काबुल में तिरंगा फहराने वाले राजा महेंद्र प्रताप
1956 में लोकसभा सचिवालय में मेरा चयन कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ था उसका उल्लेख मैं पहले कर ही चुका हूं । पहली नियुक्ति गैरसरकारी विधेयक और संकल्पों की शाखा (पीएमबी ब्रांच) में हुई थी जिसका बाद में लेजिस्लेटिव ब्रांच में विलय हो गया था।मेरे एक सहयोगी कश्मीरीलाल भांबरी ने आगाह किया कि ऑफ़िस में प्रवेश करते समय सांसदों और मंत्रियों के समूह या झुंड को देखकर आतंकित मत होना ।संसद भवन से बाहर या अपने निर्वाचन क्षेत्रों में बेशक वे महत्वपूर्ण या अतिमहत्वपूर्ण हो सकते हैं लेकिन यहां वे अपने प्रश्न,विधेयक और संकल्प देते हैं जिनकी हम लोग जांच पड़ताल करके देखते हैं कि ये स्वीकृत करने योग्य हैं कि नहीं ।कभी कभी सांसद ब्रांच में भी आ सकते हैं अपने किसी विधेयक या संकल्प की जानकारी लेने के लिये । किसी असिस्टेंट की सलाह पर वह अपने मूल विधेयक या संकल्प में संशोधन करते हुए भी देखे जा सकते हैं ।ये सभी सांसद (और मंत्री भी) सभी बहुत ही विनम्र होते हैं ।इसकी एक वजह शायद यह है कि इन में से अधिकांश सांसद स्वाधीनता संग्राम से जुड़े रहे हैं और वे आमजन की सोच और मानसिकता से भलीभांति परिचित होते हैं ।उनके लिए महत्वपूर्ण तो ‘आमजन’ ही हैं ।इन सांसदों में कुछ भूतपूर्व रियासतों के राजा-महाराजा भी रहे हैं ।कुछ सांसद आज भी अपने नाम के साथ महामहिम (हिज हाईनेस) लिखा जाना पसंद करते हैं, सभी नहीं ।यह 1956 की बात है ।
आम तौर पर हम लोग मेन गेट (गेट नंबर एक) से ऑफ़िस आते थे और एक नंबर लिफ्ट से ही तीसरी मंज़िल पर अपनी ब्रांच में जाया करते थे ।दूसरी मंज़िल पर संसदीय कार्य मंत्रलाय था और पहली मंज़िल पर ऑफ़िस के नाम पर वहां मीडिया के लिए सूचना ब्रांच थी जबकि मीटिंग्स के लिए बड़े बड़े हाल थे और शशि राम का रेस्टोरेंट भी ।टी हाउस और कॉफ़ी हाउस के काउंटर लोकसभा और राज्यसभा के बीच केंद्रीय कक्ष के पास हैं ।इसी रास्ते से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आम तौर से लोकसभा से राज्यसभा की ओर जाया करते थे ।कुछ लोग उनकी इस आदत से परिचित थे और ऐसे लोग पंडित जी से मिलने का कोई मौका नहीं गंवाते थे ।

सोफे के बीच धंसकर बैठे होशियारपुर के छोटे कद के प्रोफेसर दीवान चंद शर्मा पंडित नेहरू को लोकसभा के सदन से आता देखकर सोफे से उछल कर उठते और बोलते पंडित जी पंडित जी ।पंडित नेहरू रुक जाते और कहते कहिये प्रोफेसर साहब,क्या बात है ।बिना किसी भूमिका के प्रो शर्मा तपाक से बोलते कि हम पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो से तंग आ गये हैं,वह हमारा कुछ भी काम नहीं करते, हम भला अपने हलके में मतदाताओं को क्या मुंह दिखाएंगे ।पंडित जी उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें आश्वस्त करते हैं कि आप हमारे सदन की शान हैं,रूह हैं,आप के काम भला कौन रोक सकता है ।आगे बढ़ते तो भक्त दर्शन भी हाथ जोड़े खड़े मिल जाते और उत्तराखंड के मसलों की चर्चा करते ।अभी वह राज्यसभा की तरफ जाने वाली चार पांच सीढ़ियों को पार करने को ही होते कि कहीं से आवाज़ आती पंडित जी पंडित जी। नेहरू जी मुड़ कर देखते तो सांसद उपाध्याय जी कुछ महिलाओं और लड़कियों के साथ खड़े होते ।कहते ये लोग आपके दर्शन करना चाहती हैं ।
पंडित जी हाथ जोड़कर आगे निकल जाया करते थे ।पंडित जी ने देखा कि यह तो उपाध्याय जी का रोज़ का काम बन गया है ।एक दिन जब उपाध्याय जी अपनी आदत के मुताबिक कुछ महिलाओं और लड़कियों के साथ प्रधानमंत्री निवास तीन मूर्ति पहुंच गये पंडितजी ने सोचा कि यह तो अति हो गयी है ।वह खीझ कर बोले ‘उपाध्याय जी आपको कोई और काम भी है या नहीं है ।यह क्या रोज़ रोज़ का धंधा बना रखा है आपने ।जाइये कुछ पार्टी का काम कीजिये ।’ ‘हां’ कहकर उस समय तो मुंह लटका कर उपाध्याय जी चले गये लेकिन महीने-दो महीने बाद फिर से उसी पुराने काम में सक्रिय हो जाते। उपाध्याय जी की इस मानसिकता के बारे में किसी को भी नहीं पता था, साथी सांसदों को भी नहीं ।
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एक दिन पंडित जी उन महिलाओं को हाथ जोड़ नमस्कार कर आगे बढ़ने को हुए कि उनकी नज़र राजा महेंद्र प्रताप पर पड़ गयी। पंडित जी ने स्वयं उनके पास जाकर अभिवादन किया और हालचाल पूछा। पंडित जी के सचिव यशपाल कपूर ने इसकी वजह यह बतायी कि राजा महेंद्र प्रताप स्वतंत्रता सेनानी,पत्रकार, क्रांतिकारी,लेखक,महान दानवीर और समाज सुधारक होने के अलावा अफगानिस्तान में भारत की अंतरिम सरकार के अध्यक्ष थे ।उन्होंने 1915 में काबुल में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान निर्वासित भारतीय सरकार के रूप में काम किया और वहां पर तिरंगा झंडा फहराया जो कि उन दिनों बड़ा जोखिम भरा काम था ।इससे ब्रिटिश भारत सरकार में हड़कंप मच गया था ।लेकिन राजा महेंद्र प्रताप की हिम्मत की दाद उस समय स्वधीनता संग्राम से जुड़े सभी वर्गों ने दी थी ।पंडित नेहरू एक तो उनके इस साहसिक कार्य के मुरीद थे और दूसरे वह राजा महेंद्र प्रताप से आयु मे भी तीन साल छोटे थे।राजा महेंद्र प्रताप 1 दिसंबर,1886 जन्मा हैं जबकि पंडित नेहरू 14 नवंबर,1889।
भारत के स्वधीनता संग्राम में बहुत लोग सक्रिय रहे हैं देश और विदेश दोनों स्थानों पर ।भारत में जहां महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका थी तो वहां सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव,बटुकेश्वर दत्त,चंद्रशेखर आजाद, यशपाल, सच्चिदनंद वात्स्यायन,बिमलप्रसाद जैन आदि जैसे क्रान्तिकारियों की अपनी जुदा । मकसद सभी का समान था हिंदुस्तान की आज़ादी ।बताया जाता है कि अंग्रेज़ी हुकूमत में दहशत पैदा करने के लिए भगत सिंह ने असेंबली में जो बम फेंका था वह सच्चिदनंद वात्स्यायन का बनाया हुआ था जो क्रांतिकारियों में ‘साईंटिस्ट’ के नाम से मशहूर थे। बम फेंकने की यह खबर चंद्रशेखर आजाद और बिमल प्रसाद जैन ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में दी और वहां से तुरंत भाग खड़े हए थे ताकि पुलिस उन्हें देख न ले।
राजा महेंद्र प्रताप 1957-62 में लोकसभा सदस्य रहे ।उन्होंने मथुरा से निर्दल उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था।उन्होंने कांग्रेस के चौधरी दिगंबर सिंह और जनसंघ (बाद में भारतीय जनता पार्टी) के अटल बिहारी वाजपेयी को पराजित किया। मैं पहली लोक सभा में सचिवालय की नौकरी में आ गया था ।दूसरी लोकसभा (1957-62) पूरी और तीसरी लोकसभा (1962-67) में 1965 तक रहा। वहां पर काम करते हुए मैंने महसूस किया था कि इस दौर में अधिसंख्य सदस्यों का जुड़ाव स्वधीनता संग्राम से किसी न किसी तरह था ।कुछ नामों का मैं पहले उल्लेख कर चुका हूं और कुछ का आने वाली अगली किश्तों में किया जायेगा ।उस समय ऐसे भी सांसद थे जो अपने बारे में कम ही बातचीत किया करते थे ।बावजूद इसके राजा महेंद्र प्रताप के बारे में कुछ लोग इतना भर जानते थे कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में रहते हुए भारत की निर्वासित सरकार के ‘राष्ट्रपति’ के तौर पर काबुल में तिरंगा झंडा फहराया था ।क्योंकि पंडित नेहरू,जो स्वयं स्वाधीनता सेनानी थे, राजा महेंद्र प्रताप की वैश्विक भूमिका से परिचित थे इसलिए उन्होंने राजा महेंद्र प्रताप के साथ बहुत वक्त गुजारा ।भक्त दर्शन,प्रो दीवान चंद शर्मा और उपाध्याय जी दूर खड़े इन दो नेताओं की भावभंगिमाएं देख पा रहे थे और अगर सब कुछ कोई देख-सुन रहे थे वह थे सिर्फ यशपाल कपूर, जिनकी उस समय पंडित नेहरू के साथ ड्यूटी थी ।
लोकसभा सचिवालय में काम करते हुए मैंने भी राजा महेंद्र प्रताप के बारे में पढ़ रखा था,जिन्हें देश का ‘गुमनाम नायक’ कहा जाता है तो कुछ लोगों के लिए वह ‘आर्यन पेशवा’ थे ।मेरी उनसे टुकड़ों-टुकड़ों में कई मुलाकातें हुई थीं लेकिन मैं तसल्ली से बैठकर उनसे बात करना चाहता था ।एक दिन लोकसभा सचिवालय में ही मुझे ऐसा अवसर मिल गया जब उन्होंने न केवल मुझे स्वाधीनता संग्राम में अपनी भूमिका के बारे में ही बताया बल्कि उन तमाम जत्थेबंदियों का ज़िक्र भी किया जो विदेशों में रहते हुए भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रही थीं। वह 32 वर्ष तक कई देशों में रहते हुए अपने इस अभियान को चलाते रहे और 9 अगस्त 1946 को भारत लौटे । वह बहुत ही विनम्र और दूरदर्शी थे और कहते थे कि स्वधीनता संग्राम के इस यज्ञ में कई जत्थेदारियों ने अपनी अपनी आहुति दी है, मुझसे भी जो बन पड़ा मैंने किया ।
उन्होंने स्वधीनता संग्राम में कूदने का फैसला 1906 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने से किया तब उनकी स्वदेशी आंदोलन में शामिल कई नेताओं से बातें और मुलाकातें हुईं जिसके फलस्वरूप उन्होंने स्थानीय कारीगरों के साथ छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने का निर्णय लिया ।राजा महेंद्र प्रताप ने मुझे बताया था कि न जाने मुझे एक दिन क्या सूझा कि हमें विदेशों में जाकर भी अपने स्वधीनता आंदोलन के बारे में ब्रिटेन विरोधी शक्तियों की मदद से अपनी मुहिम को आगे बढ़ाना चाहिए लिहाजा जनवरी, 1915 में मैं स्विट्ज़रलैंड पहुंच गया ।वहां मेरी मुलाकात वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय से हुई जिनकी पहुंच जर्मन नेताओं तक थी ।मैंने तत्कालीन जर्मन सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय से मिलने की इच्छा जताई जिसकी व्यवस्था कर दी गयी । सम्राट कैसर से मुलाकात में ऐसी रणनीति बनी जिसके अनुसार उनका सुझाव था कि अगर भारत पर अफ़ग़ान सीमा की तरफ से हमला किया जाये तो कैसा रहेगा ।विचार अच्छा था ।पूर्व में भी तैमूर लंग,बाबर तथा अन्य विदेशी आततायियों का इसी रास्ते से हिंदुस्तान पर हमले होते रहे हैं ।इस रणनीति को अंजाम देने से पहले मुझे पोलिश सीमा के पास एक सैन्य शिविर में सेना की नीतियों और उसकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजा गया।अप्रैल,1915 को एक जर्मन राजनयिक, मौलवी बरकतुल्लह और कुछ अन्य सदस्यों के साथ एक प्रतिनिधिमंडल के तौर पर हमने सम्राट कैसर से भेंट की ।वहां पर तुर्की के सुल्तान मोहम्मद रिशाद भी उपस्थित थे ।उन दोनों ने अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह हबीबुल्लाह के नाम एक पत्र दिया जिसे लेकर हम बरास्ता मिस्र के खेडिव और तुर्की के सुल्तान के दामाद और रक्षामंत्री अनवर पाशा से मिले जिन्होंने हमारा मार्गदर्शन करने के लिए अपने एक विश्वसनीय सैन्य अधिकारी के नेतृत्व में दो हज़ार सैनिकों की एक टुकड़ी दी जिस के साथ हम लोग काबुल पहुंचे जहां हमारे प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया । वहां अगली रणनीति पर चर्चाएं हुईं क्योंकि सभी लोग ब्रितानी उपनिवेशवाद के विरुद्ध थे ।
अफगानिस्तान पहुंचकर राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में आज़ाद हिंदुस्तान की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया जिसमें महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति,मौलवी बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री और मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को गृह मंत्री बनाया गया और हम सबने अंग्रेज़ों के खिलाफ जेहाद का ऐलान कर दिया ।ब्रिटिश विरोधी शक्तियों ने हमारे आंदोलन का समर्थन किया लेकिन अफसोस भारत में देसी रियासतों ने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने में हमारा साथ नहीं दिया ।उधर 1918 में कैसर विल्हेम द्वितीय के त्यागपत्र देने से हमारी मुहिम में देरी ज़रूरी हुई लेकिन भारत से अंग्रेज़ों को उठा फेंकने का हमारा जुनून खत्म नहीं हुआ । अफ़ग़ानिस्तान में अब कई सालों से रह रहा था तथा वहां के बादशाह मेरी कई सेवाएं लिया करता ।वह अपने दूत के तौर पर मुझे दूसरे देशों को भेजते थे । कुछ लोग मुझे ‘विश्व महासंघ के प्ररेणता तो कुछ अफ़ग़ानिस्तान का अनौपचारिक दूत कहकर भी संबोधित किया करते थे’।1917 में मैं रूस गया और लेनिनग्राद में ट्राटस्की से मिला ।वहां से कैसर और तुर्की के सुल्तान का संदेश देने के लिए वापस आया ।कुछ समय बुदापेश्त और स्विट्ज़रलैंड में बिताया ।वहां से एक जर्मन जहाज के ज़रिये रूस आया और लेनिन से मेरी मुलाकात हुई।उनसे भी मैंने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में मदद करने की गुहार लगाई ।उन्हें मैंने बताया कि इस समय मैं बेशक अफ़ग़ानिस्तान का अनौपचारिक दूत हूं लेकिन एक भारतीय स्वाधीनता सेनानी होने के नाते मैं सभी ब्रिटिश विरोधी शक्तियों से मदद मांग रहा हूं ।लेनिन ने मेरी बातें ध्यान से सुनीं और कुछ ‘करने’ का आश्वासन दिया ।
लेनिन से मुलाकात के बाद मैं अफ़ग़ानिस्तान लौट आया ।यहां आकर पता चला कि हबीबुल्लाह के स्थान पर अमानुल्लाह नये बादशाह बन गये हैं ।उनकी सोच हबीबुलल्लाह से अलग थी । अमानुल्लाह ने तो चीन,तिब्बत, जर्मनी,तुर्की,अमेरिका आदि से समझौते कर लिए थे ।पहले जर्मनी में सम्राट कैसर सत्ता से अलग हो गये थे और अब हबीबुल्लाह भी ।मैं अफ़ग़ानिस्तान में ही बना रहा और बादशाह अमानुल्लाह मुझे ‘अफगानिस्तान के एक अनौपचारिक आर्थिक मिशन ‘के मुखिया के तौर पर देखते थे ।लेकिन मेरे ज़ेहन में भारतीय स्वधीनता संग्राम सर्वोपरि रहा । मेरा मुख्यालय काबुल में था जहां मैंने भारत की अंतरिम सरकार गठित की थी ।अमानुल्लाह की मुझ में हबीबुल्लाह जैसी रुचि तो नहीं थी लेकिन वह मेरी उपेक्षा भी नहीं करते थे ।मैं अमेरिका गया और वाशिंगटन डीसी में एक अफ़ग़ानिस्तान सूचना ब्यूरो और विश्व महासंघ का कार्यालय स्थापित किया । अमेरिका में रहते हुए ही मुझे पता चला कि यहां के प्रवासी भारतीयों ने ब्रिटिश शासन उखाड़ फेंकने के लिए गदर आंदोलन करने का निर्णय लिया है जिसे गदर पार्टी का नाम दिया गया है । गदर पार्टी के कई संस्थापक नेताओं में प्रमुख सोहन सिंह भकना थे ।शुरूआती आन्दोलन उन क्रांतिकारियों के लिए बनाया गया था जो अमेरिका और कनाडा के पश्चिमी तट पर रहते थे लेकिन बाद में यह आंदोलन दुनिया भर में रहने वालेभारतीय प्रवासी समुदाय में फैल गया ।इसकी स्थापना 15 जुलाई, 1913 की मानी जाती है । इसमें हिंदुस्तानी श्रमिकों के रूप में जाने जाने वाले आप्रवासियों का एक समूह था ।अमेरिका के ओरेगन राज्य के एस्टोरिया नगर में हरदयाल, संत बाबा वसाखा सिंह,सोहन सिंह भकना, बाबा संतोख सिंह,बाबा ज्वाला सिंह की बैठक हुई जिसमें सैन फ्रांसिस्को के युगांतर आश्रम में मुख्यालय बनाने का निर्णय लिया गया ।इसमें अध्यक्ष और सभी पदाधिकारियों का संबंध पंजाब से था ।और कई सदस्य कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय बर्कले के छात्र भी थे जैसे हरदयाल,तारक नाथ दास मौलवी बरकतुल्लाह, करतार सिंह सराभा,विष्णु गणेश पिंगले,हरनाम सिंह आदि ।हरदयाल और तारक नाथ जैसे क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों ने छात्रों को संगठित कर उनमें राष्ट्रवादी विचारों में शिक्षित करने की कोशिश की ।बर्कले के कुछ छात्र धनी पंजाबी किसानों के वंशज थे जिन्होंने ने भी गदर पार्टी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया ।
पार्टी का एक साप्ताहिक अखबार भी होता था ‘गदर के इर्द-गिर्द’ जिसका शीर्षक था ‘अंग्रेज़ी राज का दुश्मन’। यह अखबार अमेरिका से पंजाब के शहरों और गांव तक पहुंचाया जाता था। अखबार में स्पष्ट तौर पर लिखा गया कि गदर पार्टी पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष है ।हम सिख या पंजाबी नहीं,हमारा धर्म है देशभक्ति’। राजा महेंद्र प्रताप ने मुझे इस गदर पार्टी की जानकारी देते हुए कहा कि मैंने गदर पार्टी के कई नेताओं से भेंट करके उन्हें बताया था कि मैं भी अफ़ग़ानिस्तान में रहते भारत की आज़ादी की मुहिम चला रहा हूं ।मैं भी वहां ऐसी सोच वाले क्रांतिकारियों की टीम बनाऊँगा ।उनकी अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री बरकतुल्लाह उसी गदर पार्टी की ही देन हैं ।
राजा महेंद्र प्रताप द्वारा दिया गया गदर पार्टी का यह विवरण 1979 में मेरी अमेरिकी यात्रा में बहुत काम आया ।पहले तो मुझे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि हमारे मेजबान को सैन फ्रांसिस्को में गदर मुख्यालय के बारे में कोई जानकारी नहीं थी ।जब उन्हें और विस्तार से बताया तो वे लोग गदर मेमोरियल हाल तलाशने में सफल हो गये ।सैन फ्रांसिस्को के इस मेमोरियल हाल में उन तमाम जाँबाज देशप्रेमियों के चित्र टंगे हुए हैं जिन्होंने भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद कराने के न केवल सपने देखे थे बल्कि उसके लिए ठोस प्रयास भी किए थे ।वहां मैंने बहुत समय बिताया ।स्वधीनता संग्राम से जुड़ा एक संग्रहालय भी है ।बताया गया कि जुलाई,1913 में हिंदुस्तान गदर पार्टी का गठन हुआ था जिसका उद्देश्य था अमेरिका से आप्रवासी भारतीयों का स्वदेश के स्वधीनता सेनानियों के साथ मिलकर भारत को परतंत्रता की जंजीरों से आज़ाद कराना ।इस पार्टी के संस्थापक सदस्यों में प्रमुख थे: लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, भाई परमानंद,संतोख सिंह,संत बाबा वसाखा सिंह,सुल्तान चौधरी, बाबा भगवान सिंह दूसांझ,मौलवी बरकतुल्लाह, करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगल आदि ।अफ़ग़ानिस्तान से गदर पार्टी के नेता जैमल सिंह ढाका भी थे जो राजा महेंद्र प्रताप की प्रेरणा से इस आंदोलन के साथ जुड़े थे ।(और विस्तार से पढ़ने के लिए मेरी पुस्तक ‘आप्रवासी अमेरिका’ देखें ।प्रकाशक अद्विक पब्लिकेशन प्रा. लि.)
राजा महेंद्र प्रताप ने उस विशेष भेंट में बहुत तफसील से बातचीत की थी ।मुझे ऐसा लगा था कि अपने 32 साल के विदेश प्रवास में उन्होंने जिन जिन जत्थेबंदियों को भारत की आजादी के लिए लड़ते देखा है वह सब कुछ बता देना चाहते थे। उनसे हुई बातचीत के जितने अंश मुझे याद हैं उसी के बल पर मैं लिखने की कोशिश कर रहा हूं क्योंकि उनसे बातचीत के नोट्स और उनके हस्ताक्षरों से युक्त उनका साहित्य मुझे खोजे नहीं मिला और न ही उनके साथ एस जे सिंह द्वारा लिया हमारा चित्र । राजा महेंद्र प्रताप ने बताया था कि 1913-14 में विदेशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों को भारत के स्वाधीनता संग्राम में शामिल करने के लिए बहुत प्रयास हुए । पंजाब के लोग इस दिशा में बहुत सक्रिय थे पंजाबी हिंदू,सिख और मुसलमान सभी । अमेरिका और कनाडा में रहने वाले प्रवासी भारतीयों का भी इसमें बहुत योगदान था ।इसी सिलसिले में सिंगापुर के व्यवसायी सरहाली के गुरदित सिंह संधू ने 1914 में जहाज कामागाटा मारू जापान से किराये पर लिया जिसमें सवार होकर 376 भारतीयों ने कनाडा के वैंकूवर पहुंचने का प्रयास किया था। इनमें 340 सिख, 24 मुस्लिम और 12 हिन्दू थे ।वहां भारतीय राष्ट्रवादी क्रन्तिकारी बरकतुल्लाह और भगवान सिंह ज्ञानी रास्ते में जहाज में मिले ।भगवान सिंह ज्ञानी वैंकूवर गुरुद्वारे में मुख्य ग्रंथी थे । लेकिन कनाडा की कंजरवेटिव सरकार ने यात्रियों को जहाज से उतरने की अनुमति देने से इंकार कर दिया ।कनाडा में पहले से बसे दक्षिण एशियाई कनाडाई लोगों ने कामागाटा मारू यात्रियों को प्रवेश से वंचित करने के फैसले का विरोध किया । कनाडा और अमेरिका में सरकार के इस फैसले के खिलाफ विरोध सभाएं हुईं लेकिन कनाडा सरकार अपने निर्णय पर अडिग रही ।उसका फैसला था कि किसी को भी आप्रवासन और उपनिवेशीकरण मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है ।अंत में 376 यात्रियों में से केवल 24 को कनाडा में प्रवेश मिला,शेष 352 को मजबूरन कोलकाता के पास बज बज लौटना पड़ा। यहां उनकी पुलिस से भिड़ंत हुई,क्योंकि ब्रितानी सरकार को यह पता चल गया था कि ये लोग राष्ट्रवादी हैं और कनाडा में स्वधीनता संग्राम की भावना से वहां पर रहने वाले भारत के प्रवासियों को प्रोत्साहित करेंगे । कोलकाता में ब्रिटिश पुलिस ने उन पर गोलीबारी की जिसमें बहुत लोग मारे गये और कुछ भाग कर अपने गांव चले गये । बाबा गुरदित सिंह वहां से निकलकर छुपते छुपाते गांधी जी के पास पहुंचे और उन्हें अपनी व्यथा कथा सुनायी ।गांधी जी ने उन्हें ‘सच्चा देशभक्त’ बताकर आत्मसमर्पण की सलाह दी और उन्हें पांच वर्ष की सज़ा हुई ।लेकिन कामागाटा मारू के प्रयास के विफल हो जाने से उन्होंने हार नहीं मानी । 1952 में भारत सरकार ने बज बज के पास कामागाटा मारू के शहीदों के लिए एक स्मारक बनवाया जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था ।स्थानीय लोग इसे ‘पंजाबी स्मारक’ के तौर पर जानते हैं ।
अपनी एक कनाडा यात्रा के दौरान मैंने पाया कि कामागाटा मारू आज भी वहां प्रासंगिक है ।गया तो मैं वहां के हाउस ऑफ़ कामंस का चुनाव कवर करने के लिए था लेकिन मेरी चाहत कामागाटा मारू के बारे में जानने की भी थी ।मैंने टोरांटो में जब कुछ पंजाबियों से इस बाबत पूछा तो उनका उत्तर था कि असली तस्वीर आपको वैंकूवर जाने पर ही मिल सकती है ।वहां तो आपको जगह जगह कामागाटा मारू के बारे में कुछ जानने और देखने को मिल जाएगा ।टोरांटो से अमेरिका में जाने और उसके बाद स्वदेश लौटने तक मुझे कामागाटा मारू के बारे में समाचार मिलते रहे ।जब से प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर और जस्टिन त्रूदो ने कामागाटा मारू घटना के लिए हाउस ऑफ़ कामंस में माफी मांगी है तबसे कनाडा के पूर्व शासकों के रवैये को ‘क्रूर हृदय और संवेदनहीनता’ का प्रतीक बताया जाता है ।अब कामागाटा मारू घटना संबंधित विभिन्न तिथियों को याद करते हुए वहां कई प्रकार के समारोह आयोजित हो रहे हैं ।उसके प्रस्थान की 75वीं वर्षगांठ पर 23 जुलाई, 1989 में वैंकूवर के गुरुद्वारे में उसके स्मरण और कीर्ति की याद में वहां एक सम्मान फलक रखा गया है ।इसी प्रकार का फलक 1099 वेस्ट हेस्टिंग्स स्ट्रीट में पोर्टल पार्क में भी है ।1994 में कामागाटा मारू की 80वीं सालगिरह पर वैंकूवर हार्बर में रखे गये एक फलक को याद किया जाता है ।खालसा दीवान सोसाइटी वैंकूवर द्वारा रास स्ट्रीट गुरुद्वारे में एक संग्रहालय स्थापित किया गया । एक स्मारक भी बना 23 जुलाई 2012 को ।कामागाटा मारू के आगमन की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में 1 मई,2014 को कनाडा पोस्ट द्वारा एक डाक टिकट भी जारी किया गया ।इतना ही नहीं ब्रिटिश कोलंबिया की सरे नगर परिषद ने 31 जुलाई,2019 को 75ए एवेन्यू के हिस्से का नाम बदल कर कामागाटा मारू रख दिया ।वैंकूवर शहर और वहां के लोग कामागाटा मारू से बिल्कुल अनजान नहीं हैं ।वहां आपको विभिन्न स्थानों पर उसका उल्लेख मिल जायेगा ।दूसरे वहां पर संग्रहालय स्थापित हो जाने से जो लोग और वर्तमान पीढ़ी और आने वाली अगली पीढियां कामागाटा मारू के अस्तित्व से अनजान हैं उन्हें यह पता चल जायेगा कि अपने देश की आज़ादी के लिए देशभक्त किस हद तक जा सकते हैं ।
अब कामागाटा मारू के यात्रियों के वंशजों ने उसकी विरासत को स्मरण दिलाने के लिए काम किया है ।कामागाटा मारू की याद में एक नागरिक संपति भी है और किंग जार्ज पार्क में दो स्मारक चिन्ह भी हैं ।ब्रिटिश कोलंबिया ने कामागाटा मारू स्मरण दिवस के रूप में मान्यता दी ।न्यू वेस्टमिंस्टर और विक्टोरिया शहरों को कामागाटा मारू दिवस के रूप में घोषित किया गया जबकि वैंकूवर शहर ने इस दिन को कामागाटा मारू स्मरण दिवस के तौर पर मनाया । कनाडा में गदरी बाबेयां दा मेला (गदर पार्टी का त्योहार) मनाया जाता है ।ऐसे ही एक मेले में 6 अगस्त 2006 में प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने कहा कि कनाडा सरकार ने कामागाटा मारू घटना को स्वीकार किया है और कनाडा के इतिहास में इस दुखद क्षण को सर्वोत्तम तरीके से पहचानने के लिए इंडो-कनाडाई समुदाय के साथ परामर्श करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता की घोषणा की ।3 अगस्त,2008 को हार्पर बाबेयां दा मेला में कामागाटा मारू घटना के लिए माफी मांगने के लिए उपस्थित हुए ।उन्होंने हाउस ऑफ़ कामंस में आये एक प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा कि ‘कनाडा सरकार की ओर से मैं प्रधानमंत्री के रूप में आधिकारिक तौर पर माफी मांग रहा हूं । समुदाय के सदस्य इससे संतुष्ट नहीं हुए।
प्रधानमंत्री हार्पर से पहले 23 मई,2008 को ब्रिटिश कोलंबिया की विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया कि यह विधानमंडल 23 मई,1914 की घटनाओं के लिए माफी मांगता है,जब वैंकूवर बन्दरगाह के पास खड़े कामागाटा मारू के 376 यात्रियों को कनाडा द्वारा प्रवेश से वंचित कर दिया गया था ।सदन को इस बात का गहरा अफसोस है कि हमारे देश और हमारे प्रांत में शरण लेने वाले यात्रियों को निष्पक्ष और निष्पक्ष व्यवहार का लाभ दिए बिना वापस कर दिया गया,जो एक ऐसे समाज के लिए उपयुक्त है जहां सभी संस्कृतियों के स्वागत और स्वीकार किया जाता है ।इसके बाद सरकार से माफी मांगने की मांग की गयी ,वह भी प्रधानमंत्री द्वारा हाउस ऑफ़ कामंस (निम्न सदन) में । मांग करने वालों में कामागाटा मारू के कुछ यात्रियों के सगे संबंधी और करीबी रिश्तेदार थे। प्रधानमंत्री हार्पर ने जब एक सार्वजनिक सभा में कामागाटा मारू को वैंकूवर में प्रवेश न देने के लिए माफी मांगी तो इसे यह कहकर अस्वीकार कर दिया गया कि भला कोई चुनावी सभाओं में इस तरह की माफी मांगता है ।लेकिन लिबरल पार्टी के नेता जस्टिन त्रूदो जब देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने हाउस ऑफ़ कामंस में माफी माँगकर कामागाटा मारू के यात्रियों के सगे संबंधियों से किए गये अपने वादे को पूरा किया ।पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो ने अपने पूर्वर्तियों की गलती के लिए माफी मांग कर यह सिद्ध कर दिया कि अपने पूर्वजों की गलतियों को स्वीकारते हुए उसके लिए क्षमायाचना करने से कोई छोटा नहीं हो जाता ।
दो बरस पहले प्रधानमंत्री के तौर पर जस्टिन त्रूदो जब भारत आये थे तो उन्होंने पूरा एक दिन स्वर्ण मंदिर में सेवा की थी ।उन्होंने दरबार साहब में सपरिवार बैठकर न केवल कीर्तन सुना बल्कि लंगर में हर किस्म की सेवा की ।लंगर बांटा, रोटियां बेलीं,बर्तन धोये,जोड़ा घर में जूतों पर पॉलिश की, जल सेवा की आदि ।उस समय वह कनाडा के प्रधानमंत्री थे ।इसी प्रकार जर्मनी के नेताओं ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जिन जिन देशों पर ज़ुल्म किए थे चांसलर (प्रधानमंत्री) विली ब्रांट ने उन देशों में जाकर अपने पूर्ववर्तियों
के कृत्यों के लिए माफी मांगी । वह पोलैंड के आश्विच विशेष तौर पर गये जहां गैस चैंबरों में स्त्री,पुरुषों और छोटे-छोटे बच्चों को ठूंस कर मारा गया था ।1977 में अपने पोलैंड दौरे के दौरान मैं एक गैस चैंबर में रखे मृतकों के कपड़े और बच्चों के खिलौने देखकर यह सोच कर भीतर तक हिल गया था कि कैसे कोई इंसान इतना हृदयहीन और संवेदनहीन हो सकता है । लेकिन यह हक़ीक़त थी और यहां भी विली ब्रांट ने आकर घुटने टेक कर माफी मांगी थी ।
लेकिन अमृतसर में जलियाँवाला बाग में जो नरसंहार हुआ था उसके लिए ब्रिटेन की सरकारों में से प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने क्षमायाचना नहीं की बल्कि ‘गहरा शोक’ व्यक्त किया ।हालांकि महरानी अमृतसर में जलियांवाला बाग़ गयी थीं उन्होंने भी इसे एक ‘दर्दनाक हादसा’ ही बताया, माफी नहीं मांगी । ब्रितानी हाउस ऑफ़ कामंस के कुछ सांसद समय समय पर सरकार से सदन में माफी मांगने की मांग करते रहे हैं लेकिन वह “गहरे खेद’ से आगे नहीं बढ़ी ।तर्क यह दिया जाता है कि अगर सरकार माफी मांगती है तो उसे जलियांवाला बाग में मारे गये व्यक्तियों के सगे-संबंधियों को मुआवजा देना पड़ेगा। इतना ही नहीं जिन जिन देशों में ऐसी घटनाएं हुई होंगी जहां ब्रितानी शासन था उन सभी देशों के पीड़ितों को मुआवजा देना होगा ।कुछ समय पहले केन्या के उन दो जीवित व्यक्तियों को कोर्ट के आदेश पर ब्रितानी सरकार को मुआवजा देना पड़ा जिन पर उनके सत्ता में रहते हुए जुल्म हुए थे ।
जब मैंने राजा महेंद्र प्रताप से पूछा कि आपने दुनिया भर के आप्रवासी भारतीयों की भारत के स्वाधीनता संग्राम में अपने अपने योगदान के बारे तो बता दिया क्या आप सुभाषचंद्र बोस के प्रयासों पर भी रोशनी डालेंगे ।उन दिनों भी आप विदेश में ही थे ।राजा महेंद्र प्रताप मुस्कराये और बोले आपने भी काफी तैयारी कर रखी है ।जी हां,सुभाष बाबू ने भी अपनी मुहिम जर्मनी से शुरू की थी । बताया जाता है कि कांग्रेस से निकाले जाने पर उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक जो पार्टी बनायी थी उसने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोही तेवर दिखाये जिसके चलते उन्हें घर में नजरबंद कर बाहर पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया ।लेकिन सुभाष चंद्र बोस 16 जनवरी, 1941 को पुलिस को चकमा देते हुए एक पठान मोहमद ज़ियाउद्दीन के वेष में अपने घर से निकले और कोलकाता से दूर धनबाद के ज़िले गोमोह पहुंचे और वहां के रेलवे स्टेशन से फ़्रंटियर मेल पकड़ कर पेशावर पहुंच गये। वहां से फॉरवर्ड ब्लॉक के अपने एक साथी के साथ वह काबुल में प्रवेश कर गये ।यहां पर दो महीने रहकर उन्होंने अपनी अगली योजनाओं पर काम शुरू कर दिया।यहां पर पहले उनसे मेरी मुलाकात हुई थी ।उनका तब लक्ष्य था रूस जाने का ।वहां जब उनका काम नहीं बना तो वह जर्मनी गये ।इस बाबत मैंने अपने अनुभव के आधार पर उन्हें बताया था कि रूस में मैं लेनिन और जर्मनी में उस समय के सम्राट कैसर से मिला था ।उसके बाद मैंने जापानी नेतृत्व से सहायता मांगी लेकिन वह तो दिसंबर,1941 को हवाई द्वीप के पर्ल हार्बर स्थित अमेरिका के नौसैनिक अड्डे पर अचानक सैन्य हमला करके सातवें आसमान पर था ।वह इतना महत्वकांक्षी हो गया कि वह अपने आप को एक शक्ति के तौर पर देखने लग गया था ।इसका परिणाम यह हुआ कि जो अमेरिका अभी तक द्वितीय विश्वयुद्ध में तटस्थ था जापान के हमले के बाद वह मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हो गया ।इस तरह अब जापान भी किसी न किसी रूप में विश्वयुद्ध से जुड़ गया था ।मैंने अपने अनुभवों तईं सुभाष बाबू को फीडबैक दे दिया था ।मुझे पता चला कि रूस में उनकी बात नहीं बनी जर्मनी में सुभाषचंद्र बोस फासी नेताओं से और हिटलर से भी मिले थे लेकिन उस समय जर्मनो की दिक्कत यह थी कि वह दूसरे विश्वयुद्ध में बुरी तरह से फंसे हुए थे ।इसलिए उनके पास सुभाषबाबू को मदद देने का समय नहीं था हालांकि वह अंग्रेज़ों से नफरत करते थे ।
जापान सुभाषबाबू की मदद करने के लिए तैयार था । नेता जी वहां से सिंगापुर पहुंच गये जहां उन्होंने 211 अक्टूबर,1943 को स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार गठित की जिसके वह स्वयं ही राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने ।आज़ाद हिंद फौज के प्रधान सेनापति भी वही थे ।जापानी सेना ने अंग्रेज़ों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबंदियों को भर्ती किया ।महिलाओं के लिए झांसी की रानी की रेजिमेंट भी बनायी गयी । नेता जी ने अपने भाषणों में भारतीय लोगों को आज़ाद हिंद फौज में भर्ती के होने और उसे आर्थिक मदद देने का आवाहन किया इस संदेश के साथ कि ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा ।’ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से हमला कर अंग्रेज़ों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत कर अपनी अंतरिम सरकार स्थापित कर दी ।सुभाषबाबू ने इन द्वीपों को नाम दिया ‘शहीद द्वीप’ और ‘स्वराज द्वीप’। इसके बाद दोनों फौजों ने इम्फाल और कोहिमा पर भी हमला कर दिया । यहां अंग्रेज़ों की रणनीति हावी रही जिससेदोनों सेनाओं को पीछे हटना पड़ा। इस युद्ध में दोनों तरफ से काफी बड़ी संख्या में सैनिक मारे गये ।
जब आज़ाद हिंद फौज पीछे हट रही थी तब जापानी सेना ने नेता जी के भाग जाने की व्यवस्था की लेकिन उन्होंने महिलाओं की झांसी की रानी रेजिमेंट के साथ सैकड़ों मील चलते रहना पसंद किया।6 जुलाई,1944 को आज़ाद हिंद रेडियो पर सुभाषचंद्र बोस ने अपने एक भाषण में गांधी जी को जापान से सहयता के कारणों के साथ ही आज़ाद हिंद फौज के उद्देश्य के बारे मेँ भी बताया ।इस भाषण के अंत में नेता जी ने गांधी जी को ‘राष्ट्रपिता’कहा और तभी गांधी ने सुभाष बाबू को ‘नेता जी’।ऐसे ही नेता जी ने पहले पहल ‘जय हिंद ‘ का नारा दिया था । राजा महेंद्र प्रताप ने मुझे यह जानकारी भी दी थी कि शुरू शुरू में नेताजी अफ़ग़ानिस्तान में आकर मेरे साथ आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहते थे लेकिन ऐन वक़्त पर उन्होंने अपना मन क्यों बदल लिया यह मेरी समझ से बाहर की बात है ।लगता है वह सोवियत संघ में भविष्य तलाशने के लिए बरास्ता मंचूरिया सोवियत संघ पहुंचना चाहते थे जो ब्रिटिश विरोधी हो गया था ।
इधर भारत में अंग्रेज़ शासकों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी ।जापानी सेना पूर्व में भारतीय सीमा में प्रवेश कर चुकी थी ।लिहाज़ा ब्रिटिश सरकार की नज़र उन लोगों पर गयी जिनकी देशभक्ति और विश्वसनीयता पूर्णता: प्रमाणित होती हो ।ऐसे लोगों की फौज के पीछे शत्रु को प्रतिरोध देने की ज़रूरत थी ।सच्चिदनंद वात्स्यायन अज्ञेय को भी बुलावा आया यह जानते हुए भी कि यह ब्रिटिश सरकार के बागी रह चुके हैं और इनकी देशभक्ति संदेह से परे है ।इन्होंने जैन्किंस जैसे अधिकारी को लाहौर जेल में थप्पड़ मारा था लेकिन जनता में प्रतिरोधी शक्ति के निर्माण में इनमें अद्भुत क्षमता है ।तकनीकी तौर पर वह फौज में थे लेकिन मोर्चे पर लड़ने के लिए नहीं बल्कि जनमानस में जापानियों की ‘जीत’ से होने वाले खतरे से आगाह करने के लिये । उन्हें पूरी तरह से फौजी अनुशासन में रहना होता था ।अंग्रेज़ हैं तो चतुर रणनीतिकार। उन्होंने जापानी फौज का मुकाबला करने के लिए केवल गोरे सैनिकों को ही चुना, हिन्दुस्तानियों को अलग रखा गया शायद यह सोचकर कि कहीं ये आज़ाद हिंद फौज से न मिल जायें ।खैर, अंग्रेज़ी सेना ने जापानी सेना की मदद से आगे बढ़ रही आज़ाद हिंद फौज को कोहिमा से आगे नहीं बढ़ने दिया और वह उलटे पांव भाग खड़ी हुई ।
महेंद्र प्रताप अपने नाम के साथ राजा क्यों लिखते हैं इसका विशेष कारण है ।उनका जन्म 1 दिसंबर,1886 को एक जाट परिवार में हुआ जो मुरसान रियासत के शासक थे ।यह रियासत आज के उत्तरप्रदेश के हाथरस जिले में थी ।वह राजा घनश्याम सिंह के तीसरे बेटे थे ।1902 में उनकी शादी बलबीर कौर से हुई जो जींद रियासत के कायस्थ परिवार की थीं । इनके पूर्वजों ने भी अंग्रेज़ों के साथ युद्ध किए थे ।अंग्रेज़ों से अजादी की सीख तो उन्हें अपने पूर्वजों से ही मिली ।वह 1915 से 1946 तक विदेशों में रहकर ही आज़ादी की लौ जलाते रहे ।उन्होंने विश्व मैत्री संघ की स्थापना भी की ।खुली सोच वाले राजा महेंद्र प्रताप जाति ,धर्म,रंग, देश आदि को नहीं मानते थे ।वह शिक्षा को बहुत महत्व देते थे ।1909 में वृंदावन में अपने बेटे प्रेम के नाम पर उन्होंने प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत का पहला केंद्र था और उसका उद्घाटन किया था मदन मोहन मालवीय ने ।इसके संचालन के लिए एक ट्रस्ट बनायी गयी जिसे पांच गांव,वृंदावन का राजमहल और चल संपत्ति का दान दिया गया।इतना ही नहीं 1911 में उन्होंने वृन्दावन में ही 80 एकड़ में फैले एक फल उद्यान को आर्य प्रतिनिधि सभा,उत्तरप्रदेश को दान में दे दिया जिसमें आर्य समाज गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी ।इस महान दानवीर की स्मृति में 2021 को उत्तरप्रदेश सरकार ने अलीगढ़ में एक विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की थी ।उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी नहीं है । जिन दिनों वह लोकसभा के सदस्य थे उनसे मिलने वाले जिज्ञासुओं की खासी भीड़ रहती थी क्योंकि वह अपने आप में एक संस्था थे और किंवदंती बन गये थे ।प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के अतिरिक्त सभी पार्टियों के सांसद और मंत्री भी उनसे मिला करते थे ।यहां तक कि इंदिरा गांधी भी विशेष तौर पर उनसे मिलने के लिए आयीं थीं संसद भवन में ।तब वह लोक सभा की सदस्य नहीं थीं । भारत लौटकर वर्धा में राजा महेंद्र प्रताप ने महात्मा गांधी से मुलाकात भी की जिन्होंने उन्हें पुन: समाज सेवा में जुड़ने का परामर्श दिया था ।इसी सलाह में उनका लोकसभा का चुनाव लड़ना भी निहित था ।इस महान दानवीर और स्वधीनता सेनानी का 26 अप्रैल, 1979 को 92 साल की उम्र में निधन हो गया ।भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया ।













