कूटनीति में समय ही सबसे बड़ा कारक होता है। भारत का यूरोप की ओर ताज़ा झुकाव—जिसका ठोस रूप हाल ही में संपन्न भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफ़टीए) में दिखाई देता है—किसी दीर्घकालिक रणनीतिक दूरदृष्टि की पराकाष्ठा कम, और परिस्थितियों के दबाव में लिया गया एक तेज़ निर्णय अधिक लगता है।

इतिहास बताता है कि यूरोप कभी भी भारत की रणनीतिक कल्पना के केंद्र में नहीं रहा। बदला केवल इरादा नहीं, बल्कि वह तात्कालिकता बदली जिसने वैश्विक झटकों और वॉशिंगटन में लौटती अनिश्चितता के बीच भारत को तेजी से निर्णय लेने पर विवश किया।

पिछले सात दशकों तक यूरोप दिल्ली के विश्वदृष्टिकोण में परिधि पर ही रहा। भारत की विदेश नीति शीतयुद्ध के त्रिकोण से गढ़ी गई—सोवियत संघ से हथियार और ऊर्जा, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा, और 1991 के बाद अमेरिका के साथ सतर्क निकटता। इसके उलट यूरोप भारत के लिए एक पूर्व औपनिवेशिक शक्ति और नैतिक उपदेशक बना रहा—जो मानवाधिकारों पर व्याख्यान देता रहा, लेकिन अपने बाज़ारों को सब्सिडी और कठोर नियमन से सुरक्षित रखता रहा।

2004 की भारत–ईयू रणनीतिक साझेदारी ने गहराई का वादा किया था, पर परिणाम सीमित ही रहे। शिखर सम्मेलन औपचारिक रस्मों में बदल गए, 2013 में व्यापार वार्ताएँ ठप पड़ गईं, और व्यापार का विस्तार तो हुआ—पर बिना किसी रणनीतिक छलांग के। 2006 में जहाँ व्यापार €47 अरब था, वह 2018 में €91 अरब तक पहुँचा, पर यह वृद्धि क्रमिक थी, परिवर्तनकारी नहीं।

चीन की यात्रा इसका उलटा उदाहरण पेश करती है। वॉशिंगटन के प्रारंभिक समर्थन और यूरोपीय पूंजी के प्रवाह के साथ चीन वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में तेज़ी से समाहित हुआ। 2000 में लगभग €100 अरब से शुरू हुआ यूरोप–चीन व्यापार आज €700 अरब से अधिक है। पैमाना, गति और केंद्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया—तीनों ने इस उभार को कई गुना बढ़ाया।

भारत को ऐसी रणनीतिक अनुकूलता कभी नहीं मिली। ब्रसेल्स की नज़र में वह संरक्षणवादी, सुधारों में धीमा और मॉस्को से भू-राजनीतिक रूप से जुड़ा हुआ देश रहा। नतीजा यह कि दशकों तक यूरोपीय व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से नीचे ही अटकी रही।

हालिया आँकड़े भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं। 2021 में €88 अरब से बढ़कर 2024 में भारत–ईयू वस्तु व्यापार €120 अरब तक पहुँचा। सेवाओं का व्यापार—मुख्यतः आईटी और परामर्श—तीन गुना बढ़कर €66 अरब हो गया। यह प्रगति सम्मानजनक है, पर क्रांतिकारी नहीं।

इसके विपरीत, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और ईएफ़टीए के साथ भारत के नए एफ़टीए लागू होते ही कुछ ही महीनों में निर्यात में तेज़ उछाल दिखा। यूरोप अंतिम बड़ा अपवाद बना रहा—केवल भारत की हिचक के कारण नहीं, बल्कि ब्रसेल्स की अपनी नियामक, राजनीतिक और रणनीतिक सावधानियों के चलते भी।

यूरोप का यह पुनर्मूल्यांकन महत्वपूर्ण है। चीन की आक्रामकता, कोविड के दौरान उजागर हुई आपूर्ति शृंखला की कमजोरियाँ, और यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से उपजा भू-राजनीतिक टूटाव—इन सबने भारत को एक अधिक विश्वसनीय दीर्घकालिक साझेदार के रूप में उभारा। लेकिन वास्तविक गति तब आई जब अमेरिकी व्यापार नीति में अस्थिरता लौट आई।

2025 में डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी के साथ ही भारतीय निर्यात पर शुल्क की धमकियाँ और रूस से तेल खरीद पर दंड की बातें फिर उभरने लगीं। वर्षों से अटकी ब्रसेल्स वार्ताओं में अचानक जान आ गई। अक्टूबर 2025 के चौदहवें दौर में सफलता मिली और जनवरी 2026 में समझौते की घोषणा हुई। आधार पहले से मौजूद था; शिखर दबाव में जाकर रखा गया।

यह क्रम भारत की कूटनीति की एक गहरी संरचनात्मक कमजोरी की ओर इशारा करता है। हमारी विदेश नीति अब भी व्यक्तित्व-प्रधान और घटनाओं पर प्रतिक्रियात्मक है, जबकि यूरोपीय संघ जैसे जटिल साझेदार के लिए मज़बूत संस्थागत निरंतरता चाहिए।

ईयू से बातचीत द्विपक्षीय सौदेबाज़ी नहीं है। इसमें 27 सदस्य देशों, यूरोपीय आयोग और एक घने नियामक तंत्र से जूझना पड़ता है। 2007 में शुरू हुआ व्यापक व्यापार एवं निवेश समझौता पेटेंट, कृषि सब्सिडी और डेटा शासन जैसे मुद्दों पर वर्षों तक अटका रहा। प्रगति तब तेज़ हुई जब बाहरी झटकों—चीन का उदय और अमेरिका की नई अनिश्चितता—ने तात्कालिकता पैदा की।

नया समझौता काग़ज़ पर महत्वाकांक्षी है—97 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क समाप्ति, गतिशीलता प्रावधान, रक्षा सहयोग और सतत विकास प्रतिबद्धताएँ। पर महत्वाकांक्षा अपने-आप क्रियान्वयन की गारंटी नहीं देती। असली परीक्षा समन्वय की है—क्या भारत कर-प्रणाली, श्रम बाज़ार और अनुबंध प्रवर्तन में ऐसी घरेलू सुधार-क्षमता दिखा पाएगा जो यूरोप की नियामक अपेक्षाओं से मेल खाए?

यदि यह साझेदारी वास्तव में परिवर्तनकारी बननी है, तो इसे प्रतीकवाद से आगे बढ़ना होगा। भारत की सेवाओं, औषधि उद्योग और विनिर्माण पैमाने को यूरोप की मशीनरी, सटीक इंजीनियरिंग और हरित तकनीक की ताकत से जोड़ने वाली पूरक आपूर्ति शृंखलाएँ बनानी होंगी। एक क्षेत्र विशेष रूप से गंभीरता का संकेत देगा—ग्रीन हाइड्रोजन। साझा निवेश लक्ष्य, एकरूप मानक और बड़े पैमाने पर उत्पादन का विश्वसनीय मार्ग तय हुआ, तो यह साझेदारी आने वाले औद्योगिक चरण की धुरी बन सकती है।

निर्णायक तत्व संस्थागत गहराई होगी। स्थायी कार्य समूह, वार्षिक व्यापार एवं नियामक समीक्षा, और सशक्त उप-राष्ट्रीय साझेदारियाँ—जैसे गुजरात–हैम्बर्ग या कर्नाटक–बवेरिया—आकस्मिक शिखर सम्मेलनों की जगह लेनी चाहिए। इसके बिना गति राजनीतिक चक्रों की बंधक बनी रहेगी।

भारत का आर्थिक उत्थान बहु-दिशात्मक रणनीति की माँग करता है, न कि बाहरी झटकों से प्रेरित तात्कालिक पुनर्संरेखण की। ईयू समझौता आवश्यक कदम है, पर इसे मंज़िल नहीं, नींव माना जाना चाहिए। यदि दिल्ली इसे प्रतिक्रियात्मक विविधीकरण का अंतिम बिंदु समझेगी, तो यूरोप एक शालीन साझेदार भर रह जाएगा—पर परिवर्तनकारी नहीं।

असली सवाल यह नहीं है कि यह समझौता बनने में कितना समय लगा। सवाल यह है कि क्या भारत इसे सार्थक बनाने के लिए तैयार है। इतिहास हस्ताक्षर को नहीं, उसके बाद आने वाले ठोस परिणामों को याद रखेगा।

(सतीश झा, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के पूर्व संपादक, ने अमेरिका के फ़्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी, हेग के आईएसएस और फ्रांस के ईडीएचईसी में अध्ययन किया है।)

Adv from Sponsors