इंदिरा गांधी को अटलबिहारी वाजपेयी ने दुर्गा कहा था

इस श्रृंखला के योजनान्तर्गत मुझे लिखना तो किसी और व्यक्तित्व पर था लेकिन कश्मीर घाटी के पहलगाम के बैसरन घासस्थली को जिस तरह से आतंकवादियों ने बेगुनाह 26 सैलानियों की 22 अप्रैल,2025 को निर्मम हत्या कर रक्तरंजित किया था उसे देखते हुए मैंने सोचा कि भारत की ‘शेरनी’ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ी अपनी मुलाकातों और संस्मरणों को साझा किया जाये । किन्हीं यादों को याद करके जीने से पहले मैं उन यादगार पलों को याद करना चाहता हूं जो श्रीमती इंदिरा गांधी से हुई कई मुलाकातों से मैंने दिल में संजो कर रखे थे ।मैंने इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व के कई दौरों को देखा है:उनके जवाहरलाल नेहरू की बेटी के रूप में, कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर,आम कार्यकर्ता के रूप में,सूचना और प्रसारण मंत्री के तौर पर आदि ।इमरजेंसी का वक्त भी मुझे याद है और 1977 में राय बरेली से लोकसभा चुनाव हारने के बाद की उनकी दिनचर्या तथा 1980 में उनकी वापसी के बाद का दौर । 1984 के 31 अक्टूबर और पहली नवंबर के वे दो दिन जिन्हें याद करके मैं आज भी सिहर उठता हूँ ।क्यों! पोस्ट के अंत तक पहुंचते पहुंचते कई घटनाओं का खुलासा होगा । इंदिरा गांधी से जुड़ी इतनी स्मृतियां हैं जिन्हें पूरी तरह से लिख पाना मुमकिन नहीं ।फिर भी कुछ खास मुद्दों को छूने की मैंने कोशिश की है ।यह पोस्ट खासा लंबा हो गया है,शायद ज़रूरी भी था।

मैं अपने लालबहादुर शास्त्री वाले पोस्ट में लिख ही चुका हूं कि यह मेरी इंदिरा गांधी से पहली मुलाकात थी और शास्त्री जी से दूसरी । सन था संभवतः 1963। इन दोनों ही नेताओं की स्मरणशक्ति की तारीफ करनी होगी ।संसद भवन की लिफ्ट में चार में उनसे मेरी दो-तीन मिनट की यह छोटी सी भेंट उन्हें याद रह गयी थी ।शास्त्री जी ने मुझसे पहली भेंट के बारे में इंदिरा जी को बता दिया था और इंदिरा जी ने मेरी बहन प्रभजोत कौर को यह बताकर चौंका दिया कि मैं इनसे लोकसभा सचिवालय में शास्त्री जी के संग मिल चुकी हूं । मेरी बहन प्रभजोत जी से उनकी पुरानी मुलाकातें थीं जब से वह राष्ट्रपति भवन में रहती थीं । मेरे बहनोई कर्नल नरेंद्रपल सिंह राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के उपसैन्य सचिव थे ।लेकिन राष्ट्रपति राधाकृष्णन इस साहित्यिक दंपति का सम्मान उनके लेखन की वजह से बहुत करते थे ।इन दोनों को राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन से कभी भी मिलने की छूट थी । रिहायश भी इनकी राष्ट्रपति भवन में ही थी ।मेरी बहन प्रभजोत कौर की एक नियमित ड्यूटी थी हर रोज़ सुबह 11 बजे राष्ट्रपति को उस दिन की अखबारों में छ्पी खबरों को पढ़ कर सुनाना, क्योंकि डॉ राधाकृष्णन की आंखों में मोतियाबिंद था और उन्हें समाचारपत्र पढ़ने में दिक्कत पेश आती थी ।

उसी राष्ट्रपति भवन में इंदिरा गांधी भी किन्हीं सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई थीं ।उन्होंने एक दिन प्रभजोत जी से कहा कि पापा (पंडित नेहरू) इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं इसलिए मेरे इस काम को भी आप ही संभाल लीजिए ।इंदिरा जी के काहे को वह भला कैसे टाल सकती थीं ।राष्ट्रपति भवन आने पर इंदिरा जी प्रभजोत कौर और उनकी दोनों बेटियों निरूपमा और अनुपमा से भी मिल लेती थीं ।मैं जिस प्रसंग का उल्लेख कर रहा था वह भी राष्ट्रपति भवन से ही जुड़ा हुआ था । यह बात 1964 की है ।एक दिन प्रभजोत जी ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक निजी समारोह में शामिल होने के लिए इंदिरा गांधी को आमंत्रित किया । तब वह प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की सरकार में सूचना और प्रसारणमंत्री थीं ।अवसर था मेरी बहन प्रभजोत जी द्वारा नेहरू जी की वसीयत नामक एक पंजाबी कविता का पाठ करना ।इस कविता को वहां उपस्थित लोगों के समक्ष पढ़ा गया जिसे खूब सराहा गया । इंदिरा गांधी ने प्रभजोत जी की तारीफ करते हुए कहा कि आपने सचमुच पंडित जी की आत्मिक सोच को इस कविता के माध्यम से साकार कर दिया है । इसे आपने लिखा ही नहीं अपितु गढ़ा है ।प्रभजोत जी ने मूल पंजाबी कविता और उसका हिंदी अनुवाद इंदिरा जी को भेंट किया जिसे उन्होंने खड़े होकर बड़े सम्मान के साथ स्वीकार किया वह बहुत सहज और सामान्य नेता थीं और उपस्थित लोगों से बेझिझ्क मिल रही थीं और मुझे विशेष कर ।उन्होंने मेरी बहन को सलाह दी कि इन्हें लिखने पढ़ने का शौक है,क्यों नहीं इन्हें मीडिया से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाये ।प्रभजोत जी ने इंदिरा जी को सूचित किया कि दीप की भी ऐसी ही इच्छा है और वह अपने तईं इस दिशा में कोशिश भी कर रहा है । भगवान ने चाहा तो यह जल्दी कामयाब हो जाएगा इंदिरा जी ने चलते चलते कहा और मेरे सिर पर अपना हाथ फेरा। अब मुझे दो विदुषियों का आशीर्वाद मिल गया जिसके कारण मेरे प्रयास भी तेज़ हो गए थे ।

इस कार्यक्रम से पहले भी मैं एक और बार इंदिरा गांधी से लोकसभा सचिवालय में कांग्रेस पार्टी के ऑफ़िस अधिकारी श्री पाहवा की मदद से मिल चुका था ।हुआ यों कि संसद भवन के लॉन में कांग्रेस पार्टी के नेताओं और सांसदों की एक हाई टी पार्टी चल रही थी ।हमारी लेजिस्लेटिव ब्रांच तीसरी मंज़िल पर थी।ब्रांच के हम सभी लोग बाहर निकलकर पार्टी के नेताओं और सांसदों के बीच के मिलन की शैली का लुत्फ उठा रहे थे ।पंडित नेहरू के आने पर ज़्यादातर सांसदों ने उन्हें घेर लिया और अपनी अपनी फरमायशें-शिकायतें उनसे कर रहे थे ।अभी पंडित जी का घेराव जारी ही था कि चारों तरफ से आवाज़ आयी ‘इंदिरा जी आ गयी हैं ।’ अब सारा हुजूम उनकी ओर भागा और पंडित नेहरू लालबहादुर शास्त्री के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें अलग एक तरफ ले गये ।

इस बीच हमने यह नोटिस भी किया कि इंदिरा जी ने फ़िरोज़ गांधी की पीठ पर हाथ मारा और जब उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा तो इंदिरा गांधी ने उन्हें ‘आदाब’ की मुद्रा में अभिवादन किया।कुछ देर तक दोनों के बीच बातचीत भी हुई ।यह बहुत ही खूबसूरत नज़ारा था ।काश कि हमारे पास कैमरा होता ।निस्संदेह यह ऐतिहासिक चित्र होता । यह दृश्य देखकर मैं लिफ्ट से तुरंत नीचे उतर गया और ग्राउंड फ्लोर पर पाहवा जी को तलाशने लगा ।उन्होंने भी मुझे दूर से देख लिया ।वह सांसदों से घिरे हुए थे ।मेरे पास आकर पूछा,किससे मिलना है!मैंने कहा इंदिरा गांधी से ।उन्होंने मुझे आश्वस्त किया । थोड़ी देर में देखा वह इंदिरा जी के साथ चले आ रहे हैं ।इंदिरा जी के हाथ में सांसदों द्वारा दिए गये जितने कागज़ थे उन्हें पाहवा जी को सौंपते हुए कहा कि कल इन्हें पीएम ऑफ़िस में भिजवा दीजियेगा ।फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोलीं,’कोई खास बात!’ सामान्य अभिवादन के बाद मैंने उनसे पूछा कि यह क्या बात है कि आपके पार्टी में आते ही सभी नेता पंडित जी को छोड़कर आपके पास आ गये! वह हंसकर बोलीं,कोई खास बात नहीं ।मैं अक्सर कांग्रेस की पार्टियों में जाती नहीं, इसलिए लोग शिष्टाचार के नाते मिलने के लिए आ गये ।वैसे भी मैं कांग्रेस अध्यक्ष रही हूं,इस वजह से भी कुछ लोग मुझे जानते हैं.. और फिर ये पर्चियां और आवेदन जो आपने पाहवा जी को सौंपे हैं.. हंसकर बोलीं,इसका मतलब आप भी जानते हैं,बहुत दिनों से इस सचिवालय में काम कर रहे हैं आप ।और फिरोज गांधी जी के साथ के भावुक क्षण.. इंदिरा गांधी ने जवाब दिया,फिरोज मेरे पति हैं, राजीव और संजय के पिता ।मैं पंडित जी के निजी और सरकारी कामों में इतनी उलझी रहती हूं कि हम दोनों चाह कर भी साथ साथ नहीं रह पा रहे हैं। मैं पंडित जी की बेटी के साथ साथ उनकी परिचारिका भी हूं ।कभी कभार मुझे और फिरोज को ऐसे मौके मिल जाते हैं जिनका हम भरपूर आनंद ले लेते हैं ।इतना कहकर मुस्कुराते हुए इंदिरा जी चली गयीं और फिर भीड़ से घिर गयीं ।

फिरोज गांधी (12 सितम्बर,1912-8 सितम्बर,1960) से भी मेरी मुलाकातें थीं ।यहां सिर्फ इंदिरा गांधी से जुड़े मुद्दे का ही उल्लेख करूंगा ।उनके बारे में अलग से एक पोस्ट डालूंगा ।एक बार मैं लोकसभा के उपाध्यक्ष सरदार हुकम सिंह (तब वह अध्यक्ष नहीं बने थे) को एक कमेटी की मीटिंग के लिए एस्कार्ट करके ले जा रहा था ।हम लोग केंद्रीय कक्ष से गुज़र रहे थे कि अचानक किसी ने आवाज़ दी,’सरदार साहब’ । हुकम सिंह जी को ऐसे ही संबोधित किया जाता था ।वह रुक गये ।फिरोज गांधी उनके पास आकर बोले,आपसे मिलना है ।’सरदार साहब मुस्कुराये और बोले कभी भी फिरोज जी।जब उनकी नज़र मेरी तरफ पड़ी तो सरदार साहब ने स्वयं ही मेरा परिचय फिरोज गांधी से कराते हुए बताया कि ‘यह त्रिलोक दीप है मेरे अंग्रेज़ी के संस्मरणों का हिंदी और पंजाबी में अनुवाद करके छपवाता रहता है ।’इसके बाद मैं सरदार साहब को कमेटी मीटिंग के लिए ले गया जिसकी उन्होंने अध्यक्षता करनी थी ।अब जब भी मैं कभी केंद्रीय कक्ष यानी सेंट्रल हाल में जाता तो देखता कि फिरोज गांधी असम की महरानी मंजुला देवी तथा कुछ अन्य सांसदों के साथ एक कोने में काफी पीते हुए चर्चा कर रहे हैं ।यह कोना फिरोज गांधी कोने के नाम से मशहूर था ।एक बार हिम्मत जुटाकर मैंने फिरोज गांधी को उस मीटिंग से अलग बुलाया और कहा कि आजकल आप पंडित जी की सरकार के मंत्रियों का कच्चा चिट्ठा खूब खोल रहे हैं ।आप मुंदड़ा केस की बात कर रहे हैं शायद ।उस पर लिखने से पहले मुझसे बात कर लीजियेगा ।फिरोज गांधी ने कहा ।जब मैंने कहा कि आज मैं एक अलग मुद्दे पर बात करना चाहता हूं तो उत्साहित होकर उन्होंने पूछा,बतायें ।इंदिरा जी और आप अलग-अलग क्यों रहते हैं ।वह हंस दिये और बोले,ऐसी कोई बात नहीं,हम लोग अक्सर मिलते रहते हैं ।इन्दु (इंदिरा गांधी को वह इसी तरह संबोधित करते थे)को पंडित जी की देखभाल की ज्यादा ज़रूरत है इसलिए वह वहां रहती है । कुछ दिनों के बाद फिरोज गांधी से मैं मिला और उनके व्यक्तित्व के बारे में अलग से पोस्ट लिखूंगा ।

इंदिरा गांधी को देखने और मिलने के अवसर मुझे मिल ही जाया करते थे ।बेशक उन दिनों वह सांसद नहीं थीं लेकिन कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष होने के नाते कभी कभार संसद भवन में दीख जाती थीं ।वैसे उन दिनों कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय जंतर मंतर रोड पर हुआ करता था । जनवरी,1964 में लालबहादुर शास्त्री का शव जब ताशकंद से आया तब भी उनके निवास 10,जनपथ पर वह दीख गयीं और जब शास्त्री जी के उत्तराधिकारी को चुनने के लिए संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में मतदान हो रहा था तब मुझे भी वह नज़ारा देखने को मिला था ।उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष कुमारस्वामी कामराज बहुत सक्रिय थे जो इंदिरा गांधी के पक्ष में प्रचार कर रहे थे, मोरारजी देसाई के हक़ में नहीं ।इस चुनावी दृश्य को देखने के लिए जिन पत्रकारों को मैं चीन्ह पा रहा था वे थे इन्दरजीत, सुनील राय, कुलदीप नैयर, सुभाष किरपेकर,सुदर्शन भाटिया,आनंद जैन,यतींद्र भटनागर, एम एल कोतरू, आदि । उस समय कुछ लोगों को तो मैं लोकसभा के अपने एक साथी जी. के. भसीन की वजह से जानता था तो कुछ से मेरी मुलाकात 1966 के बाद हुई ‘दिनमान’ ज्वायन करने के बाद ।टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग में सुदर्शन भाटिया,इकोनामिक टाइम्स में बैठते थे जबकि आनंद जैन,नवभारत टाइम्स और सुभाष किरपेकर ,टाइम्स ऑफ़ इंडिया के ब्यूरो में ।यतींद्र भटनागर,दैनिक हिंदुस्तान से जुड़े थे जबकि सुनील राय पीटीआई से ।कुलदीप नैयर को मैं सूचना अधिकारी के तौर पर जानता था,लेकिन बाद में वह ‘स्टेट्समैन’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस ‘ के संपादक भी रहे

वह दौर खुलेपन का था न तो मंत्रियों और सांसदों से मिलने और गपियाने में दिक्कत पेश आती थी और न ही पत्रकारों से दोस्ती गांठने में ।चर्चा इंदिरा गांधी की चल रही थी ।मतदान के बाद इंदिरा गांधी को विजयी घोषित किया गया ।मोरारजी देसाई का चेहरा मुरझा गया क्योंकि उस समय वह कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में थे ।कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलज़ारीलाल नंदा की पीएम बनने की न रुचि थी और न ही लालसा ।वह पार्टी में अपनी हैसियत से भी वाकिफ थे ।इस जीत से इंदिरा जी का चेहरा दमक रहा था ।दूसरे लोगों के साथ मैं भी जब उन्हें बधाई देने के लिए गया तो मेरा हाथ पकड़ कर कानों में बुदबुदा कर पूछा,’अभी तक लोकसभा सचिवालय में ही हो!’ मैंने उन्हें धीरे से बताया कि टाइम्स ऑफ इंडिया का प्रकाशन ‘दिनमान’ ज्वायन कर लिया है ।उन्होंने खुश होकर मेरा हाथ दबाया और फुसफुसाकर बोलीं ‘कांग्रेचुलेशंस’।उनके चेहरे पर मैंने एक अजब किस्म की दमक देखी ।जब मैंने अपनी बहन प्रभजोत कौर को इंदिरा गांधी वाले बधाई के इस प्रसंग की जानकारी दी तो वह बहुत खुश हो गयीं ।उनके चरण छू कर मैंने उनका आशीर्वाद लिया । खैर प्रधानमंत्री के चुनाव के इस जश्न के बाद मुलाकातों का सिलसिला थम सा गया ।

प्रधानमंत्री पद कोई साधारण पद तो होता नहीं तमाम तरह की देश-विदेश की जिम्मेदारियां अब इंदिरा गांधी का ध्यान आकर्षित कर रही थीं ।किन्हीं लोगों का ख्याल था,शायद भ्रम भी,कि देश के शासन-प्रशासन की पेचीदा गुत्थियां सुलझाने का उन्हें अनुभव नहीं लिहाजा इंदिरा जी को उनकी सलाह की ज़रूरत पड़ेगी ।इसीलिए कुछ नेताओं ने उन्हें ‘गूँगी गुड़िया’ तक की संज्ञा प्रदान कर दी ।ऐसे लोगों को शायद इस बात का गुमान नहीं था कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के तीन मूर्ति आवास में रहते रहते वह राजनीति और राजनय की बारीकियों से भलीभांति परिचित थीं ।इसके अतिरिक्त वह 1959 में कांग्रेस अध्यक्ष रह चुकी थीं तथा सूचना और प्रसारणमंत्री के तौर पर उन्हें सरकारी तंत्र का भी ज्ञान था,आखिर पूरे सोलह महीने उन्होंने सरकारी दफ्तर और अधिकारियों की मन:स्थिति को समझने में बिताये थे ।वैसे कहा यह भी जाता है कि ‘कुर्सी’ सब कुछ सिखा देती है,और फिर इंदिरा गांधी के पास तो अनुभवों का भंडार था।इस हक़ीक़त से उन्हें ‘गूँगी गुड़िया’ कहने वाले अनजान थे। यह भी हो सकता है कि राजनीतिक तौर पर वह लोग अपने आप को इंदिरा गांधी से अधिक शातिर नेता मानते रहे हों। भ्रम पालने में क्या जाता है ।

खैर अब इंदिरा गांधी से किसी राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भेंट हो जाया करती थी। वह भेंट कभी दूर दूर से तो कभी कभी अभिवादन तक ही सीमित रहती ।एक बार उनसे ठीक-ठाक मिलने का अवसर मिल ही गया ।12 मार्च, 1968 को मॉरिशस स्वाधीन हुआ था ।दिल्ली में उसके पहले उच्चायुक्त नियुक्त हुए रवींद्र घरभरण ।शुरू शुरू में घरभरण दंपति अशोक होटल के एक विशेष सुएट में रहते थे ।उनकी विदुषी पत्नी पद्मा घरभरण से श्रीमती शीला झुनझुनवाला के साथ मैं भी उनकी पत्रिका ‘अंगजा’ के लिए इंटरव्यू लेने के लिए गया ।स्मरण रहे शीला जी दिल्ली आने से पूर्व मुंबई में ‘धर्मयुग’ पत्रिका में महिला पृष्ठ की इंचार्ज थीं ।हम दोनों ने मिलकर प्रश्नों की एक लंबी चौड़ी सूची तैयार कर ली थी जिसमें उनके आयकर आयुक्त बनाम संस्कृतिप्रेमी पति ठाकुर प्रसाद झुनझुनवाला (दोस्तों के लिए टीपी भाई साहब) का भी खासा योगदान था ।शीला जी और मैं निश्चित समय पर अशोक होटल पहुंच गये ।रिंग देने पर रवींद्र घरभरण ने द्वार खोलने के बाद दोनों हाथ जोड़कर कहा,’पधारिये,स्वागत है आपका।’ मैंने उनसे शीलाजी का परिचय कराया और शीला जी ने मेरे बारे में दो शब्द कहे ।अभी औपचारिकता का दौर चल ही रहा कि बहुत ही सुन्दर और सौम्य महिला ने प्रवेश किया। घरभरण जी ने उनका परिचय देते हुए बताया कि यह मेरी पत्नी पद्मा घरभरण है ।इनका मॉरिशस के सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान है ।बाकी जब आप लोग इनसे बातचीत करेंगे तो इनकी रुचियों,खूबियों, गतिविधियों और कार्यों को समझ कर स्वयं आकलन कर सकेंगे । हम लोग करीब दो घंटे वहां पर बैठे ।बहुत अच्छा और विस्तृत इंटरव्यू हो गया ।’अंगजा’ महिला पत्रिका की वह कवर स्टोरी थी ।छपने पर घरभरण दंपति के यहां दो प्रतियां मैं दे आया जिसे देख और पढ़कर रवींद्र घरभरण बहुत खुश हुए,पद्मा जी को उन्होंने पढ़कर बताया ।रवींद्र जहां हिंदी,भोजपुरी,अंग्रेज़ी,फ्रेंच और क्रियोल पढ़ लिख सकते थे,पद्मा जी के पुरखे दक्षिण के थे इसलिए वह हिंदी और भोजपुरी बोल नहीं पाती थीं ।

यह विषयान्तर अनिवार्य था ।इस सफल इंटरव्यू के बाद घरभरण परिवार के यहां हमारा आना जाना शुरू हो गया।जब ग्रेटर कैलाश के ‘बी’ ब्लाक में वह शिफ्ट हो गये तो उनके यहां अक्सर सांस्कृतिक कार्यक्रमो का आयोजन होने लगा ।जब कभी मॉरिशस के प्रधानमंत्री सर शिव सागर रामगुलाम आते तो हमें ज़रूर याद किया जाता ।शिव सागर रामगुलाम वहां ‘चचा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं ।सर्दियों में दिल्ली आने पर स्वामी कृष्णानंद सरस्वती भी घरभरण दंपति से भी मिला करते थे ।एक बार रवींद्र घरभरण ने इंदिरा गांधी को भी अपने यहां आमंत्रित किया ।उन दिनों आज जैसी सुरक्षा व्यवस्था नहीं हुआ करती थी,माहौल बहुत खुला खुला रहता था ।घरभरण के यहां कोई पार्टी हो और हमें यानी मुझे और झुनझुनवाला परिवार को न न्योता जाये यह हो नहीं सकता था ।जिस दिन इंदिरा गांधी वहां आयीं तो मुझे वहां देखकर प्रसन्न हो गयीं।घरभरण जी ने इंदिरा जी से मेरा विधिवत परिचय कराते हुए उन्हें बताया कि ‘दीप जी,चचा से कई बार मिल चुके हैं और उनका इंटरव्यू भी ‘दिनमान’ के लिए ले चुके हैं ।वित्तमंत्री वीरस्वामी रिंगाटू (बाद में मॉरिशस के राष्ट्रपति) से भी इनकी मुलाकात है और स्वामी कृष्णानंद सरस्वती से भी ।स्वामी जी का नाम सुनकर इंदिरा जी चौंकीं और रवींद्र घरभरण से पूछा,’वही स्वामीजी जिन्होंने मॉरिशस जाने पर मेरे स्वागत की अद्भुत व्यवस्था की थी’! घरभरण का सकारात्मक उत्तर सुन कर बोलीं कि ‘मैंने उन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण दिया था लेकिन उन्होंने बड़ी विनम्रता से दोनों हाथ जोड़कर कहा था कि भारत में कहीं मुझसे बड़े बड़े संत-महात्मा-स्वामी आपको मिल जायेंगे लेकिन मॉरिशस को इस समय मेरी अधिक ज़रूरत है क्योंकि यह देश अभी शैशवावस्था में है,दिल्ली आने पर मैं अवश्य आपके दर्शन करने का प्रयास करूंगा’।
लेकिन वह मुझसे मिले नहीं ।फिर मेरी तरफ मुड़ कर बोलीं,’बड़े छुपे रुस्तम हो आप ।जब कभी स्वामीजी दिल्ली आयें तो आर के (धवन) से बात करके मुझसे मिलवा देना । हम लोगों से बातचीत करने का इंदिरा जी का इतना लंबा दौर चल गया कि दूसरे अतिथि उनसे अभिवादन करने की बाट जोह रहे थे ।

लेकिन 1966 में परिदृश्य बदल गया ।इंदिरा गांधी 24 जनवरी, 1966 को देश की प्रधानमंत्री बन गयीं और मैं पहली जनवरी,1966 को ‘दिनमान’ से जुड़ गया ।इस आशय की जानकारी मैंने इंदिरा जी को दे दी थी । जैसे कि मैं पहले स्पष्ट कर चुका हूं कि इंदिरा गांधी से न पहले मिलना आसान था और अब तो बिल्कुल ही नहीं ।पहले फिर भी उनके संसद भवन में आते जाते भेंट हो जाया करती थी लेकिन अब मेरे पास वह सुविधा भी नहीं थी ।लोकसभा सचिवालय छोड़ने के बाद तो उधर पत्रिका से जुड़े किसी काम के सिलसिले में ही जा पाना होता था ।लेकिन यह बात सही है कि जब कभी भी वह किसी प्रेस कांफ्रेंस में मुझे देख लेतीं तो पहचान लिया करती थीं ।

उन दिनों आज जैसी सुरक्षा व्यवस्था नहीं होती थी प्रधानमंत्री के लिए तो थोड़े बहुत सुरक्षा प्रबंध हुआ करते थे,मंत्रियों के लिए बिल्कुल नहीं ।जब मैं पंडित जवाहरलाल नेहरू के मोटरसाइकिल पर सवार उनके पायलट से मिलता और उससे पंडित जी से मिलने वाले मुलाकातियों की बातें सुनता तो लगता कि सही मायने में राजा और प्रजा के बीच का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए ।पंडित नेहरू का पायलट अंत तक वही पंजाबी मोटरसाइकिल वाला ही रहा ।लालबहादुर शास्त्री के बाद जीप वाले पायलट आ गये लेकिन प्रधानमंत्री की गाड़ी के आगे पीछे चलने वाली गाड़ियों की संख्या बहुत सीमित रहती थीं शायद दो-तीन ।किसी भी आयोजन के बाद पीएम उपलब्ध रहते थे, अपनी वार्षिक प्रेस कांफ्रेंस जो करते सो अलग ।लिहाजा कई आयोजनों में इंदिरा गांधी से मुलाकात हो जाती,अक्सर साथी पत्रकारों के साथ तो कभी दो-तीन मिनट अलग से मिल पेपर के लिए कोई स्कूप प्राप्त कर लेता ।

कांग्रेस के जिन नेताओं ने इंदिरा गांधी को गूँगी गुड़िया समझ कर प्रधानमंत्री चुना था उनकी सोच गलत साबित हुई ।इंदिरा गांधी का अपना स्वतंत्र दिमाग था,उनकी जनोपयोगी नीतियां थीं जो उन्होंने अपने पिता पंडित नेहरू की परिचारिका रहते हुए सीखी थीं । मोरारजी देसाई को इंदिरा गांधी ने उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री (13 मार्च,1967-16 जुलाई,1969) नियुक्त किया ।बेशक 1965 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध के फलस्वरूप भारत को यश की तो प्राप्ति हुई किंतु देश में वस्तुओं की बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी,आर्थिक मंदी और खाद्य संकट के कारण इंदिरा गांधी ने 1967 में जिस पहले लोकसभा के चुनाव का सामना किया था उसमें उन्हें बहुमत तो प्राप्त हो गया लेकिन बहुत कम सीटों का ।कई राज्यों में कांग्रेस पार्टी के हाथ से बहुमत जाता रहा ।उन्हें अपनी मुद्रा रुपए का अवमुल्यन करना पड़ा ।लेकिन इससे भी व्यवसायियों और उपभोक्ताओं की मुश्किलें कम नहीं हुईं ।

1967 के लोकसभा में घटे बहुमत तथा पांच विधनसभाओं में पराजय के बाद उन्हें समाजवादी नीतियों की ओर उन्मुख होना पड़ा ।इसके चलते 1969 आते आते इंदिरा गांधी की कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से अनबन शुरू हो गयी ।3 मई, 1969 को भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ ज़ाकिर हुसैन के निधन के बाद उपराष्ट्रपति वराहगिरि वेंकटगिरि ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की ।लेकिन 20 जुलाई,1969 को अपने पद से इस्तीफा दे उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर अपना नामांकन दाखिल कर दिया ।गिरि के त्यागपत्र देने के बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के तौर पर कार्यभार संभाला ।विपक्ष की ओर से पूर्व वित्तमंत्री सी. डी. देशमुख चुनावी मैदान में थे ।लिहाजा भारत के राष्ट्रपति के खाली पद के लिए कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी बनाये गये ।उनके नामांकन तक इंदिरा गांधी कुछ नहीं बोलीं लेकिन वह संजीव रेड्डी को किन्हीं वजहों से पसंद नहीं करती थीं ।नीलम संजीव रेड्डी के विरोध में वराहगिरि वेंकटगिरि स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर खड़े थे ।इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए पार्टी के मतदाताओं से अपनी ‘अंतरात्मा’ के अनुसार मतदान करने के लिए कहा ।राष्ट्रपति पद के चुनाव में संसद की दोनों सदनों के चुने हुए सांसद तथा राज्य विधानसभाओं के चुने हुए विधायक मतदान करते हैं ।इंदिरा गांधी ने जुआ खेला था, क्योंकि 1967 के लोकसभा और पांच विधानसभाओं में कांग्रेस का बहुमत घटा था ।इस बाबत जब मैंने इंदिरा गांधी से पूछा कि यह ‘अंतरात्मा’ वाला मुद्दा उछालकर क्या आपने जोखिम नहीं उठाया था।उन्होंने बड़े ही आत्मविश्वास का परिचय देते हुए बताया,नहीं। मैं आश्वस्त थी ।मेरे विश्वासपात्रों ने पुख्ता गणना करके मुझे यकीनी जीत का भरोसा दिलाया था ।फिर मुझसे एक और रहस्योद्घाटन किया ।उन्होंने बताया कि हमारे बुजुर्गों ने यह तय कर रखा था कि नीलम संजीव रेड्डी के राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद वह पहला काम मेरी सरकार की बर्खास्तगी से करेंगे ।अब मैं इतनी मूर्ख तो हूं नहीं कि उनके हाथ में अपनी बर्खास्तगी का फरमान थमा देती ।16 अगस्त,1969 को हुए मतदान में दूसरी वरीयता में वी वी गिरि को सफल घोषित किया गया ।वी वी गिरि की जीत ने मेरी हिम्मत बढ़ा दी ।मैंने वित्तमंत्री मोरारजी देसाई से बिना पूछे 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण (19 जुलाई, 1969) करने का निर्णय करके इन दिग्गजों का गुस्सा बढ़ा दिया था जिसके चलते मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही कर मुझे पार्टी से निकाल दिया गया ।इस प्रकार कांग्रेस दो फाड़ हो गयी-एक बनी कांग्रेस (संगठन) या कांग्रेस (ओ) या सिंडीकेट कांग्रेस और दूसरी कांग्रेस (आई)। जब मैंने उनसे पूछा कि आपको प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने वाले कुमारस्वामी कामराज कैसे आपके विरोधियों की पंगत में बैठ गये! इंदिरा जी हल्के से मुस्कुराईं और बोलीं,उनकी मुझसे कुछ अपेक्षाएं रही होंगी जिसकी मैं पूर्ति कर पाने में असमर्थ रही ।

अब कांग्रेस (आई) की देश पर पकड़ खासी मजबूत हो गयी थी।1971 उनके जीवन का बहुत महत्वपूर्ण बरस था ।1 से 10 मार्च, 1971 के बीच हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने 352 सीटें जीतकर दूसरी पार्टियों के हौसले पस्त कर दिए थे अर्थात मतदाताओं ने उनकी पार्टी को ही ‘असली’ कांग्रेस माना । सिंडीकेट कांग्रेस को महज़ 16 सीटें ही मिलीं । उन दिनों लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या 521 थी ।विपक्षी पार्टियों में सबसे अधिक 25 सीटें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को मिली थीं जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और डीएमके को 23-23,भारतीय जनसंघ को 22 और स्वतंत्र पार्टी को 8 सीटें मिली थीं ।इन चुनाव परिणामों ने कांग्रेस विभाजन में इंदिरा गांधी के गुट को तरजीह दी गयी क्योंकि उनकी पार्टी ने जनसंघ के ‘इंदिरा हटाओ’ के बरकस ‘गरीबी हटाओ भारत बचाओ’ का नारा दिया था ।इस वर्ग को इंदिरा गांधी पर अधिक विश्वास था। 1969 में चौदह
बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जिसके चलते बैंक शाखाओं की संख्या 8,200 से बढ़कर 62,000 से अधिक हो गयी जिनमें से ग्रामीण क्षेत्रों को लाभ इस मायने में हुआ कि जो गांव और कसबे अभी तक बैंकिंग सुविधा से वंचित थे अब इस कदम से वे भी
लाभान्वित हुए ।1971 का चुनाव जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने कोयला, इस्पात,तांबा,रिफाइनिंग,सूती वस्त्र और बीमा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर ज़्यादातर रोज़गार और संगठित श्रम के हितों की रक्षा की ।इतना ही नहीं 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जिन विदेशी स्वामित्व वाली निजी तेल कंपनियों ने भारतीय नौसेना और वायुसेना को ईंधन की आपूर्ति करने से इंकार किया था उसके चलते उन्होंने इंडियन आयल कारपोरेशन (आईओसी), हिंदुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन (एचपीसीएल) तथा भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन (बीपीसीएल) नामक नयी कंपनियाँ बनायीं ।एक बार भेंट होने पर मैंने उन से हंसकर कहा कि आजकल तो आप ‘राष्ट्रीयकरण वाली इंदिरा गांधी’ के नाम से मशहूर हो गयी हैं तो उनका भी तुर्की-ब-तुर्की जवाब था ‘जिस काम को करने से राष्ट्रहित के साथ गरीबों की भलाई होती हो, ऐसे काम मैं बार बार करूंगी ।’ इतना-सा जवाब देकर वह किसी मीटिंग के लिए चली गयीं ।

क्योंकि मैंने 1956 से 1965 तक लोकसभा सचिवालय में काम किया था इसलिए देश और राज्यों की समस्याओं को लोकसभा सदन में उठते हुए देखता था ।कुछ के संकल्प और विधेयकों के प्रारूप हमारी लेजिस्लेटिव ब्रांच से होकर गुजरते थे ।इनमें पंजाब प्रमुख हुआ करता था लेकिन पूर्वोतर के राज्य भी अपनी अस्मिता के मामले उठाया करते थे ।पंजाब की अकाली पार्टी के नेता मास्टर तारासिंह खासे मुखर थे ।उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय में ही अलग से पंजाबी सूबे की आवाज़ बुलंद कर दी थी । लेकिन उस वक़्त पंजाब के मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरों इसके खिलाफ थे ।उनका तर्क था कि ‘इस समय अटारी से लेकर दिल्ली के बार्डर तक पंजाब है ।इसको बांट देने से पंजाब के पास क्या बचेगा,इस हक़ीक़त को न जाने अकाली क्यों नहीं समझ पा रहे हैं ।’ पंडित जी मास्टर जी को समझाते रहे कि ऐसा करने से पंजाब के हिस्से कुछ नहीं आयेगा ।लेकिन मास्टर जी के साथ के दूसरे अकाली नेता संत फतेहसिंह पंजाबी सूबे की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गये । इस आमरण अनशन से कहीं हालात न बिगड़ जाएं पंडित जी ने लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह,जिनकी पृष्ठभूमि अकाली दल की थी, की सेवाएं लीं और उन्हें अमृतसर संत फतेहसिंह का आमरण अनशन तुड़वाने के लिए भेजा ।सरदार साहब ने संत जी को समझाते हुए कहा कि सरकार आपकी मांगों पर विचार करने के लिए तैयार है,उसे कुछ वक़्त तो दीजिए ।इस बीच पंडित नेहरू का 27 मई,1964 को निधन हो गया और 6 फरवरी, 1965 में प्रतापसिंह कैरों की हत्या ।कुछ समय तक शांत रहने के बाद इस मुद्दे ने फिर ज़ोर पकड़ा । केंद्र में लालबहादुर शास्त्री की सरकार थी ।पुन: सरदार हुकम सिंह को सक्रिय किया गया ।अब की बार स्वयं मास्टर तारासिंह आमरण अनशन पर बैठे ।सरदार हुकम सिंह ने पहले उनका अनशन तुड़वाया । उसके बाद सरकार की तरफ से उन्हें भाषा पर आधारित अलग पंजाब राज्य के निर्माण का भरोसा दिलाया ।

सरदार हुकम सिंह के नेतृत्व में एक समिति गठित की गयी जिसका काम पंजाबी भाषी ज़िलों और क्षेत्रों का चयन करना था ।उसने 1961 की जनगणना की रिपोर्ट के हिसाब से पंजाबी भाषी क्षेत्रों का चयन किया ।हुआ यों कि 1961 की जनगणना से पहले भाषा के मसले को लेकर तत्कालीन पंजाब के कुछ क्षेत्रों में पंजाबी भाषी के काफी परिवारों ने अपनी मातृभाषा पंजाबी के बजाय हिंदी लिखवाई थी ।इस नाते पंजाबीबहुल होते हुए भी अंबाला और करनाल को प्रस्तावित पंजाब का हिस्सा नहीं माना गया ।
इसलिए जांच समिति ने पंजाबी भाषी क्षेत्रों को आधार बनाकर अलग पंजाब राज्य निर्माण की सरकार से सिफारिश की । इस प्रकार भाषाई आधार पर पंजाब को पुनर्गठित करने की अकालियों की मांग को स्वीकार कर लिया गया ।पंजाब का हिंदी भाषी हिस्सा हरियाणा बन गया जबकि पहाड़ी इलाकों को हिमाचलप्रदेश में शामिल कर दिया गया ।चंडीगढ़ को दोनों राज्यों की राजधानी के रूप में साझा करने के लिए उसे एक केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया ।दोनों राज्य पहली नवंबर,1966 को वजूद में आये जिसका श्रेय इंदिरा गांधी को दिया जाता है ।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रयासों से ही मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा को राज्य का दर्जा दिया गया ।इसके अलावा के क्षेत्र को नार्थ ईस्ट फ़्रंटियर एजेंसी यानी ‘नेफा’ घोषित किया गया ।बाद में इसका नाम बदलकर अरुणाचलप्रदेश कर दिया गया ।इस समय उसे राज्य का दर्जा प्राप्त है ।सिक्किम का भारत में विलय भी इंदिरा गांधी के शासनकाल में हुआ ।इंदिरा गांधी के प्रयासों से नगालैंड में उग्रवाद समाप्त भी शिलंग समझौते के तहत हुआ । इस तरह राष्ट्रीयकरण के अतिरिक्त इंदिरा गांधी को पुराने मसलों को सुलझाने वाली प्रधानमंत्री भी कहा जाता है और नये राज्यों की निर्माणकर्ता भी ।

अब तो इंदिरा जी से ऐसे ही चलते चलते बात हो पाती थी क्योंकि घरेलू समस्याओं के अलावा अंतरराष्ट्रीय समस्याएं उनके सामने मुंह बाय खड़ी थीं और दूसरी तरफ पड़ोसी पाकिस्तान अपनी हरकतों बाज़ नहीं आ रहा है ।इतनी बार उसकी पिटाई हो चुकी है फिर भी वह आदत से मजबूर था। उस समय विश्व में दो महाशक्तियां थीं-अमेरिका और सोवियत संघ । सोवियत संघ के साथ तो भारत के घने संबंध थे लेकिन अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की तरफ था ।इसके अलावा जुलाई, 1971 में भारत के बाद पाकिस्तान और वहां से जिस तरह से गोपनीय और रहस्यमय ढ़ंग से हेनरी कीसिंगर बीजिंग जाकर चीनी नेताओं से मिले वह दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के लिए चौंकाने वाली खबर थी ।उन्होंने 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की चीन की यात्रा तय कर दोनों देशों के बीच के 23 सालों की दूरी मिटाने की कोशिश की । हेनरी कीसिंगर तब राष्ट्रपति निक्सन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे ।अब भारत के खिलाफ पाकिस्तान,चीन और अमेरिका की जुगलबंदी हो गयी थी ।लिहाजा भारत ने अगस्त, 1971 में भारत-सोवियत मैत्री और सहयोग संधि की । इस का मतलब था कि भारत और सोवियत संघ के बीच पुख्ता दोस्ती की जड़ें ऐसी मजबूत करना ताकि किसी देश पर भी अगर कोई विपत्ति आये तो उसका सामना मिलजुल कर करना ।बेशक यह संधि अमेरिका की नज़रों की किरकिरी बन गयी थी ।

इंदिरा गांधी ने इस संधि के ज़रिये अपनी आपत ढाल बना ली थी।जहां भारतीय लोकसभा के चुनाव मार्च,1971 में हुए थे वहीं आज़ादी के बाद पहली बार पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली के लिए प्रत्यक्ष आम चुनाव 7 दिसंबर,1970 को हुए जिसमें 24 राजनीतिक पार्टियों ने हिस्सा लिया था ।पूर्वी पाकिस्तान में जहां बंगाली राष्ट्रवादी पार्टी अवामी लीग का दबदबा था वहां पश्चिम में लोकतांत्रिक समाजवादी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) प्रमुख शक्ति थी,करिश्माई नेता ज़ुल्फिकर अली भुट्टो के कारण ।पाकिस्तान सरकार ने इस्लाम समर्थक दलों का समर्थन किया क्योंकि वे मजबूत संघवाद के लिए प्रतिबद्ध थे। 300 सीटों के लिए आम निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हुआ जिनमें 162 पूर्वी पाकिस्तान में और 138 पश्चिमी पाकिस्तान में थीं । महिलाओं के लिए 13 सीटें आरक्षित थीं ।इनमें सात पूर्वी पाकिस्तान और छह पश्चिमी पाकिस्तान में थीं यानी पूर्वी पाकिस्तान में कुल 169 सीटें। इनमें से अवामी लीग ने 160 सामान्य सीटें और सात महिला सीटें जीत लीं जबकि एक सीट पाकिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी तथा एक स्वतंत्र उम्मीदवार ने जीती थी।उधर पश्चिमी पाकिस्तान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) को केवल 81 सामान्य सीटें मिलीं और पांच महिलाओं की । दस दिनों के बाद हुए प्रांतीय चुनावों में भी अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में अपना दबदबा और वर्चस्व कायम रखा जबकि पीपीपी पंजाब और सिंध में विजयी रही तथा नेशनल अवामी पार्टी उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान में जीती ।

पाकिस्तान में दरअसल जनवरी 1965 से ही लोकतंत्री ताकतें मजबूत होनी शुरू हो गयी थीं ।बेशक राष्ट्रपति का चुनाव जनरल अयूब खान (1958-1969) जीत गये थे लेकिन उनके खिलाफ राजनीतिक विद्रोह बढ़ता जा रहा था ।पूर्वी पाकिस्तान में अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान राष्ट्रपति अयूब खान के विरोध में रैलियाँ निकाल रहे थे और उन्होंने पूर्वी पाकिस्तानी स्वायत्तता के लिए छह सूत्री आंदोलन शुरू कर दिया ।1968 में एक तरफ उनके विरुद्ध राजद्रोह का आरोप लगा और दूसरी तरफ भारत के साथ साजिश करके पाकिस्तान की अस्थिरता का इल्जाम लगाया गया । इन आरोपों को लेकर पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह हो गया जिसके चलते सरकारी बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच बड़े पैमाने पर झड़पें हुईं ।इधर पश्चिम पाकिस्तान में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने विदेशमंत्री पद से त्यागपत्र देकर 1967 में अपनी राजनीतिक पार्टी पीपीपी का गठन कर लिया ।लिहाजा 26 मार्च, 1969 को राजनीतिक दबाव में आकर अयूब खान ने सेना के कमांडर-इन-चीफ़ जनरल आगा मोहम्मद याह्या खान को सत्ता सौंप दी क्योंकि वह देश में बढ़ता हुआ राजनीतिक दबाव झेल नहीं पा रहे थे ।

चुनाव परिणामों में अवामी लीग की बढ़त के बावजूद पश्चिम पाकिस्तान में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के समर्थकों का यह तर्क था,क्योंकि अवामी लीग को इधर कोई सीट नहीं मिली है इसलिए शेख मुजीबुर्रहमान को सत्ता नहीं सौंपी जा सकती ।इस पर भुट्टो का सूत्र वाक्य था कि ‘इधर हम,उधर तुम’ मतलब यह कि हम यहां शासन करते हैं,आप उधर करें । पाकिस्तान का यह मौखिक विभाजन था जो पहली बार सुनने को मिल रहा था।जहां कुछ बंगालियों ने पीपीपी का पक्ष लिया वहीं पश्चिमी पाकिस्तान में शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और मानवाधिकार कार्यकर्ता आस्माँ जहांगीर के पिता मलिक गुलाम जिलानी,जिये सिंध के नेता जी. एम. सैयद और जमायते इस्लामी के नेता अबुल आला मौदूदी ने अवामी लीग को सरकार बनाने की अनुमति देने का समर्थन किया । इस बीच राष्ट्रपति याह्या खान ने नेशनल असेंबली का उद्घाटन स्थगित कर दिया जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप शेख मुजीबुर्रहमान ने आम हड़ताल का आवाहन कर दिया और सरकारी कामकाज ठप्प पड़ गया ।लिहाजा जातीय दंगे शुरू हो गये और पश्चिम पाकिस्तान समर्थक बिहारी समुदाय को निशाना बनाया गया ।

लिहाजा पाकिस्तानी हुकूमत ने पूर्वी पाकिस्तान में सेना की तैनाती को सही ठहराने के लिए ‘बिहारी नरसंहार’ को मुद्दा बनाया और लेफ्टिनेंट जनरल टिक्का खान (बाद में गवर्नर) के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने 25 मार्च,1971 की रात को ढाका पर हमला कर दिया ।शांतिपूर्ण रात रोने,चिल्लाने और जलने के रूप में बदल गयी ।जनरल टिक्का खान का बर्ताव ऐसा था मानो वह किसी दुश्मन पर हमला कर रहा हो, न कि अपने ‘गुमराह’ हुए लोगों को समझाने का काम। यह सैन्य कार्रवाई बुखारा और बगदाद में चंगेज़ खान तथा हलाकू खान द्वारा किए गये नरसंहारो से भी कहीं ज्यादा निर्दयी क्रूरता का प्रदर्शन थी ।टिक्का खान का फरमान था ‘मुझे ज़मीन चाहिए,लोग नहीं’ ।इसीलिए टिक्का खान को ‘बंगाल का कसाई’ कहा जाता है ।एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तानी सेना और उसके समर्थक इस्लामी मिलीशिया के सदस्यों ने तीन लाख से तीस लाख के बीच नागरिकों की हत्या की ।अवामी लीग को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया ।उधर 26 मार्च, 1971 को शेख मुजीबुर्रहमान ने बंगलादेश की स्वतंत्रता की घोषणा कर एक निर्वासित सरकार गठित कर ली। पाकिस्तानी सशस्त्र सेनाओं से बंगाली अधिकारियों ने भारत के विभिन्न भागों में शरण लेने के बाद विद्रोह कर दिया। उन्होंने सेवानिवृत कर्नल मोहम्मद अता उल उस्मानी के नेतृत्व में मुक्तिवहिनी का गठन किया ।इस में पारंपरिक और गोरिल्ला बल दोनों शामिल थे ।इसी प्रकार दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग से बंगाली राजनयिकों ने इस्तीफा देकर भारत में शरण प्राप्त कर बंगलादेश की निर्वासित सरकार का समर्थन किया ।

जनरल टिक्का खान की सेना ने बंगाली नागरिकों पर कहर बरपा रखा था । उनके निशाने पर अल्पसंख्यक बंगाली हिंदू थे ।ये हिंदू अपना घरबार छोड़ भारत की तरफ पलायन कर रहे थे ।भारत सरकार ने बंगाली शरणार्थियों को सुरक्षित आश्रय देने के लिए पाकिस्तान-भारत सीमा खोल दी थी ताकि वे पश्चिम बंगाल,बिहार,असम,मेघालय और त्रिपुरा में प्रवेश कर सकें ।जगह जगह शरणार्थी शिविर स्थापित किए गये ।इन शरणार्थियों की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा ।एक अनुमान के अनुसार एक करोड़ से अधिक बंगाली शरणार्थियों ने भारत में प्रवेश किया था ।विदेशमंत्री सरदार स्वर्णसिंह ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहायता की अपील की जो विफल रही ।प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के स्वतंत्रता संघर्ष के लिए अपनी सरकार का पूर्ण समर्थन व्यक्त किया ।साथ ही वह पाकिस्तान की सरकार को सबक भी सिखाना चाहती थीं ।प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सोचा कि लाखों शरणार्थियों को लेने के बजाय पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में जाना ज्यादा किफायती होगा ।उन्होंने सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशा से पूर्वी पाकिस्तान पर हमला करने बाबत जब बात की तो उनकी राय थी कि अभी मानसून का मौसम है,वहां दलदल होगी, यह सही वक़्त नहीं है ।फिर भी आप इसरार करती हैं तो मैं अपना इस्तीफा पेश करता हूं जिसे इंदिरा गांधी ने अस्वीकार कर दिया। सैम मानेकशा ने कहा कि मैं अपने सैनिकों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता ।माकूल मौसम और वक़्त आने पर आपके हुक्म की तमील होगी ।इस बीच भारतीय सैन्य अधिकारियों ने मुक्तिवाहिनी गुरिल्लों की भर्ती कर उनका प्रशिक्षण शुरू कर दिया । एक रणनीति के तहत नवंबर,1971 तक भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ सीधी गोलाबारी कर रही थी।कई बार तो वह वहां घुसपैठ भी कर जाती थी ताकि पूर्वी पाकिस्तान में साथियों का मनोबल बना रहे ।इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध बताया गया था तो कुछ क्षेत्रों में इसे भारत की ‘टोही’ कार्रवाई भी ।

लेकिन जब 3 दिसंबर, 1971 की शाम पाकिस्तान वायुसेना ने आगरा सहित आठ भारतीय हवाई अड्डों पर हमले किये तो भारतीय थलसेना,वायुसेना और नौसेना ने एक साथ प्रहार करके उसके हाथ पांव फुला दिये ।उसके आपरेशन चंगेज़ खान का मकसद आगरा के ताजमहल के सफ़ेद संगमरमर पर हमला करना था जो चांदनी रात को बहुत चमकता है लेकिन उसे क्या पता था कि भारतीय सेना उसकी कुटिल नीति से वाकिफ है जिसके चलते ताजमहल को काले कपड़ों, पेड़ों की टहनियों और पत्तों से ढक दिया गया था।जिस दिन पाकिस्तानी वायुसेना ने आठ भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया उसी दिन शाम को रेडियो पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि ‘पाकिस्तान ने हमारे देश पर हवाई हमले किए हैं इसलिए हम उसके खिलाफ युद्ध की घोषणा करते हैं’।

सश्स्त्र सेना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की घोषणा का बस इंतज़ार कर रही थी ।जिस तरह से एकजुट होकर समन्वित ढंग से तीनों सशस्त्र सेनाओं ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान पर हमले किए उनके लिए अपना बचाव कर पाना मुश्किल था।पाकिस्तान के हुक्मरानों ने सोचा था कि भारत को पश्चिम में उलझाकर पूर्व में मनमानी कर लेंगे किन्तु ऐसा मुमकिन न हो सका ।पूर्व में भारतीय सेना के साथ मुक्तिवहिनी भी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रही थी।पाकिस्तान की मदद के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक विमानवाहक पोत यूएसएस एंटरप्राइज के नेतृत्व में टास्क फोर्स 74 (इसे सातवां बेड़ा भी कहा जाता है)को बंगाल की खड़ी में जाने का आदेश दिया ।इसके अलावा ब्रिटेन ने विमानवाहक पोत एचएमएस ईगल के नेतृत्व में एक वाहक युद्धसमूह को खाड़ी में तैनात कर दिया तथा चीन ने मौखिक धमकियां दीं ।।भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल एस एम नंदा हर गतिविधि की खबर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देते रहे लिहाजा उन्होंने तुरंत सोवियत संघ के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव से संपर्क कर वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया जिसके चलते सोवियत नौसेना ने व्लदिवोस्तोक से क्रूज़र और विध्वंसक के दो समूहों को भेजा । सोवियत परमाणु पनडुब्बी को आते देख अमेरिकी और ब्रितानी विमानवाहक पोत आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाये । भारतीय नौसेना का अपना आईएनए विक्रांत भी पहले से तैनात था जिसने पहले ही कराची बन्दरगाह को धू धू कर जला दिया था ।लिहाजा भारतीय नौसेना ने पाकिस्तानी नौसेना को करीब करीब रौंद डाला ।

उधर पाकिस्तानी फौज जिस तरह से हिंसा पर उतारू थी और महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार कर रही थी उसका ध्यान अपनी फौजी ड्यूटी से भटक गया लगता था ।एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तानी सैनिकों और रजाकारों (स्वयंसेवकों) ने नरसंहार और बलात्कार के अभियान के तहत दो से चार लाख बंगलादेशी महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार किया । इसलिए पाकिस्तानी सैनिकों पर हिन्दुस्तानी सेना का इतना तीखा और तेज़ प्रहार था कि उसके कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला खान (एएके) नियाज़ी को भारतीय कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीतसिंह अरोड़ा के समक्ष 16 दिसंबर,1971 को ढाका में आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर दस्तखत करने पड़े । पूर्वी पाकिस्तान का बंगलादेश के रूप में नये राष्ट्र के तौर पर अभ्युदय हुआ ।भारतीय सेना ने 90,368 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बना लिया। इसमें 54,154 सैनिक थे, 1381 नौसैनिक,833 वायुसैनिक, 22,000 अर्धसैनिक बल जैसे पूर्वी पाकिस्तान राइफल्स/पुलिस,राज्यपाल अब्दुल मोटालेब मलिक सहित 12,000 नागरिक तथा सरकारी कर्मी शामिल थे । पाकिस्तानी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाज़ी से आत्मसमर्पण दस्तावेजों पर दस्तखत तो लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने लिए थे लेकिन वहां दूसरी सेनाओं के अधिकारी भी मौजूद थे।सेना के दूसरे बड़े अधिकारी थे लेफ्टिनेंट जनरल जेएफ़आर जैकब ।

जहां तक पश्चिमी मोर्चे की बात है भारतीय सेनाओं ने 15010 किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया ।इसमें पंजाब, कश्मीर,सिंध और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) का काफी बड़ा भाग था ।राजस्थान के लोंगोवाल में पाकिस्तानी सेना हावी होती दीखी लेकिन स्थल सेना को भारतीय वायुसेना का समर्थन प्राप्त होने से पाकिस्तानी सैपरो को भारतीय छोटे हथियरों और तोपखाने की तोप की आग से पीछे धकेल दिया और वह सिंध के भीतर तक घुस गयी थी। गदरा रोड रेलवे स्टेशन भारत के पास था और बाड़मेर में पाकिस्तान से कबज़ियाया गया एक टैंक भी आम लोगों को देखने के लिए प्रदर्शित था । भारत की तुलना में पाकिस्तानी सशस्त्र बल बहुत कमजोर था ।इसलिए अमेरिकी और ब्रितानी सहयोग के अश्वासन के बावजूद पाकिस्तानी सेना,वायुसेना और नौसेना सभी क्षेत्रों में बुरी तरह से न सिर्फ हार गयी बल्कि अपने देश को दो हिस्सों में बांट गयी।

16 दिसंबर,1971 को सेना प्रमुख सैम मानेकशा ने फोन करके प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को बताया कि बंगाली मुक्तिवहिनी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ढाका को आज़ाद करा लिया है तथा पाकिस्तानी सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया है तो वह अपने संसद भवन के ऑफ़िस से तेज़ कदमों से लोकसभा में पहुंचीं। तब लोकसभा अध्यक्ष गुरुदयालसिंह ढिल्लों आसन पर थे ।उनकी अनुमति से इंदिरा गांधी ने घोषणा की कि ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है ।यह सदन और पूरा देश इस ऐतिहासिक घटना पर खुशी मनाता है ।हम बंगलादेश के लोगों को उनकी जीत की इस घड़ी में सलाम करते हैं ।उन दिनों संसद का शीतकालीन अधिवेशन चल रहा था । सांसदों ने अपनी मेज़े थपथपा इस घोषणा का स्वागत किया और सशस्त्र सेनाओं की बहादुरी को सलाम किया ।श्रीमती गांधी ने जब यह ऐलान किया कि पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए हैं और पूर्वी पाकिस्तान अब नया देश बंगलादेश बन गया है तो सांसदों ने खड़े होकर करतल ध्वनि से स्वागत किया ।बंगलादेश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान की ताजपोशी पर भी सांसदों ने अपनी मेज़े थपथपाईं । भारतीय सशस्त्र बलों की इस सवन्वित जीत की भी सांसदों ने दिलखोल कर प्रशंसा और सराहना करते हुए कहा था कि जिस देश के पास ऐसा समर्पित सशस्त्र बल हो उस तरफ दुश्मन आंख उठाकर देखने का साहस कभी नहीं कर सकता ।प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सफल नेतृत्व का उल्लेख करते हुए विपक्ष के नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें ‘दुर्गा का रूप’ करार दे दिया था ।

जब से पाकिस्तान अस्तित्व में आया है अमेरिका और चीन उसके स्थायी समर्थकों में रहे हैं ।अमेरिका तो एक तरह से उसका लालन-पालन-पोषण कर रहा है और चीन को उसने पीओके का कुछ वह क्षेत्र दे दिया है जो 1947 में उसने कबाइलियों की मदद से भारत से हथियाया था । लेकिन देश के पहले प्रतिरक्षामंत्री (1947-1952) सरदार बलदेव सिंह ने स्थिति पर काबू पाने के लिए ब्रिगेडियर (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) बिक्रम सिंह को जिम्मेदरी सौंपी थी ।उन्होंने पैदल सेना ब्रिगेड की कमान संभाली और कबाइलियों को पीछे खदेड़ने में कामयाब रहे ।लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह (1911-1963) ऐसे दिलेर जनरल थे जो पाकिस्तान के जनरल अयूब खान (बाद में राष्ट्रपति) को ललकारा करते थे ।ये दोनों बैचमेट थे वैसे ही जैसे जनरल मानेकशा और पाकिस्तान के जनरल याह्या खान । दुर्भाग्य से 22 नवंबर,1963 को पुंछ जाते समय हेलीकाप्टर के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से उनकी मृत्यु हो गयी ।इस दुर्घटना में जनरल बिक्रम सिंह के अलावा लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह, एयर वाइस मार्शल एरिक पिंटो, मेजर जनरल एनकेडी नानवाटी, ब्रिगेडियर एस आर ओबेराय और फ्लाइट लेफ्टिनेंट एस एस सोढ़ी जैसे प्रतिष्ठित अधिकारी भी मारे गये । इस दुखद हादसे पर तत्कालीन गृहमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा था कि हमने सेना और वायुसेना के सर्वश्रेष्ठ अधिकारी खो दिए हैं ।भविष्य में हमें इस बात का ख्याल रखना होगा कि सभी सीनियर अधिकारी एकसाथ उड़ान न भरें ।दूसरे शब्दों में एक बास्कट में सभी अंडे पैक नहीं करने चाहिए ।जनरल बिक्रम सिंह उस समय सबसे सीनियर लेफ्टिनेंट जनरल थे,जनरल मानेकशा उनसे जूनियर थे लेकिन कश्मीर के इस अभियान में वह भी जनरल बिक्रम सिंह की कमान में थे ।

नवंबर,1971में इंदिरा गांधी जब वॉशिंगटन में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से मिलीं तो उन्होंने इंदिरा जी की इस दलील के प्रति कोई सहानूभूति नहीं दिखायी कि पूर्वी पाकिस्तानी सेना द्वारा उत्पीड़न से बचने के लिए लाखों लोगों को भारत में पनाह लेने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं ।इसलिए यह एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है जिसका समाधान विश्व के सभी देशों को मिलजुल कर करना चाहिए ।इस पर जब निक्सन ने उन्हें कुछ नसीहत देने की कोशिश की तब इंदिरा गांधी यह कहते हुए कि ‘मुझे अपने देश के हितों की रक्षा करने के लिए दूसरों की नसीहत की ज़रूरत नहीं,वहां फैसला मेरा होगा’ मीटिंग छोड़कर निकल गई थीं ।विदेशमंत्री हेनरी कीसिंगर उनके पीछे भागकर गए थे लेकिन वह लौटने के लिए नहीं मानीं ।बताया जाता है अपने इस अपमान को सह न सकने के कारण निक्सन ने इंदिरा गांधी के खिलाफ कई अपशब्दो का प्रयोग किया था।इंदिरा गांधी तो अपने स्वतंत्र विचारों के लिए जानी जाती हैं ।उनके लिए राष्ट्रहित से बढ़कर कोई चीज़ नहीं थी ।लिहाजा उन्होंने अमेरिकी लोगों से अपील की कि ‘मैं दुनिया के अपने हिस्से की स्थिति को गहराई से समझने के लिए यहां आयी थी लेकिन..’।

यह वही रिचर्ड निक्सन (1913-1994) हैं जिनपर डेमोक्रेटिक पार्टी के मुख्यालय वॉटरगेट में चोरी कराने का आरोप लगा था और इसे निक्सन के प्रशासन से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक घोटाला माना जाता है ।यह घोटाला निक्सन के 1972 के पुनर्निवाचन अभियान से जुड़े एक समूह के सदस्यों के आसपास घूमता है जिन्होंने वॉशिंगटन डीसी में वाटरगेट परिसर में वाटरगेट होटल में डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के मुख्यालय में घुसपैठ की ।इस सुराग का पीछा किया ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ के पत्रकार कार्ल बर्नस्टीन और बॉब वुडवर्ड ने ।उन्होंने इस कांड का बारीकी से अध्ययन करके इसमें राष्ट्रपति निक्सन की भूमिका को उजागर किया था।अंततः 9 अगस्त,1974 को उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया ।ऐसा करने वाले वह एकमात्र अमेरिकी राष्ट्रपति बन गये ।लेकिन निक्सन को उनके उत्तराधिकारी जेराल्ड फोर्ड ने 8 सितम्बर को माफ़ कर दिया लेकिन जनता ने न तो रिपब्लिकन पार्टी को माफ किया और न ही जेराल्ड फोर्ड को ।1974 के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी ने सेनेट की चार और प्रतिनिधिसभा की 48 सीटें खो दीं और 1976 का राष्ट्रपति चुनाव फोर्ड हार गये ।

जेराल्ड फोर्ड (13 जुलाई,1913-26 दिसंबर,2006) के राष्ट्रपति बनने की कहानी बहुत दिलचस्प है ।राष्ट्रपति से पहले वह उपराष्ट्रपति बने जब स्पिरो एग्न्यू (1918-1996) ने 10 अक्टूबर, 1973 को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया । स्पिरो एग्न्यू पर जबरन वसूली,कर धोखाधडी, रिश्वतखोरी और साजिश जैसे अपराध थे ।अपने उपराष्ट्रपतिकाल में उन पर एक लाख डॉलर से अधिक रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया जिसकी वजह से उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा ।बताया जाता है कि एग्न्यू मैरीलैंड के गवर्नर के रूप में भी बहुत भ्रष्ट थे और उनपर कई संगीन आरोप लगे थे ।अक्टूबर,1973 में अपमानजनक तरीके से इस्तीफा देने के बाद फिर कभी रिचर्ड निक्सन से बात नहीं की।अपने पद से इस्तीफा देने वाले वह दूसरे उपराष्ट्रपति थे,जॉन सी कैलहौन पहले थे ।

अमेरिकी संविधान के अनुसार यदि उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के इस्तीफों से कोई पद रिक्त होता है तो उनके स्थान पर प्रतिनिधिसभा का स्पीकर चुना जाता है ।1973 में स्पिरो एग्न्यू के इस्तीफे के बाद जेराल्ड फोर्ड ने उपराष्ट्रपति के रूप में काम किया ।इससे पहले 1949 से 1973 तक उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधिसभा के सदस्य के रूप में काम किया। रिपब्लिकन पार्टी के जेराल्ड फोर्ड की सेनेटर बनने में कभी रुचि नहीं रही ।हालांकि प्रतिनिधिसभा का कार्यकाल दो बरस का होता है लेकिन वह सदन का अध्यक्ष बनने को अपनी ‘अंतिम उपलब्धि’ बताते हुए कहा करते थे कि 434 लोगों का मुखिया बनना कोई कम उपलब्धि है । फोर्ड अपने सहयोगियों के बीच ‘कांग्रेसमैन के कांग्रेसमैन’ के रूप में प्रसिद्ध थे । अमेरिका में सेनेट और प्रतिनिधिसभा को कांग्रेस कहते हैं और सांसदों को कांग्रेसमैन ।सभी के कार्यकाल संविधान द्वारा निर्धारित हैं: राष्ट्रपति चार वर्ष, सेनेटर छह साल और प्रतिनिधिसभा का सदस्य दो बरस ।

हमारे देश में भी जब पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तो वह भी यह मानते थे कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति बाद प्रोटोकाल में लोकसभा के स्पीकर आते हैं ।1969 में राष्ट्रपति ड़ॉ ज़ाकिर हुसैन का निधन हो गया और उपराष्ट्रपति वी वी गिरि ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया तो पंडित नेहरू की सोच के मुताबिक लोकसभा स्पीकर का हक़ कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने का बनता था लेकिन इंदिरा गांधी ने इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतउल्ला को चुना ।इस पर जब किसी पत्रकार ने उनसे पूछा कि आपने पंडित नेहरू की सोच का अनुसरण क्यों नहीं किया? उनका उत्तर था,’लोक सभा स्पीकर नीलम संजीव रेड्डी थे ।’ उनके कार्यवाहक राष्ट्रपति बनते ही उनका सबसे पहला आदेश होता इंदिरा गांधी सरकार की बर्खास्तगी ।क्या सही और बेबाक टिप्पणी थी इंदिरा गांधी की ।

बहरहाल, 1971 के जंग में भारत की निर्णायक जीत से इंदिरा गांधी की ख्याति विश्व भर बढ़ गयी ।जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को उनके सातवें बेड़े के जवाब में उन्होंने कहा था कि ‘आप सातवां तो क्या सत्तरवां बेड़ा भी पाकिस्तान की मदद के लिए भेजेंगे तो उसका मुंह तोड़ जवाब दिया जाएगा ।मुझे अपने देशवासियों की एकता पर नाज़ है और अपने सशस्त्र बल के शौर्य और पराक्रम पर भरोसा।’ युद्ध की समाप्ति पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सेनाध्यक्ष सैम मानेकशा, वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ़
मार्शल पी. सी. लाल तथा नौसेनाध्यक्ष एडमिरल एस. एम. नंदा को बधाई दी ।इस युद्ध में प्रमुख भूमिका जनरल मानेकशा की थी इसलिए उनकी पदोन्नत कर फ़ील्ड मार्शल बनाया गया । मानेकशा भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल बने ।इंदिरा गांधी तो उन्हें चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) बनाना चाहती थीं लेकिन नौसेना और वायुसेना के कमांडरों की कई आपत्तियों को देखते हुए यह फैसला रद्द कर दिया गया ।हालांकि मानेकशा को 1972 में सेवानिवृत्त होना था लेकिन उनका कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया तथा उन्हें ‘सशस्त्र बलों और राष्ट्र के लिए उत्कृष्ट सेवाओं के सम्मान में पहली जनवरी, 1973 को फ़ील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत किया गया ।

3 अप्रैल, 1914 में अमृतसर में जन्मे सैम होर्मुसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशा का 27 जून,2008 को वेलिंगटन में निधन हुआ ।वह सैम बहादुर के नाम से प्रसिद्ध थे । तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के परामर्श पर 28 अप्रैल, 1986 को स्वतंत्र भारत के पहले सेनाध्यक्ष के.एम. करिअप्पा (28 जनवरी,1899-15 मई,1993) को तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैलसिंह ने फ़ील्ड मार्शल का पद प्रदान किया ।भारतीय वायुसेना में एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह (15 अप्रैल,1919-16,सितम्बर, 2017) पहले और एकमात्र अधिकारी थे जिन्हें 26 जनवरी, 2002 को भारतीय वायुसेना के मार्शल के रूप में पांच सितारा रैंक पर पदोन्नत किया गया था,जो फ़ील्ड मार्शल की सेना रैंक के बराबर है और जीवन भर के लिए रखा जाता है ।23 अप्रैल, 2002 को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने राष्ट्रपति भवन में एक विशिष्ट समारोह में अर्जन सिंह को मार्शल का बैटन सौंपा । फ़ील्ड मार्शल मानेकशा और मार्शल अर्जन सिंह सहित कुछ फौजी अधिकारियों से निजी बातचीत पर आधारित पोस्ट फिर कभी । 1971 में इंदिरा गांधी को भारत रत्न से विभूषित किया गया ।

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय और पूर्वी पाकिस्तान के स्थान पर नये देश के तौर पर बंगलादेश के अभ्युदय के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश-विदेश से बधाइयों और शुभकामनाओं के संदेशों की भरमार थी लेकिन इंदिरा गांधी इस जीत का श्रेय भारतीय सशस्त्र बलों को देते हुए कहती थीं कि कुछ बड़े और शक्तिशाली देशों की ‘धमकियों’ की परवाह किए बिना राष्ट्रीय एकता का जो परिचय दिया है उस पर पूरे राष्ट्र को गर्व है । श्रीमती गांधी ने सशस्त्र बलों के हर सुझाव को अंगीकार किया था ।उनकी इस शालीनता के बावजूद जहां विपक्षी नेता अटलबिहारी वाजपेयी को इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा का रूप’ कहते थे तो अमेरिकी विदेशमंत्री हेनरी कीसिंगर उन्हें ‘आयरन लेडी’ के तौर पर वर्णित किया करते थे। इंदिरा गांधी की सोच बहुत ही संयत और संतुलित रहा करती थी। उन्हें व्यग्र होते तो मैंने कभी नहीं देखा था ।

1971 की जीत की खुमारी धीरे-धीरे उतरनी शुरू हो गयी थी ।कई मुद्दों और मामलों में विपक्ष इंदिरा गांधी को आड़े हाथों ले रहा था ।कुछ को उनकी शासन शैली पसंद नहीं थी । अपनी अहमियत बनाये रखने की कला में श्रीमती गांधी निपुण थीं ।पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने परमाणु कार्यक्रम को विकसित करने के सपने देखे थे ।इस बीच चीन ने परमाणु परीक्षण किया जिसे इंदिरा गांधी ने उसकी ‘धमकी’ के तौर पर लिया । उन्होंने परमाणु वैज्ञानिक राजा रमन्ना से अपने देश के परमाणु हथियारों की क्षमता की बात की ।उन्हें बताया गया कि वैज्ञानिक तौर पर हम तैयार हैं लिहाजा 1974 में भारतीय सेना द्वारा राजस्थान के पोखरण टेस्ट रेंज में तैयारियों के बाद ‘स्माइलिंग बुद्धा’ नाम से एक भूमिगत परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक किया गया । दुनिया चुप थी लेकिन पाकिस्तान को तकलीफ हुई और प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने ज़ोरदार विरोध करते हुए इस परीक्षण का प्रस्तुतिकरण उसे डराने के तौर पर किया ।लेकिन इंदिरा गांधी ने भुट्टो समेत दुनिया के देशों को एक पत्र भेजकर बताया कि यह परीक्षण शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए था और औद्योगिक तथा वैज्ञानिक उपयोग के लिए अपने कार्यक्रम को विकसित करने की प्रतिबद्धता का हिस्सा था ।बावजूद इसके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस परीक्षण की खासी आलोचना हुई और विदेशी निवेश तथा व्यापार में भी गिरावट आयी लेकिन घरेलू स्तर पर यह परमाणु परीक्षण बहुत लोकप्रिय रहा जिससे इंदिरा गांधी और कांग्रेस की छवि में वृद्धि हुई ।

लेकिन 12 जून,1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा ने अपने एक फैसले में 1971 में लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जीत को राज नारायण द्वारा चुनौती देने वाले मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए श्रीमती गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी ठहराया और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत उन्हें कोई भी निर्वाचित पद ग्रहण करने से अयोग्य घोषित कर उनके चुनाव को रद्द कर दिया तथा अगले छह बरसों तक चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित कर दिया गया । 1971 के लोकसभा चुनाव में राय बरेली से इंदिरा गांधी ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राज नारायण को 1,10,000 मतों से हराया था ।राज नारायण ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर कर श्रीमती गांधी के निर्वाचन को चुनौती दी थी ।

इस फैसले को लेकर विपक्ष ने इंदिरा गांधी को त्यागपत्र देने के लिए आंदोलन किये ।कांग्रेस के भीतर भी मंथन हुआ । कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने तक विदेशमंत्री स्वर्णसिंह को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाने का सुझाव दिया लेकिन इसे अमान्य कर दिया गया ।बताया जाता है कि इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय गांधी सहित कुछ करीबी लोगों से सलाह मशविरा करके देश में ‘आंतरिक गड़बड़ी’ के आधार पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल की घोषणा की सिफारिश की ।यह आपातकाल 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक रहा । 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी राय बरेली से और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गये । सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से सभी विपक्षी पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी बनायी जिसे 1977 में पूर्ण बहुमत मिला और प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई तथा चौधरी चरण सिंह उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री बनाये गये । वह इंदिरा गांधी को तुरंत गिरफ्तार करना चाहते थे लेकिन मोरारजी देसाई चाहते थे कि कानून के खिलाफ जाकर कुछ भी काम न किया जाये ।लिहाजा चौधरी चरण सिंह अब सबूत जुटाने में जुट गये ।उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर चुनाव प्रचार में इस्तेमाल की गयी 104 जीपों की खरीददारी में भ्रष्टाचार का आरोप लगा उसे घोटाले की शक्ल में एक मजबूत मामला बनाया गया । श्रीमती गांधी पर आरोप था कि ये जीपें कांग्रेस पैसे से नहीं खरीदी गयी हैं बल्कि इसका भुगतान किसी बिज़नेसमैन द्वारा किया गया है और सरकारी पैसे का उपयोग भी इन्हें खरीदने के लिए हुआ है । इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने का दायित्व सीबीआई के एक अधिकारी एन के सिंह को सौंपा गया ।3 अक्टूबर, 1977 को वह अधिकारी इंदिरा गांधी के 12, विलिंगटन क्रीसेंट (वर्तमान में मदर टेरेसा क्रीसेंट) आवास पर उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पहुंच गये । इंदिरा गांधी ने उस अफसर को हथकड़ी लगाने के लिए कहा ताकि लोगों की उन्हें सहानुभूति मिल जाए लेकिन उसने मना कर दिया ।वह अधिकारी इंदिरा जी को गिरफ्तार कर बड़खल ले जा रहे थे कि बंद रेलवे फाटक के पास जब जीप रुकी तो इंदिरा गांधी उससे उतरकर एक पुलिया पर जाकर बैठ गयीं । इंदिरा जी को पुलिया पर बैठा देख आसपास की भीड़ वहां पहुंचने लगी और इंदिरा गांधी जिंदाबाद के नारे लगने शुरू हो गये जिसके चलते उन्हें बड़खल नहीं ले जाया गया ।अगले दिन 4 अक्टूबर को जब मजिस्ट्रेट आर. दयाल के सामने पेश किया गया तो उन्होंने अभियोजन पक्ष से पूछा कि आपके पास जीप स्कैम को लेकर क्या सबूत हैं तब प्रासीक्यूटर ने कोर्ट को बताया कि एफ़आईआर तो दर्ज हो चुकी है,सबूतों को जमा करने में कुछ समय लगेगा ।साक्ष्य के अभाव में यह केस खारिज कर दिया गया और कांग्रेस के कार्यकर्ता खुशी से झूम उठे ।

इंदिरा गांधी से अक्सर मेरी मुलाकातें होने लगीं ।मेरा यह उसूल है कि जब कोई व्यक्ति सत्ता में नहीं होता तो उसे मैं ज़रूर मिलता हूं ।इंदिरा गांधी को कोर्ट में देखा था । उसके बाद 12,विलिंगडन क्रीसेंट में आना जाना शुरू हो गया ।अब उन्हें मिलने वालों की संख्या कम हो गयी थी।वही लोग मिलने के लिए आते थे जिन्हें उनसे किसी प्रकार की अपेक्षाएं नहीं हुआ करती थीं ।वह अब किसी सार्वजनिक सभाओं और डिप्लोमेटिक पार्टियों में भी दीख जाती थीं ।एक बार मैं अपनी पत्नी के साथ एक डिप्लोमेटिक पार्टी में गया ।वहां इंदिरा गांधी से भी भेंट हो गयी ।उनसे मैंने अपनी पत्नी का परिचय कराया । उनसे मिलकर वह खुश हुईं और कहा कि ‘इसके साथ पार्टियों में आती जाती रहें।’ मेरी पत्नी को गले लगाकर वह दूसरे लोगों से मिलने के लिए चली गयीं ।

मैंने महसूस कि सत्ता में न होने के बावजूद इंदिरा गांधी का आज भी बहुत आकर्षण है ।लगता है उनमें जनमानस को सम्मोहित करने की कला है । यह भी सही है कि वह अपनी सोच और नीतियों के प्रति सदा अक्षुण्ण रही हैं ।बीच में कई बड़े बड़े नेता कांग्रेस छोड़ कर उनसे अलग होते रहे लेकिन उन्होंने न कभी किसी को रोका और न मनाया ही । 1977 के चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस विभाजित हो गयी ।जगजीवन राम,हेमवती नंदन बहुगुणा,नन्दिनी सत्पथी जैसे दिग्गज नेताओं ने कांग्रेस छोड़ कांग्रेस फ़ॉर डेमोक्रेसी (सीएफडी) जैसी ईकाई का गठन किया लेकिन इंदिरा गांधी पर इसका कोई असर नहीं पड़ा ।प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कांग्रेस ने लोकसभा में 153 सीटें जीत लीं ।क्योंकि वह और संजय गांधी दोनों चुनाव हार गये थे इसलिए कांग्रेस पार्टी ने
यशवंतराव चव्हाण को संसदीय दल का नेता नियुक्त किया ।लेकिन नवंबर,1978 में कर्नाटक के चिकमंगलूर निर्वाचन क्षेत्र में एक उपचुनाव जीत कर वह पुन: लोकसभा में पहुंच गयीं और उन्होंने विपक्षी नेता की भूमिका निभायी ।एक बार मैंने इंदिरा गांधी से पूछा कि 1969 से कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह अभी तक चल रहा है,मेरा यह सवाल सुनकर वह मुस्कराईं और फिर बोलीं,’यह तो अच्छी बात है ।किसी को दिल मसोस कर पार्टी में नहीं रहना चाहिए।जो लोग पार्टी के प्रति समर्पित हैं पार्टी नेतृत्व भी उनकी कद्र करता है ।1977 का चुनाव परिणाम आप देख चुके हैं, कांग्रेस विरोधी हवा के बावजूद हमने 153 सीटें प्राप्त कर लीं ।देखियेगा भानुमति का यह पिटारा ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है ।’ कितनी सही और सटीक भविष्यवाणी थी इंदिरा गांधी की ।

दरअसल इंदिरा गांधी से इतनी सारी मुलाकातें रही हैं जिनके आधार पर एक किताब लिखी जा सकती है ।उनके साथ कई गंभीर मुद्दों पर चर्चाएं भी होती रहती थीं जिन्हें सार्वजनिक करने की मनाही थी ।1980 में कांग्रेस की जीत और इंदिरा गांधी की प्रधानमंत्री के तौर पर वापसी के बाद मुलाकातें कम हो गयी थीं लेकिन खत्म नहीं ।इधर ‘दिनमान’ में भी हमारे नये
सांपादक डॉ कन्हैयालाल नंदन ने सच्चिदनंद वात्स्यायन और रघुवीरसहाय से चली आ रही मेरी विदेश और प्रतिरक्षा की बीट से हटाकर मुझे राष्ट्रीय और स्थानीय समाचारों में डाल दिया ।लिहाजा 31अक्टूबर, 1984 को जब इंदिरा गांधी की हत्या की खबर आयी तो उसकी आंखों देखी कवरेज का ज़िम्मा मुझे सौंपा गया ।अपनी ड्यूटी का निर्वाहन करने के लिए मैं अपने बेटे अमरदीप सिंह के साथ सुबह छह बजे ही तीन मूर्ति भवन पहुंच गया ।करीब आठ बजे अमिताभ बच्चन,रोमी चोपड़ा,राजीव गांधी और राहुल गांधी इंदिरा गांधी का शव लेकर तीन मूर्ति भवन पहुंचे ।इन लोगों के अलावा मैं और मेरा बेटा ही वहां उपस्थित थे जिन्होंने इंदिरा गांधी के शव के बिल्कुल करीब जाकर अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित की थी।अपनी श्रृद्धांजलि देकर हम दोनों जब कमरे से बाहर निकले तो वहां जमा भीड़ ने सिखों के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिये । स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए दिल्ली पुलिस उपायुक्त हरिदेव पिल्लाई और पंडित गौतम कौल ने हमें वहां से तुरंत निकल जाने के लिए कहा ।खतरे का आभास तो मुझे भी हो गया था बावजूद इसके मैं अपने बेटे अमरदीप को घर छोड़कर अपने स्कूटर से दरियगंज स्थित ‘दिनमान’ ऑफ़िस की ओर चल पड़ा ।रास्ते में कई घूरती नजरें भी देखीं ।दिल्ली गेट चौराहे पर एक भलेमानुस ट्रैफिक सिपाही ने मुझे दरियगंज के भीतर से तेजी के साथ निकल जाने की सलाह देकर मेरी जान बचा ली ।

खैर किसी तरह मैं ‘दिनमान’ के ऑफ़िस पहुंच गया ।गेट पर सांपादक कन्हैयालाल नंदन समेत सभी लोग मौजूद थे ।ऊपर पहुंचकर अपने टेबल पर रखे टाइपराइटर पर मैंने आंखों देखी रपट लिखनी शुरू कर दी ।करीब दो घंटे के बाद अपनी कॉपी संपादक के कक्ष में पहुंचा दी ।उसमें उन्होंने एक संपादकीय टिप्पणी लिखी कि किस प्रकार अपनी जान को जोखिम में डाल कर हमारे संवाददाता त्रिलोक दीप ने यह आंखों देखी रिपोर्ट लिखी है ।’दिनमान’ का ऑफ़िस दूसरी मंज़िल पर स्थित था। वहां से आसपास का नज़ारा दिखायी देता है इसलिए हमने शाहदरा को जलते हुए देखा था ।दरियगंज के गोलचा के आसपास का वातावरण भी खौफनाक बताया जा रहा था ।घर से चिंतित परिवार फोन कर रहा था तो बगदाद (इराक) में बैठा मेरा बड़ा बेटा मनदीप सिंह मेरी सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद था ।मेरी सुरक्षा तो मेरे सहयोगियों के लिए भी चिंता का विषय थी लेकिन सांपादक कन्हैयालाल नंदन ने टाइम्स ऑफ इंडिया के महाप्रबंधक रमेशचंद्र जी से बात करके 4, तिलक मार्ग स्थित गेस्ट हाउस में रात बिताने का इंतजाम कर दिया ।मेरे साथ एक और साथी परमजीत सिंह भी था । अगले दिन सुबह चार बजे रमेशचंद्र जी की कार से हम लोग अपने अपने घर पहुंचे ।मेरे अगले दस दिन घर में ही बीते।मित्रों और हितैषियों के फोन लगातार आ रहे थे और बगदाद से मेरे बेटे मनदीप सिंह के भी ।

भारतीय सशस्त्र सेना के शौर्य और पराक्रम के कारण ही 7 मई, 2025 को आधी रात के बाद और अगले दिन की भोर होने से पहले उन्होंने एक बजकर पांच मिनट पर पाकिस्तान स्थित नौ आतंकी ठिकानों को खंडहर में तबदील कर दिया ।इनमें मरकज सुभान अल्लाह, बहावलपुर,सरजाल सियालकोट,मरकज तैयबा,मुरीदके और मेहमोना ज़ोया,सियालकोट चार पाकिस्तान के थे जबकि बरनाला (पंजाब वाला नहीं) भिम्बर,अब्बास कोटली,गुलपुर कोटली,सवाई नाला, मुजफ्फराबाद और सईदना बिल्ल, मुजफ्फराबाद के पांच ठिकाने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में हैं ।इनमें बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय है जबकि मुरीदके लश्कर-ए-तैयबा का ।ये दोनों ही मुख्यालय पंजाब में हैं तथा तीसरा हिजबुल मुजाहिद्दीन पीओके में है ।बताया जाता है कि पाकिस्तान में 21 आतंकी शिविर हैं लेकिन प्रहार के लिए नौ प्रमुख ठिकानों को चुना गया ।ये शिविर आतंकियों को प्रशिक्षण देते थे ।इन आतंकी शिविरो पर भारत के लड़ाकू विमानों ने ‘आपरेशन सिंदूर’ के तहत ध्वस्त कर दिया ।सशस्त्र बलों के हमले का नाम ‘आपरेशन सिंदूर’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुना । इस हमले में एक सौ आतंकी मारे गये लेकिन उनके तीनों सरगना हाफिज़ सईद,मौलाना मसूद अज़हर और सैयद सलाउद्दीन बच गये या यों कहें कि पाकिस्तानी आईएसआई ने उन्हें बचा लिया किसी सुरक्षित बिल में छुपा कर । लेकिन मसूद अज़हर के दस रिश्तेदार मारे गये ।उनकी मौत से दुखी होकर वह फूट फूट कर रोया था ।उस वक़्त मौलाना यह भूल गया कि उसके प्रशिक्षित आतंकी जिन लोगों को मारते हैं उनके भी रिशतेदार और सगे संबंधी होते हैं ।पहलगाम में तो हद ही हो गयी पत्नी के सामने पति को मार डाला और बच्चों के सामने उनके पिता को ।इससे बड़ा कोई नृशंस अपराध होता है क्या !

जिस तरह से 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सशस्त्र बलों में जनरल सैम मानेकशा,एयर चीफ़ मार्शल पी सी लाल तथा नौसेना प्रमुख एस एम नंदा थे मई, 2025 के सैन्य संघर्ष (इसे पूरा युद्ध नहीं कहा जा सकता) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सशस्त्र बलों में चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान,सेनाध्यक्ष जनरल उपेन्द्र द्विवेदी, वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ़ मार्शल अमरप्रीत सिंह तथा नौसेनाध्यक्ष दिनेश के. त्रिपाठी । इस बार सैन्य संघर्ष में मुख्य भूमिका वायुसेना की ही रही लेकिन थलसेना और नौसेना पूरी तरह से मुस्तैद थीं ।प्रधानमंत्री मोदी, प्रतिरक्षामंत्री राजनाथ सिंह,गृहमंत्री अमित शाह तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ पूरे सश्स्त्र बलों से सलाह मशविरा करते थे ।कभी कभी प्रधानमंत्री वायुसेनाध्यक्ष अमरप्रीत सिंह से अलग भी बातचीत कर लेते थे ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी सेनाध्यक्ष सैम मानेकशा से किया करती थीं ।बेशक युद्ध में जाने का निर्णय राजनीतिक नेताओं का होता है लेकिन जमीनी हक़ीक़त से उन्हें अवगत कराने की जिम्मेदरी सशस्त्र बलों की होती है क्योंकि दुश्मन के खिलाफ रणनीति और समरनीति तो उन्हें ही युद्धक्षेत्र में तय करनी होती है ।

देखा जाये तो 1947 के समय या उसके बाद जो बच्चे पैदा हुए उन्हें तो शायद मालूम था कि कभी भारत और पाकिस्तान एक ही देश था ।1965 के युद्ध तक भी 18-19 साल के बच्चे इस हक़ीक़त से वाकिफ थे और संभवतः 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय की पीढियाँ भी । 1990 में मैं जब पहली बार पाकिस्तान गया तो मुझे कई गबरू जवान मिले जिन्हें अविभाजित हिंदुस्तान की जानकारी थी लेकिन अफसोस इस बात का था और आज भी है कि पाकिस्तान के बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में पाकिस्तान की अलग तस्वीर पेश की जाती है ।1971 के युद्ध के समय तक पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगलादेश) की पीढ़ी को एक हिंदुस्तान की जानकारी थी । जिस तरह से पहलगाम के बैसरन में आतंकियों ने धर्म पूछ कर बेकसूर लोगों को मारा था वहीं भारतीय जाँबाज़ कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने आतंकियों और पाकिस्तानी सशस्त्र बलों को अपने मिसाइलों की प्रहार शक्ति से उनकी सूझबूझ की क्षमता कुन्द कर दी जिस तरह से नौ आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया गया ।उससे मिली कामयाबी से प्रेरित होते हुए एयर चीफ़ मार्शल अमरप्रीत सिंह ने कहा था कि ‘तुमने धर्म पूछ कर निर्दोष लोगों को मारा, हमारे जाँबाज़ अपना धर्म बताकर तुम्हारे होश ठिकाने लगाकर आए हैं ।’

भारत और पाकिस्तान के बीच अभी तक चार लड़ाइयां हुई हैं,1947,1965,1971 और 1999।पहली तीन लड़ाइयों में मुख्य मुद्दा कश्मीर था जबकि 1971 में पूर्वी पाकिस्तान की फौज ने हिंदुस्तान को उकसाया था ।1947 में जब पाकिस्तान के
कबाइलियो ने कश्मीर पर हमला किया तो तब तक कश्मीर के महाराजा ऊहापोह की स्थिति में थे कि कश्मीर को हिंदुस्तान के साथ मिलना चाहिए या पाकिस्तान के साथ ।लेकिन पाकिस्तानी हमले से वह हिल गये और उन्होंने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मदद मांगी ।पंडित जी अपने सैनिकों को तुरंत विमानों से कश्मीर भेजा जिन्होंने पाकिस्तानी कबाइलियो और फौजियों को खदेड़ा ।लेकिन उनके हत्थे कश्मीर का जितना हिस्सा चढ़ गया वही आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके)है जिसे पाकिस्तान में आज़ाद कश्मीर कहा जाता है ।इस लड़ाई के बाद महाराजा हरि सिंह ने भारत में शामिल होने का फैसला किया था । 2025 सहित पाकिस्तान के साथ भारत के पांच युद्ध हुए हैं और पांचों में ही उसने मात खाई है ।यह है भारतीय सशस्त्र बलों का शौर्य,पराक्रम और अनुशासन ।सलाम देश के इन वीरों और वीरांगनाओं को ।

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