मधु लिमये जी का राष्ट्र सेवा दल के साथ स्थापनाके समय से ही सक्रिय योगदान रहा है. (4 जून 1941) महाराष्ट्र के खान्देश, जो साने गुरूजी का कार्यक्षेत्र था उसमें पुणे के अपने कालेज की शिक्षा अधुरी छोड़कर ( 1938-39 मधुकी उम्र 16-17 ) लगभग साडेतीन सौ किलोमीटर कि दूरी पर स्थित, मध्य प्रदेश और गुजरात के सिमावर्ति इलाके पस्चिम खान्देश खान्देश में ( जिसमें धुलिया, जलगांव और नासिक यह महाराष्ट्र के तीन जिले मुख्य रूप से शामिल है. जाकर, काम करने का निर्णय लेने की चर्चा 1938 के आखिरी दिन और 1939 के शुरू होने के पहले दिन के संक्रमण काल में ) अपने अजिज दोस्त बुंडू गोरे, माधव लिमये, अण्णा साने, विनायक कुलकर्णी, और गंगाधर ओगले जैसे मित्रों के साथ, मंत्रणा करने के बाद नये साल का संकल्प लेने के फैसले के पिछे, एस. एम. जोशी जी के साथ अंमलनेर 1938 के दिसंबर के अंत में, ख्रिसमस की छुट्टियों में किसान – मजदूरों के संमेलन में भाग लेने के लिए जाना. ( जिसमें मुख्य अतिथि स्वामी सहजानंद सरस्वती थे. ) और मधु लिमये को वहां की पारिस्थितिके अवलोकन में, ध्यान में आया कि साने गुरुजिके सादगी और भोलेपन का लाभ उठाकर कम्युनिस्ट समाजवादियों की युनियन पर, (जो खान्देश के चार कपडा मिल धुलिया, जलगांव, अंमलनेर और चालिसगांव) के मजदूरों में पहले से ही थी. और किसानों के संघठन पर कब्जा करने की होड़, सत्रह साल के मधु के देखने में आई थी.

इसके पीछे का कारण, कम्युनिस्ट पार्टी के उपर सरकारी पाबंदी होने की वजह से उन्होने एक षडयंत्र के तहत कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल होकर लगभग पूरे देश में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं को कम्युनिस्ट पार्टी में खिंचने का काम किया है. जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान दक्षिणी राज्यों में हुआ. उदाहरण के लिए ईएमएस नबुद्रीपाद समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. और अन्य कई समाजवादी लोग जो कभी समाजवादी पार्टी के थे लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को समाजवादी पार्टी में शामिल करने से समाजवादियों की ताकत बढने की जगह, आधीसेभी ज्यादा पार्टी के लोग इस तरह के अलायंस करने के कारण कम हो गई थी

और यही गलती जयप्रकाश नारायण के आग्रह के कारण आपातकाल के समय, चालीस साल बाद दोबारा 1976-77 के जनता पार्टी के गठन के पहले हुई है. जिसके विरोध में मै, मधु लिमये और जॉर्ज फर्नाडिस भी एस. एम. जोशी जी से बोल चुके थे. की जन्मना समाजवाद और सेक्युलरिज्म के खिलाफ रहनेवाले जनसंघ जैसे दल के साथ एक दल नही करना चाहिए. लेकिन इतिहास से सबक लेने की जगह जयप्रकाश नारायण ने अपने जीवनकाल में राजनीतिक पार्टियों को लेकर दो बार गलती की है. और दोनों समय समाजवादी पार्टी को जबरदस्त नुकसान पहुंचा है. यह वर्तमान समय में भारत के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए और भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है.

और इसी कारण खान्देश की यात्रा से पुणे लौटने के बाद खान्देश के समाजवादियों के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप खड़ा कीया गया , मजदूरों और किसानों के संघटन को कब्जे में करने की कम्युनिस्ट पार्टी की कोशिश को देखकर मधु बहुत ही चिंतित होकर ही पुणे में लौटा था. और तुरंत बाद ही अपने घर पर पांचों करीबी मित्रों के साथ 1938 के 31 दिसंबर की रात और 1939 के नये साल के शुरूआत में, खान्देश के राजनीतिक स्थिति पर, संकल्प लेने हेतु अपने पांच करीबी मित्रों के साथ घनघोर चर्चा करते हुए, संकल्प लिया कि मधु लिमये अपनी इंटर की पढाई छोड़कर खान्देश में समाजवादी पार्टी के काम के लिये जायेंगे उम्र सोलहवें साल .

मधु लिमये ने होश सम्हालने के बाद मराठी साहित्य से लेकर अंग्रेजी भाषा में का साहित्य, का गहरा अध्ययन किया है. अपने पिता के मार्गदर्शन में उनके पिता उस समय के जाने माने अंग्रेजी भाषा के शिक्षक थे. और मधु को बगैर किसी पाठशाला में भेजें घर पर ही मॅट्रिक तक उन्होंने पढाया था. यहां तक कि उम्र के पंद्रह साल से कम उम्र रहते हूऐ. उस जमाने में ग्यारहवीं क्लास में मॅट्रिक की परीक्षा मुंबई विश्वविद्यालय के निगरानी में हुआ करती थी. उससे पत्राचार करने के बाद विशेष रूप से प्रायवेट विद्यार्थि के हैसियत से मधुने मॅट्रिक की परीक्षा देने की इजाजत प्राप्त की थी. और परीक्षा के रिझल्ट आने के बाद पता चला कि मधु लिमये मेरीट में पास हूऐ है. पुणे के मशहूर कालेज फर्ग्युसन में दाखिल हुए थे. उम्र पंद्रह साल मे. शायद उस समय के सबसे कम उम्र के विद्यार्थियों में एक रहे होंगे. और उसी कालेज के छात्रों के तरफसे आयोजित एक कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक श्री. अच्युतराव पटवर्धन का भाषण फॅसिझम तथा उसके कारण आने वाले दुसरे महायुद्ध की भविष्यवाणी, और उसमें अंग्रेज सरकार भारत के संसाधनों का खुब दोहन करेंगी तो हम सभी ने उसके विरुद्ध असहकार आंदोलन करना चाहिये इस आशय का भाषण दिया था. जो मधूजी के जीवन में का पहला राजनीतिक भाषण था. और उन्हें बहुत पसंद भी आया था.
मधु लिमये पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने के बाद अच्युतराव पटवर्धन के प्रिय लोगों मे से एक थे. व्यक्तिगत रूप से अच्युतराव मधूजी के लिए जेल में जाने के बाद किताबों से लेकर उनके कपड़े तक पहुंचाने का काम खुषी – खुषी करते थे. यहां तक कि जब मधूजी ने चंपा गुप्ते के साथ शादी की उसके बाद अच्युतराव पटवर्धन ने उन्हे बहुत ही सुंदर पत्र लिखा था. “कि तुम मेरे घर हनिमून के लिए आकर ठहर सकते हो, और मै तुम्हें कबाब में हड्डी लगता हूँ तो उस समय कहीं और दुसरी तरफ रहने के लिए चला जाऊंगा. लेकिन तुम और चंपा मेरे पुणे स्थित घर अवश्य ठहरने के लिए आओ.”
उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत हो चुकी थी. और अंग्रेजोने भारत की जनता के भावनाओं की पर्वा किए बगैर, युद्ध में भारत को शामिल करने के निर्णय लेने के कारण, कांग्रेस और समाजवादियों ने युद्ध के दौरान अंग्रेज सरकार के खिलाफ जबरदस्ती से भारत को युद्ध में शामिल करने की कृती का विरोध करना शुरू किया था.

और मधु लिमये 1935 से ही तेरह साल की उम्र में पुणे के नगरवाचन मंदिर में जाकर अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं तथा अखबारों में प्रकाशित आंतरराष्ट्रीय खबरों पर विशेष ध्यान देने की आदत के कारण, कार्ल मार्क्स, ट्रॉटस्की, लेनिन और उनके बाद रशिया के तानाशाह स्टालिन के साहित्य का अपडेटेड अध्ययनों के कारण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही गतिविधियों के बारे में पढकर, हिटलर – मुसोलीनी की फासिस्ट राजनीतिक गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन करने की वजह से अपने अध्ययन को राष्ट्र सेवा दल के आभ्यास शिविरों में शिबीरार्थियो के साथ बाटने की शुरुआत मधूजी ने ही किया है. और अंमलनेर धुलिया, जलगांव जैसे जगहों पर जाकर वहां की शाखा में आनेवाले लडकियां- लडकों के सामने समाजवाद, जनतंत्र, सेक्युलरिज्म तथा राष्ट्रीयता, और सबसे महत्वपूर्ण तत्कालीन द्वितीय विश्वयुद्ध, आंतरराष्ट्रीय सवाल जैसे महत्वपूर्ण विषयों को समझाने की कोशिश करते थे. शायद उस समय उनके उम्र के किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता की इतनी बौद्धिक तैयारी नहीं थी. और मेरे हिसाब से उम्र के बीस साल पहले की जींदगी हसने – खेलने और हल्के – फुल्के मनोरंजन की उम्र होती है.
लेकिन मधु लिमये सचमुच ही मराठी संत ज्ञानेश्वर. जिन्होंने उम्र के सोलह साल में ज्ञानेश्वरी जैसा अजरामर ग्रंथ लिखने का काम किया है. समस्त मराठी साहित्य मे आज भी उसकी बराबरी तो दूर की बात है. उसके आसपास भी कोई साहित्यिक पहुंच नही सके. और यही प्रतिभा स्वामी विवेकानंद की भी रही है. मधु लिमये समाजवादी आंदोलन के प्रतिभाशाली लोगों में से एक थे.
लेकिन भारतीय संसदीय राजनीति में मर्यादित होकर रह गए. जिस तरह डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अपनी प्रतिभा के कारण, समाजवादी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए विशेष रूप से अनुठे नारों के साथ कार्यक्रम दिए उस तरह मधु लिमये की प्रतिभा होने के बावजूद, उसका फायदा समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए नही हो पाया. यह कमी मुझे उनके जन्मशताब्दी के बहाने उनके बारे में पढकर लग रही है.

वैसेही उनके बाद की पीढ़ी में मेधा पाटकर मेरी हम उम्र साथी है. हमारे जीवन का पहला राष्ट्र सेवा दल का दस्तानायक शाखानायक शिबीर 1967 मे हम दोनों शामिल थे. आज उसने विकास की अवधारणा को लेकर शुरू किया आंदोलन को लेकर, उसे मैंने अपने साथ की मुलाकातों में, समय-समय पर इस विषय पर स्पष्ट रूप से कहा कि 1972-73 के संपूर्ण क्रांति की संकल्पना को लेकर जयप्रकाश नारायण ने कुछ सुत्रपात किया था. लेकिन उनकी उम्र और बिमारीयो के कारण और जनता पार्टी जैसा भानामती का कुनबे का राजनीतिक प्रयोग करने के चक्कर में संपूर्ण क्रांति खो गई थी. अब पंद्रह – बीस साल के बाद पहली बार कोई महत्वपूर्ण चहल-पहल तुम्हारे आंदोलन के कारण एक महत्वपूर्ण बहस विकास की अवधारणा को लेकर उभर कर सामने आयी है. और वह आज सिर्फ अपने देश के संबंधित ही नहीं समस्त विश्व के संबंध में लागू होने के कारण, हमारे सभी की कोशिश उस दिशा में होने की आवश्यकता है. शायद उन्हें मै अपनी बात नहीं समझा सका. या उसके टेंपरामेंट में नहीं सूट हुई होगी. लेकिन मधु लिमये के बाद दुसरी समाजवादी विचारधारा की होने के बावजूद, देश – दुनिया के सवाल पर जिस तरह से हस्तक्षेप की आवश्यकता है. उस हिसाब से पहल नहीं हो रही है. यह मेरी पिडा मधु लिमये की जन्मशताब्दी के बहाने आप सभी साथियों के साथ बाटने का मन किया है. उम्मीद है कि मेरी इस बात को कोई भी अन्यथा नहीं लेगा.
तत्कालीन धुलिया के नये कलेक्टर ने अंग्रेजी फौज में भर्ती और युद्ध के लिए धन इकठ्ठा करने का अभियान काफी तेजी से शुरू करने के कारण उसकी प्रतिक्रिया में विरोध का अभियान, पस्चिम खान्देश के साक्री तालुका के हर गांव देहात मे बैलगाड़ी से बस से, और कहा – कहा पैदल यात्रा कर के युध्द के विरोध में भाषण देने का जबरदस्त अभियान मधु लिमये ने चलाया था. और पुलिस उनके उपर नजर रखी हुई थी आखिर अक्तूबर के अंत में उन्हे गिरफ्तार कर के, साक्री के पुलिस स्टेशन में पांच दिन पुछताछ के लिए रखने के बाद न्यायालय में खडा किया गया और भारत सरकार के युद्ध विरोधी प्रचार करने के गुनाह में ग्यारह महिने की जेल की सजा सुनाई गई.
पुणे जैसे मराठी संस्कृती के केंद्र के शहर से, मॅट्रिक की परीक्षा प्रायवेट विद्यार्थियों के हैसियत से देने वाले 1937 में 15 साल की उम्र में मेरिट में पास हुआ विद्यार्थियों में से एक 1938 के गर्मी की छुट्टियां मनाने के लिए अपने माता-पिता के नोकरी जुन्नर नामके पुणे जिले के गांव में जाने के समय, साथ मे कार्ल मार्क्स की कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो किताब को लेकर जाता है. उम्र 16 साल के रहते हुए उसके अध्ययन के बाद मधूजी की ही भाषा में ” इस किताब के अध्ययन के बाद मुझे लगा कि जैसे मुझे दिव्यदृष्टी प्राप्त हुई है.

उसके बाद मैंने मार्क्सवाद के उपर लिखा साहित्य एक के बाद एक पढ़ने की शुरुआत की यहां तक की दास कैपिटल के तीनों खंडों का भी अध्ययन किया लेकिन कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो कि तुलना में कोई भी अन्य किताब विशेष नहीं लगी. हालांकि उन्होंने उस समय के सभी उपलब्ध मार्क्स के साहित्य का अध्ययन किया था. यह बात खुद मधु लिमये ने अपनी मराठी आत्मकथा में किताबों की फेहरिश्त के साथ लिखा है. मतलब उम्र के बीस साल पूरे होने के पहले ही एक युवक इतनी गंभीर साहित्य का अध्ययन करना भी एक तरह का अनुठा उदाहरण है. और वह सब समझकर अपनी स्वतंत्र जनतांत्रिक समाजवाद की भारत की स्थिति को देखते हुए राजनीतिक और सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समज बनाने की मिसाल भी जो उम्र खेल – कुद तथा मौजमस्ती की होती है
उसी तरह डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी और बैरिस्टर मोहम्मद अली जिना के बारे में इतनी संतुलित समझ आस्चर्यजनक है. दोनों अंग्रेजो के दलाल है इस बदनामी की मुहिम को लेकर मधु इंटर कॉलेज की पढ़ाई के दौरान, अपने सहपाठियों से लड बैठे थे. उम्र सत्रह साल. उन दोनों की कांग्रेस और गांधी विरोधी भुमिका के कारण सभी राष्ट्रवादीयो की उन्हें समझने में गलतफहमियां हो गई थी. यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा को पढ़ने के बाद, मुझे लगा कि सामाजिक समता के सवाल पर, जवाहरलाल नेहरू की समझ कुछ भी नहीं होने के कारण उन्हें डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी एक दबे-कुचले समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. यह बात समझ में नहीं आई थी जीना और डॉ. आंबेडकर का अंग्रेज सरकार उन दोनों की कांग्रेस विरोधी भुमिका का फायदा उठाती थी. इसमें कोई शक नहीं लेकिन वह दोनों भी गैरमामुली लोग नहीं थे. इसी लिए मै इंटरमीडिएट के क्लास में जीना और डॉ. आंबेडकर की साईड लेकर, अपने साथियों के साथ धुआंधार विवाद करता था. ‘वादे वादे जायते तत्वाबोध ‘ के आश्रय से मै वादविवाद करता था. और मुझे आज भी संदेह नहीं है कि डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी का गांधी विरोध की मुख्य वजह दलितों के उपर हजारों सालों से होने वाले अन्याय के कारण से इतना गुस्सा आता था. 1938 – 39 तक जिना संयुक्त भारत के पक्ष में थे. बाद के दो – तीन सालों में वह पाकिस्तान के पक्षधर बने थे. व्यक्तिगत रूप से वह उदार विचारों के थे. लेकिन सामाजिक व्यवहार में संकुचित और अनुदार हिंदु समाज के स्थायी बहुमत का भय जनतंत्र में मुस्लिम समुदाय को महसूस होना स्वाभाविक था. और जिना उस विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसी मेरी समझ थी कांग्रेस के सरकारों में भी मर्यादित सत्ता में भी मुस्लिम समाज को हिस्सा नहीं मिलने से जिना और भी ज्यादा नाराज हो गए थे. “क्या बीस साल से भी कम उम्र में भला कोई भी व्यक्ति कैसे इतना संतुलित विचार कर सकता है ? ( इसे मराठी भाषी कहावत के अनुसार जावे त्याच्या वंशा तेंव्हा कळे ) मतलब आप जबतक उस जन्म में और उसी जाती में पैदा नहीं होते तबतक आप उनकी पीड़ा को नहीं समझ सकते.
लेकिन मधु लिमये इस बात का जीवंत उदाहरण है. और इसी कारण अच्युत पटवर्धन से लेकर, साने गुरुजी के इतने प्रिय पात्र बने रहने का रहस्य, उनका उम्र से पहले ही इतना प्रगल्भ होना एस. एम. जोशी तो उनके मेंटर थे. लेकिन अशोक मेहता, जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव जैसे उनके सिनियर लोग भी मधु लिमये के साथ बराबरी का व्यवहार करते थे. साने गुरूजी तो संपूर्ण महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर के बाद दुसरे पुरूष थे. जिन्हें माऊली याने मां कहा जाता था. उनके जैसे विनम्र व्यक्ति को मधु लिमये बेटे के उम्र के रहते हुए भी एक विलक्षण प्रतिभा के धनी मधु के उपर का प्रेम देखकर रामकृष्ण परमहंस का और स्वामी विवेकानंद जी के रिश्ते की याद आती है.

और एक मध्यवित्त घर में पैदा हुआ लडका जीवन के शुरूआती दौर में, एस. एम. जोशी जैसे अवलिया राजनेता के संपर्क में आने के बाद इतना आमुलचुल परिवर्तित होता है. कि कई मामलों में वह, एस. एम. जोशी के भी आगे नजर आता है. हालांकि वह खुद अपने जीवन को आकार देने में, एस एम जोशी का योगदान है. यह बार – बार लिख-बोल रहे हैं थे. लेकिन मुझे भी आपातकाल में एस. एम. जोशी की सोहबत में रहने का अवसर मिला है. और उस समय वह सत्तर वर्ष पार चुके थे. और उनकी सादगी तथा अनासक्त व्यक्तित्व का, मै भी कायल हुआ हूँ. लेकिन मधु लिमये की जन्मना प्रतिभा के कारण राजनीतिक विष्लेषण तथा सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक और सबसे महत्वपूर्ण कलाविषयक समझ बहुत ही उच्च कोटि की थी. ऐसा उनके संपूर्ण जीवन को देखते हुए लगता है.
कालेज की शिक्षा अधुरी इंटर में ही छोड़कर, द्वितीय विश्वयुद्ध के खिलाफ बोलने और लिखने का काम शुरू किया था. मुख्य रूप से किसानों और मजदूरों के बीच , युद्ध में सहयोग नहीं करने का प्रचार-प्रसार करते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर के, साक्री तालुका के मामलेदार के सामने सत्रह साल के युवक को खड़ा किया तो मामलेदार भी इतने कम उम्र के युवा को देखते हुए भौचक्का रह गए, और इसी कारण कुछ समझा – बुझाकर छोडने का मन बनाया था. लेकिन सामने आया युवक कुछ और ही मट्टी का बना हुआ था. तो मधु ने कहा कि मुझे कुछ कहना है. तो मामलेदार ने इजाजत दी. तो उन्होंने अपने जेब से पहलें से ही लिखा हुआ अंग्रेजी में अपना मंतव्य जो सरकार और युद्ध विरोधी था. पढ़ने के बाद मामलेदार को मजबूर होकर, जुवेनाईल वार्ड, जो कि धुलिया जेल में होने के कारण वहां एक साल जेल की सजा देने के बाद भेजा गया था.

और कुछ ही दिनों बाद साने गुरुजिके गिरफ्तारी के बाद वह भी धुलिया जेल में आए. और इस तरह मधु लिमये और गुरूजी को पहली बार करीब आने का मौका मिला. उस समय गुरुजिके ध्यान में आया कि मधु उम्र में छोटा होने के बावजूद बौद्धिक रूप से काफी मंजा हुऐ है. तो जेल में गुरुजिके आग्रह पर सत्रह साल के मधु लिमये ने समाजवाद के उपर उन्नीस दिन भाषण दिए . और साने गुरुजी ने एक कोने में बैठे – बैठे सभी भाषणों की नोट्स लेने का काम किया है. साने गुरुजी के बारे में कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों की सोहबत के कारण कम्युनिस्ट होने की बात फैली हुई थी. लेकिन सत्रह साल के मधु लिमये के भाषणों में, द्वितीय विश्वयुद्ध में कम्युनिस्ट पार्टी के दोहरे चरित्र को उजागर करने की वजह से और कम्युनिस्ट पार्टी के भारत के आजादी के आंदोलन के बारे मे भी रशिया के वर्चस्व को लेकर, आधी – अधुरी भुमिका को मधु लिमये ने अपने भाषणों में प्रत्यक्ष उदाहरण के साथ बोलने से गुरुजिके मतपरिवर्तन होने में सहायता हुई है. वैसे तो मधुजी के और उनके संबंध गुरु शिष्य के जैसे थे. लेकिन कौन गुरु और कौन शिष्य ? यह सवाल पाठकों के उपर छोड़ दें रहा हूँ.













