इस चिंता का ज़िक्र किससे करें? आदरणीय प्रधानमंत्री जी से, आदरणीय गृहमंत्री जी से या आदरणीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महोदय से? हमारा पूरा देश डिजिटल इंडिया हो गया है। हमारे सारे काम अब डिजिटल हो गए हैं। चाहे बैंक हो, चाहे अस्पताल हो, चाहे हवाई जहाज़ हो या फिर मोबाइल सिम लेना हो। हमें उन्हें मोबाइल नंबर बताना पड़ता है, अपना आधार कार्ड और पैन कार्ड देना पड़ता है। हमारा सारा डाटा इस देश के हर उस संस्थान के पास है जो उपभोक्ता को सेवाएँ देता है।
हम पिछले आठ महीने से देख रहे हैं कि दिल्ली के स्कूलों में बम रखने के ईमेल आ रहे हैं। ये सारे स्कूल बड़े हैं, जिनमें दिल्ली के उच्च मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं, जिनकी औसतन उम्र 6 साल से लेकर 16 साल होती है। जब इन स्कूलों में धमकी भरा ईमेल आता है कि स्कूल को बम से उड़ा दिया जाएगा, तो जहाँ स्कूल में घबराहट फैल जाती है, वहीं उस बच्चे का पूरा परिवार, उसके सारे रिश्तेदार और पूरा मोहल्ला तनाव में आ जाता है। सभी अपने बच्चों को लेने के लिए स्कूल की तरफ भागते हैं। आज भी दिल्ली के कुछ स्कूलों में धमकी भरे ईमेल आए हैं कि स्कूल को बम से उड़ा दिया जाएगा।
दिल्ली के अलावा भी बेंगलुरु और चेन्नई जैसे स्थानों से भी कभी-कभी ऐसे समाचार आते हैं कि वहाँ के स्कूलों में भी ऐसे ईमेल भेजे जा रहे हैं। यही सवाल उठता है कि हमारा देश संपूर्ण रूप से डिजिटल हो गया है। सारे काम ईमेल के ज़रिए हो रहे हैं और इंटरनेट जीवन का सबसे आवश्यक अंग हो गया है। जहाँ पर थोड़ा भी तनाव होता है, सरकार या प्रशासन उस पूरे इलाके का इंटरनेट बंद कर देता है। मैं यह मानता हूँ कि सरकार ने अवश्य इंटरनेट का दुरुपयोग करने वाले लोगों पर नज़र रखने के लिए कोई ग्रुप बनाया होगा, कोई संस्था बनाई होगी। सुरक्षा एजेंसी के पास भी इस तरह की ज़िम्मेदारी है और उनके पास यंत्र और विशेषज्ञता भी है। लेकिन इसके बाद भी दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में भेजे जाने वाले स्कूलों को बम से उड़ा देने वाले ईमेल का, और उन्हें भेजने की हिम्मत करने वाले लोगों या संस्थाओं का कोई पता भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ नहीं लगा पा रही हैं।
बैंकों में होने वाले फ्रॉड इंटरनेट के ज़रिए ही हो रहे हैं, लेकिन किसी का भी कोई हल निकला हो, इसका समाचार न तो किसी अख़बार में आया है और न ही किसी न्यूज़ चैनल में। इस तरह की जालसाज़ी अदालतों में भी की जा रही है। जिन लोगों के बैंक अकाउंट इस तरह की जालसाज़ी की वजह से खाली हो गए हैं, उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है। इस तरह की जालसाज़ी की शिकायत करने वाले जो नंबर जारी किए गए हैं या जिस वेबसाइट का प्रचार किया गया है, वहाँ से कभी जवाब नहीं आता।
पर सबसे महत्वपूर्ण, स्कूलों को भेजे जाने वाले ईमेल की श्रृंखला है, जो देश में यह संदेश दे रही है कि लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियाँ या सरकार किन्हीं दूसरे महत्वपूर्ण कामों में व्यस्त हैं और इन घटनाओं को रोकने की अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रही हैं। क्या ये ईमेल पाकिस्तान से आ रहे हैं, चीन से आ रहे हैं या कहीं और से आ रहे हैं? इसका खुलासा सरकार या लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियों ने नहीं किया है। तो हम यह मान लेते हैं कि ये सारे मेल, जिनमें बम से स्कूलों को उड़ाने की धमकी है, शायद अपने ही देश में कहीं से भेजे जा रहे हैं। सरकार या लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियाँ इनमें से एक का भी पता क्यों नहीं लगा पा रही हैं? क्या उनके पास क्षमता नहीं है, उनके पास तकनीक नहीं है, उनके पास यंत्र नहीं हैं? कोई तो कारण होगा। आख़िरी कारण एक ही बचता है कि सरकार के पास इनका पता लगाने का वक़्त नहीं है। वे ऐसे सारे संस्थानों और विशेषज्ञों को किसी ऐसे काम में लगा रहे हैं, जिनका संबंध किसी नॉन प्रॉडक्टिव काम से है।
तब हम यह कैसे मान लें कि सीमा पार से दुश्मन देश से आने वाले घुसपैठियों पर सरकार या लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियाँ मजबूती से नज़र रख रही होंगी? एक धारणा यह बन रही है कि सीमा पार से आसानी से आतंकवादी आते हैं और वारदात करके टहलते हुए चले जाते हैं। हमारे देश में नकली नोट भी शायद विदेश से ही आते हैं, शायद सीमा पार से। और रिज़र्व बैंक को एक रिपोर्ट में यह कहना पड़ता है कि अभी भी देश में नकली नोटों का चलन बहुत बड़ी संख्या में हो रहा है। इसी कारण ₹500 के नोट को धीरे-धीरे चलन से बाहर किया जा रहा है। शायद सरकार को यह पता चला है कि देश में ₹500 के नकली नोटों का चलन बढ़ रहा है।
देश के लोगों के लिए यह चिंता की बात है और हम इस चिंता को आदरणीय प्रधानमंत्री, आदरणीय गृहमंत्री और आदरणीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से साझा करना चाहते हैं। उनसे यह विनम्रतापूर्वक निवेदन करना चाहते हैं कि अगर दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी भरे ईमेल के सोर्स का, उन्हें भेजने वाले संगठनों का अगर पता नहीं लगाया जा पा रहा है, तो फिर किसी भी ऐसे केस को वर्कआउट करने की अपनी ज़िम्मेदारी से सत्ता और प्रशासन बहुत दूर चला गया है और अपने को नाकारा साबित कर रहा है।
देश में लगभग हर नागरिक के परिवार में बच्चे हैं। चाहे वह सरकार में मंत्री हो, अफ़सर हो या ग़रीब आदमी हो। सभी अपने बच्चों से एक जैसा ही प्यार करते हैं। तब फिर क्यों भारत सरकार और लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियाँ इसका पता नहीं लगा पा रही हैं? पर यह तो हमारा सवाल है, देश की चिंता है। लेकिन केंद्र सरकार, आदरणीय प्रधानमंत्री जी के साथ उनके पूरे मंत्रिमंडल के सदस्य और लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियाँ इस सवाल पर क्यों चुप हैं? यह एक और बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। हम आपसे सिर्फ निवेदन ही कर सकते हैं कि इसका उत्तर तलाशिए और उन लोगों को पकड़िए जो इसके साज़िशकर्ता हैं। आशा है, प्रधानमंत्री जी के कान में हमारा निवेदन पहुँचेगा और वे षड्यंत्र करने वालों को जल्दी ही क़ानून के दायरे में लाने का आदेश देंगे और अपनी सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से फ़ूलप्रूफ़ बनाए जाने की निगरानी स्वयं करेंगे।













