सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं हो सकता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं बताया की नागरिकता का प्रमाण पत्र क्या होगा क्योंकि भारत में किस संस्था के पास अधिकार है कि वह नागरिकता का प्रमाण पत्र जारी करे? किसी को नहीं पता, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को जल्दी से जल्दी यह बताना चाहिए की नागरिकता का प्रमाण पत्र क्या माना जाएगा,। अभी तक आधार कार्ड बनाने के ऊपर लाखो करोड रुपए खर्च हुए और सालों का समय लगा। बैंक से लेकर के सिम कार्ड लेने तक आधार कार्ड मांगा जा रहा है। पासपोर्ट इस देश के बहुत कम लोगों के पास है। वोटर आईडी कार्ड लगभग सबके पास है। तब क्या यह माना जाए की वोटर आईडी कार्ड जिसके पास है वह भारत का नागरिक है?
इसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय खामोश है मैंने संपादकीय लिखने से पहले पता करने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट किस संस्था को अधिकार दे रही है कि वह किसी व्यक्ति की नागरिकता सुनिश्चित करें कि यह भारतीय नागरिक है या नहीं है। क्या चुनाव आयोग यह फैसला करेगा जो एस आइ पी के नाम से बिहार में एक नई ड्राइव चल रहा है जिसमें वह अवैध लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा रहा है ।और मांग यह हो रही है लगभग सभी भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री मांग कर रहे हैं कि यह अभियान सारे देश में चलना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय की खामोशी देश में एक नई तरह की चिंता पैदा कर रही है।

मैं याद दिला दूं जब श्री नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और श्री अरुण जेटली भारतीय जनता पार्टी के नेता थे तब इन दोनों ने आधार कार्ड का का विरोध किया था। आधार कार्ड यूपीए सरकार के निर्णय के आधार पर सारे देश में बनाना शुरू हुआ था और श्री नंदन नीलकानी को इसका मुखिया बनाए गए थे। जब 2014 में मोदी सरकार आई तो यह माना जा रहा था की आधार कार्ड निर्माण की प्रक्रिया तत्काल रोक दी जाएगी। लेकिन नंदन नीलकानी श्री अरुण जेटली से मिले और रहस्य में ढंग से अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री की अनुमति लेकर आधार कार्ड बनाने का समर्थन कर दिया और नंदन नीलकानी को ही आधार कार्ड बनाने की समिति का मुखिया बना रहने दिया। नंदन नीलकानी ने देश में जो भी मिला , जैसी भी संस्था मिली, जैसा भी संगठन मिला, उसे आधार कार्ड बनाने का जिम्मा सौंप दिया। इन कंपनियों ने आधार कार्ड बनाने वालों से भी पैसा वसूला और सरकार से भी पैसा वसूला। नंदन नीलकानी की संपत्ति की कभी जांच नहीं हुई की आधार कार्ड प्रक्रिया शुरू करने से पहले उनकी संपत्ति क्या थी और आज संपत्ति क्या है।
अब सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला आया है। अब एक नई संस्था बनाई जाएगी, इसका एक नया मुखिया होगा जो नागरिकता प्रमाण पत्र का कार्ड जारी करेगा। इसमें फिर कई लाख करोड रुपए खर्च होंगे, और नागरिकता प्रमाण पत्र की प्रक्रिया होने पर हम पाएंगे कि हमारे देश की जनसंख्या में जिसका जिक्र अक्सर प्रधानमंत्री जी करते हैं कि 140 करोड़ के देश के वह प्रधानमंत्री हैं, सचमुच देश के नागरिक 100 करोड़ के आसपास ही हैं । एक जानकारी यह भी मिली है कि जिस परिवार के पास, उसके पिता, माता, उसके दादा-दादी का प्रमाण पत्र नहीं है कि वह भारत में कब से रह रहा है, उसकी नागरिकता आज संदिग्ध मानी जा रही है। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के 80% लोगों के पास उनके माता-पिता, या उनके दादा-दादी का जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। उसको बनाने के लिए नगर पालिकाओं को और ग्राम पंचायत को शायद अधिकृत किया जाएगा, और यहां से देश में भ्रष्टाचार की एक नई गंगा बहने लगेगी।

सुप्रीम कोर्ट देश के चुनाव आयोग से क्यों सवाल नहीं करता, कि उसने जितने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव कराए हैं वह जी मतदाता सूची के आधार पर कराए हैं उसे तो स्वयं चुनाव आयोग ने बनाया, घर-घर जाकर सर्वे किया गया, जिसे भी मतदाता सूची में शामिल किया गया जांच की गई, उसके प्रमाण पत्र लिए गए, और अब कैसे चुनाव आयोग का रहा है की बहुत सारे अवैध लोग मतदाता सूची में आ गए हैं। इसका मतलब अगर कहीं भ्रष्टाचार है तो चुनाव आयोग की पूरी प्रक्रिया में है। और इसे देखने में सर्वोच्च न्यायालय क्यों अपनी आंख बंद किए हुए हैं।
या फिर सर्वोच्च न्यायालय यह कहना चाहता है की एक नई संस्था बने नया सर्वे हो लोगों के घर-घर जाकर के उनके जमीन के कागजात और पंचायत में उनका रजिस्ट्रेशन देखा जाए और उनके लिए नागरिकता का एक नया कार्ड बनाया जाए। ऐसी स्थिति में देश के मजदूरों का क्या होगा जिनका कोई जमीन का प्रमाण पत्र नहीं है, जिनके पास उनके माता-पिता या दादा का ,कि वे भारत में ही रहे हैं, किसी तरह का प्रमाण पत्र नहीं है, और फिर एक बड़ी संख्या अपने देश में पेट पालने के लिए अपना घर छोड़कर दूसरे जिले में दूसरे प्रदेश में जाते हैं वह क्या इस नए सर्वे में शामिल होने के लिए अपने गांव या अपने शहर आएगे, क्योंकि इसमें पूरे परिवार के आने-जाने में 15 से ₹20 हजार खर्च होंगे जिसे शायद बहुत सारे परिवार करना नहीं चाहेंगे। इसका मतलब वह देश के नागरिक नहीं होंगे।
और सबसे बड़ा सवाल जिसका सुप्रीम कोर्ट उत्तर नहीं दे रहा है, कि पिछली लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव तो अवैध नहीं है, आने वाले बिहार सहित देश के विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव इसमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है और 2029 में लोकसभा का चुनाव भी होना है, वह किसी मतदाता सूची के आधार पर होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है की बिहार से ही सारे देश में जैसे भी सूची चुनाव आयोग के प्रकाशित करेगा वही सूची मान्य होगी। उसने मतदाता सूची को लेकर जनता की आपत्तियों को या मतदाताओं की आपत्तियों को सुनने से इनकार कर दिया है।
इसका एक दूसरा गुप्त अर्थ यह भी निकलता है कि देश के आने वाले सारे चुनाव विशेष कर लोकसभा का चुनाव, आने वाले कई सालों तक स्थगित हो जाएं और जब देश में नया सर्वे हो जाने, की प्रक्रिया पूरी हो जाए, चुनाव आयोग नई सूची तैयार कर ले, नए वोटर आईडी कार्ड लोगों के पास तक पहुंचा दे, तब तक सारे चुनाव स्थगित कर दिए जाएं। इसका अंतिम अर्थ यह भी निकाला जा सकता है की नया बना वोटर आईडी कार्ड ही नागरिकता का आखिरी प्रमाण पत्र होगा। देश के समाचार चैनल देश के अखबार इस सवाल के ऊपर खामोश है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह इन सवालों के ऊपर देश की शंकाओं का समाधान करें। अगर वह शंकाओं का समाधान नहीं करता तो वह अपनी साख के ऊपर एक बड़ा सवालिया निशान स्वयं लगा रहा है।
मैं यह साफ कर दूं कि अभी भी देश के बहुत सारे लोगों का भरोसा सर्वोच्च न्यायालय के ऊपर है और वह टकटकी लगाकर सर्वोच्च न्यायालय की तरफ इन सवालों का उत्तर पाने के लिए देख रहे हैं। क्या सर्वोच्च न्यायालय अपने आंख और कान थोड़ी देर तक खोलकर देश में व्याप्त शंकाओं का निराकरण करेगा??
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