ये हैं हम, और यह है हमारा लोकतंत्र. हमें लोकतंत्र पर गर्व है, क्योंकि लोकतंत्र हमें अपनी बात कहने का हक़ देता है, अपनी समस्याओं पर आवाज़ उठाने की अनुमति देता है और साथ ही इंसान के रूप में हमारी इज्ज़त भी करता है. लेकिन लोकतंत्र बना रहे, इसके लिए हम क्या करते हैं? हम केवल बातें करते हैं, कभी-कभी गला फाड़ते हैं, और तफरीह के लिए कभी-कभी जुलूस भी निकाल देते हैं. मुंबई जैसे कांडों पर हम बाहर निकलते हैं और तलाशते हैं कि टी.वी. कैमरे किधर हैं. हो सकता है कि अगर कैमरे वाले न रहें तो हमें सड़क पर आने की प्रेरणा ही न हो.क्या हम कैमरा आधारित लोकतंत्र की दुनिया में जा रहे हैं?
अपने देश में लोकतंत्र बचाए रखने के लिए बहुत ज़्यादा नहीं करना है. केवल उस दिन, जिस दिन मतदान होना है, मतदान केंद्र तक जाना है और मतदान करना है. लेकिन इस देश का साहब वर्ग, मध्यम वर्ग इस दिन को छुट्टी के दिन के रूप में देखता है और परिवार व दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने चल देता है. तब लोकतंत्र बचाने की ज़िम्मेदारी क्या केवल ग़रीब, मज़दूर, किसान और वंचित वर्ग की है? वह वोट डालता जाए और ये उन लोगों को प्रभावित करते जाएं, जो जीत कर संसद में जाते हैं. दूसरे शब्दों में पैसे वाले लोग उनको धन से प्रभावित करने में लग जाएं जो ग़रीबों के वोट से चुन कर आते हैं.
आख़िर ग़रीबों को, किसानों को, मज़दूरों को, अल्पसंख्यकों को इस लोकतंत्र से मिला क्या है? इस सवाल का जवाब उन्हें देना चाहिए जो इस व्यवस्था को चलाने के ज़िम्मेदार हैं. राजनैतिक दल, नौकरशाह, न्यायपालिका से जुड़े लोग या बुद्धिजीवी क्यों नहीं सोचते कि जिस लोकतंत्र की बात वे करते हैं वह ग़रीबों या देश की आम जनता का लोकतंत्र नहीं है. पहले वे इसे अपना मानते थे और गाजे-बाजे के साथ वोट देने जाते थे, पर पिछले साठ सालों में क्या हुआ? ग़रीबों की रोजी-रोटी छिनी, उसके रोज़गार के अवसर कम हुए, किसानों की खेती नुकसानदेह हो गई, उसे उसके उत्पादन का कम से कम दाम मिला. वहीं खेती के लिए आवश्यक बीज, खाद, बिजली और कृषि यंत्र महंगे से महंगे होते गए. मज़दूरों को मज़दूरी नहीं मिलती, उन्हें रोज़गार के लिए घरों से दूर जाना पड़ता है. अल्पसंख्यक को न नौकरी में हिस्सा, न उद्योग में, न शिक्षा में, और न राजनीति में उनका न्यायपूर्ण हिस्सा मिल पाया है. नौजवान पढ़-लिख कर बेकार हो जाते हैं. बिना पढ़े-लिखे और ज़्यादा बेकारी के जाल में फंस जाते हैं.
ये सब मिल कर देश का सत्तर-अस्सी फीसदी होते हैं. इनका भरोसा इस व्यवस्था से, दूसरे शब्दों में लोकतंत्र से उठ रहा है. वे सोचते हैं कि किसी कोभी वोट दें, उनकी हालत नहीं सुधरने वाली. इस निराशा का परिणाम भी बहुत खतरनाक निकल रहा है.
देश के सात सौ पचास जिलों में से लगभग एक सौ पचास जिले भारतीय संप्रभुता के अंदर एक नई संप्रभुता बना रहे हैं. हम उन्हें नक्सलवादी कहें या कुछ और, पर व्यवस्था या लोकतंत्र से निराश आम लोग, ग़रीब और वंचित उन्हें अपना समर्थन देने में हिचक नहीं रहे हैं. उन्होंने अपनी न्याय व्यवस्था, अपना कानून और अपनी मुद्रा का चलन बढ़ाने का फैसला कर लिया है. भारत के लगभग सभी किनारे के प्रदेश अशांत हैं.
कश्मीर में तो आतंकवादी कहे जा सकते हैं और उन्हें एक धर्म के दायरे में रख अपमानित भी कर रहे हैं, पर उन एक सौ पचास जिलों में तो धर्म आधारित कुछ भी नहीं है, वर्ग आधारित और ग़रीबी को आधार बनाकर लोग हथियार उठा रहे हैं. पूरा उत्तर पूर्व अशांत है, जहां सेना ही उसे भारत से जोड़ने का काम कर रही है. अगर सेना न हो तो वह हिस्सा भारत के साथ रहने को तैयार नहीं है. कुछ यही हाल कश्मीर का है. हर जगह पहले समस्या, फिर उसका समाधान न होना, लोगों में निराशा का बढ़ना और फिर उन्हें या तो उग्रवादी या अलगाववादी के तमगे का मिल जाना.
कोई प्रदेश सुखी नहीं है. पीने का पानी जब नहीं है तो सिंचाई का पानी कहां से आएगा?  अर्थव्यवस्था नौजवानों की रोजी-रोटी के सवाल का उत्तर देने की जगह उसे अनदेखा कर रही है और मीडिया जिसे इन सबका विरोध करना चाहिए, स्थिति का वर्किंग पार्टनर बन गया है. आप अंदाज़ा लगाएं कि तीन हज़ार या पांच हज़ार मासिक वेतन पाने वाले कितने होंगे हमारे देश में. सौ करोड़ के मुल्क में पचास प्रतिशत से ज़्यादा तो निश्चित होंगे. चीनी तीस रुपए किलो से ज़्यादा में बिक रही है. वे चाय में चीनी की जगह नमक डाल कर पी रहे हैं, बाकी भावों के बारे में बात करना बेकार है.
क्या हम समझते हैं कि ये सारे लोग हमारी व्यवस्था से खुश हैं ?  बिल्कुल नहीं. ये सब न केवल नाराज़ हैं बल्कि निराश भी हैं. उन्हें लोकतंत्र से अब शिकायत भी नहीं है, क्योंकि ये सोचते हैं कि जो आएगा वह यही करेगा. और जब नाराज़गी निराशा से मिल जाती है तो खतरनाक हो जाती है. इसी स्थिति को हम चुनावों में देख रहे हैं. अमीर छुट्टी मनाने निकल जाता है और वोट नहीं डालता, वहीं ग़रीब इसीलिए वोट डालने से हिचकता है कि उसके वोट का कोई फायदा तो होता नहीं. जो भी जीतेगा, वह उनके हितों के ख़िला़फ ही काम करेगा. यह स्थिति खतरनाक है और इसे हमारे लोकतंत्र को चलाने वाले नहीं समझ रहे. इन सबका विश्वास हमारे लोकतंत्र में नहीं रहा.
सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी, प्रकाश करात, मुलायम सिंह, मायावती, जयललिता. चंद्रबाबू, प्रकाश सिंह बादल, फारूक़ अब्दुल्ला का लोकतंत्र अलग है और दलित, अल्पसंख्यक व ग़रीबों और वंचितों का लोकतंत्र अलग. इस बार कम वोट पड़ने के पीछे यही कारण हैं और अगर इन कारणों से आंख बंद करने की कोशिश करेंगे तो परिणाम का भविष्य बताने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. पंद्रहवीं लोकसभा में जीतने वालों की यही सबसे बड़ी परीक्षा है कि वे देश के सत्तर से अस्सी प्रतिशत लोगों का भरोसा हमारे लोकतंत्र में वापस लौटा पाते हैं या नहीं और उन्हें यह विश्वास दिला पाते हैं या नहीं कि यह लोकतंत्र उनका भी है.
भारतीय लोकतंत्र का चेहरा संसद है. इस बार संसद की परीक्षा है, और हम परीक्षा में संसद को पास होते देखना चाहेंगे, क्योंकि अगर संसद इस परीक्षा में सफल नहीं होती तो फिर बंदूक की बात करने वालों के तर्क आम जनता को सही लगने लगेंगे. उस स्थिति में लोकतंत्र केवल कुछ लोगों के ड्राइंगरूम की शोभा बनकर रह जाएगा.

Adv from Sponsors

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here