giraftar-abhiyuktaलखीमपुर खीरी में तीन सगी बहनों को एक साथ अगवा किए जाने की सनसनीखेज घटना से उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और अपराधियों पर पुलिस के खौफ की पोल खुल गई. पुलिस के नाकारेपन का हाल यह है कि अपहरण की घटना के बारे में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जानकारी दी, तब जाकर पुलिस सक्रिय हुई. लेकिन इस सक्रियता का भी कोई नतीजा नहीं निकला और फिरौती की रकम चुकाने के बाद ही तीनों लड़कियों को छुड़वाया जा सका. पुलिस मुंह ताकती रह गई. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कानून व्यवस्था पुख्ता करने की चाहे जितनी तकरीरी पढ़ते रहें और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव अखिलेश की सरकार के कामकाज से असंतोष जाहिर करते रहें, प्रदेश का शासन-प्रशासन इन सबसे बेफिक्र है.

उत्तर प्रदेश की मित्र पुलिस मंत्री की गुमशुदा भैंसें तलाशती रहती है और अपराधी लड़कियों को सरेआम अगवा करते रहते हैं. वर्तमान में अपराधियों का आखेट-स्थल बना लखीमपुर खीरी जुर्म के क्षेत्र में नामवर बनता जा रहा है. डेढ़ दशक पहले ललित मोहन वर्मा उर्फ मुण्डे ने जो अपराध का बीज बोया था उसे वृक्ष बनाने का काम कर रहा है जेल से फरार बग्गा जैसा अपराधी. उसका साथी डालू पुलिस मुठभेड़ में मारा जा चुका है, लेकिन बग्गा की आपराधिक गतिविधियां बेखौफ जारी हैं.

लखीमपुर खीरी की तीन सगी बहनों के अपहरण की घटना ने पूरे प्रदेश और देशभर का ध्यान खींचा. अगवा बहनों के परिवार ने स्थानीय पुलिस से लेकर पुलिस कंट्रोल रूम और जिला मुख्यालय तक का दरवाजा खटखटाने की कोशिश की, लेकिन किसी भी पुलिस अधिकारी ने उस रात फोन नहीं उठाया. मुख्यमंत्री का डायल-100 का बंदोबस्त, महज एक सियासी नारा साबित हुआ.

विवश परिजनों को सीधे मुख्यमंत्री से ही मदद की गुहार लगानी पड़ी. लखीमपुर खीरी का अधिकांश हिस्सा वन क्षेत्र से संलग्न है. यहां दुधवा नेशनल पार्क स्थित है. यह जिला नेपाल की सीमा से लगा हुआ है. यह क्षेत्र अपराधियों की शरण स्थली भी बना रहता है. अपराधी जघन्य अपराधों को अंजाम देकर आसानी से घने जंगलों में छिप जाते हैं या सीमा पार कर नेपाल चले जाते हैं. इसी क्षेत्र में स्थित खैरीगढ़ के गुड़ व्यापारी रामबली गुप्ता की तीन बेटियों का पिछले दिनों अपहरण कर लिया गया था.

रामबली गुप्ता की बड़ी बेटी उपमा कर्नाटक से बीएएमएस की पढ़ाई कर रही है. दूसरी बेटी रोहिणी बीए की छात्रा है और तीसरी बेटी संतोषी जनपद के एक विद्यालय में इंटर की छात्रा है. बीती रात दर्जनभर से अधिक अपराधियों ने गुड़ व्यापारी के घर हमला बोल कर सहन में आग ताप रही तीनों बेटियों, व्यापारी की पत्नी मुन्नी देवी और नौकरानी तारा का अपहरण कर लिया. हथियार के घेरे में लेकर उन्हें जंगल में ले जाया गया. वहां अपराधियों ने मुन्नी देवी और नौकरानी तारा को 50 लाख रुपये फिरौती तैयार रखने की ताकीद देकर छोड़ दिया और तीनों बहनों को मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले गए.

फौरन ही पुलिस को घटना की जानकारी देने की कोशिश की गई, लेकिन सिंगाही थाने के प्रभारी जेपी यादव, सीओ मोहम्मद इब्राहिम और कंट्रोल रूम (डायल-100) में से किसी ने भी फोन नहीं उठाया. लगातार कोशिशों के बावजूद जब फोन नहीं उठा तब परिजनों ने सीधे मुख्यमंत्री आवास के नम्बर पर फोन किया और घटना के बारे में जानकारी दी. इसके बाद ही कुंभकर्णी नींद में सोई जनपद पुलिस जागी और हरकत में आई. मुख्यमंत्री आवास से घटना की सूचना मिलते ही एसपी सहित कई थानों की पुलिस घटना स्थल की ओर भाग पड़ी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी.

बदमाश व्यापारी की बेटियों को लेकर घने जंगलों में ओझल हो चुके थे. पुलिस की लापरवाही से नाखुश परिजनों और स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किए और अपनी नाराजगी जताई. पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला, जबकि बदमाशों ने अगवा बेटियों में से किसी एक के फोन से व्यापारी रामबली गुप्ता को फोन कर पचास लाख रुपये की फिरौती मांगी. मुख्यमंत्री तक सूचना जाने से बौखलाई पुलिस और प्रशासन के अधिकारी अंधेरे में हाथ पांव मार रहे थे.

अधिकारियों की विवशता इतनी बढ़ गई कि जिलाधिकारी किंजल सिंह को पीड़ित के घर पहुंचकर परिजनों की मुख्यमंत्री से बात तक करानी पड़ी. उधर फिरौती के लिए बार-बार फोन आने के बावजूद नाकारा पुलिस अपराधियों को ट्रेस नहीं कर पाई. आखिर विवश व्यापारी ने 50 लाख के बजाय पांच लाख रुपये देने की बात कही.

अपराधी पांच लाख पर ही मान गए. बदमाशों ने परिजनों को फिरौती की रकम लेकर भैरमपुर बुलाया. जंगल ले जाकर अपराधियों ने पहले फिरौती की पूरी रकम गिनी, फिर अगवा बहनों को बेलरायां रेलवे लाइन के पास लाकर छोड़ दिया. पुलिस कुछ नहीं कर पाई. बाद में यह दावा किया गया कि एसटीएफ व पुलिस ने एसएसबी की सहायता से कुख्यात अपराधी तिकुनिया के रायपुर निवासी राजकुमार उर्फ राजू पुत्र विश्राम, बगौड़िया निवासी गुरमीत सिंह और कुलवन्त सिंह को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस कहती है कि वसूली गई फिरौती की रकम में से भी करीब सवा दो लाख रुपये बरामद किए गए हैं. लेकिन बरामद हुए नोटों और फिरौती में दिए गए नोटों की संख्या अलग-अलग बताई जा रही है. इस मसले पर पुलिस चुप है.

लापरवाही में सिर्फ एसओ ही क्यों नपे?

तीन सगी बहनों के अपहरण की सूचना देने के लिए किया गया फोन रिसीव नहीं करने पर सिंगाही थाने के प्रभारी जेपी यादव तो निलंबित कर दिए गए, लेकिन एसपी अखिलेश चौरसिया ने सर्किल अफसर मोहम्मद इब्राहिम को क्यों बख्श दिया? यह सवाल सब पूछ रहे हैं, लेकिन इसका जवाब देने वाला कोई नहीं. जबकि जिलाधिकारी किंजल सिंह ने अपहरण मामले में क्षेत्राधिकारी की भूमिका को सदिग्ध मानते हुए उन्हें कड़ी फटकार भी लगाई थी.

अनसुलझे रह गए कुछ सवाल

1- अगवा कर ले जाई गई बहनों ने रास्ते में अपने चप्पल फेंक दिए थे, ताकि रास्ते का पता चल सके. थाली में रख कर दिया गया यह सुराग एसटीएफ और एसएसबी की निगाहों में क्यों नहीं आया?

2- डीआईजी डीके चौधरी ने कहा था कि 48 घंटों के भीतर खुलासा नहीं हुआ तो एसओ और सीओ पर कार्रवाई होगी. फिर अकेले एसओ के ही खिलाफ कार्रवाई क्यों हुई और सीओ को क्यों छोड़ दिया गया?

3- लखीमपुर खीरी के एसपी अखिलेश चौरसिया ने कहा कि अपहरण मामले में तीन अपराधी पकड़े गए हैं. जब घटना से जुड़े तीन अपराधी पकड़ लिए गए तो अपहरण में प्रयुक्त मोटरसाइकिलें अब तक क्यों नहीं बरामद हो पाईं? एसटीएफ अब तक क्यों झख मार रही है?

4- गिरफ्तार अपराधियों के पास से बरामद नोटों की संख्या अलग है, जबकि फिरौती में दिए गए नोटों की संख्या अलग. नोटों के सीरियल नम्बर पर उठ रहे सवाल पर एसटीएफ के एसएसपी अमित पाठक ने चुप्पी क्यों साधी?

5- विभिन्न अपराधों में पकड़े जाने वाले अपराधियों को मीडिया के समक्ष हाजिर करने का जिले में चलन रहा है, लेकिन अपहरण मामले में पकड़े गए अपराधियों को मीडिया के सामने क्यों नहीं लाया गया?

एसटीएफ फेल डायल-100 भी नाकाम

अपराध की गुत्थियां सुलझाने का दावा करने वाली एसटीएफ इस अपहरण मामले में फेल साबित हुई है. खैरीगढ़ के जंगलों में अगवा लड़कियों को छुपाए रखा गया और फोन पर फिरौती के लिए मोल-भाव होता रहा, लेकिन एसटीएफ सर्विलांस नहीं कर पाई. विडम्बना यह है कि अपहरणकर्ता फिरौती की रकम के लिए परिजनों से मोबाइल के जरिए लगातार सम्पर्क में रहे. सामान्य लोगों को भी यह जानकारी है कि महज 14-15 किलोमीटर दूर नेपाल की तरफ मोबाइल का नेटवर्क नहीं मिलता. यानी, अगवा लड़कियां और अपराधियों का लोकेशन 14-15 किलोमीटर के दायरे में ही था. इसके बावजूद एसटीएफ कुछ नहीं कर पाई और अपराधी जो चाहते थे वह कर ले गए. इसी तरह पुलिस कंट्रोल रूम की डायल-100 व्यवस्था भी बुरी तरह फेल रही.

इस सिस्टम पर सरकार के करोड़ों रुपये खर्च हुए और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी व्यक्तिगत ऊर्जा लगाई, लेकिन कंट्रोल रूम ने फोन ही नहीं उठाया. खैरीगढ़ के गुड़ व्यापारी की तीन बेटियों को बदमाश उठा कर ले गए. परिजन 100 नम्बर डायल करते रहे. पुलिस सोती रही. आखिरकार मुख्यमंत्री आवास का फोन उठा और पीड़ितों की गुहार वहां सुनी गई. मुख्यमंत्री आवास से पुलिस को फटकार लगाई गई, तब जाकर पुलिस सक्रिय हुई. फिर भी व्यापारी को फिरौती देकर ही अपनी बेटियों को छुड़ाना पड़ा.

जब जनता उतर पड़ी सड़क पर

सनसनीखेज अपहरण की वारदात को लेकर लगातार पुलिस निष्क्रियता के खिलाफ आम लोगों के साथ सामाजिक संस्थाएं और राजनीतिक पार्टियां भी सड़क पर उतर पड़ीं. भाजपा के नवनिर्वाचित जिलाध्यक्ष शरद बाजपेई की अगुवाई में पूर्व मंत्री रामकुमार वर्मा, धौरहरा सांसद रेखा वर्मा सहित सैकड़ों भाजपाइयों ने धरना प्रदर्शन किया और चक्का जाम किया. इसी कड़ी में भाकपा माले की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य कृष्णा अधिकारी के नेतृत्व में दर्जनों कार्यकर्ताओं में पलिया तहसील में प्रदर्शन कर घटना के प्रति विरोध जताया. इसमें माले नेता राम दरस व तहसील संयोजक रंजीत सिंह भी शरीक थे. पूर्व सांसद व कांग्रेस नेता जफर अली नकवी और सपा के जिलाध्यक्ष अनुराग पटेल ने खैरीगढ़ जाकर पीड़ित परिवार से मुलाकात की.

पुलिस की असलियत बताती अपहरण की ये घटनाएं

जनपद में पिछले करीब एक दशक में हुए अपहरण के मामले देखें तो आप पाएंगे कि तकरीबन सभी वारदातों में फिरौती देकर ही अपहृत को छुड़ाया जा सका है. वर्ष 2008 में गोला के तीन बड़े व्यापारियों को अगवा किए जाने के मामले में भी फिरौती देकर ही उन्हें छुड़ाया जा सका. वर्ष 2009 में रेशू नाम के बालक को मटेहिया थाना ईसानगर से अगवा कर लिया गया था. उसमें भी पांच लाख रुपये की फिरौती मांगी गई थी. जून 2015 में सिंगाही थाना क्षेत्र से व्यवसायी रामनिवास का अपहरण हुआ था. पुलिस ने रामनिवास को मुक्त करा लिया.

लेकिन उसमें भी फिरौती देने की बात कही जाती है. अगस्त 2015 में आवास विकास कॉलोनी में रहने वाले छात्र प्रांजल सचान का अपहरण कर लिया गया था. बीच शहर में हुई इस सनसनीखेज वारदात ने सबके रौंगटे खड़े कर दिए थे. पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त टीम ने बालक को मुक्त कराया, लेकिन फिरौती की रकम गिरोह तक पहुंची, इस बात की चर्चा आम रही. हालांकि इसकी पुष्टिनहीं हुई.

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