यहूदियों वंश के लोगों का इतिहास बहुत पुराना है. इसा के पूर्व, ताम्रयूग में पांच या छ हजार साल पहले का, दूनिया का पहला अब्राहमिक मोनोलिथिक, मोनोथेसिस और एथनिक अब्राहम के द्वारा स्थापित धर्म के रूप में जाना जाता है. यहूदियों के धर्म ग्रंथ को तोराह बोला जाता है. तोराह का मतलब कानूनी शिक्षा. कोई तालमुद भी बोलता है. और कोई ओल्ड टेस्टामेंट जो हिब्रू में लिखा है. उसे भी धर्म ग्रंथों में शुमार करते हैं. और विश्व में पहला धर्म के रूप में स्थापना होने के बावजूद. आज संपूर्ण विश्व में कुल मिलाकर दो करोड़ से भी कम यहूदियों की संख्या है. और इतिहास के क्रम में कितनी बार इन धर्मावलंबियों को विस्थापन का शिकार होना पडा है. और सबसे महत्वपूर्ण बात इसी धर्म के संस्थापक अब्राहम के ही वंशजों में से एक क्रिस्चियन धर्म, आजसे दो हजार चार पच्चीस (2025) और उसके बाद पंद्रह सौ साल पहले इस्लाम, और हेब्रिइझम और हेलेकिझम की शाखाओं का जन्म हुआ है. मतलब इन सभी धर्मों को सेमेटिक धर्म बोला जाता है.


लेकिन विश्व के स्थापित धर्मों में से सबसे पुराना धर्म होने के बावजूद भयंकर रक्तपात, और उस कारण पलायन,( जिसे अंग्रेजी में ‘एक्साडस’ बोला जाता है.) का सिलसिला बिसवी शताब्दी के शुरुआत में युरोपीय देशों में, तथा रशिया और पोलंड में, यहूदियों के साथ अत्याचार हुए हैं. और वह खत्म होने के पहले ही हिटलर ने 1930 जर्मनी के चांसलर बनने के बाद जो यहूदियों का नरसंहार नियोजित तरीके से किया है. वह विश्व इतिहास का अबतक का सबसे घृणास्पद और अमानवीय था. और इस कारण यहूदियों की जनसंख्या आज बड़ी मुश्किल से संपूर्ण विश्व में डेढ़ से दो करोड़ के बीच में है. जिसमें से एक करोड़ से भी कम इजराइल में गत सतहत्तर(77) सालों से, जबरदस्ती से आकर यहूदियों ने फिलिस्तीनियो के साथ वैसेही बर्बरता करते हुए. फिलिस्तीन में 1948 मे अपने इस्राइल नाम से नऐ राष्ट्र की निंव तो डाली है. लेकिन उसमें फिलिस्तीनियो के खून और मास तथा हड्डियोंकी कांक्रीट से वह निंव बनी है. और अब पिछले दो सालों से गाजा पट्टी में लगातार हमले करते हूऐ फिलिस्तीन का अस्तित्व मिटाने का काम किया जा रहा है. सतहत्तर(77) सालों से यहूदियों ने फिलिस्तीनियो के अस्तित्व से लेकर उनकी जमीन दखल करते हुए फादर ऑफ द इजराइल’ के ‘थिओडोर हर्झल’ के अनुसार स्थानीय लोगों को साम- दाम – दंड के द्वारा खदेडने की वजह से, आज फिलिस्तीन का अस्तित्व, एक राई के दाने के आकार का हो गया है.


और आनेवाले 7 अक्तुबर को दो वर्ष होने जा रहे हैं. गाजा पट्टी में हमास के आड मे गाजा का अस्तित्व खत्म करने के लिए, अमेरिका की मदद से युध्द जारी है. जिसमें एक लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई है. और सबसे हैरानी की बात इन मृतकों में पंद्रह साल के बच्चों की संख्या सब से अधिक है. गाजापट्टी की जनसंख्या 23 लाख थी. लेकिन इस्राइल ने आधे से अधिक गाजापट्टी को ध्वस्त कर दिया है. इसलिए गाजापट्टी की सबसे बड़ी आबादी विस्थापित होकर खुले आसमान के निचे रहने के लिए मजबूर हो गई है. पानी तथा बीजली तथा दवा और अन्न के अभाव रह रहे हैं.
आज का मुख्य मुद्दा है, यहूदियों के बारह सौ वर्ष के अंतराल के बाद अपना स्वतंत्र देश होना चाहिए ऐसी कल्पना को ‘झियोनिझम’ बोला जाता है. इसकी मुख्य वजह कई सारे यूरोपीय देशों से यहूदियों को निकाल बाहर करने की वजह से यहूदियों में से कुछ लोगों को लगने लगा कि, हमारा अपना देश होना चाहिए.

क्योंकि शुरू में रशिया फिर बाद में पूर्व यूरोपीय देशों के बाद जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ हिंसक घटनाओं के साथ भयंकर अत्याचार किए गए. उन्नीसवीं शताब्दी के शुरु में यहूदियों की आबादी 25-30 लाख के आसपास थी. उसमें से 90% यहूदि यूरोपीय देशों में रह रहे थे. और फिलिस्तीन में सिर्फ पांच हजार यहूदियों आबादी थी. तब फिलिस्तीन की कुल जनसंख्या ढाई से तीन लाख थी. जिसमें सबसे बडी संख्या में सुन्नी मुस्लिम समुदाय के लोग थे. और बचे हुए 25-30 हजार क्रिस्चियन लोग थे.
1882 में झिओनिस्ट विचारों की निंव लिओ पिन्स्कर की किताब ( Autoemancipation ) ने भुमिका तैयार करने का सबसे महत्वपूर्ण प्रयास किया गया. क्योंकि ” यूरोपीय देशों में मुख्य प्रवाह में शामिल करने के, सभी प्रयास कीए गए लेकिन वह सफल नहीं हो सकते” ऐसी लिओ पिन्स्कर की पक्की धारणा बन चुकी थी. और इसिलिये यहूदियों का अपना अलग देश होने का आग्रह था. लेकिन उसने फिलिस्तीन की भूमि पर ही अपना राष्ट्र होना चाहिए यह कभी भी नहीं कहा. लेकिन यहूदियों ने अपनी मातृभूमि के तरफ चलना चाहिए ऐसा संकेत जरुर दिया था. और उसके इस तर्क से रशिया में रह रहे यहूदियों के युवाओं को काफी प्रभावित किया था. और 1890 के दशक में झिओनिस्ट विचारों का प्रभाव बढा है. क्योंकि तबतक यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं था, कि कौन सी जगह पर यहूदियों का राष्ट्र बनेगा ?


क्योंकि फिलिस्तीन की जमीन खेती तथा अन्य उद्योगों के लिए प्रतिकूल होगी. और वहां का जीवन बहुत कठिन कष्टों से भरा हुआ हो सकता है. इसलिए फिलिस्तीन में नहीं करते हुए, कही अन्य क्षेत्रों में करने का विचार चल रहा था. और इसलिए 1890 में दस लाख रशियन यहूदियों की बस्ती को, अर्जेंटीना में खडी करने का प्रयास शुरू किया गया. इसके लिए बॅरॉन हर्श नाम के यहूदि उद्योगपति ने चार करोड़ डॉलर का निवेश करने के संकल्प की घोषणा की. और इस योजना को शुरू करने के पांच दशकों में सिर्फ 45 हजार यहूदि जनसंख्या थी. जो यूरोपीय देशों के अत्याचारों से तंग आकर 1950 में यह संख्या 4 लाख तक पहुंची थी. लेकिन उसके बावजूद वहां पर यहूदियों के अलग देश बनने की कल्पना समाप्त हो गई थी.


पिन्स्कर के बाद झिओनिस्ट विचारों को सबसे अधिक ताकत से ऑस्ट्रियन पत्रकार थिओडोर हर्झल (1860 – 1904 ) ने 1896 के दौरान हिब्रू भाषा में (Der Judenstaat) और अंग्रेजी भाषा में ‘द जूइश स्टेट’ शिर्षक किताब में, झियोनिझम की संकल्पना को, और अधिक मजबूत करने का प्रयास किया. हर्झल ने विएना विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई थी. और पत्रकारिता के क्षेत्र में पश्चिमी यूरोपियन देशों में घुमने का मौका मिलने की वजह से, उसने देखा कि सभी जगहों पर यहूदियों के खिलाफ माहौल है. और सिर्फ कानून बनाने से वह कम नहीं होंगे. ऐसी उसकी धारण बनी. इसिलिये उसने यहूदी लोगों के ‘राष्ट्रवाद और धर्म’ इन दोनों मुद्दों पर, अपनी किताब में यहूदी लोगों को अपना खुद का देश बनाने का स्पष्ट आवाहन किया.

और झियोनिझम को लेकर चल रहे अलग – अलग आंदोलनों को, इकट्ठा होने के लिए माहौल पैदा किया. और अब झियोनिझम का सवाल स्थानीय स्तर पर से अंतराष्ट्रीय स्तर पर आने के लिए मददगार साबित हुआ है. और सबसे आस्चर्य की बात थिओडोर हर्झल ने भी यहूदियों का देश कहा पर होगा यह बात कही नही लिखि है. फिलिस्तीन की भूमि पर होने का उल्लेख न करते हुए उसने अर्जेंटीना और अमेरिका के पश्चिम भाग जैसे पर्यायो का सुझाव दिया था. और यह जगह फिलिस्तीन की तुलना में ज्यादा समृद्ध और प्रगत थी. लेकिन इसके बावजूद उसने सोचा कि “फिलिस्तीन का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व ध्यान में रखते हुए. विश्व भर में फैले हुए यहूदियों को ज्यादा आकर्षित करेगी.” और सचमुच ही थिओडोर हर्झल की कल्पना की वजह से यूरोपीय देशों में रह रहे यहूदि, जो निराशा और दिशाहीनता की वजह से ग्रस्त हो चुके थे. वह फिलिस्तीन की कल्पना से प्रभावित होकर उन्हें एक निश्चित दिशा मिल गई.


और अगले वर्ष स्वित्झर्लंड के बाझल नामके जगह पर, थिओडोर हर्झल ने 200 यहूदियों की कांफ्रेंस का आयोजन किया था. और हर्झल के संदेश “कि हम यहूदियों ने अपने – अपने रहने के जगहो पर, और वहां की संस्कृति के साथ, शामिल होने के जबरदस्त प्रयास करने के बावजूद, हमें अत्यंत अपमानास्पद और हिनता की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया गया है. हमारे इसके लिए किए गए सभी प्रयास व्यर्थ गए. और इसलिए हम यहूदियों के लिए स्वतंत्र देश बनाने के अलावा अब कोई चारा नहीं है. “और अपनी कल्पना को साकार करने के लिए उसने यहूदियों को आक्रामक होकर ऐसे नए जगह पर घुसकर उस प्रदेश में वास्तव्य करने के लिए आवाहन किया है.
हर्झल की मृत्यु के 26 वर्षों के बाद 1930 में उसकी डायरी पहली बार प्रकाशित होने के बाद पता चला है. कि उसने यूरोपीय देशों के यहूदियों के साथ वैसेही अविश्वास और गुस्से का माहौल बना हुआ था. तो उसने उन्हें खदेड़ा जाने के लिए एक अफवाह फैला दी. कि “विश्व भर में एक करोड़ यहूदि गुप्तचर फैले हुए हैं. और उन्होंने उन देशों में किसी भी तरह की विभाजनकारी या हिंसक कृतियां नहीं करनी चाहिए. ऐसा जिन देशों को लगता है. उन्होंने यहूदियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्रनिर्माण के लिए ही, चल रही झियोनिझम की संकल्पना को मानकर यहूदियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्रनिर्माण के लिए मदद करना चाहिए.
हर्झल के इस तरह के कपटपूर्ण लेखन की वजह से उसने आगे जाकर लिखा है. कि “यहूदियों ने फिलिस्तीन में घुसकर अहिस्ता- अहिस्ता स्थानीय लोगों की जमीन पर कब्जा कर के, उन्हें अपने पास रोजगार के अवसर नही मिलेगा ऐसा माहौल बनाना है. और बिल्कुल यही तरीका अपनाने के बाद ही यहूदियों का आगमन फिलिस्तीन की जमीन पर अतिक्रमण के माध्यम से करने की राणनीति, थिओडोर हर्झल ने अपनी मृत्यु के पहले 1904 तक वर्तमान इजराइल की निंव डालने वाला हो गया है.
उसके पहले से ही मध्य पूर्व एशिया में फिलिस्तीनियो का रहन-सहन अरबों के जैसा ही था. कुछ थोडी बहुत आबादी यहूदियों की भी थी. लेकिन अब यहूदियों ने सुनियोजित तरीके से फिलिस्तीन की भूमि पर, स्थानीय अरबों से जमीन को खरीदने का सिलसिला शुरू किया. और अपनी खरीदी हुई जमीन पर अरबों को काम पर नहीं रखना चाहिए, यह थिओडोर हर्झल कि सलाह का पूरा पालन करने हुए. 1878-1908 के दौरान यहूदियों ने 67-50 लाख हेक्टर जमीन में से, एक लाख से अधिक हेक्टेयर जमीन खरीदने के बाद अपना अधिपत्य जमाने की शुरुआत की है. और बहुत ही जल्द झिओनिस्ट बैंक तथा यहूदियों का राष्ट्रीय स्तर पर एक न्यास बनाने के बाद झियोनिझम के अनुसार सांस्कृतिक और सामाजिक आदान-प्रदान के कार्यक्रम सभी स्तरों पर शुरू किए गए. और यहूदियों की सेना तैयार करने की शुरुआत की थी.


और इस कारण बड़ी संख्या में यहूदियों के आने की शुरुआत 1881 – 1900 इन उन्नीस सालों में 25 हजार यहूदि फिलिस्तीन में स्थलांतर कर के आए थे. लेकिन फिलिस्तीन में रहना इतना आसान नहीं था. क्योंकि वहां की आबोहवा में मच्छरों का उत्पात के वजह से मलेरिया का प्रकोप से बचने के लिए, पॅरिस स्थित यहूदि उद्योगपति बॅरॉन रॉथ्सचाईल्ड ने काफी बडी मात्रा में मलेरिया नियंत्रण के लिए पैसे भेज दिए थे. जो सिलसिला आज भी जारी है. जब भी इजराइल के उपर किसी भी तरह का संकट या समस्या पैदा होती है. तो अमेरिका में बैठी हुई झिओनिस्ट लॉबी मे से, यहूदियों की बड़ी – बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर हॉलीवुड तथा सबसे बडे बैंकों के मालिक ज्यादातर यहूदि ही है. और वह अमेरिका में किसी भी दल की सरकार हो. उसपर दबाव बनवाकर अमेरिका को हरहालत में, इजराइल को मदद करने से लेकर, यूएनओ में उसके तरफसे अपने वीटो का अधिकार का, इस्तेमाल करते के हूऐ इस्राइल के गुनाहों का समर्थन करती है. जैसे अभी चल रहा यूएनओ के अधिवेशन में अकेला अमेरिका गाजा मे चल रहा नरसंहार का बेरहमी से समर्थन करते हूऐ इस्राइल को साथ दे रहा है.
अभी चल रहा यूएनओ के अधिवेशन में काफी यूरोपियन देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है जिसका बेंजामिन नेथ्यान्यू ने सिर्फ विरोध ही नहीं किया हमास को खत्म करने के आड मे फिलिस्तीन का अस्तित्व ही खत्म करने का संकल्प दोहराया है.


और ब्रिटेन जिसका भारत जैसे विशालकाय देश के उपर राज था. और उस समय भारत में अंग्रेजो के खिलाफ जबरदस्त विरोध का आंदोलनों का जोर देखते हुए इंग्लैंड को भारत पर रशिया या फ्रांस अपना वर्चस्व स्थापित करने की संभावना को देखते हुए. भारत पर अपना कब्जा बनाएं रखने के लिए, भारत के अगल – बगल के प्रदेशों में, अपना ही वर्चस्व बनाएं रखने के लिए, इराण सबसे आदर्श देश दिखाई दे रहा था. और भारत में अपनी सेनाओं को लाने के लिए सबसे कम समय में पहुंच सके ऐसे मार्ग के रूप में कौन सा मार्ग सबसे कम समय में सेना को भारत में ला सकते उसके लिए सुएज कॅनॉल बनने से चालीस दिन में इंग्लैंड से भारत में सेना आ सकती है. और उसके लिये लगने वाले तेल की खोज में आबादान (1916) नामके इराण के क्षेत्र में तेल के कुंओकी खोज की वजह से इंग्लैंड तथा अमेरिका को बहुत ही फायदा हुआ . 1918 के प्रथम विश्व की समाप्ति और द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के दौरान मध्य पूर्व एशिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है. दुसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने के दौरान यूरोपीय देशों की शक्ति कम होने से उन्हें अपने कब्जे के प्रदेशों को सम्हालना काफी मुश्किल होने की वजह से. और उस क्षेत्र के लोगों की आकांक्षाओं में वृद्धि होने से उन्होंने आजादी की लड़ाई शुरू कर दी. और उसमे से इजिप्त, इराक, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन, और लिबिया जैसे देशों का निर्माण हुआ. और उसी कड़ी में बालफोर्ड डिक्लेरेशन की वजह से इस्राइल के निर्माण का रास्ता प्रशस्त हो गया. झिओनिस्ट आंदोलन के लंदन स्थित प्रवक्ता हाईम वाईझमन का झिओनिस्ट विचारों को फैलाने में बहुत बड़ा योगदान रहा है. रशिया में पैदा हुए वाईझमन की पढाई बर्लिन और स्विट्जरलैंड के क्राईबर्ग में हुई थी. रसायन शास्त्र में डॉक्टरेट की थी. बर्लिन में पढ़ने के समय ही उसे झिओनिझम की पहचान हुई. और उसने कुछ समय के भीतर ही संपूर्ण विश्व में ‘वर्ल्ड झिओनिस्ट ऑर्गनाइजेशन ‘ की शाखाओं को रशिया में खोलने में कामयाबी हासिल हुई. 1904 में रसायन शास्त्र के मॅंचेस्टर विश्वविद्यालय में शिक्षक बनने के बाद वहां पर भी उसने झिओनिस्ट विचारों को फैलाने का काम शुरू किया. और इसी दौरान उसने ब्रिटेन के प्रभावशाली राजनेताओं के साथ संबंध बनाने में अधिक ध्यान दिया. अपने मुद्दों को बीना कुछ संकोच किए और प्रभावी रूप से रखने की कला में वाईझमन बहुत ही माहीर था. लंबा – दुबला पतला, और फ्रेंच कट दाढी के वजह से, उसकी तरफ देखने वाले लोगों को वह लेनिन के जैसा लगता था. अत्यंत प्रभावशील लोगों के बीच अपनी छाप बनाने की कला में वाईझमन माहिर था. 1906 के इंग्लैंड के पार्लियामेंट के चुनाव के दौरान टोरी पार्टी के नेता ऑर्थर बॅल्फोर के साथ मुलाकात करने का मौका मिला. और उसके बाद बॅल्फोर ने झिओनिझम के तरफसे अपनी गोटीयां खेलने की शुरुआत की है. 1916 के पहले महायुद्ध के दौरान इंग्लैंड को अँसिटोन नाम के रसायन की आवश्यकता थी. जो बंदुक की गोलीयो मे तथा अन्य बम-बारुद बनाने के लिए इस रसायन का इस्तेमाल होता था. इस कारण फ्रांस के खिलाफ शुरू किया गया युद्ध में कम-से-कम 30,000 टन अँसिटोन की आवश्यकता है. यह बात इंग्लैंड को पता चली. तब ब्रिटेन की सेना में शामिल भावी प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने किसी मुलाकात में यह बात वाईझमन को बताई, तो वाईझमन ने अत्यंत जल्दबाजी में बहुत ही सस्ते तकनीक से अँसिटोन बनाने कर देने की वजह से ब्रिटिश सेना के उच्चाधिकारियों के मन में वाईझमन के प्रति काफी सम्मान पैदा हो गया था. और उसे काफी बड़ा पुरस्कार देने की पेशकश की तो उसने कहा कि मुझे मेरी यहूदी कौम के लिए एक स्वतंत्र देश चाहिए. वाईझमन ने मन-ही-मन में फिलिस्तीन के जमीन पर यहूदियों के लिए राष्ट्र बनाने की योजना ने घर बना लिया था . 1920 साल के सॅन रेमो कॉन्फ्रेंस के फैसले के मुताबिक अंग्रेजों को फिलिस्तीन के भवितव्य तय करने के अधिकार दिए गए. अपने 28 साल के फिलिस्तीन के उपर चले राज के अंतिम समय में, ब्रिटेन ने फिलिस्तीन में 85% मतलब 66.82 लाख जनसंख्या अरब लोगों की होने के बावजूद ब्रिटेन ने यहूदियों के तरफसे फैसले लेने का काम किया. और आज की फिलिस्तीन की समस्या पूरे विश्व के सामने मौजूद हैं. अबतक फिलिस्तीन में अरबों की जनसंख्या अधिक रहते हुए उनके हिस्से में फिलिस्तीन में विश्व के सबसे बड़े खुले जेल जैसे वेस्ट बैंक से लेकर गाजापट्टी में रहने की नौबत आ गई है. और पिछले दो साल से तो संपूर्ण गाजापट्टी के उपर इस्राइल आयेदिन हमले करते हुए उसे लगभग नष्ट करने की कोशिश कर रहा है. और रशिया – युक्रेन के यूध्द को रोकने का दावा ठोकने वाला अमेरिका का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस्राइल को यूध्द रोकने के लिए कहने की जगह इस्राइल को मदद करने के साथ- साथ गाजावासियोको “गाजा खाली करो मुझे वहां पर सिरिसॉर्ट बनाना है.” कह रहा हैं. और आश्चर्य की बात यह आदमी नोबल शांती पुरस्कार का सपना देख रहा है.

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