भारत में खेलों में लंबे समय से चल रहा कांस्य युग समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है. पिछले महीने ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में सोने की थोड़ी चमक दिखाई पड़ी थी, लेकिन वह चमक दक्षिण कोरिया के इंचियोन में संपन्न हुए एशियाई खेलों बरकरार नहीं रही. भारत ने एशियाई खेलों में 11 स्वर्ण पदकों सहित कुल 57 पदक जीते और पदक तालिका में छठवें स्थान पर रहा. यहां पर भी भारतीय खिलाड़ियों का बड़ी संख्या में कांस्य पदक जीतने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा. भारतीय खिलाड़ियों ने 37 कांस्य पदक जीते. ऐसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी तरह का पदक जीतना एक बड़ी उपलब्धि होती है. यह खिलाड़ी की सालों की मेहनत का नतीजा होती है. लेकिन ऐसे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से भारतीय खिलाड़ी ओलंपिक और एशियाई खेलों जैसे बड़े मंच पर छोटी-छोटी चूक कर बैठते हैं और उन्हें स्वर्ण की जगह रजत अथवा कांस्य पदक से संतोष करना पड़ता है. यही कहानी एक बार फिर 17 वें एशियाई खेलों दोहराई गई. हालांकि भारतीय खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन भारत की झोली में सबसे ज्यादा कांस्य पदक ही आए. अभिनव बिंद्रा, मेरी कॉम, जीतू रॉय, सानिया मिर्ज़ा, सौरभ घोषाल, योगोश्वर दत्त जैसे खिलाड़ियों ने देश को स्वर्णिम सफलता दिलाई. यह बड़े खेद का विषय है कि आजादी के 66 साल बाद भी भारत खेलों की दुनिया में कुछ गिने चुने खेलों में ही अपनी पकड़ बना पया है. कुछ गिने चुने खेलों या स्पर्धाओं में ही निश्चित रुप से भारतीय खिलाड़ियों से पदक की आशा की जाती है उनमें टेनिस, कुश्ती, बॉक्सिंग, शूटिंग, कबड्डी और हॉकी आदि शामिल हैं. इन एशियाई खेलों इस सूची में स्न्वैश और डिस्कस थ्रो का नाम भी जुड़ गया है.
वर्ष 2010 में चीन के ग्वांगजू में हुए एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने 14 स्वर्ण, 17 रजत और 34 कांस्य पदक सहित कुल 64 पदक अपने नाम किए थे. भारतीय खिलाड़ियों ने जितने पदक जीते थे उनमें से आधे से ज्यादा कांस्य पदक थे. वर्ष 2012 में लंदन ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों ने कुल 6 पदक जीते थे. जिनमें दो रजत और चार कांस्य पदक थे. पिछले महीने ग्लास्गो में संपन्न हुए एशियाई खेलों में 15 स्वर्ण, 30 रजत और 19 कांस्य पदक जीते थे. तब इस ट्रेंड में बदलाव के संकेत दिखाई दिए थे लेकिन एशियाई खेलों में भारत एक बार फिर उसी ढर्रे पर वापस आ गया. एशियाई खेलों के दौरान स्वर्ण पदकों के लिए जूझते रहे. बीच-बीच में सोने-चांदी की चमक दिखाई पड़ती लेकिन कांसे के नीचे वो पदक दबे रहे. आखिरी दौर में आते आते टेनिस, हॉकी, कबड्डी और एथलेटिक्स में खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और कुछ और स्वर्ण और रजत पदक भारत की झोली में डाल दिए.
ओलंपिक या एशियाई खेल जैसे किसी भी खेल आयोजन में एथलेटिक्स स्पर्धा में सबसे ज्यादा पदक दांव पर लगे होते हैं. इंचियोन एशियाई खेलों में 47 स्वर्ण पदक सहित कुल 141 पदकों को जीतने के लिए विभिन्न एशियाई देशों के खिलाड़ी एक दूसरे से भिड़े. लेकिन भारतीय खिलाड़ी मात्र 12 पदकों पर कब्जा कर सके जिनमें दो स्वर्ण, तीन रजत और सात कांस्य पदक शामिल हैं. एथलेटिक्स स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक सीमा पुनिया ने डिस्कस थ्रो में और 4 गुणा 400 रिले में महिलाओं ने दिलाया. एथलेटिक्स में महिलाएं पुरुषों से आगे रहीं और कुल आठ पदक जीते जिसमें एक स्वर्ण, दो रजत और पांच कांस्य पदक शामिल हैं. पुरुष खिलाड़ी एथलेटिक्स स्पर्धाओं केवल एक रजत और दो कांस्य सहित केवल तीन पदक जीत सके.
मोदी सरकार ने इस साल के केंद्रीय बजट में राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों की तैयारी के लिए फंड स्वीकृत किया था. ताकि खिलाड़ी इन खेलों की तैयारी कर सकें साथ ही जरूरत होने पर विदेशों में जाकर ट्रेनिंग ले सकें. लेकिन सरकार ने खिलाड़ियों के लिए जब घोषणा की तब तक बहुत देर हो चुकी थी. खिलाड़ी अंतिम दौर की तैयारी में जुटे हुए थे. खिलाड़ी राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने के लिए ग्लासगो जाने की तैयारी कर रहे थे. ऐसे में खिलाड़ियों को न तो पैसे मिल पाए और न ही फंड का सही उपयोग हो पाया. ऐसे में हम उनसे इन प्रतियोगिताओं में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन और स्वर्ण पदक की आशा कैसे करते हैं. फिलहाल जो भी खिलाड़ी पदक जीत रहे हैं, यह उनकी अपनी मेहनत, समर्पण, प्रतिभा और त्याग का फल है. ये खिलाड़ी परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए इस मुकाम तक पहुंचे हैं. यह बात जग जाहिर है कि भारतीय खिलाड़ियों के पास ट्रेनिंग की कमी है. खिलाड़ियों के पदक जीतने की राह में उच्च स्तरीय प्रशिक्षण की व्यवस्था न होना सबसे बड़ा रोड़ा है. दूसरे देशों में खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दिया जाता है. और भारतीय खिलाड़ियों को मूलभूत सुविधाओं के अभाव में खेलना होता है, ऐसे में देश की जनता उनसे विश्व स्तर पर श्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद लगाए रहती है. उस वक्त यह किसी को याद नहीं रहता कि बिना सुविधा के ये खिलाड़ी हर तरह से संपन्न देशों की टीमों से कैसे पार पाएंगे? और जब खिलाड़ी जूझते हुए परास्त होते हैं तो देश में हर जगह उनकी आलोचना शुरू हो जाती है. लेकिन कोई यह नहीं सोचता है कि आखिर ऐसी हालत क्यों है? यदि हमें कोई इमारत खड़ी करनी है तो इसके लिए सबसे पहले नींव मजबूत करनी होगी, यदि नींव ही कमजोर होगी तो निश्चित तौर इमारत कमजोर होगी.
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में खिलाड़ियों को वैसी सुविधाएं क्यों नहीं हासिल हैं जैसा कि विदेशों में है? ऐसा हमारे तरीकों में खामियों की वजह से ही होता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि जो पैसा खिलाड़ियों पर उनकी सफलता के बाद बरसाया जाता है, अगर उतना ही पैसा पहले ही खेलों के विकास पर लगाया जाए और खिलाड़ियों की सफलता के साथ-साथ कोचों और अकादमियों को भी पुरस्कृत किया जाए तो निश्चित तौर पर देश में खेलों की तस्वीर बदलेगी. देश में विकास का जो मॉडल पिछले दो-तीन दशकों में देश में गढ़ा गया है उनमें खेल को जगह नहीं मिली है. वहां खेलों को शामिल न करने का आधार पैैसे की कमी को नहीं माना जा सकता, यदि यह तर्क दिया जाता है तो वह निराधार है. हमारे यहां प्राथमिक स्कूलों में खेलों को बढ़ावा नहीं मिलता,जबकि खेल की स्कूलों में ही होती है, देश में अगर खेल संस्कृति का विकास करना है तो सरकार को अपनी नीतियों में मूलभूत और प्रभावी बदलाव लाना होगा. सुशील कुमार, एम सी मेरीकॉम जैसे कुछ गिने चुने खिलाड़ियों को छोड़ दें तो भारतीय खेल इतिहास में बहुत कम ही ऐसे खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने ओलंपिक या एशियाई खेल जैसे बड़े स्टेज पर अपने प्रदर्शन को
दोहराया या उसमें सुधार किया है और न ही उसे अगली किसी पीढ़ी के लिए मानक बनाकर पेश करने की कोशिश की है. मिल्खा सिंह, पी.टी. ऊषा, कर्णम मल्लेश्वरी, राज्यवर्धन सिंह राठौर और अभिनव बिंद्रा ही क्यों न हों? कोई भी अपनी सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों को बरकरार नहीं रख पाया. केवल पहलवान सुशील कुमार ही ऐसा कर पाने में कामयाब हुए हैं बीजिंग ओलंपिक में कांस्य और लंदन ओलंपिक में कुश्ती का रजत पदक जीता था. इसी वजह से कुश्ती में खिलाड़ियों की नई खेप भी आ रही है. सुशील युवा खिलाड़ियों के लिए आदर्श बन गए हैं. भारत में हर पहलवान अब सुशील कुमार बनने का सपना देखता है. इसी वजह से देश में योगेशवर दत्त, और नरसिंह यादव जैसे नए पहलवान सामने आ रहे हैं. हरियाणा सरकार ने प्रदेश में कुश्ती और बॉक्सिंग के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं. जिसका सीधा असर कुश्ती में भारत के प्रदर्शन में दिखाई दे रहा है. ऐसा अगर देश के हर राज्य में वहां की खेल प्रतिभाओं को देखकर होने लगे तो देश में खेलो की चाल, चरित्र और चेहरा पूरी तरह बदल जाएगा. ऐसा होने पर ही भारत खेलों के कांस्य युग का खात्मा हो पाएगा.
मिशन रियो : कब होगा भारत से कांस्य युग का खात्मा
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