संतोष भारतीय, सुरेश शर्मा और कुमार प्रशांत को इतिहास प्रथम मीसा बंदियों के तौर पर हमेशा याद रखेगा 

 

बात आपातकाल से ठीक पहले की है..
गुजरात में छात्रों ने आंदोलन शुरू किया और वह आंदोलन धीरे-धीरे गुजरात सरकार के खिलाफ मजबूत जन आंदोलन में परिवर्तित हो गया । उस समय गुजरात में चिमन भाई पटेल की सरकार थी, सन 42 के आंदोलन के हीरो और उस समय सर्वोदय आंदोलन के दूसरे सबसे बड़े नेता,तथा देश के सबसे बड़े ,सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र के सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ और सर्वमान्य नेता जयप्रकाश नारायण ने इस आंदोलन का समर्थन कर दिया। यह छात्र आंदोलन बहुत जल्दी गुजरात में जन आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो गया जिसकी शुरुआत गुजरात नवनिर्माण समिति के नाम से छात्रों नौजवानों की संस्था ने की थी,इसकेअध्यक्ष छात्र नेता मनीषी
जानी थे। यह घटना 1973 की थी।

जयप्रकाश जी गुजरात से बिहार आए। बिहार में भी छात्रों ने एक संघर्ष समिति बनाई जिसका नाम छात्र संघर्ष समिति रखा जिसके अध्यक्ष उस समय लालू यादव थे और महामंत्री नरेंद्र सिंह थे। इस संघर्ष समिति में नीतीश कुमार सहित उस समय के सारे प्रमुख छात्र नेता सदस्य थे। इन्होंने बिहार में छात्र आंदोलन संगठित करने की कोशिश की और जयप्रकाश जी से अनुरोध किया कि वह उनका नेतृत्व करें।

1974 के मार्च में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में तरुण शांति सेना नाम के सर्वोदय विचार मानने वाले तरुणों ने, महंगाई के खिलाफ खाने-पीने की चीजों की कीमत निश्चित करने का आंदोलन चलाया और यह निर्णय लिया कि 17 मार्च 1974 को मुजफ्फरपुर के कंपनी बाग मैदान में एक आम सभा कर जनता की तरफ से खाने पीने की आवश्यक वस्तुओं के दामों की घोषणा की जाए।उन दिनो महंगाई बहुत ज्यादा थी और जनता बहुत परेशान थी..

जयप्रकाश नारायण, संतोष भारतीय और कुमार प्रशांत

एक दिन पहले तरुण शांति सेना ने निर्णय लिया कि सम्बन्धित सदर थाने में इस कार्यक्रम की जानकारी दे दी जाय..सभी आंदोलनकारी छात्रों युवकों की तरफ से संतोष भारतीय और कुमार प्रशांत 16 तारीख को यह सूचना देने गए कि वह कंपनी बाग में एक सभा करेंगे.., उनके साथ केनिया से आए किशोर शाह भी थे। किशोर शाह सामाजिक रूप से जागरूक युवा थे और केनिया में रहने वाले प्रवासी भारतीय थे , जो भारत में चलने वाले गुजरात आंदोलन का अध्ययन करने के लिए आए थे, और वहीं से मुजफ्फरपुर में चल रहे तरुण शांति सेना के नौजवानों के आंदोलन का अध्ययन करने चले आए थे।

थाना सदर उन दिनों ऐसा था

थाने में पुलिस ने संतोष भारतीय और कुमार प्रशांत को चाय पीने के बहाने रोक लिया और कहा कि थाना अध्यक्ष आधे घंटे में आ रहे हैं तब आपको अनुमति देंगे। इनके पीछे पीछे किशोर शाह भी थाने आ गए.. थाने के बाहर छात्रों की भीड़ लगी थी..इस तरह 3 घंटे थाने में बैठने के बाद इन तीनों से कहा गया कि बाहर पुलिस की गाड़ी खड़ी है उसमें बैठ जाइए , आप लोग गिरफ्तार कर लिए गए हैं। जाली लगी पुलिस की,कैदियों को ले जाने वाली गाड़ी में ये तीनों युवक बैठा दिए गए और उन्हें जेल की ओर रवाना कर दिया गया..उनके साथ मीसा के कागजात भी जेल भेजे गए.. इतनी देर में जिलाधिकारी ने पटना में मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को जानकारी दी, जिन्होंने मीसा के अंतर्गत तीनो युवकों को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया…अब ये तीनों तरुण मीसा बंदी थे ,,तारीख थी 16 मार्च 1974 और समय था शाम 5.30 बजे…इनकी यात्रा मुजफ्फरपुर जेल पर 6.30 बजे समाप्त हुई..

कुमार प्रशांत

18 मार्च की सुबह मुजफ्फरपुर जेल में एक कैदी ने संतोष भारतीय को बताया की रात में एक लहू लुहान नौजवान छात्र नेता को जेल में लाया गया है जिसे जेल के अस्पताल में रखा गया है। संतोष भारतीय उस नौजवान से मिलने के लिए सुबह-सुबह जेल के अस्पताल में चले गए.. उस नौजवान छात्र नेता का नाम सुरेश वात्स्यायन था. संतोष भारतीय को उसने बताया कि 17मार्च को वह कंपनी बाग गया था, जहां उसे पता चला की संतोष भारतीय और कुमार प्रशांत गिरफ्तार कर लिए गए हैं।

संतोष भारतीय और जय प्रकाश नारायण 

सुरेश वात्स्यायन ने संतोष भारतीय को पूरी घटना बताते हुए बताया कि उनके पास वह पर्चा पहुंच गया था जिसे तरुण शांति सेना के युवक कंपनी बाग में होने वाली सभा में बांटने वाले थे। सुरेश वात्सायन ने बताया कि मैंने मैदान के बीच में पहुंचकर उस पर्चे को पढ़ा जिसमें खाने-पीने की वस्तुओं के दामों का जिक्र था। पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और पड़कर थाने ले आई। थाने के गेट पर मुजफ्फरपुर के पुलिस अधीक्षक खड़े थे, उनके सामने सी आर पी एफ का जवान सुरेश को पकड़ ले गया..पुलिस अधीक्षक ने पास खड़े जवान का हेल्मेट उतार कर सुरेश के सर पर जोरदार वार किया. सुरेश ने बताया कि सिर पर वार से मेरा सिर फट गया। किसी ने मेरी मरहम पट्टी नहीं की, मैं रुमाल से अपने सर के घाव को बंद करने की कोशिश करने लगा पर खून सर से निकलकर पूरे शरीर को गीला कर रहा था। रात में जब मैं जेल में आया तब मेरी मरहम पट्टी हुई। आज इस नौजवान का नाम सुरेश शर्मा है जो देश के प्रसिद्ध पत्रकार हैं और सांध्य टाइम्स के संपादक रहे हैं, जिन्होंने बहुत सारी किताबों का संपादन किया है। इन्हें भी मीसा के तहत ही गिरफ्तार कर जेल लाया गया था।

सुरेश शर्मा 

जयप्रकाश जी ने सर्च लाइट अखबार में एक हफ्ते के बाद एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर से कहा कि जिन लड़कों को आपने कानून और व्यवस्था तोड़ने के अपराध में गिरफ्तार किया है, वे लड़के आपको यह सिखा सकते हैं कि कानून और व्यवस्था कैसे बनाए रखी जा सकती है.. हमारे नामों का उल्लेख करते हुए जयप्रकाश जी ने जो लेख लिखा, उस लेख ने बिहार और दिल्ली में बैठी सत्ताधीश जमात को जयप्रकाश जी के सौम्य लेकिन कठोर गुस्से का आभास कर दिया.

इस लेख के छपने के कुछ दिनों बाद ही बिहार सरकार ने इन चारों नौजवानों के ऊपर से मीसा वापस ले लिया और इन्हें रिहा कर दिया। जयप्रकाश जी ने इन सभी को तत्काल पटना बुलाया और उनसे सारे घटनाक्रम की जानकारी ली.. उन्होंने इन नौजवानों के दाम बांधो अभियान की प्रशंसा भी की और सराहना भी।

बिहार छात्र संघर्ष समिति ने जयप्रकाश जी से अपने आंदोलन का संरक्षक बनने का आग्रह किया था लेकिन जयप्रकाश जी ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया था, पर जब उन्होंने इन चारों नौजवानों से बात की तब शायद उनके मन में छात्र आंदोलन का संरक्षक बनने का भाव उत्पन्न हुआ होगा.. इसके बाद उन्होंने छात्र संघर्ष समिति की बैठक अपने घर बुलवाई और उन्होंने छात्र संघर्ष समिति के नेताओं से यह वादा लिया कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा, अहिंसक रहेगा और व्यवस्था के खिलाफ रहेगा,, छात्र संघर्ष समिति ने जयप्रकाश जी की सारी शर्तें मान ली।

इसके बाद शुरू हुआ बिहार का छात्र आंदोलन जिसके नेता जयप्रकाश नारायण बने, गांधी मैदान की सभा में छात्रों ने जयप्रकाश नारायण को लोकनायक की उपाधि से सम्मानित किया, यहीं से लोकनायक जयप्रकाश शब्द सारे देश में और सारी दुनिया में गूंज उठा। यहीं से नारा निकला हमला चाहे जैसा होगा ,हाथ हमारा नहीं उठेगा, और दूसरा नारा था हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है भावी इतिहास हमारा है। इसके बाद तो रामगोपाल दीक्षित का लिखा गीत जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है, उठो जवानों तुम्हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है। इसकी अगली लाइन है , कौन चलेगा आज देश से भ्रष्टाचार मिटाने को, बर्बरता से लोहा लेने सत्ता से टकराने को, आज देख लें कौन रचा ता मौत के संग सगाई है ..


यह लंबा गीत देश के हर नौजवान की जुबान पर आ गया और यह गीत बिहार आंदोलन का राष्ट्रीय गीत बन गया। इस आंदोलन को संयोजित करने में श्री ओमप्रकाश दीपक और शिवानंद तिवारी का बहुत बड़ा हाथ था। वे लोकनायक जयप्रकाश के निकट संपर्क में रहते थे।

कुमार प्रशांत लोकनायक जयप्रकाश के साथ ही रहने लगे और उनके विचार के आधार पर पत्रिका निकालना तथा आंदोलन का वैचारिक आधार तय करना उनकी जिम्मेदारी बनी, आज वे देश मे गांधी और जेपी के विचारों के प्रमुख भाष्य कार है और गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हैं…किशोर शाह आंदोलन का अध्ययन करने जगह-जगह घूमने लगे औरआज वे कहां हैं किसीको पता नहीं, लोकनायक जयप्रकाश ने ,आंदोलन को देश भर में फैलाने के लिए 14 सदस्यीय समिति बनाई जिसमें संतोष भारतीय को भी सदस्य बनाया.. अपने विशेष दूत रूप में लोकनायक जयप्रकाश ने संतोष भारतीय को देश के कई हिस्सों में भेजा ,और. अपना विश्वसनीय संदेश वाहक बनाया. जब जेपी ने संतोष भारतीय को दिल्ली भेजा तो अंग्रेजी दैनिक स्टेट्समैन ने अपनी पहली हैडलाइन बनाई , जेपी इमेजरी इन दिल्ली..यानी जेपी के विशेष दूत दिल्ली में. जेपी के ही आदेश पर संतोष भारतीय पत्रकारिता में गए और रविवार, संडे, टेलीग्राफ,न्यूज लाइन से होते हुए हिन्दी पत्रकारिता के पहले साप्ताहिक अखबार ,चौथी दुनिया के सम्पादक बने..कालांतर में वे लोकसभा के लिए चुने गए. आजकल संतोष भारतीय चौथी दुनिया के साथ डिजिटल चैनल लाउड इंडिया टीवी के सम्पादक है..सुरेश शर्मा पत्रकारिता में चले गए और आज देश के बड़े संपादक हैं।

लेखक सुरेश त्रिवेदी पूरे आपातकाल में जेल में मीसा बंदी के रूप में बंदी थे…

 

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