फ़िलिस्तीन का मुद्दा, आप भी मानेंगे, बहुत ही जटिल और उलझा हुआ है। जब अलग-अलग लोगों के अधिकार आपस में टकराते हैं, तो सही फ़ैसला करना आसान नहीं होता। यहूदियों के प्रति हमारी पूरी सहानुभूति होने के बावजूद, हमें यह भी मानना होगा कि इस मामले में अरबों के अधिकार और उनका भविष्य भी दांव पर है।
मैं साफ़ तौर पर कहना चाहता हूँ कि जैसे मुझे यहूदियों के प्रति गहरी सहानुभूति है, वैसे ही मुझे अरबों के लिए भी उतनी ही सहानुभूति महसूस होती है।
हकीकत यह है कि यह पूरा मुद्दा दोनों तरफ़ बहुत ज़्यादा भावनाओं और गहरे जुनून से भर चुका है। जब तक दोनों पक्षों में ऐसे लोग नहीं उभरते जो न्यायपूर्ण और सबको स्वीकार्य समाधान निकाल सकें, तब तक मुझे फिलहाल कोई असरदार हल दिखाई नहीं देता।
मैंने फ़िलिस्तीन की समस्या पर काफी ध्यान दिया है और दोनों पक्षों की ओर से लिखी गई किताबें और पुस्तिकाएँ पढ़ी हैं। फिर भी मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मुझे इस विषय की पूरी समझ है या कि मैं यह तय करने के काबिल हूँ कि आख़िर किया क्या जाना चाहिए। मैं यह ज़रूर जानता हूँ कि यहूदियों ने फ़िलिस्तीन में बहुत सराहनीय काम किया है और वहाँ के लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाया है।
लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है कि, इतनी उपलब्धियों के बावजूद वह अरबों का विश्वास और सद्भाव क्यों नहीं जीत पाए? वह अरबों को उनकी इच्छा के खिलाफ़ कुछ मांगें मानने के लिए मजबूर क्यों करना चाहते हैं?
मेरा यह भी मानना है कि इस पूरे संकट की सबसे बड़ी वजह फ़िलिस्तीन पर ब्रिटिश शासन का बना रहना रहा है। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि जब कोई तीसरी ताक़त हावी रहती है, तो बाकी पक्षों के लिए अपने मतभेद सुलझाना बेहद मुश्किल हो जाता है, भले ही उस तीसरे पक्ष की नीयत अच्छी ही क्यों न हो।
पंडित जवाहरलाल नेहरू, 11 जुलाई 1947
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