साथियों 2025 साल समाप्त होने के पहले समाजवादी आंदोलन के चार दुसरे बैच के लोग एक के पीछे एक करते हूऐ चले गए हैं सबसे पहले डॉ. जीजी पारिख 100 वर्ष की आयु में 2 अक्तुबर के दिन, सच्चिदा बाबु भी सौ को छूने से कुछ दूरी पर और वही पन्नालाल जी 93 उम्र में, और आज डॉ. बाबा आढाव के चले जाने से मेरे जैसे उनके बाद के तीसरे बैच के साथी को हमारे चारों वरिष्ठ साथी जो सभी दिर्घायू होकर चले गए. और सभी ने अपने जीवन के शुरुआती 20 – 25 सालों को छोड़ दो तो लगभग 75 साल हमारे देश में समतामूलक सेक्युलर और समाजवादी समाज बनाने के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया है. आज बाबा भी अपने जीवन के 95 सालों की उम्र में पूना अस्पताल में पिछले एक सप्ताह से भर्ती थे . लेकिन उम्रदराज होने की वजह से आज नहीं रहे .


मेरे साथ बाबा और पन्नालाल से व्यक्तिगत संबंध सत्तर के दशक में मेरे कॉलेज के प्रवेश के प्रथम वर्ष मे ही महाराष्ट्र में एक गांव एक कुंआ आंदोलन के दरमियान से आया है . जो उनके जीवन के अंत तक लगभग पचपन सालों से लगातार रहा है. उसकी मुख्य वजह बाबा के भी सार्वजनिक जीवन की शुरुआत राष्ट्र सेवा दल के कारण हुई है. बाबा आढाव, भाई वैद्य, तथा पन्नालाल सुराणा यह तिनो राष्ट्र सेवा दलके के और समाजवादी पार्टी के भी एक ही बॅच के साथी रहे हैं. पन्नालाल जी के जाने के एक सप्ताह के भीतर बाबा का भी आज चले जाने से राष्ट्र सेवा दल और समाजवादी आंदोलन की सबसे बड़ी हानि हुई है.


वैसे बाबा पेशेवर डाक्टर थे . लेकिन सामाजिक विषमता की हजारो साल पुरानी बिमारी को ठीक करने के लिए उन्होंने अपने जीवन का अधिकतर समय दिया है. और उसमे भी मुख्य रूप से हमारे देश के जातिव्यवस्था के लिए सबसे पहले एल्गार शुरू करने वाले महात्मा ज्योतिबा फुले जी की राह पर चलने के लिए उन्होंने संसदीय राजनीति से भी अलग होकर सत्तर के दशक में ही पूरा समय जातिनिर्मूलन के लिए अपने जीवन के अंतिम समय तक दिया है. कूलीयो की यूनियन बनाने से लेकर पूना के रिक्षाचालककोकी यूनियन तथा हमाल मापाडी भवन निर्माण करते हूए उन्हें पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए, इसलिए कष्टाची भाकर बहुत ही कम किमत मे देने की शुरुआत की है. जीसको देखकर ही महाराष्ट्र सरकारने भी झुणका भाकर केंद्र पूरे राज्य मे शुरू किए हैं. उसी तरह से सत्तर के दशक में एक गांव एक कुंआ आंदोलन को भी महाराष्ट्र सरकारने खुद इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए खुद होकर पहल की है.

हमारे इन चारों वरिष्ठ साथियो के चले जाने से मेरे मन में समाजवादी आंदोलन की वर्तमान स्थिति के लिए एक तुफान सा चल रहा है. क्योंकि इन सभी लोगों ने हमारे देश की स्वतंत्रता के बाद समाजवादी पार्टी के बैनर तले समाजवाद लाने के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है. और उसके लिए विलक्षण कष्ट किऐ है. लेकिन आज समाजवादी आंदोलन की स्थिति क्या है ? हम इनके पहले बैच के नेताओ की जयंतीयां – पूण्यस्मरण मनाने और कभी-कभी समाजवादी मित्र – मिलन और शताब्दी जैसे कार्यक्रमों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. इससे उल्टा जिस घोर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों के सफर में उन्होंने ना ही आजादी के आंदोलन में भाग लिया, और न ही समाज के मूलभूत सवालों को न छूते हूऐ, सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करत हूऐ, और सस्ते हथकंडों के साथ, हमारी तुलनामे अपने आप को प्रतिस्थापित करने मे कामयाबी हासिल की है. यह बात चाहे जितनी कडवी लगे लेकिन स्विकार करनी चाहिए. क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की भी स्थापना सौ साल पहले इसी महीने में कानपूर मे की गई थी. अब वह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तुलनामे कहा है ? यह अलग विषय है मै इसे अलग से जल्द ही लिखने वाला हूँ.
फिलहाल समाजवादी आंदोलन का जायजा लिया जाए तो क्या दिखाई दे रहा है ? क्रांति के बारे में एक मोटा सुत्र माना जाता है, कि जब अगल-बगल की परिस्थिति असहनीय हो जाती है. तो लोग खुद- ब – खुद बगावत पर उतर आते हैं. मेरे हिसाब से परिस्थितियों को सहने की इम्यूनिटी जैसे जंतुओं की भी बढने का बॉयोलॉजीकल फिनोमिना है. शायद वैसे ही इंसानों भी परिस्थिति को सहने की इम्यूनिटी बढना भी एक कारण है. महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था की स्थिति तथा जातिवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण इतिहास के क्रम में आज सबसे ज्यादा स्तर पर सर चढकर बोल रहा है.


जबकि इसी देश में एक समय हम सभी ने मिलकर जयप्रकाशजी के नेतृत्व में एक बार आंदोलन किया है. जिसको इसी साल पचास साल पूरे हो गए हैं. लेकिन उसके बाद छुटपुट बवाल हुऎ है. लेकिन आंदोलन के द्वारा बदलाव अगर हुआ है तो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के बाद जो तथाकथित राममंदिर आंदोलन किया गया उसके बाद हमारी तथा कम्युनिस्टों की भी जमीन कम होते गई. और हमारे अपने भी कुछ साथियों ने थक हार कर या कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए भी सांप्रदायिक राजनीति में शामिल होने के उदाहरण मौजूद है. इसे नकारने से हम हमारी राह सही नहीं पकड पाएंगे. क्योंकि इतिहासमेसे की गई गलतियों को स्वीकार करने के बाद उन्हें दुरुस्त करने के लिए कुछ नहीं सिखेंगे तो हम कोल्हू के बैल के जैसे सिर्फ घुमते रहेंगे और कुछ रिजल्ट नहीं निकलेगा. हमारे इन सभी साथियों के चले जाने के बाद क्या हम उन्हें सचमुच ही प्यार करते हैं. उनके समाजवादी आंदोलन के लिए किऐ गए मेहनत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. तो हमें आत्ममंथन करते हूए इस चक्रव्यूह को भेदने की कोशिश ही हमारे इन सभी साथियों को सही श्रधांन्जली होगी ऐसा मुझे लगता है.

इसलिए मै डॉ. बाबा आढाव को सही श्रंधान्जली उनके विषमता निर्मूलन के काम को आगे बढ़ाने के लिए हम सभी साथियों को संकल्प लें कर पूरा करना ही हो सकती है. क्रांतिकारी अभिवादन.

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