सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साहित्य के बारे में खूब लिखा गया है ।उनके नयी कविता आंदोलन को लेकर न जाने कितने लोगों ने पीएचडी की होगी, उनके काव्य और साहित्य की शैली को लेकर भी ग्रंथ रचे गये होंगे परंतु क्या किसी ने उनके भीतर की करुणा और संवेदनशीलता को झाँका और उनके मानवीय तथा गैरसाहित्यिक पक्ष पर कुछ लिखा? इस विषय पर शायद ही किसी ने लिखा हो ।अगर सूझा भी हो तो अज्ञेय से खुलकर बात करने की हिम्मत जुटा पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी।फिर भी किसी ने लिखने का प्रयास किया हो तो पूरी संजीदीगी और शिद्दत के साथ नहीं लिख पाया होगा। उनकी ज़िंदगी के अनेक और असाधारण आयाम रहे हैं जो गंभीर अध्ययन मांगते हैं ।उनकी तमाम रुचियां हैं जिन्हें उकेरा नहीं गया,जीवन के बहुत से पड़ाव हैं जहां तक या तो लेखक-कवि, खोजी पत्रकार पहुंच नहीं पाये हैं अथवा उनके भव्य,शालीन, आकर्षक और दिव्य व्यक्तित्व के समक्ष अपने आपको बौना,कमजोर या कमतर पाते रहे हैं ।कुछ लोगों को अज्ञेय के बारे में सतही ही जानकारी रही है ।उनका अध्ययनकाल कैसा रहा, वह कितना पारंपरिक था,कितना लीक से हट कर उन्होंने अपने पिता डॉ.हीरानंद शास्त्री के पुरातत्ववेदी होने से कितनी सीख प्राप्त की,अपने दादा पंडित मूलराज से उन्होंने विरासत में क्या हासिल किया,उन्हें क्यों ‘लाहौरिया’ कहा जाता था,वह देश की कमोबेश सभी भाषाओं को बोल ही नहीं सकते थे बल्कि लिख -पढ़ भी सकते थे यहां तक कि दक्षिण की भाषायें भी । बंगला और असमिया में तो वह अखबार भी निकाल चुके थे तथा बंगला की कई क्लासिक पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद भी ।अंग्रेज़ी के अतिरिक्त उनका फ्रेंच,जर्मन और स्पेनिश भाषाओं पर भी अधिकार था ।इसका कारण यह था कि उनकी पढ़ाई की नींव पुख्ता थी ।उनकी पढ़ाई घर पर ही होती थी और उन्हें बचपन से ही अंग्रेज़ी,हिंदी,उर्दू और फारसी पढ़ना अनिवार्य होता था और सभी भाषाओं को पढ़ाने वाले उस समय के बेहतरीन टीचर होते थे ।अज्ञेय ने घर में पढ़ते हुए ही पंजाब विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी।उन दिनों दिल्ली से लेकर अटक दरिया तक लाहौर स्थित पंजाब विश्विद्यालय का ही वर्चस्व था और उसी के अंतर्गत ही सभी स्कूल और कॉलेज आते थे ।
मेरा प्रयास यही रहेगा कि इस कुशाग्र बुद्धि वाले विलक्षण प्रतिभाशाली विद्वान के बारे में कुछ नयी और नायाब जानकारियां दूं जो गैरसाहित्यिक और रोचक हों । मैं यह मानता हूं कि अज्ञेय लगभग हर विषय के केवल जानकर ही नहीं थे बल्कि उनमें उनका गहरा अध्ययन शामिल था ।कारण कई थे ।दादा पंडित मूलराज भनोट और पिता से प्राप्त उच्च आदर्श, सघन अध्ययन,अनुशासन तथा पिता डॉ. हीरानंद शास्त्री के पुरातत्ववेदी होने से विभिन्न प्रांतों और स्थानों में निवास और वहां की कला-संस्कृति और भाषा को अंगीकार करना आदि ।उनका जन्म कुशीनगर (देवरिया) के एक खेत में हुआ था जहां उनके पिता का खुदाई शिविर था, इसलिए बताया जाता कि उनकी कविताओं में माटी की गंध का भान होता है ।इसलिए कुछ लोग उन्हें ‘धरतीपुत्र’ भी कहते हैं ।यह भी माना जाता है कि जब अज्ञेय का जन्म हुआ तो उनके पिता बाहर थे ।बेटे के जन्म का समाचार मिला तो उसी दिन खुदाई में बुद्ध की धातु की एक मंजूषा मिली थी ।जब घर लौटे तो उनके साथ दलाई लामा भी थे। दलाई लामा ने नवशिशु के आगमन पर डॉ.हीरानंद शास्त्री को बधाई दी और बच्चे को गोद में उठाकर कुछ तिब्बती मंत्र उनके कान में बुदबुदाये। यह शायद उनका बच्चे को आशीर्वाद देने का अपना ढंग था । अज्ञेय से जुड़ी इनमें से कुछ जानकारियां मैंने स्वयं अज्ञेय से प्राप्त कीं , कुछ उनके बारे में सुनीं और पढ़ी तो कुछ अपने बाईस-तेईस बरस तक के संपर्क में उनसे हुईं सैकडों मुलाकातों और उनकी अनेक गतिविधियों का अवलोकन करते हुए एकत्र कीं । यह सिलसिला काफी लंबा है ।यह भी संभव है कि अज्ञेय के जिन भावों, शैली, शब्दावली, वाक्यों का मैंने प्रयोग किया है वे किसी और से भी उन्होंने कहे हों लिहाजा इस पुनरावृति को स्वस्थ रूप में ग्रहण करने की मेहरबानी करें ।
अज्ञेय अपने पिता जी की दस संतानों में चौथे नंबर पर थे ।डॉ. हीरानंद शास्त्री के बारे में छपी किसी जीविनी में मैंने पढ़ा था कि सच्चिदानंद उन्हें औरों की तुलना में अधिक प्रिय थे ।क्या इसका कारण उसी दिन बुद्ध की धातु मंजूषा का मिलना था या दलाई लामा का उनको आशीर्वाद अथवा दोनों । बुध्द और दलाई लामा का यह मिलन अलौकिक ही माना जाएगा ।उस दौर में साधु-संतों-मनीषियों-ज्योतिषयों के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास की भावना अक्षुण्ण हुआ करती थी ।मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस दौर में पंडित आपका माथा देखकर कोई भविष्यवाणी करता था तो वह सही सिद्ध हुआ करती थी ।शायद निश्चलता का दौर था । अज्ञेय तो 7 मार्च, 1911 जन्मा हैं और वह भी विद्वान पंडितों के घर में जिन्होंने स्वयं ही उनका भविष्य देख और भांप लिया होगा और ऊपर से दलाई लामा के यंत्र-मंत्र और आशीर्वाद ने सच्चिदानंद को विशिष्टता प्रदान कर दी थी ।दलाई लामा को तब ‘पहुंचा’ हुआ दिव्य महापुरुष माना जाता था । उस समय की रवायत के अनुसार बड़े घरों के बच्चों को टीचर-पंडित-मौलवी उनके घर पर ही पढ़ाने आया करते थे ।जहां सच्चिदानंद के दो भाई-बहन एक-एक टीचर-पंडित-मौलवी से पढ़ा करते थे वहां उनके अकेले के लिए अलग-अलग टीचर-पंडित-मौलवी रखे गये थे ।डॉ. हीरानंद शास्त्री के अनुसार सच्चिदानंद की ग्राह्य शक्ति और क्षमता अपने दूसरे भाई-बहनों से अच्छी थी ।एक बार पढ़ लेने या किसी से मिल लेने या किसी को देख लेने से वह भूला नहीं
करते थे ।ऐसी थी उनकी स्मरणशक्ति ।
कुशीनगर,देवरिया (उत्तरप्रदेश) से डॉ. हीरानंद शास्त्री का स्थानांतरण लखनऊ हो गया । वहां सच्चिदानंद बड़ा होना शुरू हुए और आसपास के माहौल को समझने लगे थे ।लखनऊ के बाद जब कश्मीर पहुंचे तो उन्हें चारों तरफ नयापन नज़र आया,लोग भी, उनका पहनावा,खानपान,भाषा,जीवनशैली, वातावरण, पार्यावरण आदि ।यहीं से वह जिज्ञासु होने लगे ।चीज़ों को न सिर्फ समझने लगे बल्कि उनके अर्थ भी जानने का प्रयास करते ।अज्ञेय बताते थे कि उनके पिता को वहां के पशु पक्षियों के प्रति का खासा आकर्षण था और मेरे पिता उनकी नस्लों के बारे में बताया करते थे लेकिन इनके अलावा वहां का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत भाता था ।उनके फूल- पौधे- बाग-बनस्पतियां मुझे अपनी तरफ खींचती थीं ।मैं पिता जी और स्थानीय लोगों से उनके नाम और उपयोगिता के बारे में पूछा करता था ।मैंने काफी हद तक कश्मीरी बोलनी भी सीख ली थी । मेरा यह अनुभव उस समय बहुत काम आया जब मैंने अविभाजित भारत का ट्रकों- लारियों-जीपों-कारों से देश दर्शन किया था ।पंजाबी और पश्तो बोलने में दिक्कत पेश नहीं आती थी, बचपन में सीखी जो थी, घाटी में कश्मीरी मेरे लिए वरदान सिध्द हुई ।
अज्ञेय बताते थे कि अब वह बड़े हो रहे थे ।आसपास के माहौल के साथ साथ चीज़ों को समझने और उनका आकलन करने की समझ भी आ रही थी ।कश्मीर से पटना पहुंचे ।अलग तरह के तेवर और संस्कृति-भाषा-जीवनशैली भी ।बेशक़ मुझे विद्रोही प्रकृति का माना जाता था (कह सकते हैं ढीढ भी) लेकिन मुझे अपनी मनमानी करने से कोई रोक नहीं सकता था ।वहां की स्थानीय भाषायें सीखीं और खानपान के तौर-तरीकों को भी ।पढ़ाई तो बदस्तूर जारी थी और साथ ही जिज्ञासा की संतुष्टि भी । पटना के बाद डॉ.हीरानंद शास्त्री का तबादला दक्षिण भारत को हो गया ।उन्हें कई जगह खुदाई शिविर लगाने थे जैसे ऊटी, कोटागिरि आदि में ।कहीं सच्चिदानंद की पढ़ाई में व्यवधान उत्पन्न न हो जाये उन्हें मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज में भरती कराया गया जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट की ।यहां उन्होंने तमिल भाषा के साथ साथ तमिल साहित्य का भी अध्ययन किया ।यहीं सच्चिदानंद ने किशोर अवस्था में भी प्रवेश किया । बी.एस-सी उन्होंने फ़ोरमैन कॉलेज लाहौर से की ।लाहौर प्रसंग का आगे कहीं विस्तार से ज़िक्र होगा ।
अज्ञेय को मैंने पढ़ना तो 1952-53 से रायपुर में रहते हुए स्कूल के दिनों से शुरू कर दिया था लेकिन उनसे रू-ब-रू मुलाकात 1964 में दिल्ली में हुई ।लोकसभा सचिवालय में काम करते हुए मेरी भेंट पंजाबी की साहित्यिक दम्पति उपन्यासकार कर्नल नरेंद्रपाल सिंह और उनकी कवयित्री पत्नी श्रीमती प्रभजोत कौर से हुई । कर्नल नरेंद्रपाल सिंह के कुछ पंजाबी उपन्यासों का मैंने हिंदी में अनुवाद किया था ।एक उपन्यास ‘कड़ियां टूट गयीं’ तो ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में धारावाहिक तौर पर भी चला था ।अलावा इसके उनकी अफगानिस्तान की यात्रा के संस्मरणों का भी मैंने हिंदी में अनुवाद किया था जो ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे ।इसीप्रकार प्रभजोत कौर की कुछ पंजाबी कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया था । प्रभजोत कौर मेरी मुंहबोली बहन थीं और उनके यहां मेरा आना जाना लगा रहता था ।हुआ यों कि 1964 में अज्ञेय जी को उनके हिंदी के कविता संग्रह ‘आंगन के पार द्वार’ के लिए साहित्य अकादेमी का पुरस्कार मिला तो पंजाबी के लिए प्रभजोत कौर को उनके कविता संग्रह ‘पब्बी’ के लिये ।उन दिनों साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत साहित्यकारों का बहुत आदर सम्मान होता था ।दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों के स्वागत समारोह में मैं प्रभजोत जी के साथ जाया करता था।हिंदी भवन ने अज्ञेय जी के सम्मान में एक स्वागत समारोह आयोजित किया जिस में प्रभजोत कौर को भी आमन्त्रित किया गया था ।प्रभजोत जी के साथ मैं और कर्नल नरेंद्रपाल
सिंह भी गये थे ।वहां प्रभजोत जी ने अज्ञेय जी को मेरा परिचय देते हुए कहा कि यह मेरा भाई त्रिलोक दीप है जो इस वक़्त लोकसभा सचिवालय में काम करता है,हिंदी में लिखता है,नरेंद्रपाल सिंह के कुछ उपन्यासों को पंजाबी से हिंदी में अनुवाद किया है और मेरी कुछ कविताओं का भी ।अब यह चाहता है किसी पत्रकारिता से जुड़ना ।उधर कर्नल नरेंद्रपाल सिंह कपिला वात्स्यायन से वार्ता में मगन थे ।उन दिनों कर्नल नरेंद्रपाल सिंह राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के उपसैन्य सचिव थे और कपिला जी इस बात से परिचित थीं ।वात्स्यायन जी भी कर्नल साहब को जानते थे। साहित्य अकादेमी पुरस्कार समारोह में एक बार पुन: अज्ञेय जी से भेंट हुई ।इसे आप औपचारिक मुलाकातें कह सकते है।
अज्ञेय से विधिवत मुलाकातों का दौर 1965 से शुरू हुआ ।पहले मैं ‘दिनमान’ के लिए फ़्रीलांसिंग किया करता था।लोकसभा में काम करने के नाते संसद की कुछ आंखों देखी लिखा करता था। पहली जनवरी 1966 में मैं ‘दिनमान’ के संपादकीय विभाग से जुड़ गया ।सभी लोग जम कर काम किया करते थे । कुल जमा 14-15 लोग थे, राज्यों में कोई अधिकृत संवाददाता नहीं हुआ करते थे ।तब पत्रिका का मैटर हैंड कोम्पोजिंग से हुआ करता था, कंप्यूटर का आगमन नहीं हुआ था ।ताज़ा खबरों के लिए पीटीआई या यूएनआई के टेलीप्रिंटरों पर निर्भर रहना होता था।’दिनमान’ में विभिन्न प्रकार के स्तंभ थे किंतु अज्ञेय की संपादकी में पूरी टीम में एकजुटता थी । 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस था ।अज्ञेय उस दिन या उससे पहले या बाद में राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से भेंट करना चाहते थे ।उन्होंने यह जिम्मेदारी मुझे सौंपी ।मैंने तुरंत कर्नल नरेंद्रपाल सिंह से संपर्क साधा और अपने संपादक की इच्छा के बारे में बता दिया ।उन्होंने एक घंटे के बाद वापस फ़ोन करके मुझे अज्ञेय की राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन
से भेंट का दिन और समय बता दिया जिसकी जानकारी मैंने अज्ञेय जी को दे दी ।
निश्चित दिन और समय पर अज्ञेय राष्ट्रपति भवन पहुंच गये ।प्रोटोकोल को दरकिनार रखते हुए कर्नल नरेंद्रपाल सिंह उन्हें स्वयं राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन से मिलवाने के लिए ले गये ।अज्ञेय का राष्ट्रपति से परिचय कराते हुए कहा कि अज्ञेय हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत और फारसी के विद्वान हैं और इस समय हिंदी की साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक हैं। ‘दिनमान’ अपने किस्म का पहला समाचार साप्ताहिक है जो ‘टाइम’ और ‘न्यूज़वीक’ के स्वरूप पर अधारित है लेकिन कलेवर पूर्णरूपेण भारतीय है । अज्ञेय केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी बर्कले के विज़िटिंग प्रोफेसर हैं और अभी हाल ही में वहां से लौट कर ‘दिनमान’ का कार्यभार संभाला है । इसके बाद कर्नल साहब अपने ऑफ़िस में चले गये ।निस्संदेह डॉ. राधाकृष्णन अज्ञेय का परिचय प्राप्त कर खासे प्रसन्न हुए होंगे । आम तौर पर जब भी कोई संपादक या पत्रकार अथवा बुद्धिजीवी राष्ट्रपति से मिलने आता था तो वह हाथ जोड़ कर यही कहता है कि आपके दर्शन करने आया था ।लेकिन अज्ञेय का व्यक्तित्व तो कुछ अलग ही था ।यह तो सर्वविदित
है कि डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भारत का ‘दार्शनिक राष्ट्रपति ‘ कहा जाता था ।अज्ञेय ने उनसे दार्शनिकता पर ही बातचीत की।उन्हें यह बताने और जताने का प्रयास भी किया कि समय समय पर बदलती सोच के साथ पुस्तकें कुछ संवर्धन और संशोधन मांगती हैं ।इस सन्दर्भ में उन्होंने कुछ संस्कृत और तमिल विद्वानों को भी उद्धत किया ।दार्शनिकता के अतिरिक्त पुरातत्व पर भी उन्होंने राष्ट्रपति से बातचीत की ।भेंट तय दस मिनट के समय से बहुत आगे निकल गयी। जब भी राष्ट्रपति का सचिव अगले व्यक्ति की बारी बताने के लिए आते तो डॉ राधाकृष्णन हाथ के इशारे से समझा देते कि अभी उन्हें इन्तज़ार करने को कहें ।बतायाजाता है कि राष्ट्रपति ने खड़े होकर अज्ञेय से हाथ मिलाते हुए कहा था कि फिर मिलेंगे ।लेकिन बाद में मुलाकात नहीं हो पायी ।राष्ट्रपति डॉ.राधाकृष्णन का कार्यकाल समाप्त हो गया और अज्ञेय संभवतः विदेश चले गये थे ।
बाद में मैंने कर्नल नरेंद्रपाल सिंह और प्रभजोत कौर से राष्ट्रपति भवन में स्थित उनके निवास पर भेंट की तो उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति अज्ञेय से मिलकर बहुत प्रभावित हुए थे ।उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ कि हिंदी का एडिटर इतनी भाषाओं का ज्ञाता हो सकता है ।उनके तर्कों से सहमत न होते हुए भी राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन उनके विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण से बहुत मुतासिर हुए थे ।राष्ट्रपति ने यह भी कहा बताते हैं कि अज्ञेय से बात करते हुए उन्हें समय का भी बोध नहीं रहा ।कर्नल नरेंद्रपाल सिंह ने जब राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को यह जानकारी दी कि अज्ञेय का नाम नोबेल साहित्य पुरस्कार के लिए भी चला था तो इस पर राष्ट्रपति की दोटूक प्रतिक्रिया थी, नामुमकिन नहीं । लेकिन जब मैंने अज्ञेय से राष्ट्रपति से उनकी मुलाकात के बारे में दरयाफ्त किया तो उनका संक्षिप्त उत्तर था, ठीक।और मुस्कुरा दिये ।उन्हें ज्ञात था कि उनकी राष्ट्रपति से भेंट में हुई बातचीत की जानकारी मुझे मिल जाएगी ।राष्ट्रपति डॉ.राधाकृष्णन के साथ कर्नल नरेंद्रपाल सिंह और प्रभजोत कौर के बहुत ही आत्मीय संबंध थे और राष्ट्रपति उनके साथ अक्सर साहित्यिक ,सांस्कृतिक और बौद्घिक विषयों पर भी चर्चा किया करते थे ।
अज्ञेय से जुड़ा एक और प्रसंग याद आ रहा है । मैंने 1962-63 में रेडियो पर वार्ताएं देनी शुरू कर दी थीं ।उन दिनों मैं कहानियां भी लिखा करता था ।मुझे याद है कि हिंदी वार्ता में उन दिनों हमेंद्र जी और मधु मालती हुआ करती थीं ।पहले मेरी एक कहानी का प्रसारण हुआ था। हमेंद्र जी की मार्फत पंजाबी वार्ता के देविंदर से भेंट हुई और पंजाबी से भी जुड़ गया ।लोचन बक्शी किसी बड़े पद पर थे ।उनके साथ रमानाथ अवस्थी और डॉ. हरिकृष्ण देवसरे से भी दोस्ती हो गयी ।इनके अतिरिक्त ‘सामायिकी’ भी लिखने लगा और एक्सटर्नल सर्विस वाले अपने बुलेटिन का अनुवाद भी कराने लगे । उन दिनों रेडियो में बहुत ही सद्भावनापूर्ण माहौल होता था ।एक दिन राष्ट्रीय कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता डॉ. आर.के. माहेश्वरी ने याद किया । बोले,पंजाब में बढ़ते आतंकवाद पर एक कार्यक्रम का आपको संचालन करना है,ज़रा अच्छी तैयारी करके आईयेगा । बहुत दिग्गज लोग आ रहे हैं ।माहेश्वरी जी (अब दिवंगत) बहुत अच्छे मित्र बन गये थे ।स्टुडियो में मैं पहले ही पहुंच गया ।कुछ देर बाद देखा कि माहेश्वरी जी अटलबिहारी वाजपेयी, इन्दर कुमार गुजराल और हरकिशन सिंह सुरजीत को लेकर आये ।बेशक़ उन दिनों ये देश के बड़े और महत्वपूर्ण नेताओं में थे ।बोले अभी पंजाब के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह भी आने वाले हैं ।थोड़े इन्तज़ार के बाद जब दरबारा सिंह नहीं पहुंचे तो माहेश्वरी जी ने रिकॉर्डिंग शुरू करवा दी ।सभी लोग अपने अपने विचारों के लिए विख्यात थे लिहाजा बहुत अच्छा प्रोग्राम बन गया । दरबारा सिंह जब बाद में आये तो उनके विचार भी रिकॉर्ड कर लिए गये । माहेश्वरी जी ने यहां अपनी एडिटिंग के जौहर दिखाये जिस से यह पता ही नहीं चला कि दरबारा सिंह को उसमें जोड़ा गया है । बहरहाल यह और इस जैसे मेरे और भी कई प्रोग्राम खासे चर्चित रहे ।
एक दिन आकाशवाणी से किसी सीनियर अफसर ने मिलने के लिए बुलाया ।नाम अब याद नहीं ।उन्होंने एक पैकज दिया और कहा कि बीस स्वाधीनता सेनानियों का इंटरव्यू करना है ।ये सभी स्वाधीनता सेनानी उस समय दिल्ली में रहते थे ।कुछ लोगोंं से रेडियो वालों ने संपर्क किया तो कुछ से मैंने सम्पर्क साधा । जिन स्वाधीनता सेनानियों के नाम मुझे याद पड़ रहे हैं,वे हैं जैनेंद्र जी,अज्ञेय जी, विमल कुमार जैन और राम चरण अग्रवाल (पूर्व सांसद जयप्रकाश अग्रवाल के पिता)। गांधी जी की गतिविधियों को कवर करने वाले पत्रकार और कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता भी थे, कोशिश करने के बावजूद उनके नाम याद नहीं पड़ रहे हैं ।शुरुआत मैंने जैनेंद्र जी से की जो दिल्ली की जेल में तीन माह तक रहे थे और यहां उनकी भेंट वात्स्यायन जी से हुई थी । उन्होंने बताया था कि हम लोग तो गांधी जी के आवाहन और सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने के जुर्म में जेल में डाल दिये गए थे जबकि वात्स्यायन अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से कभी एक जेल तो कभी दूसरी जेल भेजे जाते थे ।वह मुल्तान जेल से दिल्ली लाए गए थे ।वहां भी उन्होंने कुछ कहानियां लिखी थीं ।फिर उन्हें टाइफाइड हो गया बावजूद इसके उनका लेखन जारी रहता था ।दिल्ली जेल में साथ साथ रहते स्वाधीनता आन्दोलन के अतिरिक्त साहित्यिक चर्चा भी हुआ करती थी ।जैनेंद्र जी तीन-चार महीने वात्स्यायन के साथ ही जेल में रहे । उनकी रिहाई जल्दी हो गयी ।जैनेंद्र जी जब जेल से छूटे तो वात्स्यायन की कुछ कहानियों को साथ ले आये ।उन्हीं में से कुछ कहानियां उन्होंने मुंशी प्रेमचंद को ‘जागरण’ में छापने के लिए भी भेजी ।जब प्रेमचंद ने जैनेंद्र जी से लेखक का नाम पूछा तो वह पसोपेश में पड़ गये ।असली नाम वह बताना नहीं चाहते थे । इसलिए थोड़ा सोचने के बाद उन्होंने प्रेमचंद को लिख दिया कि इन्हें ‘अज्ञेय’ के नाम से छाप दें ।वात्स्यायन जी को ‘अज्ञेय’ का नामकरण जैनेंद्र जी की देन है ।अपनी रिहाई के बाद वात्स्यायन जी जब जैनेंद्र जी से मिले तो उन्होंने अपने इस नए नामकरण के लिए आभार व्यक्त किया । वात्स्यायन की रिहाई के बाद अज्ञेय नाम इतना लोकप्रिय हो गया था कि उन्होंने उसे बदलने के बारे में कभी सोचा भी नहीं ।जैनेंद्र जी दिल्ली की अपनी जेल यात्रा में वात्स्यायन को एक अमूल्य उपलब्धि के तौर पर देखा करते थे ।उस समय की वात्स्यायन की
कहानियां क्रान्तिकारी अनुभवों और अनुभूतियों से प्रयुक्त हुआ करती थीं ।जैनेंद्र जी वात्स्यायन जी को ‘ज्ञान का सोमा’ मानते थे ।
विमल प्रसाद जैन अज्ञेय के बहुत करीबियों में थे ।इस विशेष इंटरव्यू से पहले भी मैं उनसे कई बार मिल चुका था ।जब कभी वह ‘दिनमान’ के ऑफ़िस में आते तब भी मिलते और जब कभी दरियागंज स्थित प्रेस में ड्यूटी होती तब भी टहलते हुए मुझे मिल जाते थे ।मैं अपना स्कूटर रोक कर उनसे बतियाने लगता ।वह बताते,जो उन्होंने विशेष इंटरव्यू में भी बताया था,कि वात्स्यायन एक बहुत ही सहज सामान्य व्यक्ति है ।हमारे साथ भी धीरे-धीरे बोलता था लेकिन था वह बहुत साफगो ।क्रांतिकारी संगठन में उसका तख्लुस था ‘साइंटिस्ट’। हमारे क्रांतिकारी संगठन में एक वाहिद यही इंसान था जो बम और विस्फोटक बना सकता था मैं ठहरा बनिया ।मेरी एक परचून की दुकान थी । उस दुकान के पीछे एक शौचालय भी था ।मेरी दुकान के पिछवाड़े का काम वात्स्यायन विस्फोटक बनाने के तौर पर लिया करते थे ।आम आदमी को यह शक़ भी नहीं होता था कि दुकान के पिछवाड़े और शौचालय के आसपास बम बन रहे हैं । विमलप्रसाद जैन वात्स्यायन के बहुत करीबी थे ।उनके अनुसार वात्स्यायन पार्टी के साथियों के भी रहनुमा थे,उनका मनोबल बढ़ाते रहते थे और देश की स्वाधीनता के लिए हर तरह की क़ुर्बानी और ज़ुल्म सहने की हिदायत दिया करते थे ।
अज्ञेय ने उस विशेष कार्यक्रम और बाद में भी मुझे क्रांतिकारी संगठन में उनके शामिल होने के कारणों की चर्चा की थी । उन्होंने बताया था कि लाहौर हमारी कर्मभूमि थी ।हमारा परिवार वहीं का रहने वाला था ।लाहौर के कॉलेज से बी-एससी करने के बाद मैं ऊहापोह की स्थिति में था ।बाद में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.करने का निर्णय लिया और उसका पूर्वार्द्ध प्रथम श्रेणी में पास किया ।उतरार्द्ध की वह तैयारियां कर ही रहे थे कि उनका जवान दिल स्वतंत्रता के संघर्ष की ओर उन्मुख होने लगा ।उन्हें लगा कि महात्मा गांधी का मार्ग बहुत लंबा है लिहाजा उनका झुकाव क्रांतिकारी संगठनों की ओर हुआ जो लाहौर में बहुत सक्रिय थे ।अज्ञेय की
भेंट भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद,बटुकेश्वर दत्त, भगवतीचरण वोहरा और यशपाल आदि से हुई ।उनकी निष्ठा क्रांतिकारी संगठन के उद्देश्यों के प्रति बढ़ने लगी थी और इस प्रकार पूरी तरह से वह क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गये । पढ़ाई बीच में छूट गयी और क्रांतिकारी संगठन की रणनीति में शामिल रहने लगा ।
आपकी मुख्य भूमिका क्या थी और आपकी निष्ठा किस तरह संदेह के परे थी के प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि मेरी विज्ञान और रसायनशास्त्र की पृष्ठभूमि के बारे में मेरे अंतरंग सहयोगियों को मालूम था,इसलिए मेरा मुख्य कार्य विस्फोटक तैयार करना था ।बम भी बनाता था ।लेकिन यह सारा काम बड़े करीने और गोपनीय ढंग से करना होता था।कई तरह के आवरणों का भी सहारा लेना पड़ता था । जैसे हिमालय नामक एक मशहूर दुकान के मैनेजर थे बिमलप्रसाद जैन ।बहुत ही प्रतिष्ठित नागरिक थे,संदेह से परे।वह दुकान के बाहर तो साबुन, क्रीम जैसी चीज़े बेचते थे लेकिन उसके भीतर और पिछवाड़े में हमारा रासायनिक कारखाना था जिस में हर प्रकार की विस्फोटक सामग्री का भंडार था जहां बम आदि बनाये जाते थे । ये विस्फोटक सामग्री मेरे अधीन रहा करती थी ।जहां तक निष्ठा का प्रश्न था हर किसी की नज़र एक दूसरे पर रहा करती थी ।अनुशासन और निष्ठा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाता था ।हरेक की ड्यूटी बंटी हुई थी ।
यदि किसी पर संदेह हो जाये तो उसकी सज़ा क्या होती थी? के उत्तर में वात्स्यायन ने बताया,’मौत’ । यशपाल संगठन के एक बहुत महत्वपूर्ण सदस्य थे और उन्हें गुप्त संगठन चलाने में माहिर माना जाता था ।वह साहसी भी बहुत थे,कमी एक ही थे कि वह अपने आप को बहुत श्रेष्ठ मानते थे और साथियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया करते थे ।इसका खामियाजा पूरे संगठन को भुगतना पड़ता था ।हम लोगों को अक्सर भेष बदल कर भी काम करना पड़ता था ।वह सदा साहेबी रोल अदा करना चाहते थे ।कभी कभी हालात ऐसा गवारा नहीं किया करते थे । एक बार उन्हें ट्रेन में मेरे नौकर की भूमिका निभानी पड़ी जो उन्हें कतई पसंद नहीं थी लेकिन हुकुमउदूली भी नहीं की जा सकती थी । एक दो बार यशपाल संदेह के घेरे में भी आये ।लाहौर में हमारा विस्फोटक का कारखाना गर्मियों भर चलता था । यशपाल की किसी हरकत की वजह से वह कारखाना तोड़फोड़ दिया गया ।उसके बाद से यशपाल को विस्फोटक के कार्य से अलग कर दिया गया और अमृतसर में एक अड्डा स्थापित किया गया जहां जलियाँवाला बाग के पास मैं एक मुसलमान पेंटर बन कर रहने लगा और नाम था शायद मोहम्मद बख्श ।
एक अन्य सवाल के जवाब में वात्स्यायन ने बताया था कि वह अपने तईं तो पूरी मर्यादा और अनुशासन के साथ काम कर रहे थे लेकिन उन्हें यह भी महसूस हो रहा था कि धीरे-धीरे संगठन में ऐसे लोग भी शामिल हो रहे हैं जो व्यक्तिगत चरित्र और निष्ठा के संबंध में क्रांतिकारी संगठन से मेल नहीं खाते ।कुछ लोगों को मुखबिरी करते हुए भी पाया गया था तो किसी के महिला क्रांतिकारियों से रागात्मक संबंध विकसित हो रहे थे ।चंद्रशेखर आज़ाद को ऐसे लोग पसंद नहीं थे । आज़ाद की कुछ मूलभूत और आधारभूत मान्यताएँ थीं जिस के अनुसार महिला और पुरुष क्रांतिकारियों से दूरी बनाये रखने की अपेक्षा की जाती थी । वात्स्यायन के मन में चंद्रशेखर आज़ाद के प्रति गहरे सम्मान की भावना थी, क्योंकि आज़ाद की नेतृत्व क्षमता और चरित्र के जोड़ का कोई ।दूसरा क्रांतिकारी नहीं था ।वह क्रांतिकारी नेता की चुस्ती दुरुस्ती, निर्भीकता और कुशलता की लासानी मिसाल थे। वह सदा चौकस और सतर्क रहा करते थे और अपनी रणनीति बहुत ही सुझ्बूझ तथा हर तरह की बारीकियों को ध्यान में रख कर बनाया करते थे ।एक बार यशपाल संगठन के कुछ बुनियादी नियमों का उल्लंघन कर बैठे जिस के अपराध में चंद्रशेखर आज़ाद ने उन्हें गोली से मारने की सज़ा सुना दी । गोली मारने का फैसला सुनने के बाद यशपाल मेरे पास दिल्ली आये और मुझे अपने साथ चलने
को कहा । वात्स्यायन ने क्रांतिकारियों की केंद्रीय समिति को सूचित कर दिया कि वह यशपाल के साथ जा रहे हैं और उनके कब्ज़े में जो विस्फोटक सामग्री है,वह अपने अधिकार में ले लेंगे ।उन्होंने अपनी तरह से केंद्रीय समिति को समझाबुझा कर यशपाल की जानबख्शी करायी थी ।
रेडियो का यह विशेष कार्यक्रम स्वाधीनता संग्रामियों से जुड़े संस्मरणों पर था और वात्स्यायन उस समय के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे जिनके सिर पर पांच सौ रुपए का इनाम था इसलिए उनसे यह जानना भी लाजिमी था कि क्या उन्हें भी यातना दी गयी थी । यह प्रश्न सुनकर वह कहीं खो गये और बोले कि उन्हें अमृतसर से गिरफ्तार कर लाहौर किले ले जाया गया। लाहौर किले का जेलखाना पूरे भारत में अपनी यातना के लिए मशहूर था । वहां यातना देने की इतनी पद्धतियां थीं कि बड़े से बड़े मनोबल वाला व्यक्ति भी टूट जाता था ।वहां महीनों तक कैदी को जगाए रखा जाता,बार बार एक ही सवाल को कई तरह से पूछा जाता,खड़े खड़े सोने की कोशिश करने पर कई तरह की यातनाएं दी जातीं ।वात्स्यायन जी ने बताया था कि उनके साथ भी ये सब प्रयोग हुए लेकिन उन्हें कोई टस से मस नहीं कर पाया । इसकी एक खास वजह थी ।वात्स्यायन जी बचपन से शांत और निडर स्वभाव के थे ।वह भयमुक्त थे ।उन्हें न तो कोई शारीरिक और मानसिक यातना से भयभीत कर सकता था और न ही किसी तरह के दबाव या प्रभाव से । मुश्किल से मुश्किल घड़ी में उनमें अपने आप को शांत-संयत रखने का मादा था ।इसलिए जब रात दो ढाई बजे के करीब एक एस पी देखने के लिए आया तो उसने पहले वे सभी हथकंडे अपनाये जो वह आम कैदियों पर अपनाया करता था – जैसे शुरू शुरू में कैदी को घूरना, मारपीट करना, फांसी की धमकी देना और इन सब हथकंडों के नाकामयाब होने के बाद समझाने का
प्रयास । इससे पहले कि वह एस. पी. वात्स्यायन पर कोई भी हथकंडा अपना पाता वात्स्यायन ने उसकी गाल पर ज़ोर का एक थप्पड़ रसीद कर दिया ।एस. पी. भौचक रह गया ।उस एस.पी. का नाम था जैनकिंस ।दूसरे कैदियों ने सोचा कि अब वात्स्यायन को फांसी हुई कि हुई । लेकिन मुझे यह देख कर ताज्जुब हुआ कि उसने किसी तरह से इस थप्पड़ का प्रतिरोध नहीं किया नहीं तो एस.पी. पद जैसे अंग्रेज़ अधिकारी पर हाथ उठाने की फांसी से कम सज़ा नहीं थी । अज्ञेय को बीच में टोकते हुए मैं ने कहा कि
‘मुमकिन है उसने आप में कोई दिव्य शक्ति देख ली हो ।’ मेरी इस जिज्ञासा पर अज्ञेय हंसे और बोले मैं तो किसी ‘दैवी शक्ति’ पर विश्वास करता नहीं ।मेरी अगली प्रतिक्रिया थी ‘संभव है उस एस. पी. ने अनुभव कर ली हो ।आखिर आपको दलाई लामा का यंत्र-मंत्र और आशीर्वाद जो प्राप्त है ‘इस पर अज्ञेय चुप्पी साध गये थे । यह भी तो हो सकता है कि उस एस.पी.के मन में कहीं अज्ञेय की हिम्मत,दिलेरी और जोखिम उठाने की क्षमता से प्रभावित हो गया हो ।उस एस. पी. ने तो प्रतिरोध नहीं किया लेकिन अज्ञेय पर मामला तो दर्ज हो ही गया ।
अज्ञेय ने बताया कि उनपर कई प्रकार के केस दर्ज हुए,हत्या के प्रयास से लेकर देशद्रोह तक ।दिल्ली षडयंत्र केस चला । उन्हें एकांतवास में भी रहना पड़ा ।’जितनी तरह की जेल की यातनाओं के बारे में आप सोच सकते हैं उन सभी से मैं गुज़रा हूं ‘ वात्स्यायन जी ने बताया ।उनसे यह भी पता चला कि दिल्ली जेल में उनके साथ छलावा भी हुआ ।उनके खाने में पारायुक्त नमक मिलाया जाता था ।इस बात का पता उन्हें मुल्तान जेल पहुंचने पर लगा कि उनके खाने में जहरीला पदार्थ मिलाया जाता था ।कई महीनों की दवा के बाद वह स्वस्थ हुए थे ।जेल में उन्हें एक बार टाइफाइड भी हो गया था बावजूद इसके उन्होंने अपना लेखन कार्य जारी रखा ।जेल में रहते हुए उनका झुकाव लेखन की ओर हुआ और उन्होंने हर विधा में लेखन किया ।
जैनेंद्र जी की कभी याद आया करती थी के प्रश्न पर उन्होंने सहास्य कहा कि मुझे ‘अज्ञेय’ बनाने वाले तो वही हैं ।भला अपने नामकरणदाता को कोई कैसे भूल सकता है ।मेरी सभी प्रारंभिक रचनाओं को प्रकाशित कराने का श्रेय तो उन्हें ही जाता है ।दिल्ली जेल में उनके साथ तीन-चार माह का सहवास अविस्मरणीय रहा ।बाद मे भी अजमेर जाते हुए सिपाहियों को चकमा देकर मैं दिल्ली में जैनेंद्र जी से मिलने आ गया था ।लेकिन यह मिलन सूक्ष्म ही रहा क्योंकि सिपाहियों ने मेरी बरामदगी कर ली थी । जैनेंद्र जी के माध्यम से मैंने प्रेमचंद जी को जाना और उनका बेटा श्रीपत राय मेरे मित्रों में हैं ।
अज्ञेय जी,आपको सेना में भरती होने का ख्याल कैसे आया ।सारा समय तो अंग्रेजों के खिलाफ आप लड़ते रहे,देश के स्वाधीनता संग्राम के लिए जेलों में रहे, तमाम तरह की यातनाओं को झेला, कहीं किसी तरह के मोहभंग की स्थिति तो पैदा नहीं हो गयी थी ? नहीं,ऐसी कोई बात नहीं थी। देश की आज़ादी और राष्ट्रप्रेम से कोई समझौता नहीं किया था ।हां, क्रांतिकारी संगठनों में ऐसे कुछ लोग आ गये थे जिनमें अनुशासन, प्रतिबद्धता और समर्पण की भावना अभीष्ट नहीं थी,इसलिए खिन्नता का भाव तो था ही।खैर सेना में मेरी भरती को लेकर मेरे आचरण के बारे में उसी जैनकिंस से रिपोर्ट मांगी गयी जिसे मैंने थप्पड़ मारा था ।उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह बंदा बहादुर और भरोसेमंद तो है लेकिन ब्रितानी सरकार का बागी है । उस वक़्त तो बात आयी गयी हो
गयी लेकिन जब अंग्रेज़ जापानियों से पिट रहे थे और जापानी सेना ने पूर्वोतर में दस्तक दी तो अंग्रेज़ हुक्मरानों के हाथपैर फूल गये,मुझे याद किया गया ।मेरा काम लड़ना नहीं था बल्कि आम लोगों का मनोबल बढ़ाना था ।इस नाते मुझे गांव गांव का
दौरा कर लोगों के मन में अंग्रेज़ सरकार के प्रति भरोसा और प्रतिरोधी शक्ति का निर्माण करना था । फौज में होने की वजह से वह अपने व्यवहार में पूरे अनुशासन का परिचय देते थे ।
वात्स्यायन जी ने बताया था कि उनकी फौज की नौकरी का निर्णय लेना कोई साधरण बात नहीं थी ।इसके लिए उन्हें अपने आप से बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी थी ।वह दिल से अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन थे तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा और पूर्णरूपेण देशभक्त ।उन्हें लगता था कि अगर अंग्रेज़ जापानियों के हाथों पिट गये तो स्वाधीनता सेनानियों की अब तक की कुर्बानी बेकार चली जाएगी और उन्हें फिर से नये जापानी शासकों के खिलाफ स्वतंत्रता की मुहिम तेज करनी पड़ेगी । लेकिन जापानी सेना तो सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज की मदद कर रही थी भारत को अंग्रजों से मुक्त कराने के लिए मेरे इस सवाल के जवाब में वात्स्यायन जी का कहना था कि मुझे जापानियों की मंशा पर शक़ था ।मेरा ही क्यों स्वयं सुभाषबाबू कदम कदम पर जापानी सेना को सतर्क करते रहते थे कि उसकी सीमा क्या है,वह पहचानती है ।बहरहाल जापानी सेना पराजित हो गयी और वात्स्यायन को अपने सैनिक जीवन में मानवीय बर्बरता के विविध प्रकार के अनुभव करा गयी । वात्स्यायन मानते हैं कि जिस मिशन को लेकर वह सेना में भरती हुए थे उसमें वह काफी हद तक सफल रहे।सेना और जनता के बीच उन्होंने सेतु का काम करते हुए तनाव पनपने नहीं दिया । अपनी चारित्रिक निष्ठा और अटूट राष्ट्रभक्ति का परिचय देते हुए बड़ी ही होशियारी से अपने फर्ज को अंजाम दिया । एक लाभ उन्हें और प्राप्त हुआ ।अभी तक तो पूर्वोत्तर के बारे में उन्हें किताबी ज्ञान था,सेना ने उन्हें यहां के समाज का गहरा परिचय करा दिया ।शिलोंग उनका मुख्यालय था लिहाजा उन्होंने सेना में भारतीय स्वाभिमान और अस्मिता के पक्षधर के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की ।उनके संपादन में बंगला और असमिया में दो समाचार पत्र भी प्रकाशित होते थे जिनमें वह खूब लिखा करते थे । अपने इस फौजी जीवन को भी वात्स्यायन जी एक अविस्मरणीय पल के तौर पर देखते हैं ।
काफी देर तक चला यह इंटरव्यू ।मेरे पास पूछने को बहुत कुछ था और उनके पास बताने को भी ।लेकिन हम समयसीमा से बंधे थे ।स्टुडियो से बाहर निकले तो वात्स्यायन जी को देखने और मिलने वालों की अच्छी खासी भीड़ थी ।लोगों से वह बड़ी बेतकल्लुफी से मिले और सभी का आभार व्यक्त किया । मुझसे पूछा,आपके पास क्या सवारी है? मैंने बताया ‘स्कूटर’। उन्होंने कहा कि मुझे जनपथ पर छोड़ दीजिए,वहां मेरी गाड़ी खड़ी है ।वात्स्यायन जी जब मेरे स्कूटर पर बैठे तो लोगों को आश्चर्य हुआ ।रेडियो ने अपनी कार देने की पेशकश की ।लेकिन वात्स्यायन जी ने मेरे स्कूटर पर बैठते ही कहा,’चलिये’ ।मेरे जीवन के ये बहुमुल्य क्षण थे ।मैंने बड़े ही आराम से स्कूटर चलाकर उनकी गाड़ी के पास पहुंचा दिया ।मैं अपने आपको खुशनसीब समझता हूं कि मेरे स्कूटर पर रघुवीरसहाय,श्रीकांत वर्मा,सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,मनोहर श्याम जोशी,जितेंद्र गुप्त, श्रीमती शुक्ला रुद्र,जवाहरलाल कौल, प्रयाग शुक्ल,विनोद भारद्वाज आदि ने सवारी की है ।ये सभी लोग ‘दिनमान’ में मेरे सहयोगी थे।
अज्ञेय से जुड़ी और बहुत यादें हैं ।वे फिर कभी ।अज्ञेय के साथ कई मुलाकातों में उनसे विभिन्न विषयों पर बात हुई थी जिसे मैंने संकलित कर एक पुस्तक का रूप दिया ।इस बातचीत को खुद अज्ञेय ने संपादित किया था ।यह बातचीत 70-80 टाइपड पृष्ठों में थी जिसे हिंदी के एक बड़े प्रकाशक को मैंने छपने के लिए दी थी ।प्रकाशक महोदय को भी यह पांडुलिपि बहुत पसंद आयी और उनकी प्रतिक्रिया थी ‘यह पुस्तक न केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए ही उपयोगी होगी वरन आने वाली पीढियों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगी ।’ जब साल भर तक मेरी उस पुस्तक का कहीं कोई अतापता नहीं चला तो हार कर मैं उनसे मिलने चला गया ।बोले, उसे शेडूल कर लिया है,बहुत जल्दी प्रकाशित होगी और वह ‘जल्दी’ कभी नहीं आयी ।अपने हाथ झाड़ते हुए प्रकाशक ने तो एक दिन कह ही दिया कि लगता है कि वह पाण्डुलिपि कहीं ‘खो’ गयी है ।यदि वह पुस्तक छप गयी होती तो अज्ञेय के बहुआयामी व्यक्तित्व का एक नया अक्स पेश करती ।वैसे ही जैसे ‘दिनमान’ में मेरे सहयोगी रहे मनोहर श्याम जोशी यह कहा करते थे कि ‘संसार का कौन-सा विषय है जिस पर अज्ञेय अधिकार से बात नहीं कर सकते, यह बात मेरी समझ में नहीं आयी ज्ञान की इतनी विविधता, व्यापकता और गहराई मैंने अन्यत्र नहीं देखी । लगता था विपरीतताओं से खेलना उनकी हॉबी हो। ‘ मेरे दूसरे सहयोगी रघुवीरसहाय अज्ञेय को अपना ‘काव्य गुरु’ और ‘जीवन-गुरु’ बताते हुए कहते थे कि ‘वह शांत और सयंत स्वभाव वाले व्यक्ति रहे हैं ।उनका व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है ।उन में सर्जनात्मक पक्ष जितना प्रबल है उतना ही आयोजनात्मक पक्ष भी ।’ और मेरे
तो अज्ञेय पत्रकारिता गुरु हैं और सदा रहेंगे । बहरहाल अज्ञेय की स्मृतियों की रेखाएं खींचती मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई है ‘मेरी स्मृतियों में अज्ञेय ‘।इसके प्रकाशक हैं ‘इंडिया नेटबुक्स’ प्राइवेट लिमिटेड,नोएडा ।
4 अप्रैल,1987 को सुबह सवेरे इला डालमिया ने मुझे फोन करके रुआंसी आवाज़ में कहा कि’आपके गुरु जी हम सब लोगों को छोड़कर चले गये हैं ।आप जल्दी से आ जाएं,आगे की सारी व्यवस्थाएं आपको देखनी हैं ।’ इला जी का फोन रखने के बाद मैंने दिल्ली के तत्कालीन पुलिस आयुक्त वेद मारवाह को फोन कर यह मनहूस खबर सुनायी ।वह भी बहुत दुखी हुए और बोले कि मुझे शवयात्रा का समय बता दीजिएगा ।हम पुलिस की ओर से उन्हें राजकीय सम्मान देंगे ।वेद मारवाह अज्ञेय जी से न केवल परिचित थे बल्कि उनका सारा साहित्य पढ़ रखा था । उसके बाद मैं केवेंटर ईस्ट,सरदार पटेल मार्ग,पहुंचा ।इला जी को गले लगाकर मिला ।उन्होंने कहा कि भीतर जाकर अपने गुरु जी के अंतिम दर्शन कर लें ।जब मैं उनके कमरे में पहुंचा तो अज्ञेय जी का चेहरा मुझे एक
‘दिव्य संत’ की भांति लग रहा था-शांत,सुकून भरा ।थोड़ी देर तक वहां बैठा घुटनों के बल,हाथ जोड़े हुए ।अविरल आंसू बह रहे थे जिन्हें मैं जज्ब करने का प्रयास कर रहा था । बाहर निकला तो इला जी मेरा इंतज़ार कर रही थीं ।तब तक मैंने अपने आपको संभाल लिया था ।
वेद मारवाह से हुई बातचीत के बारे में उन्हें बता दिया ।उन्होंने अपने भाइयों से सलाह मशविरा करने के बाद मुझे बताया कि हम लोग घर से तीन बजे निकलेंगे । मैंने देखा कि एक कमरे में इला जी के भाई विद्यानिधि के ऑफ़िस के कर्मचारी एक डायरी से फोन नंबर लेकर वात्स्यायन जी के स्वर्ग सिधारने की सूचना दे रहे हैं और साथ में निगमबोध घाट पर शवयात्रा के पहुंचने के समय से भी अवगत करा रहे हैं ।रमेश ऋषिकल्प को मैंने सूचित किया ।वह और उनकी पत्नी अज्ञेय जी के बहुत करीब थे। वात्स्यायन जी की शवयात्रा जब आईटीओ के करीब पहुंची तो वहां से लेकर निगम बोध घाट तक की सड़क के दोनों तरफ पुलिस की टुकड़ियां तैनात थीं । निगम बोध घाट पर तो न केवल साहित्यकार,कलाकार और संस्कृतिकर्मी ही थे बल्कि समाज के सभी वर्गों के लोग अज्ञेय को श्रद्धांजलि देने के लिए भारी संख्या में उपस्थित थे ।पुलिस आयुक्त वेद मारवाह ने भी अपने प्रिय लेखक को अंतिम श्रद्धांजलि दी । पत्रकारिता के अपने गुरु की मधुर स्मृति में नमन ।













