इंदरकुमार गुजराल से मास्को में मिलने के प्रसंग पर चर्चा करने से पहले मैं उन दो अविस्मरणीय स्मृतियों को याद करना चाहता हूं जिन्होंने मुझे गुजराल साहब के काफ़ी करीब ला दिया. इन यादों का जुड़ाव रेडियो से है. एक समय था कि जब मैं रेडियो में हर तरह के प्रोग्राम किया करता था – हिंदी और पंजाबी में कहानियां पढ़ने, सामायिकी लिखने, खबरों का अनुवाद करने से लेकर राष्ट्रीय कार्यक्रमों का संचालन करने तक, जिसे आजकल एंकरिंग कहते हैं.रेडियो पर ज्वलंत और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने के लिए देश के दिग्गज नेताओं को आमंत्रित किया जाता था. इस राष्ट्रीय कार्यक्रम के प्रमुख अधिकारी थे डॉ राजेंद्रकुमार माहेश्वरी. उन्होंने मेरे कुछ प्रोग्राम देखे थे. इसके अतिरिक्त वह इस बात से भी वाकिफ थे कि मैं लोकसभा सचिवालय में करीब दस बरस काम कर चुका हूं. वह इस बात से भी परिचित थे कि मैं उन दिनों से रेडियो में लगातार कई प्रोग्रामों में बुलाया जाता हूं. एक बार उन्होंने यह बात तस्दीक की कि एक तो लोकसभा से मेरा नाता और दूसरे 1963-64 में लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष (स्पीकर) सरदार हुकम सिंह, तत्कालीन शिक्षामंत्री मोहम्मद करीम चागला तथा सोशलिस्ट पार्टी के नेता डॉ. राममनोहर लोहिया के इंटरव्यू बहुत चर्चित हुए थे इसलिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के संचालन के लिए मेरा चयन हुआ था.
हमारे आकाशवाणी के इस मित्र डॉ आर.के.माहेश्वरी का एक दिन सुबह फोन आया कि आपने अलग अलग तो कई राजनीतिक विभूतियों के इंटरव्यू किए हैं लेकिन आज मामला कुछ और है, काफ़ी गंभीर और चुनौतीपूर्ण. उन दिनों पंजाब में आतंकवाद का बोलबाला था. उस समय के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह दबाव की स्थिति में थे. इस विषय पर बातचीत करने के लिए अटलबिहारी वाजपेयी, मार्क्सवादी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत, इंदर कुमार गुजराल तथा दरबारा सिंह को आमंत्रित किया गया था.बेशक दिग्गजों की यह पैनल बहुत महत्वपूर्ण थी लेकिन मैंने इसे सामान्य रूप में लिया क्योंकि एक तो मैं सभी नेताओं को व्यक्तिगत तौर पर जानता था और दूसरे सभी से मैं कई बार मिलकर उनके अलग अलग इंटरव्यू कर चुका था. फिर भी कार्यक्रम को रिकॉर्ड करने से आधा घंटा पहले डॉ माहेश्वरी मुझसे मिलकर सभी बिंदुओं पर बातचीत कर लेना चाहते थे. हम दोनों ने कैंटीन में जाकर चाय पी और प्रत्येक भागीदारी से पूछने वाले प्रश्न फाइनल किये. निश्चित समय पर अटलबिहारी वाजपेयी, इंदरकुमार गुजराल और हरकिशन सिंह सुरजीत आकाशवाणी भवन पहुँच गए लेकिन दरबारा सिंह का कहीं कोई अतापता नहीं था. तय हुआ कि पहले चाय पी जाये, इस बीच वह अगर आ गए तो ठीक वरना उनके बगैर ही रिकॉर्डिंग कर ली जाएगी. अंततः ऐसा ही करना पड़ा. इन तीनों के साथ बहुत ही अर्थपूर्ण बातचीत हुई तथा पंजाब में आतंकवाद पर काबू पाने के सुझाव भी दिए गए. दो घंटे बाद माहेश्वरी जी ने फिर से फ़ोन करके बुलाया और कहा कि दरबारा सिंह आने वाले हैं. उन से वही सब सवाल पूछना जो पहले के भागीदारों से पूछे थे. मैंने वैसा ही किया. जब वह कार्यक्रम प्रसारित हुआ तो उसे सुनकर मुझे कहीं से भी यह नहीं लग रहा था कि दरबारा सिंह से बाद में बातचीत की गयी है. डॉ माहेश्वरी की संपादन कला भी गजब की थी.

अब मेरी हालत यह हो गयी थी कि किसी न किसी विभाग का प्रमुख मुझे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए बुलाने लगा था. एक दिन मैं डॉ माहेश्वरी के साथ कैंटीन में चाय पी रहा था कि उनका कोई वरिष्ठ सहयोगी आया और पूछा कि क्या मैं बैठ सकता हूं. यह तहज़ीब और संस्कार देखकर मुझे अच्छा लगा. माहेश्वरी जी ने उनके लिए भी चाय मंगाई फिर मेरा परिचय कराते हुए कहा कि ‘मिलिए त्रिलोक दीप से. आज एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए पधारे हैं’. उन्होंने कहा कि मैं इन्हीं से मिलने के लिए आया था आपकी मार्फत. मैंने आँखें उठाकर उन सज्जन की ओर देखा जिन्हें मैं पहली बार मिल रहा था.नाम था शायद श्री पात्रो. उन्होंने बताया कि हमारी यूनिट स्वतंत्रता सेनानियों से साक्षात्कार का एक प्रोग्राम बनाना चाहती है. हमें पता चला है कि इनके इंदरकुमार गुजराल, अज्ञेय, जैनेंद्र जैसे स्वतंत्रता सेनानियों से करीबी संबंध हैं. इन सभी लोगों के इंटरव्यू यही करेंगे और हमें कुछ नाम भी सुझायेंगे ताकि हम उनसे संपर्क कर सकें. बेशक यह मेरे लिए बहुत बड़ा और चुनौतीपूर्ण दायित्व था. डॉ माहेश्वरी के आग्रह पर मैंने हामी भर दी. इसके बाद मैंने गुजराल साहब के साथ बैठकर दिल्ली में रहने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के नाम तय किये. शुरुआत अज्ञेय से की. उनके बाद बिमलप्रसाद जैन, इंदरकुमार गुजराल, जैनेन्द्र जैन, अरुणा आसफ़ अली, राजकुमारी अमृत कौर,विभूति मिश्र, दादा राधा रमन, मीर मुशतक अहमद, गुरमुख निहाल सिंह, शशि भूषण,चौधरी ब्रह्म प्रकाश, जगप्रवेश चंदर,रामचरन अग्रवाल, यशपाल जैन, विष्णु प्रभाकर,आदि से किये. अज्ञेय और बिमलप्रसाद जैन क्रांतिकारी संगठन से जुड़े थे, शेष सभी ने गांधी जी के आवाहान पर गिरफ्तारियां दी थीं. एक अन्य क्रांतिकारी यशपाल लखनऊ में रहते थे. उनका वहीं इंटरव्यू हुआ.
मास्को में इंदरकुमार गुजराल से भेंट के पहले यह महत्वपूर्ण जानकारी देनी इसलिए अनिवार्य थी क्योंकि उनके व्यक्तित्व के स्वतंत्रता सेनानी के पक्ष का ज़िक्र करना ज़रूरी था. गुजराल साहब 1976 में सोवियत संघ में भारत के राजदूत बनकर आ गए थे. मैंने 6 सितम्बर, 1977 में बारह दिनों की सोवियत संघ की यात्रा की शुरुआत मास्को से की. हालांकि मैं सोवियत संघ का मेहमान था लेकिन भारत के राजदूत से मिलने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी. लिहाज़ा 8 सितम्बर, 1977 को मैं गुजराल साहब से उनके ऑफिस में मिलने के लिए पहुंचा तो उन्होंने अपनी कुर्सी से उठकर मुझे गले लगा लिया.शिष्टाचार के चलते पहले दिल्ली और हिंदुस्तान की बातें हुईं. देश की गतिविधियों से वह मुझसे ज़्यादा परिचित थे. क्योंकि हम दोनों एक दूसरे से काफी खुले हुए थे इसलिए मैंने पूछ ही लिया कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय से हटाए जाने की क्या वजह थी! इस सवाल पर वह कुछ संजीदा हो गए क्योंकि इस बाबत देश की अख़बारों में काफ़ी कुछ लिखा जा चुका था लेकिन गुजराल साहब ने उनपर कोई प्रतिक्रिया नहीं की थी. उनके स्थान पर विद्याचरण शुक्ल को सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया था. पहले तो उन्होंने यह कहकर टालने की कोशिश की कि अब यह पुरानी बात हो गयी है और नई सरकार भी सत्ता में आ गयी है, गढ़े मुर्दे उखाड़ने का क्या फ़ायदा! लेकिन मेरे बार बार इसरार करने पर बोले कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जून, 1975 में मुझे सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया. यह इमरजेंसी का समय था. भारत में सेंसरशिप थी और मैं मीडिया का इंचार्ज था जिसमें दूरदर्शन भी शामिल था. क्योंकि मीडिया से मेरे हमेशा से सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं इसलिए उन्हें मैं कैसे कहता कि आप अपनी अख़बार में कोई भी खबर छापने से पहले प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) से क्लियरेंस करा लें. लेकिन मुझे यह सब करना पड़ा था. इसका नतीजा यह निकला कि कुछ अखबारों में संपादकीय पृष्ठ खाली छोड़ दिए जाते. इससे सरकार की भी फ़जीयत होती, किरकिरी होती. पीआईबी में बैठे अधिकारियों को वैसी संपादकीय समझ नहीं थी जो किसी समाचारपत्र के एडिटर की होती है. अखबारों में खाली जगह छोड़ना बेशक संसरशिप का मूक विरोध था. मैंने सरकार को सलाह दी थी कि यह एडिटर के विवेक पर छोड़ दिया जाए कि उन्हें मौजूदा हालात के चलते किस प्रकार की स्टोरियां करनी चाहिए और संपादकीय लिखने हैं तो यह बेहतर होगा लेकिन सरकार को मेरा यह सुझाव नहीं रुचा.यह पूछे जाने पर कि दूरदर्शन पर किसी विशेष घटना के कवरेज के लिए आपसे कहा गया था जिसे आपने मानने से इंकार कर दिया था और उसके चलते ही आपको सूचना और प्रसारण मंत्रालय से हटा दिया गया, इसपर गुजराल साहब ने हंसकर कहा था कि छोड़ो, बीत गयी सो बात गयी. क्या संजय गांधी का दबाव था उस विशेष घटना को कवर करने के लिये, गुजराल साहब संजीदा होकर बोले कि ‘किसी का नाम लेकर मैं अपने आप को छोटा नहीं करना चाहता.’
इंदरकुमार गुजराल बहुत ही सुलझे हुए राजनेता और राजनयिक थे. 1976 में उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्रालय से हटाया गया और उसी वर्ष उन्हें सोवियत संघ में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया, इस मुद्दे पर उन्होंने इतना भर कहा कि शीर्ष नेतृत्व मेरे विचारों से कहीं न कही सहमत था. शेष नेतृत्व अर्थात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी! इस पर गुजराल साहब मुस्कुराये और बोले, आप खुद समझदार हैं. 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आ गयी थी.
बावजूद इसके वह राजदूत के पद पर बने रहे. इसका क्या राज़ है, गुजराल साहब धीरे से हँसे और बोले, एक तो भारत अमेरिका नहीं जहाँ सत्ता परिवर्तन के कारण राजदूतों को अपने पद से इस्तीफ़ा देना होता है. ऐसी परंपरा न होने के बावजूद मैंने विदेशमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को फोन करके पूछ लिया था कि’मेरे लिए क्या हुक्म है?’ इसपर वाजपेयी जी ने सहास्य कहा था, ‘ जहाँ आप हैं वहीं बने रहें इंदर. आपकी योग्यता से हम परिचित हैं. मैंने प्रधानमंत्री देसाई को भी इस निर्णय की सूचना दे दी है.’ इस प्रकार 1976 में इंदिरा गांधी द्वारा नियुक्त इंदरकुमार गुजराल 1980 तक चौधरी चरण सिंह की सरकार तक सोवियत संघ में भारत के राजदूत पद पर कायम रहे. ऐसी थी गुजराल साहब की सभी पार्टियों में साख. उनकी बहुआयामी काबलियत के सभी कायल थे.
हालांकि इंदरकुमार गुजराल प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की 21 से 26 अक्टूबर, 1977 को सोवियत संघ की राजकीय यात्रा को लेकर खासे व्यस्त थे बावजूद इसके उन्होंने मुझे खुला वक़्त दिया.मैंने उन्हें बताया कि नोवोस्ती प्रेस एजेंसी ने मुझे 12 दिनों के लिए आमंत्रित किया है. 6 सितम्बर, 1977 को मैं तड़के मास्को पहुँच गया था और मेरे रहने का इंतज़ाम रशिया होटल में है.
उस समय वह मास्को का सबसे बड़ा होटल माना जाता था.इक्कीस मंज़िला इस होटल में तीन हज़ार कमरे थे. इस होटल को देखकर एक अमेरिकी पर्यटक की प्रतिक्रिया थी, ‘लगता है हम संयुक्तराष्ट्र में रह रहे हैं’. इस होटल में जब सुबह आप नाश्ते के लिए जाते हैं तो आपको दुनियाभर के देशों के लोग देखने को मिलेंगे.
इंदरकुमार गुजराल को मैंने बताया कि पहले मुझे मीडिया के लोगों से मिलना है जिसमें शामिल हैं ‘प्राव्दा’, ‘इज़वेस्तिया’ जैसे प्रमुख समाचारपत्रों के संपादक, ‘इंटरनेशनल अफेयर्स’ जैसी पत्रिका के एडिटर, रेडियो, टेलीविज़न आदि के अधिकारी. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सोवियत संघ की राजकीय यात्रा के अवसर पर ‘प्राव्दा’ एक विशेष संस्करण की योजना बना रहा था. ‘प्राव्दा’ के ओलग स्केलकिंग ने बताया कि इसके लिए उनकी भारतीय राजदूत इंदरकुमार गुजराल से विस्तृत बातचीत हो चुकी है. इज़वेस्तिया के वलादिमीर स्कोसाइरेव ने कहा कि हम लोगों के लिए भी भारत- सोवियत संघ के संबंध महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. उनकी भी गुजराल साहब से भेंट हुई थी. मीडिया के जिन लोगों से भी मेरी मुलाक़ात हुई उन्होंने आई.के.गुजराल की विद्धता, सहजता, समझदारी और दोनों देशों के बीच के मसलों और उपलब्धियों की खुलकर चर्चा की. मैंने उन्हें यह जानकारी दी कि सोवियत संघ का राजदूत बनने से पहले वह सूचना और प्रसारण मंत्री थे और उनकी पत्रकारों से कमोबेश रोज मुलाक़ात हुआ करती थी. इस पर एक रूसी पत्रकार के मुंह से अचानक निकल गया, ‘तभी तो!’ वर्तमान सरकार में लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री हैं.
जब मैंने उनसे पूछा कि तीस बरस बाद भारत में कांग्रेस की जगह जनता पार्टी की सरकार आयी है, क्या इससे सोवियत संघ के सत्ताधारियों को कुछ बदला बदला नहीं लगेगा, इसपर उनका जवाब था, क्योंकि सोवियत संघ और भारत की मित्रता के ठोस आधार हैं जैसे भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति, समय समय पर दोनों देशों के राज्याध्यक्षों के बीच शिखर सम्मेलन तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिसंख्य विषयों पर समान विचार इसलिए सभी कुछ सामान्य रहने वाला है, कुछ भी तो बदला बदला नहीं है. यह बात तो भारत के विदेशमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी स्पष्ट कर चुके हैं.दूसरे रूसियों ने भारत के प्रति सदैव सदभावना का परिचय दिया है जिससे दोनों देशों की सरकारें परिचित हैं. फिर किसी भी देश के संबंध व्यक्तित्व पर आधारित नहीं होते वह देशों की बुनियादी नीतियों पर आधारित होते हैं. यह बात सही हो सकती है कि पिछले तीन दशक से भारत में कांग्रेस की सरकारें थीं और वहां के नेताओं और सोवियत संघ के नेताओं के बीच संबंध सहज थे लेकिन इसके साथ यह दलील भी उतनी ही सटीक है कि वर्तमान सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और विदेशमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी उसी पुरानी विदेश नीति का ही अनुसरण करने वाले हैं. अभी तक तो उसकी कांग्रेस की सरकारों से जो निकटता रही है, वही जनता पार्टी की सरकार की भी रहने वाली है. इस पर उन पत्रकारों का मानना था कि एक तो देशों के संबंध जनाधारित होते हैं, दूसरे मोरारजी देसाई सोवियत संघ के लोगों के लिए नये नहीं हैं और तीसरे विदेशमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सरकार गुटनिरपेक्ष नीतियों की प्रबल समर्थक है.
(मैटर जारी)












