1992 के 1 या 2 दिसंबर को मैं मुम्बई में भागलपुर दंगेके ऊपर बोलनेके लीये एक दो दिन के लिये था. जो 24 अक्तूबर 1989 को हुआ था. और डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर आनंद पटवर्धन को भागलपुर दंगे को लेकर फिल्म बनाने के लिए आग्रह करने के लिए गया था . तो उन्होने कहा कि आज बीजेपी और शिवसेना छोडकर अन्य सभी मजदूर नेताओं की एक बैठक 6 दिसम्बर को आयोध्या में जो कुछ होने जा रहा है . उसके खिलाफ मुम्बई में होने वाले कर्यक्रम की तैयारी की बैठक है. तुम उसमे भागलपुर दंगे पर बोलनेके लीये चलो. तो मैं चला गया . बांद्रा या पार्ले में किसी हॉल में बैठक थी. मैने देखा बीजेपी शिवसेना छोडकर लगभग सभी मजदूर नेताओं को एक छत के नीचे मैं देख रहा हूँ. और सभा की अध्यक्षता डॉ. असगर अली इंन्जीनियर कर रहे हैं. वैसे मैं उनके लेखन से परिचित था. लेकिन पहली बार उनको प्रत्यक्ष रूप से देखनेको 1992 बाबरी विध्वंस के एक हप्ता पहले का समय था. तो बैठक में 6 दिसम्बर को हम लोग मुम्बई में क्या कर सकते उसपर काफी सुझाव आ रहे थे. प्रमुखतम सुझाव मानव शृँखला बनाना और दुसरा चौपटि पर या शिवाजी पार्क में जनसभा करना थे. आनंद ने असगर अली जी से कहा की मैं भागलपुर दंगे पर बोलना चाहता हूँ. तो उन्होने तपाक से हा कहके मुझे बोलने के लिये कहा. तो मैने कहा की “स्वतंत्र भारत में दंगे कोई नई बात नहीं है. और यह बात इस सभा के अध्यक्ष से बेहतर और कोई नहीं जानता. क्योकी उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा काम इन दंगोके कारणो का पता लगानेमे जा रहा है. और उसके उपर उनके कई रिपोर्ट भी छपे है . लेकिन आज यह नौबत आप लोगों पर क्यो आ पडी ? की इतने समयसे 6 दिसम्बर को मुम्बई में क्या करेगे ? इस चर्चा में जा रहा है.

आप सभी के मजदूर आंदोलन की उम्र मेरी उम्रसे ज्यादा है. लेकिन मजदूर आंदोलन में बोनस,पगारवाढ,जैसी आर्थिक मांगोके अलावा और उनकी कुछ और सुविधाओं के आगे आप लोगों ने कुछ और काम उनके साथ ना करनेके कारण, आज आप लोग मुम्बई में 6 दिसम्बर को प्रतीकात्मक रूप से कुछ भी कर्यक्रम कर लिजीये. लेकिन अयोघ्या मे जो भी कुछ होगा वह ना भूतो ना भविष्यती होगा. क्योकि मै भागलपुर से मुम्बई आते समय सभी जाती हूई ट्रेनों के यात्रिओं में सभिके कपाल पर मंदीर वही बनायेंगे की कपडोकी पट्टिया बांधकर जाते हुए, और उनके लिए सभी रल्वे स्टेशनों पर खिचड़ी,चाय समोसे,पानी इत्यादि का इन्तजाम कर रहे, लोगों को देखा हूँ. और सबसे हैरानी की बात शायद आपके युनियन के भी रेल कर्मचारी होंगे. जो रेल पटरी पर गिट्टी डालने के लिए या किसी रख रखाव के लिए खडे थे. और नारे लगा रहे थे की “मंदीर वही बनाकर आना और कामयाब होकर आना”.
जहातक मेरा निरिक्षण है, उन कार सेवकों में आपकी अपनी युनियन के लोग भी शामिल थे. क्योकिं जिंदगी भर आप लोगों ने मजदूरोके आर्थिक सवालों पर जद्दो-जहद की है. लेकिन उनका सांस्कृतीक पक्ष बिल्कुल दुर्लक्षीत होनेके कारण, आज वह मंदीर के आंन्दोलन में शामिल हूए. और यह स्थिति मै कम अधिक प्रमाण में पुरे देश में ही देख रहा हूँ. की आस्था के सवाल पर हमारे सभिके युनियन,दल,विभिन्न क्षेत्रों के संगठन और अपने परिवार भी इससे अछूते नहीं है. हम अपने दिल को बहलानेके लिये प्रतीकात्मक रूप का कोई भी कार्यक्रम कही भी कर लो. लेकिन सांप्रदायीक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया गत कुछ वर्षों से भयानक रूप से हो चुकी है. भागलपुर यह उसका उदहारण है. अजादी के बाद काफी दंगे हुए लेकिन सभी गली मोहल्ले तक सीमित रहे. लेकिन यह भागलपुर का दंगा है.

जो लगभग पुरे भागलपुर कमिशनरी के इलाखे में फैला था. और जिसमे चुन चुन कर मुसलमानोके उपजिविका के हजारो की संख्या में लुम्स जिनसे वे रेशम का कपडा बुनते थे. सब जलाकर नष्ट कर दिया गया है. और 300 से अधिक गावों में यह करतूत पारंपारिक हथियारोसे,हजारोकी संख्यामे भीड़ ने किया है. 3000 से अधिक लोगों की जाने ले ली है. और उसमे सौ सव्वा सौ छोडकर सभी के सभी मुसलमान है. मेरी समझ में नहीं आता है की पीढी दर पीढी शेकडो सालोसे एक साथ मिलकर काम करने वाले, खाने पीनेवाले और रहनेवाले इस तरह एक दूसरे की जान कैसे ले सकते हैं ? याने आजादिके अर्धशतक पूरा करने के बावजूद यह जहर लोगों के दिलों में कहिनाकही किसी कोनेमे छुपा रहता है. और वो कभी शिला पुजाके समय, या किसी भी प्रकार के धार्मिक आयोजन में जुलुस,गणपति,दुर्गा,काली,ईद,मोहरम,या किसी पर्व के अवसर पर और सालभर मे गाय,सूअर और कई ऐसे मौके-बेमौके कुछ ना कुछ तो हो ही रहा है.

हम लोगोके आम जीवन से संबंधित सवलोको लेकर आज 50-60 सालोसे काम कर रहे हैं. लेकिन कभी पता किया की सांप्रदायीक,जातीय,महिलाओ के प्रति हमारा अपना केड़र क्या सोचते हैं ? भागलपुर उसका मैनिफैस्टेशंंन है. सबसे चिंताकी बात हमारा समाज बट चुका है. और यह भागलपुर दंगेकी विदारकता को देखते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, की हमारे देश में आने वाले कम- से – कम 50 साल की राजनीति का केंद्रबिंदु सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिकता की राजनीति रहेगी हम आप कितना भी जल जंगल जमीन,रोजगार के मुद्दों से लेकर महंगाई ,विस्थापन ,और अर्थिक सवालो को लेकर काम करते रहेंगे. लेकिन हमारी भारतीय राजनिती सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिकता के इर्दगिर्द सिमट कर रह गयी है.


6 दिसंबर 1992 के दिन तथाकथित कारसेवकोंने मस्जिद धराशायी करने के बाद, देश भर में दंगे हुए थे. और लार्सन ,& टुब्रो और पोर्ट ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुंम्बई की मॅनेजमेंट ने अपने गेट पर 7 दिसम्बर 1992 के दिनन एक नोटिस जारी किया था, कि “मायनॉरिटी कम्युनिटी का कोई भी मजदूर अगर काम पर आना चाहता है. तो वह अपने जोखिम पर काम पर आयेगा मैनेजमेंट उसकी जिम्मेदारी नहीं लेंगी.” और कोई मजदूर यूनियन उसके लिए आगे नहीं आई थी. यह मेरी बात बोलनेके एक हप्ते के अंदर की बात है.” मतलब हमारे मजदूर आंदोलन का आत्मविश्वास समाप्त हो गया है. यही स्तिथि दलित,आदिवासियो और बहुजन समाज की भी हो चुकी है. यह बात मैं लगातार कह रहा हूँ लिख रहा हूँ. और अब तो स्तिथि और भी भयावह है. आज गत 11 वर्षों से इस देश में अघोषित हिंन्दु राष्ट्र हो चुका है. और गुरु गोलवलकर के फतवे के अनुसार मायनॉरिटी कम्यूनिटी के लोगोको हिंन्दुओ की सदाशयता पर अपना जीवन यापन करना होगा. मतलब सेकंड़ ग्रेड सिटीजन जो जर्मनी में यहूदियों के साथ हिटलर ने आजसे 100 साल पहले किया था. और हिटलर संघ परिवार का आदर्श है. उसीके कदमपर चलनेकी शिक्षा संघ अपने अनुयाइयों को गत सौ वर्षों से दे रहे हैं. और उसीका परिणाम नरेंद्र मोदी,अमित शाह,आदित्यनाथ,विजय शाह जैसे लोग आज देश पर राज कर रहे हैं. सभा के बाद असगर अलिने मुझे गले लगा कर कहा की “अरे भाई इतने दिन कहा थे ?” हमारी मुलाकात काफी देर बाद हो रही है.” वो मुझे अपने घर ले गये. और खाना खिलाने के बाद मुझे स्टेशन छोड़ने आये. तबसे लेकर 25 साल हम लोग लगातार संपर्क में रहे. ऑल इंडिया सेक्युलर फोरम की स्थापना किये. और मैं खुद उसका एक संयोजक और महाराष्ट्र,बंगाल,बिहार,दिल्ली और गुजराथ प्रदेश में इसकी इकाइयां बनानेमे सहायकों मेसे एक रहा हूँ.

उन बीस सालोमे शायद ही कोई ऐसी घटना जो देश दुनिया में हूआ हो और सबेरे – सबेरे उनका फोन नहीं आया हो ? आज गत 10 वर्षों से मैं उन्हे मिस कर रहा हूँ. क्योकी अभी अन्टी कम्युनल काममे ज्यादातर प्रोफेशनल लोगों ने कब्जा कर लिया है. और उनका प्रोजेक्ट ओरिएन्ट काम होता है. एकदम सरकारी नौकरी के जैसा कॉम्रेड शब्द इस्तेमाल तो करते हैं. लेकिन कॉम्रेड शब्द का मिनिंग कही नहीं दिखता है. असगर अली की बात अलग थी. वो अपने विषयमे महारत हासिल कर चुके थे. और उन्होंने भी एन जी ओ बनाकर अपने काम को अंजाम दिया. पर उसमे एक अपनापन था. सही मायनों में कॉमरेड थे. मेरे तो व्यक्तिगत मित्र थे. छोटा बेटा रोड अक्सीडेट मे जानेके बाद तुरंत आनेवाले लोगोमेसे एक थे. मुझे हार्ट अटेक हुआ तुरंत अस्पताल में पहुँच गए थे. सार्वजनिक जीवन में एक कार्यकर्ता के लिए यह संभल का काम करता है. जो अब नहीं रहा. एकदम बुरोक्रसी जैसा व्यवहार होते जा रहा है. और परिवर्तनके संगठन में यह स्तिथि ने भी काफी नुकसान किया है. और हमारे सेक्युलर आंदोलन मद्दीम पड़नमे यह भी एक कारण है. कि कार्यकर्ता जब नौकर और एन जी ओ चलाने वाले मालिक सरकार भारत के ज्यादातर एन जी ओ की यही कहानी है. खैर अब तो इस सरकार ने अधेसेभी ज्यादा एन जी ओ को रद्द कर दिया है. और सिर्फ संघ परिवार के एन जी ओ को प्रश्रय दे रहे हैं. यह चिंताकी बात है. लेकिन इस बहाने एन जी ओ ने अन्तर्मुख होकर सोचकर अपने आप को सुधारनेकी जरुरत है. उनमेसे कुछ लोग फ्रॉड भी थे. और हिसाब किताब में काफी गडबडीया थी. उम्मिद करता हूँ की वे अपने आप को सुधारने की कोशिश करेंगे. 50 साल के सार्वजनिक जीवन में असगर अली जैसे बिरले एन जी ओ देखनेमे आये.


असगर अली शियाओं के इस्माइली दाऊदी बोहरा समाजमे पैदा हुए थे. उनके भी अब्बा उनकों धर्म का काम करने के लिए तैयार करना चाहते थे. लेकिन वो इंदौर में इंन्जीनियर की पढ़ायी के लिए गये. तो उनके रूम पार्टनर मार्क्सवाद के अभ्यासक थे. तो उन्होंने मुझे बताया था कि वह किताबें मैने एक छुट्टियाँ में घर ना जाते हुए अपने होस्टल में रहते हुए सब पढ़ ली. इंन्जीनियर की पढाई पूरी की तो मुम्बई कोर्पोरेशन में 20 साल नौकरी की. और उसीके साथ वे टाईम्स ऑफ इंडिया और विभिन्न अखब़ारों में लिखा करते थे. जो मैं बराबर पढा करता था. 1992 के पहले ही से मैं उनके लेखनसे उनके नाम से परिचित था. और सबसे बड़ी बात हमिद दलवाईके (दलवाई सुन्नी मुस्लमान थे)जैसे वो भी दाऊदी बोहरा समाजके सुधारक के रूप में जान जोखिम में डालकर काम किये है. सैयदना साहब जो दाऊदी बोहरा समाजके सर्वोच्च हैं. जो धर्म गुरू भी है. उनकों जन्म,शादी,मृत्त्यु के समय भी पैसे देने पड़ते हैं. और अपनी कमाई का तीन या चार पर्सेंट हर बोहरा सदस्य को देना पड़ता है. सैयदना साहब की दौलत का क्या कहने. विदोशोसे लेकर देश भरके महत्वपुर्ण शहरों मे राज महल जैसे मकान और अन्य एशोआराम की चीजे और बेसुमार दौलत के मालिक हैं . आजादिके बाद भारत के संविधान के रहते हुए यह खाप पंचायतों के तर्ज पर कितने सालोसे चला आ रहा है ? जिसको असगर अली साहब ने सवाल उठाया तो उन्हे पहले,समझाया फिर नहीं माने तो डराया,धमकाया,हमले करवाये और आखिरी बात उनको समाजिक बहिष्कार मरते दम तक सहन करना पड़ा था.

उनकी पत्नी के निधन के बाद उनके दफन को लेकर और 10 साल पहले उनके खुदके दफन पर काफी हंगामा हुआ, आखिर सुन्नी दफन भूमि पर उन्हे दफन करना पड़ा. अपने जीते जी तो कई बार कठमुल्लों ने उनपर जान लेवा हमले किए . एक बार तो भोपाल से मुंम्बई के विमानको इंन्दौर एयरपोर्ट पर काफी समय रुकना पड़ा. और एक हार्ट पेशंन्टको जितनी जल्दी हो सके मुम्बई पहुचने की जरूरत थी. लेकिन विमान रुका है. और कुछ कारण पता नहीं चल रहा था. तो एक सज्जन अपने सिक्क्यूरिटी के साथ इन्दौर से चढ़े. तो बाकी पेसंजर गुस्सा होकर विमान कंपनी वालो को अपनी आपत्ति जताने लगे जिसमे एक नाम असगर अली का भी था.
बाकी किसीको कुछ नहीं कहा. लेकिन उस खास मेहमान के रक्षा गार्डोने असगर अली जी को उसी चलती हुई फ्लाईटमे लातो,मुक्कोसे मारना शुरू कर दिया. और मुम्बई एयरपोर्ट पर उतरनेके तुरंत बाद उनके साथ फुटबाल के गेंद जैसा लाथोसे मारते हुए बाहर लाये वे सैयदना के अंगरक्षक थे. और यह सब सैयदना साहब के सामने हो रहा था. अब मामला वही खत्म नहीं हुआ. उसी दिन शाम को उनके शांतक्रुज के मकान में घुसकर उनके टी वी,कॉम्पुटर और उनकी देश दुनिया भर से इकठ्ठा की हुई किताबे, जिसमे 37 विभिन्न देशों की कुरान की बहुत रेयर कॉपिया तक तहस-नहस कर दिया. लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है. दुसरे दिन मंत्रालय में असगर अलिके ऊपर हूआ हम्लेको लेकर एक डेलिगेशन जा रहा था. तो उनके पहले ही राज पुरोहित नामके बिजेपिके विधायक के नेतृत्व में सैयदना के लोग मंत्रि महोदय से मिलकर वापस आ रहे थे. और आज तक उस हमले को लेकर कुछ भी नहीं हूआ जिना-सावरकर की दोस्ती याद आ रही है.

हिंन्दु-मुस्लमान कठमुल्लापन किस तरह एक साथ मिलकर काम करता है ?यह उसकी मिसाल हैं. सैयदना साहब को बाल ठाकरे और वर्तमान प्रधान-मंत्री भी खुद मिलने वाले लोग हैं. प्रधान-मंत्री महोदय इंदौर के अंदर एक बहुत बड़ा दाऊदी जमात के कार्यक्रममे अपनी हाजिरि तो लगाई, लेकीन पब्लिकली इस्लामकि टोपियाँ नकारनेमे माहिर प्रधान-मंत्री ने इंदोर के कर्यक्रममे बोहरा टोपी पहनी है. और वक्फ बिल को सपोर्ट करने के लिए, कुछ शिया समुदाय के लोगों को प्रधानमंत्री श्री. नरेंद्र मोदी जी को मिलने का फोटो अखबारो मे देखा हूँ . और कश्मीर के डल लेक का कुछ हिस्सों का पानी कम होने के कारण उस जमीन पर शियाओं को विशेष रूप से केंद्र सरकारने सुविधा देकर होमस्टे का व्यवसाय करने के हेतू से बसाया जा रहा है. असगर अली साहब की जिंदगीके आखिरी समय का पुरा हिस्सा संप्रदायीक कठमुल्लापन के खिलाफ गया है. और इसमे बहिष्कार जैसी घ्रणित बात से लेकर जानलेवा हमले के बाद भी वो अपने काममे आखिरी सांस तक लगे रहे. और उन्होने शुरु किया हुआ ऑल इंडिया सेकुलर फोरम जो उनके जाने के बाद लगभग ठप्प चल रहा है. मेरी उनके प्रति 25 सालके सांम्प्रदायीकता के खिलाफ की लड़ाई में जो भी कॉम्रेडशिप रही है, तो मुझे लगता है कि उनके पुण्य तिथि या जयंती पर उन्हे सहि श्रध्दांजलि उन्होने जलाई हूई ज्योति को बचाने के लिए और उसकी लौ और बडी करना ही सही आदरांजली होगी.

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