संवेदनशील होना किसी भी सरकार के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है. लोकतांत्रिक देशों के लिए ख़ासकर भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए तो यह परम आवश्यक है. कुछ महीनों पहले हमने देखा कि हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में वहां की तत्कालीन मुशर्रफ सरकार ने लोगों की आवाज़ नहीं सुनी. परिणामस्वरूप वकीलों ने वहां आंदोलन खड़ा कर दिया, जिसका ज़बरदस्त समर्थन वहां की जनता ने किया. पाकिस्तान का यह पहला बड़ा जनांदोलन था जिसकी वजह से मुशर्रफ को जाना पड़ा. इतना ही नहीं वक़ीलों ने फिर ज़बरदस्त जनांदोलन किया जिसे जमता ने फिर समर्थन दिया तथा बर्ख़ास्त जजों को वहां की नई सरकार को पुनः बहाल करना पड़ा.
ऐसे आंदोलनों का इतिहास भारत में रहा है जिसकी वजह से हमें आज़ादी मिली. समाजवादियों ने डॉ. लोहिया के नेतृत्व में सफल आंदोलन किए, छात्र आंदोलन हुए और आख़िरी आंदोलन, जयप्रकाश आंदोलन हुआ. जहां सरकारों ने पीड़ितों की आवाज़ सुनी वहां उसने मांगें मान शासन किया और जहां नहीं सुनी, वहां उसे जाना पड़ा. लेकिन पिछले बीस सालों से जनता के दुख और उसकी तकली़फों को न सुनना और न देखना बढ़ता जा रहा है.
हमारे देश में समस्याएं दिनों दिन बढ़ रही हैं और लोगों का भरोसा टूटता जा रहा है. वे जब अपनी तकली़फें लेकर जाते हैं तो सरकारी नुमाइंदे अपने कान बंद कर लेते हैं, बस हाथ आगे बढ़ा देते हैं. लोग सामूहिक तौर पर चंदा कर के भी अब घूस देने लगे हैं. नहर का पानी खेतों की सिंचाई के लिए चाहिए तो घूस देनी पड़ती है. अगर रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम चाहिए तो घूस देनी पड़ती है. अगर अपनी मेहनत की कमाई किसी सरकारी महकमे से लेनी हो तो घूस देनी पड़ती है. किसानों को बीज, खाद, पानी और उसके बाद भी फसल की क़ीमत का न मिल पाना, उनके बीच का असंतोष बढ़ा रहा है.
देश में पीने के पानी का संकट बढ़ रहा है,अमीर बस्तियों में रहने वाले टैंकर से ख़रीद कर पानी पी लेते हैं लेकिन ग़रीब पीने के पानी के लिए आपस में लड़ मर रहे हैं. बीमार पड़ने पर अस्पताल हैं ही नहीं, क्योंकि अस्पतालों में न डॉक्टर हैं और न दवाएं. महंगे प्राइवेट अस्पतालों में आम आदमी जा नहीं सकता. शिक्षा में उसकी रूचि है लेकिन स्कूलों का ताना बाना टूट चुका है. बच्चे स़िर्फ अपना व़क्त बर्बाद करने स्कूल जाते हैं और ज़्यादातर पांचवी या आठवीं क्लास से पढ़ाई छोड़ देते हैं.
हमारा तंत्र इन समस्याओं को जानता है लेकिन उन्हें हल करना नहीं चाहता. सत्ता में रहने वालों को स़िर्फ तीन या पांच साल के बारे में नहीं सोचना चाहिए. अगर वे अगले बीस या पचास साल के बारे में नहीं सोचते तो हमें मानना चाहिए कि उनके सामने देश का कोई ऩक्शा है ही नहीं, इसीलिए आज देश के हालात बिगड़ते दिखाई देते हैं.
लालगढ़ एक उदाहरण है जहां सरकार, उसकी पुलिस और विशेष पुलिस के ख़िला़फ आम जनता उठ खड़ी हुई. लगभग दो महीनों से ज़्यादा समय तक पूरे इलाक़े के संस्थानों पर हथियारबंद माओवादियों का क़ब्ज़ा रहा और सरकार नाम की चीज़ वहां से ग़ायब रही. जब सरकार ने अपनी पुलिस भेजी तो सैकड़ों गांव वाले, औरतों बच्चों सहित रास्ते में खड़े हो गए. रास्ते में पेड़ काट कर डाल दिए ताकि पुलिस के वाहन न पहुंच सकें. क्यों ऐसा हुआ या सोचना चाहिए कि क्यों ऐसा होता है?
ग़रीबों की तकली़फों को जब सरकारें अनसुनी कर देती हैं तो ग़रीब उनके साथ हो जाते हैं जो उनकी तकली़फों को भविष्य में दूर करने की आशा दिखाते हैं. ऐसे जिले देश भर में डेढ़ सौ के आस-पास हैं. इनकी संख्या बढ़ रही है और सरकार सो रही है. एक लालगढ़ के दो सौ गांवों को अपने क़ब्ज़े में लेने में सरकारी पुलिस को अभी तक कामयाबी नहीं मिली है. बारुदी सुरंगों को तलाशने में उसे अनपढ़ गांववालों को लगाना पड़ रहा है क्योंकि वे स्वयं मरना नहीं चाहते.
रेल छत्तीस घंटों तक लोगों के क़ब्ज़े में रहती है. पुलिस लाइन और जेल पर नक्सलियों का तीन से पांच दिनों तक क़ब्ज़ा रहता है. सरकार उन पर तभी नियंत्रण स्थापित कर पाती है जब नक्सली स्वयं अपना नियंत्रण हटा लेते हैं. कई जिलों में तो पुलिस स़िर्फ शहरों तक सीमित रहती है, आगे निकलती ही नहीं. क्योंकि उसने नक्सलियों से समझौता कर लिया है. कुछ पुलिस चौकियों के सिपाही तो अपनी चौकी में रहने के लिए नक्सलियों को हफ़्ता देते हैं.
सरकार अगर सोचती है कि जहां-जहां ऐसी स्थिति पैदा होगी, वह उसे क़ानून व्यवस्था के नाम पर संभाल लेगी, तो यह उसका भ्रम है. दरअसल देश के डेढ़ सौै से दो सौ जिलों में एक साथ लालगढ़ जैसे विद्रोह की तैयारी शुरू हो चुकी है. अगर यह विद्रोह सचमुच एक साथ प्रारंभ हुआ तो सरकार इसका सामना कैसे करेगी, अभी तक हमारी समझ में नहीं आ रहा. एक बात ज़रूर होगी और वह है नरसंहार, ग़रीबों की गोलियों से मौत, जिसकी प्रतिक्रिया की कल्पना भी हम आज नहीं कर सकते.
क्या शासन चलाने वाले लोग समस्याओं को सुनने और उनका हल निकालने का भरोसा आम लोगों को नहीं दिला सकते?  क्योंकि यही एक रास्ता है जो हमें संपादित उग्र हथियारबंद संघर्ष से बचा सकता है. इसके लिए आवश्यक है कि सरकार अपने सोचने के तरीक़े में बदलाव लाए और एक ज़िम्मेदार लोगों की ओर देखने वाली सरकार की तरह काम करें.
बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्टाचार ऐसे तत्व हैं जो जनता को निराशा की ओर ले जाते है. देश वैसे ही सीमाओं को लेकर चिंतित है. अगर तनाव सीमा पर बढ़ता है और देश का बड़ा हिस्सा आंतरिक तनाव की चपेट में आ जाता है, वो हमें एक भयानक स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए.
ये सवाल मीडिया से ग़ायब हो गए हैं इसलिए उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं मिल पाती जो सत्ता प्रतिष्ठान पर दबाव डाल सकते हैं. एक अजीब सी संवादहीनता और ख़तरनाक असंवेदनशीलता का फैलाव देश में हो रहा है. हमें तो अल्पसंख्यकों और दलितों के भीतर उबलते असंतोष का भी अंदाज़ा नहीं है. अगर ये वर्ग भी विद्रोह पर उतर आए तो अभी भी समय है कि सरकार अपना नज़रिया बदले, अपनी योजनाओं की दिशा बदले और आम लोगों की विशेष कर किसानों की तकली़फ पर ध्यान दे. नहीं तो लालगढ़ जैसी घटनाएं शहरों के भीतर कब शुरू हो जाएं कहा नहीं जा सकता.

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