
चलिये हमारे देश में गत कुछ समय से आसमानी और सुल्तानी संकटोकी झडी लगी हुई है लेकिन इसमें भी कोई लौंगी भुइया या उसी जिलेके दशरथ मांझी जैसे लोग अपनी अपनी धुन के कारण दशरथ मांझी ने 22 साल तक पहाड़ खोदकर 55 कीलोंमीटर का अंतर अपने गांव गहलौर और वजिरगंज की दूरी 15 किलोमीटर पर लाकर रख दी !
और वैसे ही लौंगी भुइया ने अकेले ही अपने गांव के पानी की समस्या को बदलने की ठानी और 30 साल की अथक मेहनत के बाद 5 कीलोंमीटर की नहर बना दिया और अब कोठीलावा गांव में पानी पहूंचा दिया है हम पुराणों में भगीरथ की कहानी तो होश आया तबसे सुनते आरहे है और इसीलिये ऐसे लोगों की मेहनत को भगीरथ प्रयत्न कहाँ करते हैं ! दशरथ मांझी और लौंगी भुइया यह आधुनिक भगीरथ हो गये हैं !
देश में कई-कई पुरस्कार से सम्मानित होने की होड मची हुई है और उसके पीछे की राजनीति भी अब छुपी नहीं है !

विलासराव देशमुख जब केंद्र सरकार के विज्ञान मंत्री पदपर आसीन थे तो उन्होंने मुझे दिल्ली में था देश दुनिया कि वर्तमान हालात पर बात करने हेतु अपने कार्यालय में कमसे कम दो ढाई घंटे से ज्यादा समय के लिए हम लोग बैठे थे (अण्णा हजारे जी का लोकपाल के लिए अनशन पर बैठे हुऐ थे ! तब की बात है !!)
तो उस समय एक महाशय फाइल लेकर आये और विलासराव जी के सामने रखी तो उसे देखकर विलासराव जी ने मुझे पुछा कि आप देश भर में घूम ते हो यह महाशय तो महाराष्ट्र के सांगली के है और अपने आप को बहुत बडे समाजसेवी कहते हैं और मैं मुख्यमंत्री था तबसे यह मुझे पद्मश्री पुरस्कार के लिए पिछे पडे हुए हैं ! अब आप बताइए कि आप इन्हें पहचानते हैं ? मैंने कहा कि मैं आज पहली बार आपके सामने इन्हे देख रहा हूँ ! तो विलासराव ने कहा कि अब आप मेरे सामने यह फाइल लेकर कभी नहीं आना !
वैसेही भारत के एक नोबेल पुरस्कार विजेता का मामला है दो दिन पहले ही स्वामी अग्निवेश जी अब हमारे बीच नहीं रहे हैं और उनके शिष्य जो बाद में उनसे अलग होकर बाल मजदूरी के खिलाफ काम करने लगे थे और नोबेल पुरस्कार कमेटी को पंद्रह साल से भी अधिक समय से लगातार अपना सिवी भेजते थे ! आखिर मे मलाला यूसुफ घई के साथ उन्हें भी नवाजा गया है !
और इस साल तो डोनाल्ड ट्रंप जैसे जाहिलियत की हदे पार करने वाले ऊल्लू को नोबेल शांति पुरस्कार का नाॅमिनेशन करने की खबर देख कर किसी भी पुरस्कार की कोई कीमत नहीं है !
मुख्य बात दशरथ मांझी और लौंगी भुइया यह आधुनिक भगीरथ हो गये हैं ! लेकिन अगर सरकार को सुशांत या कंगना राणावत जैसे चुनाव में काम आने वाले लगेंगे तो भारत रत्न सम्मान देने के लिए देर नहीं लगेगी !
खैर दशरथ मांझी और लौंगी भुइया ने किसी पुरस्कार से सम्मानित होने के लिए यह काम नहीं किया उन्होंने अपने गांव के पानी की और रास्ता बनाया है वह अपनी अपनी लगन के कारण !
लेकिन मुझे बार-बार लगता है कि एक 22 साल से पहाड़ खोद रहे थे और दुसरे 35 साल से दोनों के गांव वालों मेसे और कोई इन्हे मदद करने के लिए क्यों नहीं आये ?

आचार्य विनोबा भावे जी की 125 वीं जयंती के अवसर पर मै यह पोस्ट लिख रहा हूँ ! विनोबाजी के जीवन का मुख्य हिस्सा सामुदायिक शक्तियों को जगाने के लिए गया है ! और इसी गया के सर्वोदय संमेलन में जयप्रकाश नारायण जी ने अपने आपको जीवन दानी घोषित किया था !
और उसके बाद उन्होंने बिहार दान तक अपने अथक प्रयास से करा दिया था ! लेकिन यह सब पराक्रम एक तरफ और लौंगी भुइया, दशरथ मांझी ने अपने जीवन का मुख्य हिस्सा सामुदायिक काम को अंजाम देने में अपने आप को खपा दिया है !

अब उनके काम को मान्यता मिल रही है और मिलनी ही चाहिए ! क्योंकी वे इसके हकदार हैं ! लेकिन सामुदायिक अभिक्रम जगाने की बात विनोबाजी, जेपी और उनके गुरु महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत की आजादी की लड़ाई में सामुदायिक अभिक्रम जगाने की कोशिश करने वाले लोगों मे शीर्ष नेता थे लेकिन आज अगर देखते हुए दूर दूर तक नजर नहीं आता है !

जो कुछ करेंगे वह सरकार करेगी और सरकार भी चाहतीं हैं कि जनता हर बात के लिए उन्हें याद करे अन्यथा तो शासन मुक्त शोषण मुक्त भारत के सपने को साकार करने लग गयें तो फिर राजनीति-राजनीति ना रहते हुए गाँधी, विनोबा, जेपी के सपने की लोकनीति हो जाएगी ! जो हमारे देश का एक भी राजनीतिक दल नहीं चाहते हैं हा भगवान बनाकर उनके मूर्ती और फोटो अपने आफिस की दिवार से लेकर देश के हर छोटे बड़े शहरों के चौराहे पर जरूर लगा रहे हैं लेकिन उनके संदेश भूलकर !
डाॅ सुरेश खैरनार 15 सितम्बर 2020,नागपुर












