें होती रहती थीं । कभी कभी मैं किसी स्टोरी के सिलसिले में जाखड़ साहब से भी मिल लेता था ।कई बार उनके माध्यम से एक्सक्लूसिव स्टोरीज़ भी मिल जाया करती थीं ।यदाकदा पहली मंज़िल पर स्थित सूचना शाखा में भी चला जाता जहां संसद कवर करने वाले पत्रकारों से भी मुलाकात हो जाती थी ।

1984 का लोकसभा चुनाव बलराम जाखड़ ने राजस्थान के सीकर से लड़ा और जीता था । उन दिनों दिल्ली और सीकर के बीच कोई सीधी ट्रेन नहीं हुआ करती थी ।वहां के लोगों की यह एक मुख्य मांग थी ।जाखड़ साहब ने रेलमंत्री बंसीलाल से बात कर शीघ्र ही लोगों की इस मांग की पूर्ति कर दी ।दिल्ली और सीकर के बीच जो ट्रेन चली वहां के लोगों ने इसका नाम ‘जाखड़ एक्सप्रेस’ रख दिया,सरकारी नाम कुछ और था।एक दिन जाखड़ साहब के निजी सचिव हरबीर सिंह का फोन आया कि साहब सीकर जा रहे हैं और वह चाहते हैं कि आप भी उनके साथ चलें।दिल्ली से वह सड़क मार्ग से चलेंगे,रास्ते में कई सभाओं को संबोधित करना है ।उन दिनों ‘दिनमान’ के संपादक थे डॉ कन्हैयालाल नंदन ।उन्हें मैं सूचित कर जाखड़ साहब के साथ निकल गया ।पहला पड़ाव था कोट पुतली ।सीकर का संसदीय क्षेत्र वहीं से शुरू होता था । वहां बहुत बड़ी सार्वजनिक सभा थी ।जाखड़ साहब का खूब स्वागत हुआ और कुछ मालाएं मेरे गले में भी डाल दी गयीं ।स्थानीय नेताओं ने बलराम जाखड़ के ज़ोरदार स्वागत के बाद क्षेत्र की समस्याएं भी बतायीं ।उन्होंने अपना भाषण राजस्थानी में दिया और लोगों को आश्वस्त किया कि जितने भी आप लोगों ने मुझे ज्ञापन सौंपें हैं उनपर पूरी कार्यवाही होगी ।जाखड़ बहुभाषी हैं। वहअंग्रेजी,हिंदी,उर्दू,संस्कृत,पंजाबी के अलावा बागड़ी और राजस्थानी भी जानते हैं ।वे लोग अपने घर में बागड़ी ही बोलते थे ।उसके बाद नीम का थाना और उदयपुर वाटी की सभाओं को संबोधित करते हुए सीकर पहुंचे थे ।

दिल्ली से सीकर की दूरी करीब तीन सौ किलोमीटर है ।क्योंकि हम लोग सुबह ही दिल्ली से निकल पड़े थे इसलिए दोपहर तक सीकर पहुंच गये ।वहां लंच करने के बाद सर्किट हाउस में थोड़ा आराम करने के बाद जनसभा स्थल पहुंचे ।सीकर के निवासियों की ओर से जाखड़ साहब द्वारा ट्रेन के ‘उपहार’ के लिए शुकराना अदा करते हुए नयी मांगों के ज्ञापन उन्हें थमा दिये गये ।यहां भी जाखड़ ने लोगों को राजस्थानी में संबोधित किया ।सीकर जाटबहुल क्षेत्र हैं और स्थानीय निवासियों ने चौधरी बलराम जाखड़ में अपनी छवि देखी, ऐसा मुझे प्रतीत हुआ । 1989 में यहां के मतदाताओं ने जाखड़ के बनिस्पत चौधारी देवीलाल को तरजीह देकर बेशक उन्हें सामयिक ‘चोट’ पहुंचाई थी लेकिन 1991 को बलराम जाखड को पुन: जिताकर यहां के मतदाताओं ने अपनी गलती सुधार ली थी ।1991 के चुनाव में जाखड़ के नामांकन के समय श्रीमती नफ़ीस खान के साथ मैं भी उपस्थित था ।

दिल्ली से सीकर जाते हुए मैं चौधरी हरबीर सिंह के साथ उनकी गाड़ी में सफर कर रहा था क्योंकि तब जाखड़ साहब के साथ स्थानीय नेता हुआ करते थे ।वापसी में जाखड़ साहब ने मुझे अपनी मर्सिडीज में अपने साथ बिठा लिया ।रास्ते भर कई तरह की गज़लों के टेप चलते रहे और हम लोग बातचीत भी करते रहे ।मैंने उनसे पूछा कि आप को लोगों को जितने ज्ञापन मिलते हैं उनपर कार्यवाही कैसे करते हैं तो उन्होंने बताया कि ये ज्ञापन सभी संबंधित मंत्रियों को इस सिफारिश के साथ भेज दिये जाते हैं कि इन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए उचित कार्यवाही करें ।कई ज्ञापनों पर मैं संबधित मंत्री से फोन पर बात करता हूं और ज़रूरत पड़ने पर अपने चैंबर में बुलाकर कार्यवाही करने के लिए भी कहता हूं ।कोशिश यही रहती है कि हर ज्ञापनकर्ता की सही और उचित मांग का समाधान हो और होता भी है ।वह मैं इसलिए कहता हूं कि मेरे निजी सचिवों का इन ज्ञापनकर्ताओं के साथ संपर्क रहता है ।कोई सचिव पंजाब से आये ज्ञापनों और दरखास्तों को देखता है तो कोई राजस्थान से आने वाले आवेदनों को ।मेरे ऑफ़िस में हर काम सही ढंग से होता है और मैं खुद भी सभी प्रमुख कामों पर नज़र रखता हूं ।

मैंने महसूस किया कि इधर मेरे सवालों का बलराम जाखड़ जवाब दे रहे थे और उधर किन्हीं मनपसंद गजलों को गुनगुना भी रहे थे खास तौर पर जगजीत सिंह की ।उन्होंने बताया कि एक बार जगजीतसिंह मिलने के लिए आये और अपने ढेर सारे टेप मुझे दे गये ।क्या उनमें पंजाबी के भी टेप थे ।थोड़ा सोचकर बोले शायद नहीं ।मैंने उन्हें कहा कि मैं आपको दे जाऊंगा और खास तौर पर शिव बटालवी की गज़लों को ज़रूर सुनियेगा ।वादे के मुताबिक मैं खुद अगले दिन जगजीतसिंह का एक पंजाबी टेप दे आया ।अब बलराम जाखड़ से मिलने के लिए मुझे पूर्व समय नहीं तय करना होता था,अगर वह ऑफ़िस या घर पर हैं तो मैं कभी भी उनसे मिल सकता था ।उनके निजी सचिव भी इस व्यवस्था से परिचित थे।

धीरे धीरे बलराम जाखड़ मेरे लिए केवल एक राजनीतिक नेता ही नहीं रहे बल्कि घर के ‘बड़े’ हो गये ।उनका आशीर्वाद हमारे बच्चों को भी मिलने लगा ।1986 में मेरी बड़ी बेटी मनजीत कौर की शादी थी और विवाह स्थल था कांस्टीट्यूशन क्लब ।बेटी की शादी में सगे-संबंधियों के अलावा मित्र और हितैषी भी थे ।हमारे यहां सुबह की शादी होती है ।बलराम जाखड़ समय पर आ गये, उद्योगपति संजय डालमिया अपनी पत्नी इन्दु जी के साथ आये,सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय और इला डालमिया, मृणाल पांडे और अरविंद पांडे जी ,मेरी बहन प्रभजोत कौर और कर्नल नरेंद्रपाल सिंह,शीला झुनझुनवाला और टीपी भाई साहब आदि समय पर पधार गये ।बारात आयी ।हमारे यहां ‘मिलनी’ की एक रस्म होती है ।इसमें वधु पक्ष के रिश्तेदार वर पक्ष के संबंधियों का गले मिलकर स्वागत करते हैं और उन्हें कुछ उपहार देते हैं ।इसमें एक लिफाफा शगुन के तौर पर भी हो सकता है या कोई जेवर आदि भी।मेरी बेटी के दादा की मिलनी मेरे चाचा परमानंद जी ने की और नाना की मेरी पत्नी के चाचा ईशर सिंह ने ।अब ताऊ और चाचा की मिलनी का जब सवाल उठा तो बलराम जाखड़ ने ताऊ की रस्म को निभाया और चाचा की रस्म संजय डालमिया ने अदा की ।उस समय संजयजी मेरे बहुत प्रिय मित्र थे ।फूफा की मिलनी कर्नल नरेंद्रपाल सिंह ने की।इसी प्रकार दिसंबर,1995 में मेरी छोटी बेटी सीमा कौर की शादी में भी बलराम जाखड़ और संजय डालमिया की भूमिकाएं यथावत रहीं ।1988 में मेरे बड़े बेटे मनदीप सिंह की शादी के समारोह में जाखड़ साहब और संजयजी किन्हीं कारणों से उपस्थित नहीं थे लेकिन 1996 में मेरे छोटे बेटे अमरदीप सिंह की शादी में भी बलराम जाखड़ बहू बेटे को आशीर्वाद देने के लिए कनिष्क होटल पहुंचे थे तो संजय डालमिया उनके स्वागत समारोह आयोजित कार्यक्रम में बहुत देर तक रहे थे ।

जब कभी भी बलराम जाखड़ के यहां कोई विशेष समारोह होता तो मुझे भी याद किया जाता । 1984 में राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने बलराम जाखड़ से एक बार फिर लोकसभा का माननीय स्पीकर बनने का अनुरोध किया । पहले वह ऊहापोह की स्थिति में थे ।वह जानते थे कि सदन की कार्यवाही चलाना कोई सहज कार्य नहीं है ।दोराहे पर खड़े इस हालात पर जब उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या करना चाहिए तो मैंने पंडित जवाहरलाल नेहरू को उद्धृत किया। वह कहा करते थे ‘माननीय स्पीकर को बुलाया नहीं जाता उनके कक्ष में जाकर निवेदन किया जाता है कि अमुक कार्य के लिए आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है वह माननीय स्पीकर का स्थान प्रधानमंत्री पद से ऊपर मानते थे।उनके अनुसार राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बाद लोकसभा स्पीकर का स्थान होता है ठीक वैसे ही जैसे कि अमेरिका में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बाद वहां की निम्न सदन प्रतिनिधिसभा के स्पीकर का ।और बलराम जाखड़ ने दूसरी बार स्पीकर बनने के राजीव गांधी के अनुरोध को स्वीकार कर लिया ।

बलराम जाखड़े से जुड़े मेरे पास तमाम ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें गाहेबगाहे याद करने से सुकून मिलता है और इस बात का गर्व भी होता है कि मुझ जैसे अदना इंसान को उनका बेतहाशा प्यार मिला था । दो यादें शेयर करना चाहता हूं ।प्रधानमंत्री राजीव गांधी जाखड़ के 20,अकबर रोड निवास पर चाय पीने के लिए आ रहे थे जिसमें शामिल होने के लिए कुछ चुनिंदा लोगों को आमंत्रित किया गया था, उनमें से मैं भी एक था । अपने मेहमानों से राजीव गांधी का परिचय कराते हुए मेरे पास आये तो कुछ ज़्यादा ही ठहर गये ।राजीव जी मेरा परिचय कुछ यों कराया,यह त्रिलोक दीप है,पत्रकार है, टाइम्स समूह की पत्रिका ‘दिनमान’ में काम करता है और मेरे साथ अक्सर कभी पंजकोसी तो कभी सीकर जाता रहता है ।सबसे बड़ी बात यह है कि यह मेरा छोटा भाई है ।’राजीव गांधी मुझे एकटक देखते रहे और बड़े प्यार से मुझसे हाथ मिलाते हुए बोले,आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा ।उसके बाद मैं राजीव गांधी से मई,1991 में हैदराबाद में मिला आधी रात को उनके एक कार्यक्रम के बाद ।दो दिन बाद बंगलोर में मिलने का वादा किया ।वह नहीं आये ।उनके बारे में एक मनहूस संदेश आया,उनकी हत्या का ।दिल बैठ गया ।

1989 में सीकर से लोकसभा का चुनाव हार जाने के बाद बलराम जाखड़ को इस बात की हैरानी हो रही थी कि जिन लोगों के लिए दिलोजान से काम किया उन्होंने मुझे ऐसी सज़ा क्यों दी ।मुझसे क्या खता हो गयी थी । इस पर वह अक्सर मनन चिंतन
किया करते थे लेकिन उनके शुभचिंतकों और हितैषियों की संख्या भी कुछ कम नहीं थी ।उनसे मिलने वाले लोगों की भीड़ लगी रहती थी ।मैं भी बददस्तूर उनसे मिलने के लिए जाया करता था ।कभी वह शायरी की कोई किताब पढ़ रहे होते तो कभी संस्कृत का कोई ग्रंथ ।उन्हें मैंने ‘वेहला’ बैठा कभी नहीं पाया ।एक दिन बोले कि कल आ जा,दोपहर का खाना दोनों भाई साथ में मिलकर खाएंगे ।मैं उनके साउथ एवेन्यू के फ्लैट में पहुंच गया ।वह शायद मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे ।उन्होंने सेवक से खाना लगाने के लिए कहा ।दाल सब्ज़ी रायता आदि सभी थे ।मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ जब उन्होंने एक चपाती ली और बोले,मेरा पेट भर गया ।फिर हँसकर बोले भगवान ने शरीर तो बहुत लंबा चौड़ा दिया है लेकिन एक चपाती से ऊपर खाने की भूख नहीं दी । जब मैंने कहा कि आप दूध लस्सी पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं तो ठहाका लगा कर हंस पड़े ।उन्होंने दाल सब्ज़ी खाई और मुझे और चपाती लेने के लिए कहा ।मैंने उन्हें बताया कि मैं भी दो से ज़्यादा नहीं खाता ।

1991 में राजीव गांधी की हत्या के समय लोकसभा का चुनावी प्रचार चल रहा था ।लिहाजा मतदान पूर्व निर्धारित तारीखों पर ही हुआ ।इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 244 सीटें मिलीं यानी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ । सक्रिय राजनीति से लगभग सन्यास ले चुके वरिष्ठ नेता पी वी नरसिंह राव को हैदराबाद से बुलाकर कांग्रेस संसदीय पार्टी का नेता चुना गया और उन्होंने दूसरी पार्टियों के बाहरी समर्थन से सरकार का गठन किया । उन्होंने सरकार गठन में एक नया प्रयोग करते हुए अपने अपने क्षेत्रों में विशेषज्ञ लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जैसे अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाया तो कृषि पंडित डॉ बलराम जाखड़ को कृषि और किसान कल्याणमंत्री ।इस पर जब मैंने बलराम जाखड़ से पूछा कि पंडित नेहरू तो माननीय स्पीकर का कद प्रधानमंत्री से भी ऊंचा मानते थे तो आपने प्रधानमंत्री के मातहत कृषिमंत्री बनना क्यों स्वीकार किया ।आप तो दो कार्यकाल तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे हैं और ये मंत्री आपको ‘सर’ कहकर संबोधित किया करते थे तो उनका उत्तर था कि मैं स्पीकर था,अब महज़ एक निर्वाचित सांसद हूं ।हमारे यहां अमेरिका और ब्रिटेन जैसी संसदीय प्रणालियां और परंपराएं नहीं चलतीं ।मुझ से पहले गुरदयाल सिंह ढिल्लों भी कृषिमंत्री रह चुके हैं 1986 से 1988 तक ।फिर हंस कर बोले जरूरी तो नहीं कि पंडित नेहरू की परंपराओं का उनके उत्तराधिकारी भी पालन करें ।

2004 में जब डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनी तो बलराम जाखड़ के अनुभव का लाभ उठाते हुए उन्हें मध्यप्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया ।वह 20 जुलाई,2004 से 19 जुलाई, 2009 तक इस पद पर रहे ।उन्होंने तीन मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया- उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराजसिंह चौहान ।अपने सामान्य ज्ञान, ज़िंदादिली,व्यवहार कुशलता और मृदु स्वभाव के चलते उन्होंने हर प्रकार की स्थिति को काबू में रखा और ज़रूरत पड़ने पर मुख्यमंत्रियों के ‘सलाहकार’ की भूमिका भी निभायी ।बेशक वहां भाजपा की सरकार थी लेकिन उसके काम में हस्तक्षेप नहीं किया,वह अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वाहन करते रहे। शिवराजसिंह चौहान तो कहते भी थे कि जाखड़ साहब एक ‘पितातुल्य’ राज्यपाल थे ।जाखड़ के पास 12 जुलाई,2004 से 24 जुलाई,2004 तक गुजरात का अतिरिक्त प्रभार भी था ।उस समय वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे ।मोदी जी को भी बलराम जाखड़ से कोई शिकायत नहीं थी ।वह उन्हें खुशमिजाज और साफगो इंसान मानते थे जो बेवजह किसी के काम में दखलंदाजी नहीं किया करते थे ।वह बहुत खूबसूरत नागरिक थे ।

चाहे बलराम जाखड़ सत्ता में रहे हों या नहीं मेरा संपर्क उनसा निरंतर बना रहा ।उनके ताजिंदगी रहे निजी सचिव हरबीर सिंह से मेरी दोस्ती थी ।जब कभी भी मेरी जाखड़ साहब से मिलने की इच्छा होती मुझे समय मिल जाता ।जाखड़ साहब को कभी मैंने अकेला नहीं पाया या तो उनके पास मिलने वाले रहते नहीं तो पढ़ने की किताबें होतीं।एकदिन हरबीर सिंह ने चिंतित होकर फोन करके बताया कि साहब की तबियत काफी खराब हो गयी है ।वह मेट्रो अस्पताल में भर्ती हैं और आपको याद कर रहे थे ।मैं नोएडा स्थित मेट्रो अस्पताल पहुंच कर जब मिला तो मुझे देखकर बहुत खुश हुए और मेरी मूँछों की तरफ इशारा करते हुए बोले इन पर मैं तोता बिठा दूंगा ।मैं उनके गले लग कर जब सुबकने लगा तो मुझे ढाँढस बंधाते हुए बोले,’मैं ठीक हो जावांगा,फिर दोवे भ्रा मिलसीए।’ बाद में उन्हें डिफेंस कॉलोनी में शिफ्ट कर दिया गया ।वहां हरबीर सिंह के अलावा कभी उनका बेटा सुनील मिल जाता तो कभी पोता संदीप जाखड़ ।सभी एक दूसरे को तसल्ली देते रहते ।उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ था जो उनके लिए जानलेवा सिद्ध हुआ।3 फरवरी, 2016 को 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया ।बेशक मेरी यह निजी क्षति थी जिसकी आपूर्ति कभी नहीं हो सकती, इस जिंदगी में तो नहीं ।

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