डोनाल्ड ट्रंप ने दुसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति की बागडोर सम्हालने के तुरंत बाद ही विश्व का पहला राष्ट्रप्रमुख इस्राइल के प्रधानमंत्री नेथ्थान्यू को व्हाइट हाउस में बुलाकर उसे एक शब्द से भी गाजा पट्टी पर कर रहे हमलो को रोकने के लिए न कहना. और उसी से नोबेल शांति पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए लॉबिंग करने के क्रम में यूक्रेन के राष्ट्रपति झेलेंस्कि को भी व्हाइट हाउस में बुलाकर दबाव डालने की कृति को पूरी दुनिया ने देखा है. और भारत – पाकिस्तान के बीच मे हूऐ चार दिन के युद्ध को लेकर खुद ही युध्दबंदी की एकतरफ़ा घोषणा 25 – 30 बार करने की हास्यास्पद बाते . और अब नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होने के पृष्ठभूमि को देख कर अचानक 20 पॉईंट देकर गाजा मे इस्राइल कर रहे युद्ध को रोकने का नाटक हाँ नाटक ही है. क्योंकि अमेरिका 7 अक्तुबर 2023 से ही अक्तुबर 2025 तक लगातार इस्राइल को दो सालों से युध्द करने के लिए अपनी तरफ से अस्र – शस्त्रों और पैसे दे रहा हैं. यह तथ्य ( Quincy Institute for Responsibil Statecrafts Senior research fellow William D Hartung’s findings and Companion report by Linda J Bilmes, an expert on budgeting and public finance at Harvard Kenedy School, found that the US spent ” a total of $31. 35 – $33.77 billion and counting”since October ,2023 ) इस रिपोर्ट मे विस्तार से लिखा गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति का पद ग्रहण करने को आज आठ महिने लगातार युद्ध चलता रहता है . और इसी दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने गाजावासियो को कुछ दिन पहले धमकाया भी था कि “आप सभी लोग अपना – अपना बोरिया बिस्तर बाँध कर इजिप्त, जॉर्डन, सिरिया, टर्की मे चले जाओ, मुझे गाजा पट्टी में ट्रंप एंड ट्रंप कन्स्ट्रक्शन कंपनी का सि रिसॉर्ट बनाना है.और जिस तरह से ट्रंप आठ महिनों में सात युध्द को समाप्त करने के दावे ठोक रहे हैं. यूक्रेन – रशिया या भारत – पाकिस्तान, इजिप्त – यूथोपिया, ग्रेंड इथोपियन रेनेसॉ डॅम को लेकर द्विपक्षीय तनाव भले वर्षों से चल रहा लेकिन अभितक युध्द हुआ नहीं है. इसी तरह ट्रंप ने कोसोवो और सर्बिया के बीच एक काल्पनिक युध्द को समाप्त करने का दावा किया है. दोनों पूर्व यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारो के पतन के बाद के चेकोस्लोवाकिया नाम देश एथ्निक आधार पर बिखरने के बाद अलग हुए देशो में 1990 के दशक के बाद कभी युध्द नहीं हुआ . लेकिन ट्रंप ने युद्ध न हुआ देशों में में युध्दबंदी करने का हास्यास्पद दावा कीया है. अर्मेनियाऔर कंबोडिया के बीच के युद्ध को लेकर ट्रंप का दावा तो और भी हास्यास्पद है. क्योंकि दोनों देशों के बीच 6500 किलोमीटर की दूरी है. और उनके बीच कभी कोई युध्द हुआ ही नहीं है. उल्टा अर्मेनिया का पडोसी अजरबैजान के साथ टकराव जरुर हुआ था. और ट्रंप ने दोनों देशों के बीच समझौता करने के लिए उनपर दबाव डालकर लिखित संधि पर हस्ताक्षर करा लिया है. लेकिन समझौते पर अमल नहीं हुआ है. कंबोडिया और पडोसी देश थायलंड के बीच मे जुलाई में सीमा विवाद के चलते झडपे हुई थी. लेकिन उन्हें समाप्त कराने मे ट्रंप का टेरिफ हथकंडा काम नहीं आया. बल्कि दक्षिण और पूर्व एशिया के देशों का संघठन (एसियान) की कुटनितिक पहल का परिणाम है.एसियान के अध्यक्ष और मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने कुआलांलम्पुर मे कंबोडिया और थायलंड के नेताओ के बीच बात कराई. भले ही प्राचीन हिंदू मंदिरों के स्वामित्व को लेकर पनपा विवाद अनसुलझा ही रहा. लेकिन अनवर इब्राहिम के मध्यस्थता मे हूऐ बीना शर्त युध्दविराम ने हिंसा रोकने की वास्तविकता रहते हूऐ. ट्रंप के बेहुदि हरकते रुकने के जगह पर ट्रंप ने इस्राइल और इरान के बीच युद्ध खत्म करने का भी दावा किया है. लेकिन सच यह है कि उन्होंने इस्राइल को इरानी ठिकानोपर हमला करने की अनुमति देते हूऐ, इस्राइल को इरानी जवाबी हमलो से बचाने के लिए अमेरिकी सैन्य – उपकरणों को तैनात किया है. और इरानी परमाणुओं के ठिकानों पर बमबारी करने का आदेश दिया है. अगर यही डोनाल्ड ट्रंप का युद्धबंदी करने का तरीका है. तो युध्द का मतलब क्या होता है ?

नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप का चल रहा कैम्पेन, मतलब पहले युध्द कराना और उसे रोकने का दावा करना. और नोबेल पुरस्कार समिति को धमकी भरे अंदाज में कहने वाला नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहासमेसे शायद पहला शख्स होगा. जो दुसरी तरफ नेथ्थान्यू को गाजा का सर्वनाश करने के लिए हर संभव सपोर्ट करते हूऐ, यूएनओ से लेकर आंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट को तक धमकाते हूऐ, यूएनओ और डब्लू एच ओ के अमेरिका के हिस्से के फंडिंग मे कटौती करने का फैसला. शायद आंतरराष्ट्रीय राजनीतिक इतिहास में पहली बार किसी राष्ट्र प्रमुख का एक गुंडे के जैसा व्यवहार करने वाला आदमी को लगभग पूरी दुनिया चुपचाप देख रहीं हैं. और वह नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उछल कूद कर रह है. इसे देख कर नोबेल पुरस्कार की रही-सही प्रतिष्ठा भी कम हो रही है. हालांकि नोबेल पुरस्कार अमेरिकन लोगों को देने का पिछले रेकॉर्ड को देखकर मुझे आश्चर्य नहीं होगा कि इस नमूने को भी दिया जा सकता है. लेकिन किस किमतपर ?


23 लाख जनसंख्या के गाजापट्टी में पिछले दो साल से आज ही के दिन इस्राइली सेना के द्वारा शुरू कीऐ गए हवाई हमले हमास ने कुछ इस्राइल के नागरिकों को बंधक बनाकर रखने का आरोप लगाकर शुरू किए गए हैं. लेकिन 70 के दशक में हमास को यासर आराफात के सेक्युलर नेतृत्व के पीएलओ को कमजोर करने के लिए इस्राइल ने ही हमास को पैदा किया है. और उसको सैनिकि ट्रेनिंग देने से लेकर एक विश्वविद्यालय भी खोलने के लिए मदद की है.जिस तरह से अस्सी के दशक में अलकायदा का निर्माण अमेरिका ने किया था. आंतरराष्ट्रीय राजनीति में मुख्यतः अमेरिका, ब्रिटन, ने पोलिटिकल इस्लाम का इस्तेमाल करने का काफी पूराना रेकॉर्ड है. 1919 को (Treaty of Versailles) अंग्लो – अमेरिकन्स का रवैया फिलिस्तीन को लेकर 1945 तक डायरेक्ट और इनडायरेक्ट हस्तक्षेप करने का इतिहास पिछले सौ साल से जारी है. और इसलिए इस युद्ध में भी डोनाल्ड ट्रंप और उनके पहले के सभी राष्ट्रपतियों ने अमेरिकन झिआनिस्ट लॉबी के दबाव में शुरू से ही इस्राइल की हरतरह की मदद करते आ रहे है .इसलिए नेथ्थान्यू को रोकने का सवाल ही नहीं है. उल्टा उसे व्हाइट हाउस में बुलाकर उसके खिलाफ यूएनओ के स्टेंड को लेकर उसे फेवर करने के लिए यूएनओ के फंडिंग मे कटौती करने से लेकर, उसे हरतरह की मदद करते हूऐ, उसके के लिए इराण पर हमला कर दिया . और इस्राइल के द्वारा पिछले दो सालों से चल रहे गाजा पट्टी के युद्ध में अभी तक 872,000 से अधिक लोगों की मौत हुई है. इनमे से 18, 530 बच्चे है. (31 %) गाजा मे 39,384 बच्चों के माँ – बाप मेसे एक मारे गए हैं. और 17000 फिलिस्तीनी बच्चौंके माँ – बाप दोनों मारे गए हैं. राहत एजैंसी के मुताबिक अब गाजा शहर नष्ट होकर सिर्फ जिंदा बचें हूऐ लोगों का कैंप है. पिछले दो सालों से इस्राइली बमबारी के बाद गाजा अब एक मलबे मे तब्दील हो गया है. यूएनओ के रिपोर्ट के अनुसार 80 % इमारतें तबाह हो गई है. इससे 4.5 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. गाजा मे इस्राइली सेना के हमलो मे तबाह हुई इमारतों का करीब 54 मिलियन टन से अधिक मलबा जमा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसे साफ करने के लिए कम-से-कम 10 साल और 1.2 लाख करोड़ रुपए लगेंगे. इस्राइल ने एक किलोमीटर गहरा बफरजोन और चार किलोमीटर सैन्य कॅरिडोर बना दिया है. इसमे सबसे बड़ा मोराग कॅरिडोर से अब गाजा पट्टी को दो हिस्सों में बाट चुका है. अब पहले वाला गाजा पट्टी का अस्तित्व ही खत्म कर दिया है. और 80 % हिस्से को इस्राइल की सेना ने अपने कब्जे में ले लिया है. और गाजावासियो को आवाजाही के लिए 20 % हिस्से में सिमट कर रख दिया है. वैसे भी हमने 2011 के जनवरी में देखा हुआ गाजा पट्टी दुनिया की सबसे कम जगह पर सबसे अधिक जनसंख्या रह रही ओपन जेल ही थी. अब इस्राइल ने दो साल के युद्ध में 80 % हथियाकर गाजा पट्टी पर कब्जा करने के बाद सिर्फ 20 % जगह पर 23 लाख जनसंख्या के गाजावासियो को रहने के लिए मजबूर कर देना और पिडि़त गाजावासियो को मदद पहुचाने के लिए आंतरराष्ट्रीय पहल को भी रोका जाना. तथा इन सब बातों को कवर करने वाले पत्रकारों को भी मारने का कृत्य देखकर मुझे सौ साल पहले इन्हि इस्राइल के वर्तमान नागरिकों के दादा- दादी तथा नाना – नानी को जर्मनी में हिटलर ने जिस तरह से को घेट्टो मे रहने के लिए मजबूर कर दिया था . उसी तरह से गाजावासियो के साथ किया जा रहा है. क्या हिटलर से यही सबक सिखकर आऐ है ?


7 अक्तुबर 2023 से अब तक शुरू युध्द मे लगातार हो रही बमबारी और जमीनी सैन्य कारवाई की वजह से गाजा पट्टी को मलबे के ढेर मे तब्दील कर दिया है. यूएनओ की सेटेलाईट रिपोर्ट के अनुसार 80% इमारते और 90 % स्कूल ; 98.5 % खेती करने के लिए जो जमीन थी वह उजाड कर दी गई है. लोग टेंटों मे रहने के लिए मजबूर हो गऐ है. जहां न पानी है, नहीं बीजली, और नहीं किसी भी प्रकार का इलाज किया जा सकता. अब गाजा के जिंदा बचे हुए लोगों को सिर्फ मलबे के पहाड़ पर दर – दर भटकते लोगो को खाना तथा पानी को ढूंढने के लिए मजबूर कर दिया गया है.


जमीन में केमिकल विस्फोटकों की वजह से जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए कम-से-कम 25 साल लग जाएंगे. कभी उपजाऊ रही गाजा की जमीन पर 2011 मे मैनें खुद जैतून (ऑलिव्ह) और संत्रो के पेड तथा ग्रीनहाउसमे गेहूँ – चावल तथा सब्जियों की खेती देखी थी. जो अब इस्राइल के हवाई हमलो से गिराऐ गए केमीकल विस्फोटकों के कारण अब बंजर हो गई है. करीब 98% खेत उजड चुकें हैं. करीब 15000 हेक्टेयर में से सिर्फ 232 हेक्टेयर भूमि ही खेती योग्य बची है. इसके साथ ही 83 % सिंचाई कुंएं भी टुट चुकें हैं. मतलब गाजा पट्टी का पूरा कृषिउद्दोग नष्ट कर दिया है. बेतलहियां के किसान हानि शफाई का 65 करोड़ रुपए का स्ट्रॉबेरी फार्म अब राख मे तब्दील हो गया है. उनका कहना है कि “मेरे दादा के लगाऐ जैतून (आलिव्ह) और संत्रौ के पेड और मैने अन्य फसलों के लिए बनाया ग्रीनहाउसको बुलडोजर से नष्ट कर दिया गया है. अब मेरे खेत की जगह पर सिर्फ धूल और पुरानी यादें बची है. संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गनायझेशन के अनुसार गाजा मे युध्द के कारण मिट्टी में विस्फोटक रसायनों का स्तर 3 गुना तक बढ गया है. जिससे जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाने के लिए 25 साल लगेंगे.


गाजा मे दो सालों से लगातार इस्राइल द्वारा जारी युध्द मे 80 % रिहायशी आवासीय इमारतें नष्ट हो गई है. 90 % स्कूल और 94% अस्पताल तबाह हो गऐ है. और सभी के सभी दस विश्वविद्यालयों की 51 इमारतों मे से एक भी इमारत अब बचीं नहीं है. 30 हजार करोड़ का एज्युकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो गया है. हमले के पहले गाजा मे 850 स्कूल थे आज 90 % स्कूल तबाह हो गए हैं. गाजा मे युध्द के पहले 36 अस्पतालों में 3412 बेड थे. 94% अस्पतालोंके उपर इस्राइल के हमलो ने तबाह कर दिया हैं. और 19 अस्पताल अंशिक रुप से कार्यरत हैं. जहा सिर्फ 33 % बेड उपलब्ध है. करीब 40 हजार करोड़ रुपए का हेल्थइंफ्रास्ट्रक्चर तबाह कर दिया गया है. हाल ही में गाजा के अस्पतालोंके दौरा करने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि डॉ. रिख पीपरकॉर्न का कहना है कि स्कूलों के जगह पर अब टेंट है. और अस्पतालोंके जगह खामोशी है. यहां बच्चों के लिए स्कूल के क्लासरूम तथा शिक्षक – किताबे नहीं है. और मरीजों के लिए अस्पताल, डॉक्टर और दवाइयां नहीं है.और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए छटपटाने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने इसी विश्व स्वास्थ्य संगठन के भी फंडिंग मे कटौती की है जिससे अविकसित देशो के स्वास्थ्य सेवा पर जबरदस्त असर हुआ है. और यह आदमी नोबेल शांति पुरस्कार का सपना देख रहा है.


गाजा के 23 लाख लोगों मे से 90 % लोग बेघर हो चुके हैं. उत्तर और दक्षिण गाजा से भगाऐ गए लाखों लोग अब मवासी जैसे मानवीय क्षेत्रों में टेंटों मे, बगैर दवा, पानी बिजली, तथा खाने के अभाव में जीने के लिये मजबूर कर दिये गए हैं. गाजा पट्टी का करीब 80 % इलाकों को इस्राइली मिलिट्री जोन में कन्वर्ट कर दिया है. जहा पर आमनागरिको को प्रवेश वर्जित है. यूएनओ के अनुसार आधे से ज्यादा लोग भूखमरी से जूझ रहे हैं. इतना सब कुछ होने के बावजूद दुनिया के दादा देश अमेरिका और इंग्लैंड का इस युध्द के बारे में पिछले सतहत्तर सालों से इजराइल के बारे में जो रवैया है. वहीं बदस्तूर चल रहा है. 10,000 स्क्वेयर किलोमिटर फिलिस्तीन की भूमि पर इजरायल की निर्मिति करने की गलती इन दोनों देशों की रही है. जहाँ फिलिस्तीन की कुल जनसंख्या 20 लाख थी. जिसमें यहूदियों की जनसंख्या सिर्फ छह लाख होने के बावजूद यहूदियों को 56% प्रतिशत भूमि, 5,700 स्क्वेयर किलोमीटर भूमि छ लाख यहूदियों को दे दी गई. और 4,300 स्क्वेयर किलोमीटर भूमि 14 लाख अरबों को दी गई. और उसमे भी सबसे अधिक उपजाऊ जमीन यहूदियों के हिस्से में. और अरबों को उबडखाबड पहाड़ी क्षेत्र दिया गया. यह बटवारा ही कितना अन्यायकारक रहा है ? और मामला यही नहीं रुका इजराइल ने हर लड़ाई और झगड़े के बाद अरबों से सतहत्तर सालों में जो जमीन दखल की है. उसे देखते हुए 56% हिस्से के जगह आज इजराइल के पास फिलिस्तीन की बचीखुची जमीन में से भी नब्बे प्रतिशत जमीन पर इजरायल ने अतिक्रमण कर लिया है. और जगह – जगह पच्चीस तीस फिट की कंक्रीट की दिवारों को खड़ा कर दिया है. और पहल से ही विश्व की सबसे घनी आबादी वाले इलाके गाजापट्टी का इन दो सालों में 80 % हिस्सा सैनिकों की मदद से कब्जा करते हूऐ 23 लाख से अधिक संख्या में रहने वाले गाजावासियो को सिर्फ 20 % प्रतिशत जगह पर सिमटकर बनाए रखना क्या विश्व के मानवाधिकार की दुहाई देने वाले अमेरिका तथा इंग्लैंड को दिखाई नहीं दे रहा है ?
लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने की लस्ट की वजह से अचानक गाजा पट्टी में चल रहे युध्द को रोकने के लिए, इजिप्त मे शांति वार्ता शुरू हो गई है. यह वार्ता ट्रंप के 20 सुत्री प्लान पर आधारित है. जिसके तहत 20 इस्राइली बंधकों के बदले 1,950 फिलिस्तीनी कैदियों की रिहाई और सिमित इस्राइल के वापसी का प्रस्ताव है. और सबसे हैरानी की बात देखिये डोनाल्ड ट्रंप इस्राइल के प्रधानमंत्री नेथ्थान्यू को कह रहे हैं. कि आप इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लो, इस मे तुम्हारीही जीत है. और नेथ्थान्यू डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार देने के लिए रेकमंड पहले ही कर चुका है. जैसे पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष असिम मूनिर और कुछ अन्य देशों के भी राष्ट्राध्यक्ष नोबेल शांति पुरस्कार ट्रंप को देने के लिए रेकमंड कर चुके है.


पिछले सौ सालो से इंग्लैंड और अमेरिका इस्राइल के निर्माण करने से लेकर, उसे हर युध्द मे हरतरह की मदद करने के लिए, हमेशा ही उसीके पक्ष में फैसला लेते रहें हैं. और सौतेला व्यवहार फिलिस्तीनीयो के साथ शुरू से ही करते आ रहे हैं. और अब ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने के लिए यूक्रेन से लेकर भारत- पाकिस्तान के बीच में समझौते करने का ढिंढोरा पिट रहे हैं. और ड्रामा सिर्फ और सिर्फ नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने की लस्ट की वजह से कर रहे हैं . अन्य विषयों के नोबेल पुरस्कार की तुलनामे मुख्यतः नोबेल शांति पुरस्कार के बारे में अमेरिकन्स को शांति पुरस्कार देते वक्त नोबेल कमेटी का पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण रहा है. इसमे कोई दो राय नहीं है. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से एक बच्चे के जैसे खुलेआम उस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए ऊटपटांग हरकते कर रहे हैं . वह भी नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहासमेसे शायद पहला ही ग्रेसलेस उदाहरण के रूप में दर्ज हो सकता है.

महात्मा गाँधी ने 1938 में ही “Surely it would be a crime against humanity to reduce the proud Arabs so that Palestine can be restored to the Jews partly or wholly as their national home ” बोलते हुए कहा कि जिस तरह से इंग्लैंड अंग्रेजों का है. फ्रांस फ्रेंच लोगों का है. इटली इटालियन लोगों का है. उसी तरह से फिलिस्तीन अरबों का है. यहूदियों को अरबों को उपर लादना गलत है. और अमानवीय भी है. ऐसा महात्मा गाँधी ने इजराइल अस्तित्व में आने के दस वर्षों पहले ही चेतावनी दी है. और हम सभी गांधीजी की विरासत की बात करने वाले लोगों की नैतिक जिम्मेदारी है कि हमने फिलिस्तीन की जनता के साथ ऐसे संकट की घड़ी में देना चाहिए.

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