ज्ञानी ज़ैल सिंह को मैंने बहुत करीब से देखा और जाना है ।1972 से 1977 तक मुख्यमंत्री के तौर पर और 1977 से 1980 तक ‘कुछ नहीं’ के रूप में, 1980 से 1982 में गृहमंत्री के तौर पर तथा 1982 से 1987 से राष्ट्रपति के रूप में ।राष्ट्रपति पद से अवकाश प्राप्त करने के बाद भी उनसे मेरी मुलाकातें होती रहीं उनके सर्कुलर रोड के आवास पर ।मुख्यमंत्री के तौर पर जब उन्होंने मोहाली में पहली सेमीकंडक्टर निर्माण ईकाई स्थापित की तो इसे चंडीगढ़ के समकक्ष समझा गया,हरियाणा का पंचकूला भी मोहाली की तर्ज पर बना ।इस सिलसिले में मैं ‘दिनमान’ की ओर से ज्ञानी ज़ैल सिंह से चंडीगढ़ में मिला था ।उनसे पंजाब में उनकी प्राथमिकताओं के बारे में जब पूछा तो उन्होंने बताया था कि पंजाब में भूमि सुधार अधिनियम को कानून बनाने,शिक्षा और सार्वजनिक रोज़गार में मज़हबी सिखों और वाल्मीकि के लिए आरक्षण सुनिश्चित करना है । आप भी तो पिछड़े वर्ग की श्रेणी में आते हैं,उन्होंने हंसते हुए कहा कि ‘नहीं,लोगों को भ्रम है,मैं रामगढ़िया सिख हूं ।हमारी बिरादरी में तरखान (बढ़ई) और लुहार आते हैं ।मैं तरखान परिवार से हूं ।’उन्होंने यह भी बताया था कि मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने गुरुद्वारे में ग्रंथी बनने के लिए प्रशिक्षण लिया और अमृतसर में शास्त्रों के ज्ञान के निशान के रूप में ‘ज्ञानी’ की उपाधि प्राप्त की ।इसलिए उन्होंने अपने नाम के साथ ज्ञानी लिखना शुरू कर दिया । यह पूछे जाने पर कि आपका बचपन का नाम तो जरनैल सिंह था,आप जेल सिंह कैसे हो गये ।इस बार फिर हंसे और बोले कि ‘मैं कांग्रेस पार्टी से संबद्ध प्रजा मंडल का सदस्य था । फरीदकोट में किसान आन्दोलों में भाग लेने तथा राजनीतिक सक्रियता के चलते मैंने 1938 से 1943 के बीच एकांत कारावास में गुजारा, इसलिए मैंने अपना नाम जरनैल सिंह से जेल सिंह कर लिया । फरीदकोट तब अलग राज्य था ।स्वतंत्रता के बाद उसका पटियाला में विलय हो गया ।’

क्या मोहाली की रूपरेखा और विकास चंडीगढ़ की तर्ज पर किया जाएगा,यह पूछे जाने पर मुस्कुरा कर बोले थे कि ‘आप मोहाली की किससे तुलना कर रहे हैं? यह बात सही है कि चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला के मुख्य फ्रांसीसी वास्तुकार ली कार्बुजिये थे जिन्हें चंडीगढ़ को आधुनिक वास्तुकला के एक उत्कृष्ट डिज़ाइन करने के लिए जाना जाता है ।मोहाली के विकास में उनका योगदान था लेकिन उनके बाद एम.एन. शर्मा ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी ।वह पहले भारतीय मुख्य वास्तुकार थे जिन्होंने सीधे ली कार्बूज़िए के अधीन काम किया था । इसी कारण मोहाली और पंचकूला पर ली कार्बूज़िए की छाप दीखती है ।

सुना जाता है कि 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद आपको सिख धर्म के चैंपियन के तौर पर देखा जाता है,इसकी क्या वजह है । इसके उत्तर में ज्ञानी ज़ैल सिंह ने बताया था कि अकालियों की पंजाबी सूबे की मांग के फलस्वरूप 1966 में हमें जो पंजाब मिला था उसे मूर्तरूप देने के लिए मैंने पंजाब के सबसे प्रमुख गुरुद्वारों को जोड़ने वाले गुरु गोबिंद सिंह राजमार्ग का उद्घाटन किया, सिख गुरुओं के नाम पर कई सरकारी अस्पतालों के नाम बदले,अमृतसर में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय शुरू किया, गुरु गोबिंद सिंह के एक बेटे अजीतसिंह के नाम पर चंडीगढ़ के पास साहिबजादा अजीतसिंह नगर मोहाली का एक रेलवे स्टेशन है।मोहाली को भी इसी नाम से जाना जाता है ।

ज्ञानी ज़ैल सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में 1974 में विधायक साधु सिंह थिंड के अनुरोध पर शहीद उधम सिंह (26 दिसंबर, 1899-31जुलाई, 1940) के अवशेषों को ब्रिटेन की कब्र से निकाल कर भारत वापस लाया गया ।उस ताबूत का स्वागत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी,तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा और ज्ञानी ज़ैल सिंह ने किया था ।उसे एक जुलूस की शक्ल में पंजाब में लाया गया और पूरे राजकीय सम्मान के साथ सुनाम में उन अवशेषों का अंतिम संस्कार किया गया और ज्ञानी जी ने खुद चिता को अग्नि दी थी।2 अगस्त,1974 को उनकी राख को सात कलशों में विभाजित कर एक-एक कलश हरिद्वार,कीरतपुर साहब,रौजा शरीफ,सुनाम और जलियांवाला बाग के संग्रहालय में,और दो कलश सुनाम में शहीद उधम सिंह कला महाविद्यालय के पुस्तकालय में रखे गये।सुनाम में उनके पैतृक घर को संग्रहलय में परिवर्तित कर दिया गया है। सुनाम का आधिकारिक नाम बदलकर ‘सुनाम उधम सिंह वाला’ कर दिया गया। उत्तराखंड में उनके नाम पर उधम सिंह ज़िला है। आनंदपुर साहिब फाउंडेशन द्वारा उन्हें मरणोपरांत ‘निशान-ए-खालसा’ से सम्मानित किया गया। उनके नाम पर कई फिल्में भी बनीं जैसे शहीद उधम सिंह,जलियांवाला बाग,सरदार उधम आदि ।उन्हें शहीद-ए-आज़म सरदार उधम सिंह भी कहा जाता है।

इस संदर्भ में उधम सिंह की शहादत के कारणों को जानना ज़रूरी है । 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में बैसाखी मनाने के लिए इकट्ठा हुए लोगों पर कर्नल रेजिनाल्ड डायर की कमान में सैनिकों ने भीड़ पर गोलियां चला दीं जिसमें कई सौ लोग मारे गए ।उधम सिंह और अनाथालय का उनका एक दोस्त, जो भीड़ को पानी पिला रहे थे, बच गये ।उसके बाद उधम सिंह क्रांतिकार संगठन में शामिल हो गये क्योंकि वह भगत सिंह से बहुत प्रभावित थे ।एक बार वह बिना लाइसेंस हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिए गये। रिहा होने के बाद वह पुलिस को चकमा देकर विदेश भागने में कामयाब हो गये और सीधे अमेरिका पहुंचे ।वहां वह हिंदुस्तान गदर पार्टी में शामिल हो गये ।गदर पार्टी का उद्देश्य अमेरिका से आप्रवासी भारतीयों का स्वदेश के स्वाधीनता सेनानियों के साथ मिलकर भारत को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद कराना था ।इस संगठन से जुड़े रहने के लिए उधम सिंह ने मेक्सिको की लूपे हर्नाडेज़ नामक महिला से शादी कर ली जिनसे उनके दो बेटे हुए ।उन दिनों कई ऐसे भारतीय पुरुषों ने विदेशी महिलाओं से शादी की थी।अगर वे ऐसा न करते तो उन्हें देश से निष्कासित कर दिया जाता । उधम सिंह ऐसे ऐतिहासिक महापुरुष हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए भारत में सरदार भगतसिंह और चंद्रशेखर आज़ाद के क्रन्तिकारी संगठन और अमेरिका में लाला हरदयाल,सोहनसिंह भकना और बाबा वसाखा सिंह के हिंदुस्तान गदर पार्टी में जमकर काम किया ।वह गदर पार्टी की एक अखबार ‘गदर दी गूंज’ के लिए नियमित लिखा करते थे जिस में वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश करने की बात कहते थे । ‘हम ब्रिटिश साम्राज्य से पीड़ित हैं, हमें अपनी जन्मभूमि को इन जालिमों से आज़ाद कराना है ‘।

क्योंकि उनका मकसद कुछ और था लिहाजा वह सात बरस अमेरिका में रहने के बाद अपने बीवी बच्चों को वहीं छोड़ लंदन पहुंच गये ।बताया जाता है कि लंदन में भी उन्होंने एक अंग्रेज़ महिला से शादी कर ली ।उनका एक ही उद्देश्य था जलियांवाला बाग के हत्याकांड का बदला लेना ।वहां उधम सिंह ने कई तरह के छोटे मोटे काम किये। वह इंग्लैंड के कोवेन्ट्री में भारतीय श्रमिक संघ से जुड़े और उनकी गतिविधियों में भाग लिया करते थे ।13 मार्च,1940 को माइकल ओ’डायर को लंदन के कैक्सटन हाल में रॉयल सोसाइटी फ़ॉर एशियन अफेयर्स, जो पहले ईस्ट इंडिया एसोसिएशन थी, में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया ।उधम सिंह ने अपनी अंग्रेज़ पत्नी के नाम टिकट लेकर कार्यक्रम में प्रवेश किया ।उन्होंने रिवाल्वर के आकार की एक किताब में रिवाल्वर छुपा कर रख ली थी जैसे ही ओ’डायर मंच की ओर बढ़ा उधम सिंह ने उस पर दो गोलियां दागीं,एक उसके दिल में लगी और दूसरी फेफड़े को पार कर गयी ।उधम सिंह को तुरंत गिरफ्तार कर रिवाल्वर पुलिस ने ज़ब्त कर ली ।एक अप्रैल,1940 को उधम सिंह पर माइकल ओ’डायर की हत्या का औपचारिक आरोप लगाकर उन्हें हिरासत में लेकर ब्रिक्सटन जेल में भेज दिया गया। जब उधम सिंह से ओ’डायर को मारने की मंशा पूछी गयी तो उन्होंने कहा कि’ मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश करने की बात कहता हूं ।अगर आपमें ज़रा भी मानवीय गरिमा है,आपको शर्म से मर जाना चाहिए। मुझे उसे मारने में तिल भर भी रंजिश नहीं,वह इसी लायक था,असली गुनहगार वही था ।वह मेरे लोगों की भावनाओं को कुचलना चाहता था,इसलिए मैंने उसे कुचल दिया ।पूरे 21 साल से मैं बदला लेने की कोशिश कर रहा हूं ।मुझे खुशी है कि मैंने यह काम किया ।मुझे मौत से डर नहीं लगता।मैं अपने देश के लिए मर रहा हूं ।और मैंने उसे मार डाला ।मुझे अपना गम नहीं,मुझे अपने मरने का कोई अफसोस नहीं ।मेरा मुल्क जिंदा रहना चाहिए।’ हिरासत में रहते हुए उधम सिंह ने खुद को राम मोहम्मद सिंह आज़ाद नाम दिया ।पहले तीन शब्द पंजाब के तीन प्रमुख धार्मिक समुदायों हिंदू, मुसलमान और सिख थे और ‘आज़ाद’ उनकी उपनिवेश विरोधी भावना का प्रतीक। 31 जुलाई, 1940 को उधम सिंह को फांसी दे दी गयी । उधम सिंह कहा करते थे कि ‘देश की आज़ादी के लिए यह कीमत तो कुछ भी नहीं ‘।

ज्ञानी ज़ैल सिंह ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वालों के लिए आजीवन पेंशन की योजना शुरू की ।उन्होंने केवल उधम सिंह को ही नहीं बल्कि भगत सिंह की विरासत को भी सम्मान दिया ।खटकर कलां में उनके पैतृक गांव (भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर,1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा गांव में हुआ जो आज पाकिस्तान में है)को एक संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया और उनकी मां विद्यावती को ‘पंजाब माता’ की उपाधि से सम्मानित किया ।भगत सिंह के जन्मदिन पर राजपत्रित अवकाश घोषित किया गया ।

5 मई,1916 को फरीदकोट ज़िले के संधवान में जन्मे ज़ैल सिंह खुद भी स्वतंत्रता सेनानी थे लिहाजा उधम सिंह और भगत सिंह की देश की आज़ादी में दी गयी कुर्बानी को बयां करते करते वह स्वयं जज़्बाती हो गए थे ।1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद कोई टिकाऊ मुख्यमंत्री नहीं बना इसलिए ज्ञानी ज़ैल सिंह के पूरे कार्यकाल (1972-77) को लोग बड़ी उम्मीद और शिद्दत भरी नज़रों से देखते थे ।पुनर्गठन के बाद कांग्रेस के ज्ञानी गुरमुखसिंह मुसाफिर मुख्यमंत्री (1नवंबर,1966-8 मार्च,1967) बने ।1967 के विधानसभा चुनाव में 104 सदस्यीय (अब यह संख्या 117 कर दी गयी है)चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा बनी और कांग्रेस 48 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी जबकि अकाली दल (संत फतेहसिंह) को 24, भारतीय जनसंघ 9, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 5, मार्क्सवादी 3, रिपब्लिकन पार्टी 3,अकाली दल (मास्टर तारा सिंह) 2 और अन्य 9 पर रहे।सरकार बनाने के लिए 53 विधायकों का समर्थन अनिवार्य होता है ।चुनाव परिणाम के बाद जस्टिस गुरनाम सिंह ने अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिलकर पीपुल्स यूनाइटेड फ़्रंट नामक गठबंधन बनाया जिसमें अकाली दल (संत फतेह सिंह), भारतीय जनसंघ और कम्युनिस्ट पार्टी शामिल थीं । मुख्यमंत्री जस्टिस गुरनाम सिंह के अलावा लछमन सिंह गिल शिक्षामंत्री, भारतीय जनसंघ के डॉ बलदेव प्रकाश,वित्तमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी के सतपाल डांग,श्रममंत्री (6 मार्च,1967-25 नवंबर,1967) आदि मुख्य सदस्य थे ।लेकिन नवंबर, 1967 में लछमन सिंह गिल ने 16 विधायकों के साथ दलबदल कर लिया और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनायी (25 नवंबर, 1967-23 अगस्त,1968) । वह भी टिकाऊ साबित नहीं हुई ।उसके बाद राष्ट्रपति शासन (23 अगस्त,1968-17 फरवरी,1969) लागू कर दिया गया । एक बार फिर जस्टिस गुरनाम सिंह मुख्यमंत्री बने (17 फरवरी,1969-27 मार्च, 1970), इस बार शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनसंघ के साथ।उसके बाद प्रकाशसिंह बादल (27 मार्च,1970-14 जून,1971) मुख्यमंत्री रहे।उनकी सरकार भी ज़्यादा समय तक टिकी नहीं रह पायी और राज्य को पुन: राष्ट्रपति शासन (14 जून, 1971-17 मार्च,1972) के हवाले कर दिया गया । 1972 में पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 66 सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त कर लिया ।इस चुनाव में शिरोमणि अकाली दल को 24 तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 10 सीटें मिलीं और 3 अन्य के खाते में गयीं । इस प्रकार कांग्रेस के ज्ञानी ज़ैल सिंह (17 मार्च, 1972-30 अप्रैल,1977) मुख्यमंत्री बने ।

ज्ञानी ज़ैल सिंह का मानना था कि पंजाब के पुनर्गठन के बाद 1967 में विधानसभा को जो पहला चुनाव हुआ उसमें कांग्रेस बहुमत प्राप्त नहीं कर पायी लेकिन पांच बरस के पूरे कार्यकाल में अकाली दल का कोई न कोई गुट सत्तारूढ़ रहा ।इस पूरे समय सत्ता को लेकर ही उठापटक होती रही, नये पंजाब के विकासकार्यों की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया ।लिहाजा 1972 के चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दे हमारी पार्टी में वोटरों ने अपना विश्वास प्रकट किया । पंजाब की भावनाओं और अस्मिता से जो और जितने भी काम संभव थे उन्हें करने की मैंने कोशिश की । आप पर आरोप है कि पिछड़ी जाति का होने के नाते आपने अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित नौकरियों के कोटे के तहत वाल्मीकि और मज़हबी सिखों के लिए पचास प्रतिशत नौकरियों का आरक्षण शुरू किया।इसका मकसद क्या दलित वोटरों के बीच अपनी स्थिति मज़बूत बनाना नहीं था ।ज्ञानी जी ने बताया था कि ‘मैंने जो भी काम किए संविधान के दायरे में रहते हुए किये’।

लेकिन 1975 में आपातकाल के दौरान तो आपने संविधान की अनदेखी की थी और लोगों की जबरन नसबंदी करायी थी।ज्ञानी ज़ैल सिंह ने बताया था कि हमने संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम की नीतियों पर अमल किया था ।वे नीतियां थीं:साक्षरता, परिवार नियोजन, वृक्षारोपण,जातिवाद का उन्मूलन और दहेज उन्मूलन।राष्ट्रीय जनसंख्या को नियंत्रित करने और परिवार नियोजन के दृष्टिगत नसबंदी के कदम उठाये गए थे। यकीन जानिए हमने किसी के साथ ज़्यादती नहीं की थी । वैसे ये समाज सुधार की नीतियां थीं जिनका क्रियान्वयन ‘सही’ तरीके से नहीं किया गया।अपना स्पष्टीकरण देते हुए उनके चेहरे से मायूसी,उदासी और मजबूरी के भाव स्पष्ट रूप से झलक रहे थे ।

1977 में पंजाब विधानसभा में हार के बाद ज्ञानी ज़ैल सिंह के दिल्ली आने पर उनसे मेरी मुलाकातों का दौर जारी रहा। मैंने ‘दिनमान’ के अलावा रेडियो के राष्ट्रीय कार्यक्रम में भी उनके इंटरव्यू किए थे ।इन कई मुलाकातों में मैं विभिन्न विषयों पर जितनी जानकारियां भी ज्ञानी ज़ैल सिंह से प्राप्त कर पाया उन्हें ही याद करते हुए साझा कर रहा हूं ।उन्होंने माना कि आपातकाल के चलते ही 1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया । 117 सदस्यीय विधानसभा में जहां शिरोमणि अकाली दल को 58, जनता पार्टी को 25 सीटें मिलीं वहां कांग्रेस को मात्र 17 पर संतोष करना पड़ा ।जनता पार्टी की इस लहर में ही लोकसभा चुनाव में राय बरेली से इंदिरा गांधी को राज नारायण और अमेठी से संजय गांधी को रवींद्र प्रताप सिंह ने हराया था । 542 सदस्यीय लोकसभा में जनता पार्टी गठबंधन को 345 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को 154 सीटें ।

1977 के बाद ज्ञानी ज़ैल सिंह ‘खाली’ से ही लगते थे ।उन्हें लोगों ने कनाट प्लेस में अकेले या कुछ लोगों के साथ चहलकदमी करते हुए देखा था ।मेरे मन में भी उत्सुकता जगी ।कुतूहलवश मैं भी एक दिन शाम को कनाट प्लेस के गलियारे में विंडो शॉपिंग कर रहा था कि ज्ञानी ज़ैल सिंह को मैंने अकेले आते हुए देखा ।सत श्री अकाल करने के बाद मैंने उनसे पूछा कि ‘अकेले कैसे! कोई तामझाम नहीं।’ मेरी बात सुनकर हंसे और बोले, ‘प्रदीप (वह मुझे इसी नाम से संबोधित किया करते थे) मुझे देखना है कि कुर्सी न रहने पर लोग कैसा बर्ताव करते हैं ।कोई जानता पहचानता भी है कि नहीं’।मैंने पूछा,’किस नतीजे पर पहुंचे’।बोले,’यह खुलापन और ठंडी हवा अच्छी लग रही है ‘।मैंने उन्हें बताया कि राजस्थान में राज्यपाल के पद से सेवानिवृत होने के बाद सरदार हुकम सिंह बी जी के साथ अपने घर रिंग रोड से साउथ एक्सटेंशन में तिपहिये पर जाया करते थे गोल गप्पे खाने के लिए ।एक बार उनके घर जाने पर उन्होंने मुझे बताया कि ‘हमारा यह अनुभव बहुत अच्छा और सुखकारी रहा ।हमें किसी ने नहीं पहचाना,कुछ सरदार ज़रूर सत श्री अकाल कर जाते लेकिन हमारे पास रुकते नहीं । एक बार के अनुभव के बाद हम लोग अक्सर तिपहिये से ही बाहर जाया करते थे,आम लोगों को देखने और उनकी दिनचर्या जानने के लिये।कभी कभी लोगों से बातचीत कर उनका हालचाल भी पूछ लिया करते थे । बेशक यह बहुत खुली जिंदगी थी जो हमें अपने अतीत से जोड़ती थी ।घर में गाड़ी ड्राइवर सब थे लेकिन हमें अपने आप को खोजना था ।बेशक यही हक़ीक़त है,असली ज़िंदगी है’ कहकर सरदार साहब हंसे थे ।

सरदार हुकम सिंह के अनुभवों को सुनने के बाद ज्ञानी ज़ैल सिंह ने कहा कि मेरा मकसद भी तो यही है ‘अपने आप को जानना। कनाट प्लेस के इन गलियारों में आज के देसी विदेशी युवा अपने आप में मस्त दीखे, किसी ने उड़ती निगाह से देखा भी तो देखकर आगे बढ़ गया ।कुछ बड़ी उम्र के सरदारों ने सत श्री अकाल की लेकिन बातचीत किसी ने नहीं की’।मैंने उन्हें टोकते हुए कहा कि बातचीत किस मुद्दे या विषय पर करते,आपके पास कुर्सी तो है नहीं, आप ‘पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री’ हैं । भूतपूर्वों की ऐसी ही दुर्गति होती है ।थोड़ा-सा गंभीर होकर मैंने उन्हें सलाह दी कि आपको चौकस रहने की आज भी बहुत जरूरत है, क्योंकि आपके मुख्यमंत्री बनने से पहले अकाली दल सत्ता में था और आज भी है ।

होता यह है कि जब राजनेता सत्ता में नहीं होते तो कभी कभी आम लोगों के बीच अपनी हैसियत जानने
के लिए बिना किसी सुरक्षाकर्मी के बिंदास खुले तौर पर घूमते हैं, आने वाले किसी खतरे से बेखबर होकर ।पश्चिमी देशों में यह आम बात है लेकिन हमारे यहां नहीं।यहां सदैव चौकस और सतर्क रहने की आवश्यकता है ।कई पश्चिमी देशों के राज्याध्यक्षों को मैंने माल या सड़क पर बेफिक्र घूमते या खरीदफरोख्त करते हुए देखा है ।उन्हें अपनी गाड़ी खुद चलाते हुए भी पाया है ।1977 में मैंने ऑस्ट्रिया के चांसलर (प्रधानमंत्री) ब्रूनो क्राइस्की को अपनी कार स्वयं चलाते हुए वीएना की सड़कों पर देखा था ।सुबह मैं उनके ऑफ़िस में मिला था और ‘दिनमान’ के लिए उनका इंटरव्यू किया था जिसमें उन्होंने जार्ज फेर्नाडीस को विशेष तौर पर याद किया था ।उन दिनों जार्ज लोकसभा में जनता पार्टी के सांसद थे।उनका सोशलिस्ट इंटरनेशनल से संबंध था। ब्रूनो क्राइस्की भी सोशल इंटरनेशनल संस्था के सदस्य थे। 1951 में स्थापित सोशलिस्ट इंटरनेशनल (समाजवादी अंतरराष्ट्रीय संस्था) विश्व का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जिसका लक्ष्य वैश्विक स्तर पर सामाजिक न्याय, मानवाधिकारों के सिद्धांतों,समानता और लोकतंत्र को बढ़ावा देना है ।यह संस्था लोकतांत्रिक और समाजवादी विचारधाराओं के माध्यम से एक बेहतर,न्यायपूर्ण और समानतावादी दुनिया बनाने के लिए काम करती है जो संयुक्तराष्ट्र के साथ भी संबद्ध है । क्राइस्की को अपनी गाड़ी खुद चलाता देख,होटल पहुंचकर मैंने उनके घर फोन किया। उधर से आवाज़ आयी,’क्राइस्की ‘ । मैंने जब उन्हें अपना परिचय दिया तो वह फौरन पहचान गये ।मैंने उनसे पूछा कि शाम को गाड़ी आप खुद चला रहे थे,क्या आपके पास ड्राइवर नहीं है ? उन्होंने बताया कि हरेक की ड्यूटी निश्चित होती है ।वह लोग समय पर आते हैं और ड्यूटी खत्म होने पर अपने अपने घरों को चले जाते हैं ।हां, कोई अर्जेंट इमरजेंसी आ जाए तो रुक जाते हैं ।और आपका निजी सचिव! बोले, ‘उसका काम समाप्त हुआ तो उसकी छुट्टी ।’फिर खुद ही बोले,’पश्चिमी देशों में यह आम रवायत है ।’यह पूछने पर कि क्या किसी आतंकी हमले से आपको डर नहीं लगता ।वह हंस कर बोले कि ‘वीएना संयुक्तराष्ट्र नगर है ।इसके महत्व को देखते हुए सुरक्षा की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की है न्यूयॉर्क और जिनेवा की भांति। इसलिए हमारा देश सुरक्षित है ।’

क्योंकि मैं कई यूरोपीय देशों, अमेरिका,तत्कालीन सोवियत संघ के गणराज्यों की यात्राएं कर चुका हूं इसलिए कुछ को सत्ता में रहने के बावजूद आम नागरिकों की तरह अपने निजी और घरेलू काम स्वयं करते हुए देखा है और उनके बारे में सुन भी रखा है ।ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री रहते हुए मॉल में अपना सामान खरीद और ढो कर अपनी गाड़ी में रखते हुए देखे गए थे।कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो अपने बच्चों को गोद में उठाकर गाड़ी चलाते हुए देखे जाते थे ।रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपनी गाड़ी में पेट्रोल भरते हुए अक्सर देखे जाते हैं ।अपनी गाड़ियों में पेट्रोल भरते हुए तो मैंने कई प्रधानमंत्रियों को देखा है ।कुछ देश ऐसे हैं जहां के सांसदों के लिए सरकारी आवास नहीं होते। कहीं कहीं सभी सांसदों के लिए एक स्थान पर फ्लैट होते हैं,बंगले कम ही देखने-सुनने को मिलते हैं । अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बोराक ओबामा को आम लोगों से घुलते मिलते अक्सर देखा जाता है और बुकस्टोर्स में किताबें खरीदते हुए भी ।लंदन की अपनी तमाम यात्राओं (1975-1983) में बॉबी (पुलिस) के हाथ में सिवाय एक छड़ी के कुछ नहीं देखा तो वारसा (पोलैंड) और बुदापेश्त (हंगरी) में (1977-1980) मुजरिमों को बिना किसी हीलहुज्ज्त के पुलिस के पीछे-पीछे आते हुए देखा बिना हथकड़ी के। आज वहां भी वैसे हालात नहीं हैं ।ये देश भी अब आतंकियों का ‘मृगवन’ बनते जा रहे हैं ।

बेशक यूरोपीय देशों में प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री बिना सुरक्षा खुलेआम घूमा करते थे लेकिन अपनी इस ‘आज़ादी’ का शिकार स्वीडेन के प्रधानमंत्री ओलोफ पाल्मे हो गये थे।वह अक्सर बिना अंगरक्षकों के घूमा करते थे अन्य पश्चिमी देशों के प्रधानमंत्रियों की तरह।इसी प्रकार 28 फरवरी,1986 को आधी रात के करीब वह अपनी पत्नी लिस्बेथ पाल्मे के साथ राजधानी स्टॉकहोम के मध्य में स्थित स्वेवागेन स्ट्रीट पर एक सिनेमाघर से घर लौट रहे थे तभी उन्हें पीठ में बहुत करीब से गोली मार दी गयी ।हालांकि गोली उनकी पत्नी लिस्बेथ पर भी दागी गयी थी लेकिन वह उनकी पीठ को छूती हुई निकल गयी ।ओलोफ पाल्मे का निधन हो गया जबकि लिस्बेथ बिना किसी गंभीर चोट के बच गयीं । इस घटना के बाद नार्डिक के पांचों देशों में नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था चाकचौबंद कर दी गयी ।ये पांच नार्डिक देश हैं:डेनमार्क,स्वीडेन, नॉर्वे, फ़िनलैंड और आइसलैंड । लेकिन दूसरे यूरोपीय देशों में नार्डिक देशों की तरह सख्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी ।बोरिस जॉनसन 24 जुलाई,2019 से 6 सितम्बर,2022 तक प्रधानमंत्री रहे । उनके बाद भारतीय मूल के प्रधानमंत्री ऋषि सुनाक (2022-2024) भी प्रधानमंत्री रहते हुए अपने परिवार के साथ धड़ल्ले से बिना किसी सुरक्षाकर्मी के घूमा करते थे।अब तो आज़ाद हैं बोरिस जॉनसन और ऋषि सोनाक दोनों ।

जब कई दिनों तक ज्ञानी ज़ैल सिंह से कनाट प्लेस गलियारे में मुलाकात नहीं हो पायी तो मैं उनसे मिलने के लिए गया ।वह मुझे कुछ संजीदा दीखे ।मैंने जब उनसे इसकी वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि तुम्हारी मुझे ‘होशियार रहने की ताकीद’ के बाद हमारी पार्टी के कुछ लोग मुझे मिले और चौकस रहने के लिए कहा ।मैंने ज्ञानी जी को आश्वस्त किया कि उतने डरने की जरूरत भी नहीं,आप नॉर्मल रहें ।यह 1979 की बात है । मैंने उन्हें उन सभी मिसालों के बारे में बताया जिनका मैं ज़िक्र कर चुका हूं ।वह बोले कि जॉन केनेडी की तो राष्ट्रपति रहते हुए उनकी खुली गाड़ी में हत्या हो गयी थी ।इस बाबत मैंने उन्हें जानकारी दी कि दरअसल जॉन केनेडी डेमोक्रेटिक पार्टी के उदारवादी विचारों वाले नेता थे ।वह नवंबर,1963 की एक दोपहर डेमोक्रेटिक पार्टी में राल्फ यारबोरो और डॉन यारबोरो तथा अनुदारवादी व रूढ़िवादी जॉन कानली के बीच मतभेदों को दूर करने के लिए एक राजनीतिक यात्रा पर टेक्सास में थे ।जॉन केनेडी, अपनी आदत के अनुसार,खुली लिमोजीन में थे और उनके साथ कानली दंपत्ति भी थी ।उनके काफिले पर उन्हें एक बार पीठ में गोली मारी गयी और एक बार सिर में ।राष्ट्रपति केनेडी का तो निधन हो गया लेकिन कानली दंपत्ति को खरोंच तक नहीं आयी ।इसे आप क्या कहेंगे! उदारता बनाम रूढ़िवादिता या उत्तर बनाम दक्षिण ।दिलचस्प बात यह है कि जिस ली हार्वे ओसवाल्ड को गिरफ्तार किया गया था,उसने कहा था कि वह बेगुनाह है,उसने केनेडी को गोली नहीं मारी थी।इससे पहले कि वह कुछ और बता पाता किसी जैक रूबी ने उसे गोली मार कर उसकी हत्या कर दी ।
अमेरिका में एक किंवदंती है कि अमेरिका में हर बीस साल में एक राष्ट्रपति की हत्या होती है । वह इसलिए कि 1865 में अब्राहम लिंकन, 1881 में जेम्स ए गारफील्ड और 1901 में विलियम मैककिनले की हत्याएँ हुई थीं ,मोटे तौर पर बीस साल के अंतराल के बाद ।और ये सभी रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति थे जबकि जॉन एफ केनेडी डेमोक्रेटिक पार्टी के ।उन की हत्या 1963 में हुई थी 60 बरस के बाद लेकिन केनेडी की हत्या के बीस बरस बाद 1983 में रोनाल्ड रीगन पर हत्या का प्रयास हुआ था मगर वह बच गये,घायल ज़रूर हो गए थे ।यह बीस साल वाली पनौती की पुनरावृति थी।

ज्ञानी ज़ैल सिंह खाँटी राजनेता थे और बहुत ही जागरूक और सक्रिय राजनीतिक ।वह देश दुनिया की राजनीति को खूब बारीकी से समझते थे इसलिए उनके ज़ेहन में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी की हत्या की घटना थी । मेरी उनसे दुनिया भर के विषयों और मुद्दों पर बातचीत हुआ करती थी । 1980 में उन्होंने होशियारपुर से लोकसभा का चुनाव जीता और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें 14 जनवरी, 1980 को गृहमंत्री (1980-82) नियुक्त किया । फरवरी 1980 में प्रकाश सिंह बादल वाली शिरोमणि अकाली दल की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया । जून, 1980 में पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत हासिल कर 64 वर्षीय दरबारा सिंह को मुख्यमंत्री बनाया । उनसे ज्ञानी ज़ैल सिंह का छत्तीस का आंकड़ा था । एक बार मैंने ज्ञानी जी से पूछा कि मुख्यमंत्री दरबारा सिंह से आपकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण पंजाब में अशांति का माहौल बताया जाता है,इसपर उन्होंने मुझे ही दोषी ठहराते हुए कहा कि ‘यह सब आप पत्रकारों की सोच और साज़िश है।गृहमंत्री होने के नाते मैं पंजाब के मुख्यमंत्री को विद्रोहियों के खिलाफ ठोस प्रशासनिक कार्रवाई करने की सलाह देता हूं ।अगर उन्होंने मेरी सलाह पर अमल किया होता तो जरनैलसिंह भिंडरांवाले ने राज्य सरकार की कमजोरी का फायदा न उठाया होता और न ही पंजाब के इतिहास में ऐसा अशांत वक़्त आता ।उनके तीन साल के प्रशासन में राज्य में उग्रवाद बढ़ा, हत्याओं का दौर चला,जालंधर में पंजाब केसरी समाचार पत्र समूह के प्रमुख लाला जगत नारायण की दिनदहाड़े हत्या हो गयी, स्वर्ण मंदिर परिसर के बाहर पंजाब पुलिस जालंधर रेंज के डीआईजी अवतारसिंह अटवाल की हत्या हुई । पूरे राज्य में आतंकवादी हिंसा का दौर था जिसके चलते उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया । इसमें मेरा क्या कसूर है ।’उनके त्यागपत्र बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया ।

नीलम संजीव रेड्डी के अवकाश प्राप्त करने के बाद ज्ञानी ज़ैल सिंह को राष्ट्रपति बना दिया गया।वह 25 जुलाई, 1982 से 25 जुलाई, 1987 तक देश के पहले सिख राष्ट्रपति रहे । ज़ैल सिंह को राष्ट्रपति बनाने का उद्देश्य सिखों के प्रति सद्भावना के तौर पर देखा गया था, क्योंकि उस समय पंजाब में अलगाववादी आंदोलन ज़ोरों पर था । एक वजह यह भी बताई गयी कि मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ज्ञानी ज़ैल सिंह के हस्तक्षेप से आजिज़ आ चुके थे जिसकी शिकायत उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से की बताई जाती है ।लिहाजा ज्ञानी ज़ैल सिंह को सक्रिय राजनीति से दूर रखा गया ताकि दरबारा सिंह बिना किसी की दखलंदाजी के अपनी सरकार चला सकें ।लेकिन ऐसा हो न सका और दरबारा सिंह ने 1983 में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया । ज्ञानी ज़ैल सिंह बेशक सक्रिय राजनीति में नहीं थे लेकिन पंजाब में अलगाववादी आंदोलन में धार्मिक नेताओं की भूमिका को लेकर वह सचेत थे ।उन्होंने अपने तरीके से अपराधियों द्वारा सिख तीर्थस्थलों को शरणस्थलों के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आलोचना अलबत्ता की थी। ज्ञानी जी के राष्ट्रपति बन जाने से उनसे मेरा वैसा मेलमिलाप और बातचीत नहीं हो सकती थी जिसका मैं आदी था ।बावजूद इसके कभी मैं उनके प्रेस सचिव तरलोचन सिंह की मार्फत या उनकी बेटी डॉ मनजीत कौर के सौजन्य से मिल लेता था ।तरलोचन सिंह को मैं उनके पटियाला में डीपीआरओ के दिनों से जानता था । ‘दिनमान’ के लिए मैं एक विशेष स्टोरी के सिलसिले में पटियाला गया था ।उन दिनों हम ट्रेन और बस से सफर करते थे और होलडाल (सोने का बिस्तर) के साथ ।पटियाला के बस स्टैंड पर उन्होंने गाड़ी भेज दी,उनके ऑफ़िस में मैंने अपनी स्टोरी पर बात की ।उन्होंने न सिर्फ मेरी स्टोरी से संबंधित लोगों से मुलाकात तय की बल्कि अपनी गाड़ी भी साथ दी। उनके सौजन्य से ज्ञानी ज़ैल सिंह के राष्ट्रपति के तौर पर जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने यह बात साफ कर दी कि हम लोग सभी मुद्दों पर खुलकर बातचीत कर सकते हैं लेकिन वह सब ऑफ़ द रिकार्ड है, लिखने के लिए नहीं।

डॉ मनजीत कौर से मेरी भेंट डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुई । वहां मेरी पत्नी भर्ती थीं ।उनकी सर्जरी होनी थी ।जिस डॉक्टर ने सर्जरी करनी थी उस टीम में डॉ मनजीत कौर भी थीं ।अस्पताल के एक कर्मचारी से मैं अपनी पत्नी की तबियत के बारे में बात कर रहा था कि इतने में डॉ मनजीत कौर राउंड पर आ गयीं । उनके बारे में मुझे यह पता चल गया था कि वह राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह की बेटी हैं ।जब मेरी पत्नी की हालत स्थिर बताकर वह चलने लगीं तो मैंने उनसे पूछा कि ‘क्या मैं आपसे दो मिनट बात कर सकता हूं ‘।मेरे निवेदन पर वह ठहर गयीं और बोलीं कि परसों आपकी पत्नी को डिस्चार्ज कर दिया जायेगा।मैंने उनसे पूछा कि ज्ञानी जी कैसे हैं? उन्होंने भरपूर नज़रों से मुझे देखते हुए पूछा कि आप उन्हें कैसे और कितना जानते हैं ।मैंने डॉ मनजीत कौर को उनसे चंडीगढ़ और कनाट प्लेस तक की मुलाकातों का सक्षेप में ज़िक्र कर दिया ।ज्ञानी जी से मेरी औपचारिक और गैरऔपचारिक मुलाकातों के बारे में सुनकर वह बहुत प्रभावित हुईं ।उसके बाद मैंने उन्हें राष्ट्रपति जी से मिलवाने का आग्रह किया ।अभी मेरी पत्नी अस्पताल में ही थीं कि उन्होंने मुझे अगले दिन शाम को ज्ञानी ज़ैल सिंह से मुलाकात करने का समय बता दिया,साथ में यह भी कि आपके लिए कोई समय सीमा नहीं ।

निश्चित समय पर मैं राष्ट्रपति भवन पहुंच गया ।रिसेप्शन से एक व्यक्ति मुझे राष्ट्रपति के कक्ष तक पहुंचा आया ।अभी कक्ष के भीतर प्रवेश कर ही रहा कि ज्ञानी जी की आवाज़ आयी,’मनजीत ओह तेरा मेहमान कित्थे रह गया?’ उनका यह वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि मैं ज्ञानी जी के सामने था।मुझे देख डॉ मनजीत कौर ने कहा,’लौ आ गए ने’। ज्ञानी जी ने जब मेरी तरफ़ आंख उठाकर देखा तो बोले,’ओ प्रदीप तू ।’डॉ मनजीत कौर ने अपने पिता को टोकते हुए कहा,’प्रदीप नहीं, दीप जी।पूरा नाम त्रिलोक दीप ।’ ज्ञानी जी ने उसी लापरवाही से कहा कि ‘मेरे लिए यह प्रदीप है और हमेशा प्रदीप ही रहेगा। फिर बोले तुम वैसे ही मुझसे मिलने के लिए वक़्त लेकर आ सकते थे।मैंने ज्ञानी जी को बताया कि यह काम अब इतना आसान नहीं है ।आप देश के राष्ट्रपति हैं,पहले नागरिक,कनाट प्लेस में चहलकदमी करने वाले ज्ञानी ज़ैल सिंह जी नहीं’। मेरी इस साफगोई से दोनों बाप बेटी हंसने लगे । परिचय के बाद डॉ मनजीत कौर चाय नाश्ते के इंतजाम के लिए चली गयीं ।

इस शिष्टाचारी बातचीत के बाद ज्ञानी ज़ैल सिंह ने मेरी पत्नी की तबियत के बारे में पूछा ।मैंने उन्हें बताया कि मुझसे बेहतर तो डॉ मनजीत कौर जानती हैं ।उन्होंने मुझे सावधान करते हुए कहा कि ‘तुम एक बात अच्छी तरह समझ लो कि हम दोनों के बीच की बातचीत का किसी को इल्म नहीं होना चाहिए,तुम्हारे घर वालों को भी । इस बातचीत के किसी भी हिस्से को न कहीं उद्धृत करोगे और न ही किसी से साझा।’ मैं तुम्हें कई सालों से जानता हूं,मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, कहीं कुछ लीक नहीं होगा ।फिर बोले, ‘तुम जानते ही हो कि मुझे गृहमंत्री से हटाकर राष्ट्रपति क्यों बनाया गया है ‘।लेकिन मैंने अपनी अनभिज्ञता व्यक्त करते हुए नाही में सिर हिला दिया ।फिर वह खुद ही बोले,’ताकि मैं पंजाब की राजनीति में दखल न दे सकूं ।वहां के हालात बहुत बिगड़ रहे थे जिसे मुख्यमंत्री संभाल पाने में नाकामयाब हो रहे थे ।’ लेकिन आप प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी को तो पंजाब के हालात पर ब्रीफ किया करते थे ।उनका उत्तर होता कि यह मेरा संवैधानिक दायित्व है । बावजूद इसके मेरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रति पूरी निष्ठा, आस्था और समर्पण की भावना है ।मुझे वह जो भी छोटा बड़ा काम सौंपेंगी मैं बेहिचक करने को तैयार हूं ।मेरे जैसे कांग्रेस के मामूली कार्यकर्ता को उन्होंने देश के सर्वोच्च पद पर बिठाया,इसके लिए मैं उनका बहुत शुक्रगुजार हूं। इंदिरा गांधी के राष्ट्रपति भवन आगमन पर राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह प्रोटोकोल की परवाह किए बगैर वह बाहर आकर उनकी अगुवानी किया करते थे, प्रस्थान पर उनकी गाड़ी तक छोड़ने जाया करते थे ।

ज्ञानी ज़ैल सिंह से जब मैंने कुछ यादगार प्रोग्रामों के बारे में पूछा तो उन्होंने 1983 में दिल्ली में आयोजित गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सातवां शिखर सम्मेलन और राष्ट्रकुल राष्ट्राध्यक्षों की मेज़बानी को बताया। इसमें महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय और प्रिंस फिलिप नवंबर,1983 में राष्ट्रपति के अतिथि के तौर पर राजकीय यात्रा पर आये और राष्ट्रपति भवन में ठहरे ।वैसे आजकल कम ही राज्याध्यक्ष और शासनाध्यक्ष राष्ट्रपति भवन में ठहरते हैं,विशेष तौर पर बड़े और विकसित देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ।फिर जिन लोगों ने होटलों में न रहकर राष्ट्रपति भवन को तरजीह दी उनमें से कुछ नाम हैं रूस के राष्ट्रपति व्लदिमीर पुतिन, न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन , बंगलादेश के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल हमीद (2014) लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन,बराक ओबामा,डोनाल्ड ट्रंप मौर्य शेराटन होटल में ठहरे जबकि जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंज़ो ऐबे को ताज पैलेस होटल भाया ।होटलों में रहने की शुरुआत तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति जैक शिराक ने 1998 में की थी ।उनका मानना था कि हम अपनी निजता और सुरक्षा की खातिर होटल में ठहरना पसंद करते हैं ।लेकिन नवंबर-दिसंबर,1955 में तत्कालीन सोवियत संघ के नेता निकिता खुश्चेव और निकोलाई बुल्गनिन तथा दिसंबर,1959 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ड्वाइट डी.आइजनहावर ने 1929 में निर्मित 340 कमरों वाले तीन मंजिला राष्ट्रपति भवन में ठहरना पसंद किया था।पूर्व में भारत में वायसराय के निवास के तौर पर प्रसिध्द इस इमारत के वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर थे ।320 एकड़ में निर्मित (1912-29) 1931 में वायसराय ने अपने इस घर में प्रवेश किया था (1931-47)। भारत के गणतंत्र बनने पर इसका नाम बदलकर राष्ट्रपति भवन कर दिया गया ।

हम राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के राजनीतिक रिश्तों की बात कर रहे थे । इंदिरा गांधी ज्ञानी जी से पंजाब में उग्रवादियों की गतिविधियों पर रोक लगाने के बारे में उन की राय लिया करती थीं ।उस समय पंजाब में जिस तरह से सांप्रदायिक सद्भाव में अभाव था उससे ये दोनों बड़े नेता चिंतित थे ।दोनों ही चाहते थे कि बातचीत के ज़रिए उग्रवादियों की समस्याएँ हल करने की कोशिश करें ।लेकिन हरमन्दिर साहब के परिसर और उसके भीतर जिस तरह के हथियारों की खबरें थीं उसे ज्ञानी ज़ैल सिंह ‘गुरु मर्यादा के खिलाफ’ मानते थे ।ज्ञानी ज़ैल सिंह की जीवनी के लेखक राम प्रकाश लिखते हैं कि तथकथित खालिस्तान के नाम पर जिस तरह से हिंदुओं और सिखों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक बन्धुत्व की भावना में दुराव पैदा करने की कोशिशें हो रही थीं उनसे ज्ञानी जी बहुत व्यथित थे ।

अप्रैल,1980 में निरंकारी गुरु गुरबचन सिंह और सितम्बर, 1981को पंजाब केसरी के मालिक लाला जगत नारायण की हत्या हुई उससे पंजाब की कानून और व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए गये ।लेकिन लगता है सरकार से बातचीत और उसके नाकाम होने की कार्रवाई का चरमपंथियों पर कोई असर नहीं हुआ ।12 मई,1984 को आतंकवादियों द्वारा लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंद्र की इसलिए हत्या की गयी क्योंकि अपने पिता जी को खोने के बाद उन्होंने आतंकवादी पीड़ितों के लिए शहीद परिवार कोष की स्थापना की थी ।उन्होंने देश की एकता, अखंडता तथा सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए निडरता के साथ लेखन कार्य किया ।इसी वजह से वह चरमपंथियों की आंख की किरकिरी बन गए थे ।रमेश चंद्र हिंद समाचार ग्रुप के सहसंस्थापक और प्रधान संपादक थे ।यही ग्रुप हिंद समाचार,पंजाब केसरी और जगबानी (पंजाबी) प्रकाशित करता है ।

इसी प्रकार जालंधर रेंज के पुलिस के उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) अवतारसिंह अटवल 25 अप्रैल,1983 को स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के बाद सीढ़ियों से चढ़कर आपनी सरकारी गाड़ी की तरफ़ जा रहे थे कि तीन अज्ञात चरमपंथियों ने उनकी हत्या कर दी ।हत्या की इन घटनाओं ने एक ऐसी श्रृंखला को जन्म दिया जिसके कारण आपरेशन ब्लू स्टार की शुरुआत हुई ।बताया जाता है कि पंजाब काडर के एक आईपीएस अधिकारी जरनैल सिंह चहल ने उन्हें एक महत्वपूर्ण मामले पर चर्चा के लिए अमृतसर बुलाया था ।उनके निधन के बाद उनकी पत्नी अमृता अटवाल पंजाब सिविल सर्विस में शामिल होकर आईएएस अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुई हैं जबकि उनका बेटा हरबीर अटवाल पंजाब पुलिस में एसपी के पद से ।

पंजाब के हालात दिनोंदिन बेकाबू होते जाने और हरमन्दिर साहब में हथियारों से लैस युवाओं की मौजूदगी से वहां आने वाली संगत भी असहज बतायी जाती थी । ज्ञानी ज़ैल सिंह ने मुझे बताया था कि उन्होंने अकाली दल के नेताओं के उस दावे का सदा विरोध किया कि भारत में सिखों के साथ भेदभाव किया जा रहा है ।अगर ऐसा होता तो उन्हें पहले गृहमंत्री और अब देश का राष्ट्रपति क्यों बनाया जाता ।ज्ञानी ज़ैल सिंह भारत के पहले (अभी तक) सिख राष्ट्रपति हैं ।ज्ञानी ज़ैल सिंह ने तो पंजाब में अलगाववादी आंदोलन को शह देने और सिख तीर्थस्थलों को शरणस्थल के रूप में इस्तेमाल करने की कुछ धार्मिक नेताओं की भूमिका भी बतायी थी ।लगता है कि जब सभी विकल्प समाप्त हो गये तभी जून,1984 में सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर में स्थित सिख उग्रवादियों को निष्क्रिय करने के लिए आपरेशन ब्लू स्टार किया गया ।’Gyani Zail Singh: Life and work’ में उनके जीवनीकार राम प्रकाश लिखते हैं कि ‘ऐसे हालात में ज्ञानी जी शायद देश के पहले राष्ट्रपति थे जो राष्ट्र के प्रति कर्तव्य और एक धर्मपरायण सिख दोनों स्तरों पर ही खरे उतरे ।आपरेशन ब्लू स्टार के बाद 8 जून को ज्ञानी जी स्वर्ण मंदिर परिसर में गये तो उन पर एक स्नाइपर ने गोली चलायी ।वह तो बच गये लेकिन उनके सुरक्षा अधिकारी घायल हो गया ।परिसर में हुए नुकसान से वह दुखी थे।’बाद में उन्होंने कहा कि यदि उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया होता तो खूनखराबा टाला जा सकता था । उन्होंने सभी सिखों से आग्रह किया कि वह सुनिश्चित करें कि भविष्य में गुरुद्वारों का उपयोग सिख परंपरा द्वारा स्वीकृत हथियरों और विस्फोटक सामग्री रखने के लिए नहीं किया जाएगा । लेकिन ज़ैल सिंह को धार्मिक दुराचार का दोषी ठहराते हुए उन्हें अकाल तख्त के समक्ष वहां हुई ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं’ के लिए क्षमा मांगने का आदेश दिया जिस पर उन्होंने अमल भी किया । अकाल तख्त अर्थात काल का सिंहासन ।इसकी स्थापना सिखों के छठे गुरु गुरु हरगोबिंद ने 1606 में अमृतसर में की जो स्वर्ण मंदिर परिसर में स्थित है ।यह सिख धर्म का सर्वोच्च आध्यात्मिक और लौकिक (सांसारिक)अधिकार केंद्र है,जो सिख कानून बनाने और न्याय करने का कार्य करता है ।यह सिखों के पांच तख्तों में सबसे प्रमुख है।ये पांच तख्त हैं अकाल तख्त साहब, केशगढ़ साहब, दमदमा साहब, पटना साहब और हजूर साहब,नादेड़।

ज्ञानी ज़ैल सिंह के काफिले पर उस समय पत्थर फेंके गये जब वह 31 अक्टूबर, 1984 को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देखने के लिए पहुंचे थे ।वह उत्तरी यमन की अपनी राजकीय यात्रा छोड़कर आये थे जबकि राजीव गांधी और प्रणव मुखर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव प्रचार छोड़कर ।ज्ञानी ज़ैल सिंह ने बताया था कि यह कहना गलत है कि मैंने अपनी मनमर्जी से राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलायी थी,दरअसल कांग्रेस संसदीय बोर्ड की कार्यकारी समिति ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए नामित किया था ।तीन दिनों के बाद कांग्रेस संसदीय दल ने सर्वसम्मति से उनके चुनाव को मंजूरी दे दी ।ज्ञानी जी ने कहा कि जिस प्रकार 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू और 1966 में लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था वैसे ही इंदिरा गांधी के निधन के बाद भी यही परंपरा अपनाई जानी चाहिए थी लेकिन कुछ अतिउत्साही संसदीय कांग्रेसी बोर्ड के नेताओं ने इस परंपरा का पालन न करते हुए तुरंत राजीव गांधी को पार्टी का नेता चुना।अब मेरे पास उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने का कोई और विकल्प नहीं था ।उस वक़्त वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी थे ।उनको कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाने में कांग्रेस के कुछ नेताओं को ऐतराज बताया जाता था।शायद इसी वजह से राजीव गांधी ने प्रणव मुखर्जी को अपनी सरकार में जगह नहीं दी ।

ज्ञानी ज़ैल सिंह शातिर राजनीतिक थे ।उन्हें प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके अतिमहत्वाकांक्षी और अतिउत्साही समर्थकों का मन पढ़ने में देर नहीं लगी । इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे लेकिन हिंसा को रोकने के लिए सरकार क्या कार्रवाई कर रही है यह जानकारी देने के लिए प्रधानमंत्री ने उन्हें ब्रीफ नहीं किया हालांकि संवैधानिक रूप से यह जानने का उनका अधिकार था ।राष्ट्रपति को तब गृहमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें बताया था कि सरकार इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार की व्यवस्था में व्यस्त थी इसलिए प्रधानमंत्री गांधी उनसे नहीं मिल पाए होंगे । प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ‘उपेक्षा’ से वह खासे आहत थे लेकिन मौन रहे ।उन्होंने 24-28 दिसंबर, 1984 को लोकसभा चुनाव भी कराए जिसमें 524 सीटों में से कांग्रेस ने 414 सीटों पर रिकार्ड जीत दर्ज की ।चुनाव से पहले एक बार दोनों की मुलाकात हुई और प्रधानमंत्री गांधी ने राष्ट्रपति सिंह और राज्यों के कार्यों पर उनसे चर्चा की ।उसके बाद राजीव गांधी राष्ट्रपति को ब्रीफ करने के लिए नहीं आये और न ही कोई केंद्रीय मंत्री ।खुल कर तो वह इज़हार नहीं करते लेकिन मेरे संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी ज़रूर करते हैं,ऐसा मैं महसूस करता हूं,ज्ञानी ज़ैल सिंह कहते हैं ।ज्ञानी ज़ैल सिंह इस बात से भी दुखी थे कि राजीव गांधी ने उन्हें घरेलू और विदेश नीति के मामलों की जानकारी देना शायद इसलिए बंद कर दिया था कि मैं ज़्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूं लेकिन वह यह भूल गए कि मैं ‘गुढ़ा’ हुआ हूं और राजनीति की हर किस्म की बारीकियों और पेचीदगियों से वाकिफ हूं ।इस क्षेत्र में तो वह अभी भी ‘बच्चा’ है । उसने मेरी आधिकारिक विदेशी यात्राओं को मंजूरी देने से इंकार किया और जिन देशों की यात्राएं परंपरागत रूप से राष्ट्राध्य्क्षों द्वारा की जाती थीं, वे सभी उपराष्ट्रपति आर. वेंकटरमण और प्रधानमंत्री राजीव गांधी करने लगे।एक देश की तो तयशुदा यात्रा को रद्द कर दिया ।इसके फलस्वरूप ज्ञानी ज़ैल सिंह भारत के सबसे कम यात्रा करने वाले राष्ट्रपतियों में एक बन गये ।

लेकिन आपने भी तो राष्ट्रपति के उन सीमित अधिकारों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था जिनके लिए सरकार की पूर्वअनुमति की आवश्यकता नहीं होती ।ज्ञानी ज़ैल सिंह मुस्कुराये और बोले कि रस्सी को उतना ही खींचना चाहिए ताकि वह टूटने से बच जाये ।मैंने उस टूटन को बचाने का काम किया था उन्होंने बताया कि अब वह सरकार द्वारा भेजे गये प्रस्तावों की बारीकी से जांच करते,न्यायिक नियुक्तियों पर नीति न बनाये जाने पर स्पष्टीकरण मांगते, टेलीविज़न कवरेज नीति पर सवाल उठाते, कुछ राज्यपालों द्वारा राज्य की राजनीति में हस्तक्षेप न करने की चेतावनी भी दिया करते थे ।इनके अलावा संसद द्वारा पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर करने से पहले वह कई बार न्यायिक सलाह लिया करते थे ।भारतीय डाक (संशोधन) विधेयक, 1986 को ‘नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन’ बताकर उस पर न दस्तखत किए और न ही सरकार को वापस लौटाया ।इसे राष्ट्रपति का ‘पॉकेट वीटो’ कहा जाता है ।

सुना जाता है कि बोफ़ोर्स की खरीद में हुए भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने पर सरकार से जब आपने जानकारी मांगी तो वह भी प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आपको मुहैया नहीं करायी । इस पर ज्ञानी ज़ैल सिंह कुछ नहीं बोले ।लेकिन यह पूछे जाने पर कि आप राजीव गांधी की सरकार को बर्खास्त करने के बारे में सोच रहे थे तो उन्होंने इसे कोरी ‘अफवाह’ बताते हुए कहा कि वह देश में अराजक और अस्थिर हालात पैदा करने के हमेशा खिलाफ रहे हैं ।गुरुबाणी को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘हम नहीं चंगे बुरा न कोय’।

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