काफी लोगों की गलतफहमी है कि बाबा साहब ने स्वातंत्र्य, समता और बंधुता यह त्रिसूत्री फ्रेंच राज्य क्रांती से ली है. तो यह साफ गलत है. श्री. कृष्णराव अर्जुन केळुसकर नामके एक विद्वान आंबेडकर के पिताजी के मित्रों में से एक थे. और बाबा साहब ने चौथी कक्षा की परिक्षा पास करने के कारण उनकी बस्ती के लोगों ने उन्हें सम्मानित करने का फैसला लिया था. लेकिन बाबा साहब के पिताजी ने कहा कि इतने छोटे बच्चे को इस तरह इतने कम उम्र में सिर्फ 4 थी कक्षा में सफलता प्राप्त करने बाद सत्कार समारोह करने से उसे बिगाड़ भी सकती हैं. इसलिए उन्होंने मना कर दिया था. हालांकि उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में भी बहुजन समाज के लोगों को 4 थी कक्षा तक पढ़ाई करना नसीब नहीं होता था. इसलिए बस्ती के लोगों ने यह सत्कार समारोह आयोजित करने का पक्का इरादा बना लिया था. तो लोग कृष्णराव केळुसकर के पास जाकर बाबा साहब अंबेडकरजी के पीताजी को समझाने के लिए विनती करने के लिए गए. और कृष्णराव केळुसकर के कहने पर इजाजत दी . और उस समारोह में खुद केळुसकर उपस्थित रहकर अपने द्वारा लिखित बुद्ध चरित्र बाबा साहब की प्रतिभा को देखते हुए उनके जीवन के शुरूआती काल में ही भेट दी थी. और उसे तुरंत ही पढने के बाद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जीवन को दिशा निर्देश देने का एतिहासिक काम किया है. और उसकी ही वजह से उन्हें बुध्ददेव के चरित्र से स्वातंत्र्य समता और बंधुत्व की त्रिसूत्री प्राप्त हुई है.


और उस समय बाबा साहब की उम्र दस – ग्यारह साल की रही होगी. उसके पहले पिता के तरफसे दिए गए ग्रंथों में से रामायण – महाभारत के ग्रंथ बाबा साहब ने पढने के बाद बाबासाहेब ने पिताजी को कहा कि “इन दोनों ग्रंथों को पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि कर्ण को सुतपुत्र कहने वाले, एकलव्य का अंगुठे को काटने वाले तथा द्रोपदी को विवस्त्र करने वाला महाभारत मुझे मान्य नहीं है. और शंबुककी हत्या करने वाला और शूर्पणखा का नाक और स्तन काटने वाले तथा गर्भवती सिता को वनवास में भेजनेवाले रामायण हमें महाकाव्य नही लगता है. मैंने खुद रामायण लिखा होता तो गर्भवती सिता को बनवास भेजने के पहले कोर्ट में खड़ा करके उनके जीवन यापन के लिए मामला दर्ज किया होता. ” इस तरह के तर्क बचपन से ही देने वाले डॉक्टर भिमराव आंबेडकर की हिंदु धर्म के प्रति वितृष्णा दिन प्रति दिन विषमता मुलक व्यवस्था के कारण आगे चलकर बढते ही गई है. उन्हें खुद को ही बचपन से ही अस्पृश्य जाती में जन्म होने की वजह से कदम – कदम पर अपमान और अत्याचार झेलना पड़ा है. सातारा मे प्राथमिक स्कूल में शिक्षा लेने के दौरान उन्हेंं पढने के कमरे के बाहर जमीन पर बैठ कर पढने के अनुभव से लेकर इंग्लैंड से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट होकर आने के बाद बडोदा रियासत में नौकरी करने के दौरान उनका सिपाही उन्हें कोई भी फाइल हाथ में देने के बजाय उपरसे फेककर देता था. और उन्हें बडोदा मे रहने के लिए घर भी नहीं मिलना . इस वजह से उन्होंने बहुत ही जल्द उस नौकरी को छोड दिया था. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने हिंदू धर्म वैसे ही अस्पृश्य समाज के लोगों को सार्वजनिक तालाब या कुंओं पर पानी लेने की मनाही के विरोध में 20 मार्च 1927 को महाड के सार्वजनिक तालाब में अस्पृश्यों को पानी लेने के लिए सत्याग्रह करना पडा था. उसके अलावा मंदिरों में पूजा अर्चना करना तो दूर की बात है. उन्हें मूर्ति के सामने खड़े, होकर दर्शन करने की भी मनाई थी. इसलिए उन्होंने नासिक के कालाराम मंदिर प्रवेश के लिए अपने साथियों के साथ (1930) पांच वर्ष से अधिक समय तक मंदिर प्रवेश करने के लिए सत्याग्रह किया था. लेकिन कट्टरपंथी हिंदुत्ववादीयो के विरोध के सामने बाबासाहेब को अपना मंदिर प्रवेश का सत्याग्रह को छोड़ना पडा और हिंदू धर्म की इन सभी कुरीतियों से तंग आकर 13 अक्तूबर 1935 के दिन नासिक जिले के ही येवला नाम के जगह, दस हजार लोगो की उपस्थिति में भिमगर्जना करते हैं कि ” मै हिंदु धर्म में पैदा जरूर हुआ हूँ. लेकिन मरने से पहले इस विषमतावादी धर्म का त्याग अवश्य करूंगा”. और इसके साथ हिंदूओं को 11 सवाल किए थे.

(1) हिंदू धर्म अस्पृश्य समाज के लोगों को वह भी मानव है, इस मुल्य को मानते हैं क्या ?

(2) यह धर्म समता को मानता है क्या ?

(3) यह धर्म अस्पृश समाज के लोगों को भी आजादी का लाभ मिलने देगा क्या ?

(4) कम-से-कम यह धर्म अस्पृश्य और हिंदूओं के साथ भाईचारा का नाता बनाने के लिए मदद करता है क्या ?

(5) अस्पृश्य हमारे ही परिवार के है , यह बात हिंदूओं को बताने का काम करता है क्या ?

(6) अस्पृश्य लोगों को इंसान की जगह पशु समझना पाप है, ऐसा समझाने के लिए यह हिंदू धर्म के लोग अपने अनुयायियों को कहते हैं क्या ?

(7) वह हिंदूओं को अस्पृश्योंको साथ अच्छा व्यवहार करने के लिए कहते हैं क्या ?

(8) हिंदूओं ने अस्पृश्योंके साथ न्यायपूर्ण और इंन्सानियत से व्यवहार करना चाहिए ऐसा उपदेश करते हैं क्या ?

(9) अस्पृश्योंके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने की भावना हिंदूओं के दिलों में पैदा करने की कोशिश करते हैं क्या ?

(10) वें हिंदूओं को अस्पृश्योंके साथ गलत व्यवहार न करते हुए प्रेम करने के लिए कहते हैं क्या ?

(11) संक्षेप में हिंदू धर्म जाति भेद नहीं मानते हूऐ जीवन मूल्यों को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानता है क्या ?


क्या हिंदूत्ववादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसकी स्थापना दशहरे के दिन 1925 को की गई है. और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने उसी दशहरे के दिन लेकिन 31 साल पस्चात, 14 अक्तुबर 1956 के दिन, नागपुर के दिक्षाभूमि के मैदान में अपने लाखों की संख्या में अनुयायीयो को लेकर हिंदू धर्म का त्याग करते हूऐ, बौद्ध धर्म का स्विकार किया. आर एस एस धर्मांतरण को लेकर सिर्फ राजनीति करने के बजाय सचमुच संवेदनशील होता तो डॉ . बाबासाहेब आंबेडकर ने 13 अक्तुबर 1935 मे की हुई घोषणा के 21 साल के अंतराल में आर एस एस ने उन्हें हिंदू धर्म का त्याग करने से रोकने के लिए क्या किया है ? और उन्होंने उठायें हूऐ 11 सवालों के जवाब दिया है क्या ? काल की विदारकता देखिए उन्होंने बौद्ध धर्म स्विकार ने के दो महीने के अंदर ही 6 दिसंबर 1956 के दिन डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी का महानिर्वाण हो गया. लेकिन उसी तारिख को 1992 को बाबरी मस्जिद गिराने के लिए हिंदूत्ववादीयो ने बाबासाहब के 37 वे महानिर्वाण दिवस का चुनाव क्यों किया ?


इसितरह का विद्रोह हिंदु धर्म के भीतर भारतीय इतिहास में तीन हजार साल पहले सिद्धार्थ गौतम ने किया था. हालांकि सिद्धार्थ गौतम खुद क्षत्रिय शाक्य कुल के और राजकुमार थे . लेकिन उनके संवेदनशील मन को हिंदु धर्म की विषमतावादी स्थिति को देखते हुए राज्य का त्याग कर के साधना के लिए जंगलों – पहाडो के तरफ अग्रसर होना पडा और बाद में विषमतावादी हिंदु धर्म के पर्याय के रूप में समतावादी बौद्ध धर्म की स्थापना की है. और बाबा साहब अछूत (महार) जाती में पैदा हुए थे. और इसी वजह से इतिहास के क्रम में करोड़ों भारतीय पिछडी जाती के लोगों ने हिंदू धर्म में चली आ रही विषमतावादी परंपरा से तंग आकर समय-समय पर हिंदु धर्म का त्याग किया है. और यह बात सव्वासौ साल पहले स्वामी विवेकानंदने खुद शिकागो के धर्मसंसद के पहले दक्षिण भारत के दौरे के समय बार – बार दोहराया है “कि भारत में इस्लाम और ख्रिस्ती धर्म किसी तलवार या बंदूक की नोक पर नही फैला है. हिंदू धर्म का त्याग करने वाले अन्य धर्मों को अपनाने वाले लोगों को हिंदु धर्म में जानवरों से भी बदतर स्थिति में रहना पड़ता था . और इससे तंग आकर उन्होंने अन्य धर्मो को अपनाया है ” और इसिलिये हिंदू धर्म की उच – निच व्यवस्था जिसे चातुर्वर्ण कहा जाता है. इसे देख कर बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा है कि” “हिंदू धर्म एक चार मंजिल की ईमारत है, जिसमें सिढिया नहीं है. उपरका उपर निचे का निचेही हजारो सालों से लगातार रह रहे हैं. जिनके भितर आवागमन नहीं होने के वजह से दूरी बनी हुई है. और सड़ांध पैदा हो गई है. “और उसे आर एस एस दूर करने के लिए समता के जगह समरसता मतलब तुम जहा पर भी हो वही रहते हुए समरस हो जाओ. बराबरी की बात नहीं करना. संत तुकाराम ने मराठी मे कहा है “ठेविले अनंते तैसेची रहावे, चित्ती असू द्यावे समाधान ” इस लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समरसता मंच की स्थापना की है. लेकिन इस समरसता मंच ने देश मे आए दिन दलितों के साथ हो रहे अत्याचारों पर कभी भी कोई भी कृती कार्यक्रम तो दूर की बात है. लेकिन कोई प्रतिक्रिया तक व्यक्त नहीं की है. और आज भी मोहन भागवत कह रहे हैं कि आर एस एस उच – निच नहीं मानता है. लेकिन हिंदु धर्म छोड़कर गए लोगों के खिलाफ द्वेष फैला कर उन्हें दंगो मे हत्या करने से लेकर आए दिन कुछ ना कुछ खुराफात करते हुए उन्हें सताने के कामों में 100 सालों से लगे हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आदि क्षेत्रों की दलितों के साथ हो रहे अत्याचारों की घटनाओं को देखते हुए लगता है, कि स्वामी विवेकानंद के कहने के अनुसार कि समस्त भारतीय भूमि पर अगर किसी ने इस्लाम या ख्रिश्चन धर्म का स्विकार किया है तो सिर्फ और सिर्फ हिंदु धर्म की विषमतावादी व्यवस्था के कारण.और यह बात स्वामी विवेकानंदजी ने डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी के सौ साल पहले कहने के बावजूद विवेकानंद जी का राजनीतिक लाभ उठाने वाले हिंदुत्ववादीयो को हिंदु धर्म मे सुधार करना छोड़ कर, बेशर्मी से मनुस्मृति का महिमामंडन करते हूऐ, हिंदु धर्म से जातीय भेदभाव के कारण छोडकर गये लोगों के उपर आतंकवादी हमले करने से क्या वह वापस हिंदु धर्म में आ जायेंगे ? और आए तो उन्हे कौन सी जाती मे रखेंगे ?


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज 2025 में शताब्दी का जश्न मना रहा है . उन्हें लगता होगा कि हमने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना को सौ साल होने के पहले ही भारत की सत्ता पर कब्जा कर लिया है. मतलब हमें बदलने की जरूरत नहीं है . क्योंकि हमे लोगों की मान्यता प्राप्त है. लेकिन यह आत्मघाती विचार है. क्योंकि भारतीय संसदीय जनतंत्र में सिर्फ तकनीकी खुराफात करते हूए विजय प्राप्त करना यही एकमात्र पैमाना नहीं है. क्योंकि चुनावों को चालाकी से चुनाव आयोग को अपने कब्जे में लेने बाद जीता हुआ जुआ है. जैसे महाभारत में कौरवों ने पांडवों को चालाकी से दूत में हराया था. बिल्कुल वैसे ही वर्तमान समय में भाजपा भारत पर कब्जा करने का षडयंत्र करते जा रहा है.


इस तिकड़म बाजी को हमेशा के लिये लोगों की मान्यता मानने की भूल बंगाल में 35 सालों से ज्यादा समय राज्य में रही, कम्युनिस्ट पार्टी ने की है. और देश के अन्य क्षेत्रों में 140 साल पुरानी कांग्रेस ने भी यही गलती की है. भारत जैसे बहुआयामी संस्कृति के देश को एक रंग में ढालने का प्रयास भारत के अमिबा के जैसे टुकड़े करने मे परिवर्तित हो सकता है. मैंने दो बार पाकिस्तान की यात्रा लाहोर से क्वेट्टा से होते हूऐ इराण मे प्रवेश करते हूऐ झायेदान से बाय रोड प्रवास कीया है. इसलिए अपने आंखों से मैंने पाकिस्तान की स्थिति देखकर यह मजमून लेख लिख रहा हूँ. अठहत्तर साल के पस्चात पाकिस्तान इस्लाम धर्म के नाम पर भारत से अलग बनाने के बावजूद आज पाकिस्तानमे पंजाबी, सिंधी, बलुच, पख्तुनवा, स्वात तथा अन्य प्रादेशिक भाषा तथा सांस्कृतिक मसले सर चढकर बोल रहे है. मतलब पाकिस्तान के धर्म के आधार पर अलग होने के बावजूद सभी मुस्लिम समुदाय के रहने वाले अपने पहचान की तलाश कर रहे हैं. बलुचिस्तान तो सौ साल से पहले ही स्वतंत्र बलुचिस्तान की मांग कर रहां हैं. और उसमे इराण तथा अफगाणिस्तान के सिमावर्ति इलाकों के बलुच भी शामिल है. वही आलम खैबर पख्तूनों का चल रहा है. और इस्लाम धर्म के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण होने के पच्चीस साल के भीतर भाषा के आधार पर बंगला देश नाम का एक अलग देश बन गया है. इस बात को आज 54 वर्ष हो गए हैं. क्या हिंदु धर्म के आधार पर सौ साल पहले से ही राजनीति करने वाले लोगों को इन सभी बाते दिखाई नहीं दे रही है ? वह आग के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. आज राम के नाम पर या और कुछ भावनाओं को हवा देकर कुछ दिन और तथाकथित कामयाबी हासिल कर लेंगे. लेकिन अखंड भारत का क्या ? आए दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की बहुआयामी संस्कृति को नष्ट करने की कृती कीए जा रहा है. इन हिंदूत्ववादीयो के भारत को सिर्फ हिंदू राष्ट्र बनाने के जूनून को लेकर डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने आज से अस्सी साल पहले ही चेतावनी दी थी की “भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने वाले लोगों को मै चेतावनी देता हूँ कि अगर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाया गया तो भारत के टुकड़े – टुकड़े हो जायेंगे. क्योंकि इतनी विविधता वाला देश दुनिया में कहीं भी नहीं है.” यह भारत को सिर्फ हिंदू राष्ट्र बनाने वाले आर एस एस के लोगों को चेतावनी देने वाले डॉ. बाबा साहब अंबेडकरजी के 69 वे महानिर्वाण दिवस पर विनम्र अभिवादन.

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