कार्ल मार्क्स ने समाजवादी क्रांति के होने की संभावना के बारे में लिखा है कि “समाजवादी क्रांति तभी संभव हो सकती है कि जब संपूर्ण विश्व में पुंजीवाद का विकास चरमसीमा पर चला जायेगा .” आज तो लग रहा है कि वर्तमान देश- दुनिया का पूंजीवाद सर चढकर बोल रहा है. जिसमें किसी समय मे संपूर्ण विश्व समाजवाद के मर्गदर्शक बने हुए देश, सोवियत रूस और चीन भी आज दुनिया कि पूंजीवाद की स्पर्धा में जिस तेज गति से अग्रसर होकर चल रहे हैं, और अपने खुद के घर के ही मजदूरो का जो शोषण कर रहे हैं, वह पहले से ही पूंजीवादी देशो को भी मात दे रहे हैं. मानवाधिकार से लेकर जिन मजदूर-किसानो की मदद से वहाकी समाजवादी क्रांतिया आजसे रशियामे 108 साल पहले और चीन मे 77 साल पहले हूई थी. लेकिन आज उन दोनो देशो की वर्तमान स्थिति में सचमुच कभी समाजवादी क्रांति हुई थी क्या यह संशय की स्थिति लग रही है. हालांकि तिएनमेन चौक पर अभी भी लाल झंडा फहराया जा रहा है और चीनी समाजवादी क्रांति के दिन बहुत विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया गया रहा है.
मै फिलहाल काफी समय के बाद अपने घरमे 2 साल से भी अधिक समय से मैडम खैरनार की तबीयत के कारण घरपर ही रहता हूँ. तो खाली समय में मेरी व्यक्तिगत लायब्रारीमे पूरानी किताबे मुख्यतः कलकत्ता के 15 साल के वास्तव्य में कॉलेज स्ट्रीट के फुटपाथ और कुछ बुक फेयर से ले कर रखी हुई है. सभीको पुरा पढना हूआ नहीं है. इसलिये जब भी कभी फुरसत मिलती है, तो मैं उन्हें उलट- पुलट करते रहता हूँ. इसी क्रममे कमुनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का एन. इ. बालाराम नामके एक मलियाली लेखक की छोटीसी 100 से भी कम पन्नोकी किताब हाथमे आतेही मै उसे एक साथ पढ़ने के बाद, यह मजमून लिखने की कोशिश कर रहा हूँ.


पहली बार 1912 मे भारतीय भूमि पर मार्क्सवादी स्वदेशभीमाणी रामकृष्ण पिल्लई ने कार्ल मार्क्स की जीवनी लिखी. लेकिन तब तक मार्क्सवादी विचार को लेकर कोई राजनैतिक हलचल नहीं हो रहा थी. 1921 में यंग नैशनलिस्ट और मजदूरों के बीच काम करने वाले मुझफ्फर अहमद कलकत्ता मे ,मुम्बई में एस. ए. डांगे,लाहौर में गुलाम हुसेन 1923 मे कूछ प्रयास कर रहे थे. वो लोग कुछ पत्रिकाओं को भी नीकाल रहे थे. कलकत्तासे नवयुग,मुम्बई से सोशलिस्ट और लाहौर से इन्क़लाब गुलाम हुसेन नीकाल रहे थे.
कमुनिस्ट मेंनिफास्टो बँगला और मराठी में 1921मे छप चुका था. 1923 मे यह गतिविधि मद्रास के अलावा विदेशोमे भी एम एन रॉय ने कुछ प्रयास करने की कोशिश की है. अफगानिस्तान,जर्मनी और रशियामे एम. एन. रॉय खुद लगे हुए थे. 1911से 1922 तक भारत के औद्योगिक शहरोंमे मुख्यतः मुम्बई,कलकत्ता,कानपुर,अहमदाबाद,मद्रास के मजदूरों में अच्छी-खासी साख बनने के बाद, लगभग सवा लाख मजदूरों ने हड़तालोमे 1918 मे भाग लिया. इसीतरह 1920,1921के दौरान कल – कारखानों मे हड़ताल उदाहरण के लिए जमशेदपुर के लोहे के कारख़ानों,जबलपुर में रेलवे, अहमदाबाद के कपडे के कारखानमे और इसके परिणामस्वरूप 1920 मे अखिल भारतीय मजदूर कॉंन्ग्रेस का जन्म हुआ है. ( AITUC) भारत में कमुनिस्ट पार्टी के पांच साल पहले कमुनिस्ट मजदूरों के संगठन का जन्म हुआ है.


1919 मे रौलट ऐक्ट के खिलाफ जो प्रतिवाद हूआ, उसीके जवाब में जलियावाला बाग हत्याकांड, उसी समय खिलाफत मुहमेंट, तथा किसानों के आंन्दोलन परवान पर चल रहे थे. 1922 की बार्डोली कॉन्ग्रेसकी वर्किंग कमेटी की फरवरी बैठक में अचानक गाँधी जी की सलाहपर चौरीचौरा काण्ड के फलस्वरुप सिवीलनाफरनामिके आंन्दोलन को स्थगित करने का एलान कर दिया गया. इस घोषणा के बाद मोतीलाल नेहरू,सी. आर. दास,लाला लाजपत राय और जवाहरलाल नेहरु ने भी गाँधी जी के निर्णय की आलोचना की है.


इसी परिप्रेक्ष्य के कम्युनिस्ट ग्रुप वजुद में आने की प्रक्रिया तेज हो गई. वैसे 1913 को गदर पार्टी बन चुकी थी. बंगाल क्राँतिकारी पार्टी भी . इन सब गुटों के बीच मुजफ्फर अहमद और प्रमुखतः एम. एन. रॉय कम्युनिस्ट इंन्टरनेशनल के लिए जो खुद कम्यूनिस्ट इंन्टरनेशनल के 1924 से 1929 तक एक्जिकुटीव्ह के सद्स्य थे. 1929 मे उन्हे एशियन राष्ट्रों मे चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर उनके और लेनिन के मतभेदों की वजह से एम एन रॉय को कम्युनिस्ट इंटरनॅशनल से निष्कासित कर दिया.


1924 मे कानपुर षड्यंत्र केस में काफी कम्युनिस्ट नेताओं को पकड़ा गया. जिसमे डांगे,मुजफ्फर अहमद और अन्य साथियों को जेल भेज दिया. इसलिये पार्टी का वजूद में आना थोडा समय के लिए रुक गया. लेकिन सालभर के भीतर ही 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में एक सम्मलेन में कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना का एलान कर दिया. जनवरी 1926 से कार्य करना शुरु कर दिया. जिसमे एस. वी. घटाटे,मुजफ्फर अहमद,सिंगरवेलू चेट्टियार,हजरत मोहानि,जानकी प्रसाद,निमकर और जोगलेकर पार्टी के पहले सेक्रेटरी एस. वी घटाटे. 1929 तक रहे. यह है भारत की पहली कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना का संक्षिप्त इतिहास.
जनयुद्ध और भारत छोड़ो


लेकिन द्वितिय विश्वयुद्ध ( 1939- 45) को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका काफी जटिल और बदलने वाली रही है. पहले इस युद्ध को साम्राज्यवादी युध्द बोलना. क्योंकि रशियन कम्यूनिस्ट पार्टी और जर्मनी के बीच ( (नॉन – एग्रेशन पॅक्ट) , मालोटोव और रिबेंट्रप के बीच में होने के कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस युद्ध को पहले साम्राज्यवादी बोला था. और उसके बाद जून 1941 मे जर्मन सेना ने रशिया के उपर (आँपरेशन बारबारोसा) युद्ध शुरू कर दिया तो. रशिया ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध में शामिल होने के निर्णय लेने के बाद, क्योंकि रशिया अब फासिस्ट जर्मनी के खिलाफ हो गया. इस बदले हूऐ घटनाक्रम के वजह से पहले युध्द के खिलाफ और बाद मे युध्द के तरफ के निर्णय लेने की वजह से, भारत में ब्रिटिश शासन के युद्ध के मदद के लिए चल रहे प्रयासों का समर्थन करने के चक्कर में फंसकर 1942 के महात्मा गाँधी द्वारा घोषित भारत छोड़ो आंन्दोलन के खिलाफ जाते हूऐ, पार्टी का मानना था कि फासीवादी जर्मनी को हराना पार्टी की प्राथमिकता है. और ब्रिटिश युध्द प्रयास को कमजोर करना फासिस्ट ताकदो को मदद करना हो सकता है. इस अचानक बदले हूऐ निर्णय ने पार्टी 42 के भारत छोड़ो आंदोलन से अलग – थलग पड गई. और उसे अंग्रेजों के दलाल के रूप में बदनामी झेलना पडा. जिस कारण कम्युनिस्टों की विश्वसनीयता को गहरी चोट लगी. इसलिए स्थापना के बाद बीस सालों के भितर ही भारत विरोधी ठप्पा जो लगा उसे दूर करने के लिए थोडी शुरुआत हुई ही थी. फिर 20 साल के भितर 1962 मे चीनने भारत पर जो आक्रमण किया था. उस आक्रमण का समर्थन करते हूए उसे भारत में पुंजीवाद तथा सामंतवाद से मुक्तिदाता कहनेकी इतिहास की सबसे बड़ी भूल कर बैठे. और उसके ही कारण पहलीबार पार्टी के दो धडे हो गये, सीपीआई और सीपीएम, लेकिन जो नूकसान होना था वह हूआ. जनता में देश विरोधी पार्टी की छविको फिर दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे थे. और फिर पंद्रह साल के भितर 1974 में बिहार मे युवाओं द्वारा शुरू किया गया जेपी के नेतृत्व के आंदोलन को सी. आई. ए. की साजिश बोलते हूऐ, सिर्फ उससे अलग ही नहीं रहे, उल्टा कॉंग्रेसियो के साथ मिलकर पूरे देश में उस आंदोलन के खिलाफ प्रचार- प्रसार करने में अहम भूमिका निभाई है. कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना के पचास वर्ष के भीतर ही तीन ऐतिहासिक गलतियों से कम्युनिस्ट पार्टी उभर नहीं पाई यह वास्तव है. हालांकि कम्युनिस्ट पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता बहुत ही इमानदारीसे अच्छा काम करते हुए, भारत में उनके त्याग और तपस्या के तुलना में उनको राजनैतिक मान्यता जनता में थोडा बंगाल,केरल और त्रिपुरा के अपवादों को छोड़कर नहीं है. लेकिन सैध्दांतिक स्तर पर पूंजीवाद का विरोध करने वाली पार्टी को आज बंगाल,त्रिपुरा (शिल्पायन तो होते ही होबे) इस नारे को लेकर अपना जनाधार गवाकर अब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कोशिश करनी पड़ रही है . केरल में भी कब तक रहेगी यह भी सवाल सवाल उठ रहा है. क्योंकि केरल में आएसएस शिद्दत से लगा हुआ है और उसकी राजनीतिक ईकाई भाजपा के दो सांसदों को केरल सांसद बनने मे कामयाबी हासिल हुई है.

आज घोर सांप्रदायिक आर एस एस अपने स्थापना की शताब्दी को जोरशोर से मना रहा है. जो 1925 के दशहरे के दिन नागपुर में पांच सदस्यों की उपस्थिति में हिंदूओं का संघठन करने के लिए की गई थी . आज वह एक करोड़ से अधिक संख्या में कटिबद्ध स्वयंसेवक और भारत के सभी राज्यों में 86000 से अधिक शाखाओं के साथ विश्व का सबसे बड़ा संघठन के रूप में अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है. और सर्वहारा,तथा सोशित,पीडित,किसान,मजदूरों के लिए सतत काम करने वाली सेक्युलर कम्युनिस्ट पार्टियों को आज यह दिन क्यो देखना पड रहा है ?


1925 के बाद स्थापित कम्युनिस्ट पार्टी की यह तीन गल्तियों का खामियाजा आज भी भुगतना पड़ रहा है. इससे सबक लेकर आगे बढ़ने की शुरुआत की थी. और इसिलिए 1977 में पस्चीम बंगालमे सरकार बनाने का मौका मिला था. ओपरेशन बर्गा (जमीन सुधार) करकेही 34 साल लगातार राज किया. लेकिन नंदीग्राम और सिंन्गुर जैसे उसी आँपरेशन बर्गा के द्वारा मिलीं हुई जमीन को किसानों से जोर-जबरदस्ती से लेकर औद्योगिक कारखानो को लिए देने के खिलाफ किसानों के आंदोलन की वजह से, आज बंगाल से 2011 के बाद से 34 साल लगातार सत्तामे रही लेफ्ट फ्रंट सिर्फ सत्ता से ही नहीं हटाई गई, आज बंगाल विधानसभा मे किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी का एक भी सदस्य नही है. जो अबतक की चवथी बडी भूल हुई है. लेकिन भूल करना और उससे कुछ भी नहीं सीखने की बीमारी से पीड़ित पार्टी भूलसुधार के उपर काफी लंबी बहस के उपरांत लंबेचौडे दस्तावेजों को अमलीजामा क्यों नहीं पहनाती यह सबसे बड़ी पहेली है. आब दुबारा कम्युनिस्ट पार्टी इस देश में कब उभरती है ? यह तो आने वाला समय ही बताएगा. हालांकि कार्ल मार्क्स की भविष्यवाणी के अनुसार पूंजीवाद चरमसीमा पर पहुंचाने के लिए भारत में 1925 के दशहरे के दिन स्थापित आर एस एस और उसकी राजनीतिक ईकाई भारतीय जनता पार्टी बदस्तूर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करते हूऐ पूंजीपतियों की मदद करते हूऐ, उन्हीं पूंजीपतियों के पैसे से आज 11 सालों से लगातार सत्ताधारी पार्टी बनीं हुई है. इस परिप्रेक्ष्य में मुझे सभी समाजवादी पार्टीयो की वर्तमान हालात के बारे में यह लिखने की प्रेरणा हुई है. जिसमें मुझे किसी भी साथी का अपमान करना या मन दुखानेका बिलकुल इरादा नहीं है. लेकिन फिर भी किसी साथी को ऐसा लगा हो तो मैं माफी चाहता हूँ. क्योंकि वर्तमान समय में हमारी सबसे बड़ी समस्या सांम्प्रदायिक शक्तियों को निकाल बाहर करने के लिये गोलबंद होने की है. नाही एक दूसरे को नीचा दिखाने की. सभी साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन के साथ.

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