आज़ादी के बाद भारत की विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है. भारत की विदेश नीति एक सतत विदेश नीति रही है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कहा जाने लगा था कि यूपीए सरकार के दौरान अर्थनीति से लेकर विदेश नीति तक में जो ठहराव आ गया था, उसमें मोदी आमूलचूल बदलाव करेंगे. हालांकि, नरेंद्र मोदी भी भारतीय विदेश नीति में व्यापक बदलाव को लेकर ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. लेकिन, वे पड़ोसी देशों से संबंध को लेकर ज्यादा उत्साहित हैं. किसी भी देश की विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और दूसरे देशों से बेहतर संबंधों की नीति पर आधारित होती है. अगर इस लिहाज से देखा जाए, तो मोदी सरकार की विदेश नीति सही राह पर चल रही है. इसकी वजह है कि यूपीए के कार्यकाल में भारत पर अपने पड़ोसी देशों की अनदेखी का आरोप अक्सर लगता रहा. कहा यह जाने लगा कि भारत सरकार अमेरिका की क़ीमत पर अपने पड़ोसियों की अनदेखी कर रहा है. नयी सरकार के आने के बाद काफी कुछ बदलता दिख रहा है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है हमारे विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का पहले विदेशी दौरे पर बांग्लादेश जाना. ग़ौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही सार्क देशों को निमंत्रण भेजकर यह संकेत दे दिया था कि भारत की विदेश नीति क्या होने वाली है. यानी भारत पहले अपने पड़ोसियों से संबंध को मजबूत करेगा. मोदी भी अपने पहले विदेशी दौरे पर भूटान गए. अब सुषमा स्वराज का बांग्लादेश जाना यह बतलाता है कि भारत की विदेश नीति में किसे कितनी प्राथमिकता मिलने वाली है.
श्रीलंका को लेकर भी मोदी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि पिछली सरकार की तरह तमिलनाडु का हस्तक्षेप श्रीलंका के साथ संबंधों को प्रभावित नहीं करेगा. नरेंद्र मोदी नौकरशाही के मुरीद रहे हैं और विदेश नीति को लेकर उनका अनुभव बेहद कम है. लेकिन, हर सरकार की अपनी कार्यशैली होती है. नतीजतन, नीतियों में थोड़ा-बहुत तो बदलाव ज़रूर होता है. भारत के साथ श्रीलंका के संबंधों की बात करें, तो मोदी की अगुवाई में भारत से उसके संबंध खट्टे-मीठे अनुभव वाले हो सकते हैं. व्यावहारिकता में देखें, तो अर्थव्यवस्था और एक-दूसरे को जोड़े रखने के मुद्दे पर संबंध मधुर हो सकते हैं, लेकिन दूसरी ओर कोलंबो के साथ अतीत की द्विपक्षीय वार्ता, जैसे श्रीलंकाई संविधान में तेरहवें संशोधन के मुद्दे पर संबंधों में कड़वाहट के रस देखने को मिलेंगे. ग़ौरतलब है कि दिल्ली और कोलंबो के बीच विदेश नीति का केंद्र बिंदु अभी तक तमिलनाडु रहा है. यह कहा जा सकता है कि साउथ ब्लॉक के बाबू मीठा पसंद करते हैं, तो तमिलनाडु के लोग मिर्च. लेकिन, 16वीं लोकसभा के नतीजों में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने के कारण तमिलनाडु का हस्तक्षेप पहले की अपेक्षा काफी कम होगा, क्योंकि भारत किसी एक राज्य की वजह से अपनी पड़ोसियों से संबंधों को ख़राब नहीं करना चाहेगा.
मोदी राष्ट्रवादी हैं और उनकी सोच से ज़ाहिर होता है कि वे एक मज़बूत भारत देखना चाहते हैं. ख़ासतौर पर दक्षिण एशियाई क्षेत्र में. नौकरशाही के प्रति उनका प्रेम और विदेश मामलों के प्रति उनकी अनभिज्ञता उन्हें साउथ ब्लॉक पर अधिक निर्भर बनाएगा. हालांकि, पिछली सरकारों में भी ऐसा ही होता था. नतीजतन, भारतीय विदेश नीति को समझने के लिए साउथ ब्लॉक के विभिन्न नए प्रभावी विभागों को समझने की जरूरत है. ऐसे में अजीत डोभाल एक बड़े नाम हैं. सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं और निश्चित तौर पर वह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी.
विदेश नीति में पड़ोसियों को वरीयता
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