रविंद्रनाथ टागौर ने खुद यह नाम रखा क्योंकि इस बालक का जन्म शांतिनिकेतन में अपने नाना क्षितिमोहन के घर में 3 नवंबर 1933 को हुआ . आज वह 92 साल के हो रहे हैं. और उनके जन्म से लेकर अब तक की यात्रा का जायजा लिया जाऐ तो, मां अमिता बंगाल की पहली भद्र बंगाली घर की लड़की जिसने स्टेजपर आधुनिक नृत्य करने की शुरुआत की है ! और आत्मरक्षार्थ जुडो – कराटे की विधिवत शिक्षा जपानी शिक्षकों के द्वारा प्राप्त की, यह सब कुछ आजसे सौ वर्ष पहले की बात है. अमिता के नृत्य से प्रभावित होकर रविंद्रनाथ टागौर ने अपने द्वारा लिखित गानों को, अमिता के नृत्यों के साथ स्टेजपर करने की शुरुआत की है. जो आजकल सभी भद्र बंगाली माँ- बाप अपनी लडकियों को रविंद्रनाथ टागौर के गितो को गाने से लेकर उनके उपर आधारित नृत्यों की विशेष शिक्षा देने की कोशिश करते हैं. अब तो भद्र बंगाली परिवार में शादी ब्याह में भी बंगाली लड़की को नृत्य या गाना आता है या नहीं, यह उसे वधू के रूप में स्वीकार करने के लिए अतिरिक्त गुण भी माना जाता है. सौ वर्ष में बंगाल के नवजागरण के परिणामस्वरूप यह परिवर्तन हुआ है. और इस परिवर्तन में अमर्त्य सेन की मां अमिता का महत्वपूर्ण योगदान है. लेकिन तत्कालीन मिडिया में तारीफ कम और आलोचना ज्यादा होती थी. क्योंकि अमिता के पहले भद्र बंगाली घर की लड़की ने स्टेजपर अभिनय या नृत्य नहीं किया था . उसके लिए विशेष रूप से नटी विनोदिनी जैसे खास कलावंतीण परिवार की लडकियां होती थी. जैसे महाराष्ट्र – कर्नाटक गोवा में देवदासिया होती थी.

इस मां की कोख से पैदा हुआ लडका जिसका नाम खुद रविंद्रनाथ ने अमर्त्य रखा. और कभी-कभी रविंद्रनाथ खुद बगैर कोई सुचना दिए अमर्त्य के नाना क्षितिमोहन के घर रोज सुबह आकर देखते थे, कि क्षितिमोहन अभितक सोये हुए हैं. तो तुरंत अपने शिघ्र कवि की प्रतिभा के अनुसार रवि मतलब सूर्य आया है. और क्षिति मतलब पृथ्वी अभितक जागी है ? यह रविंद्रनाथ अपने मधुर स्वर में गाते थे. यह सब अमर्त्य ने अपने छुटपन के दिनों में खुद शांतिनिकेतन मे रहते हूऐ देखा है. फिर रविंद्रनाथ और क्षितिमोहन सुबह की सैर के लिए निकल पड़ते थे. जन्म के आठ साल तक (1941 के 7 अगस्त को रविंद्रनाथकी मृत्यु हो गई है.) की सोहबत और पाठाभवन में स्थापना के समय से ही विश्व स्तर के अतिथियों का आना – जाना जिसमें माओ त्से तुंग के पहले चीन के सर्वेसर्वा जनरल चांग काई शेक ने पाठाभवन में आकर भाषण दिया है. जो अमर्त्य सेन ने अपने आत्मकथा में लिखा है. वैसे ही महात्मा गाँधी रविंद्रनाथ टागौर की 1941 में मृत्यु के चार साल बाद 1945 में आएं थे, और रविंद्रनाथ टागौर की मृत्यु के बाद शांतिनिकेतन का क्या होगा ? इसकी चिंता अपने भाषण में कर रहे थे, और उस दिन मैंने उनका ऑटोग्राफ लिया है . लेकिन उन्होंने उसके पहले हरिजन फंड के लिए पांच रुपए का चंदा मांगा. और मैंने अपने पॉकेट मनी से कुछ पैसे बचाएं थे, उसमे से मैंने दुनिया के महान शख्सियत को पांच रुपए दिए. लेकिन उनके जैसे महान विभुतीयो के लिए यह चंदा कोई बडी बात नहीं है. लेकिन मुझे याद है, गाँधी जी ने बहुत ही सुंदर हंसी के साथ मुझे कहा कि “यह चंदा मैंने हमारे देश की जातीव्यवस्था को खत्म करने के लिए लिया है. ” और उन्होंने देवनागरी लिपि में अपना मो. क. गाँधी, हस्ताक्षर मेरे नोटबुक में दिया है. जिसेको मैंने अभी तक सम्हालकर रखा है.
उसी तरह पाठाभवन की पढाई में मुझे बहुत ही अच्छे दोस्तों का लाभ हुआ है. जिसमें चीना भवन के संस्थापक प्रोफेसर तान यून शान के बेटे तान ली जो मुझसे एक साल छोटे थे. और जिंदगी भर मेरे दोस्त रहे हैं. और अभी हाल ही में 2017 में उसका देहांत हुआ है.
और पाठा भवन में शुरुआती शिक्षा के समय कुछ लड़कियों से भी दोस्ती थी. जैसे लडको में साधन, शिब, चित्ता, चालुता, भेलतु, और मृणाल जो मेरी सब से करीबी मित्र थे. और लड़कियों में मंजुला, जया, बिथि, तपति, शांता, मेरे शांतिनिकेतन के मित्रों के बारे में मेरी राय है कि हर एक के उपर एक चरित्र कथा लिखि जा सकती है. दोस्ती करना अमर्त्य सेन की सब से प्रिय आदतों में से एक दिखाई देती है. अपने रिश्तेदारों में भी उन्होंने कई नाम लिया है. वैसे ही ट्रिनिटी कॉलेज में विद्यार्थियों से लेकर शिक्षकों के साथ जो अंतर्तम संबंध बनाए थे, वह उसका लक्षण है. उन्होंने अपनी आत्मकथा को HOME-IN-THE-WORLD-A-MEMOIR नाम देने का मतलब ही, उनका स्नेहमय रुप है.
अमर्त्य सेन भले अर्थशास्त्री के रूप में विश्वविख्यात हुए हैं. लेकिन मानवीय संबंधों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता विलक्षण है. भारत के विभाजन के बाद उनके विदेशी भूमि पर बने हुए पाकिस्तानी मित्रों को मिलने के लिए जिसमें महिलाओं का भी शुमार है. और लाहौर, कराची तथा अन्य शहरों में सिर्फ मित्रो को मिलने के लिए अचानक चले जाना, और उन मित्रो के परिवार में शामिल होने के लिए आपको वैश्विक स्तर की संवेदनशीलता चाहिए. पढ़ाई के दौरान केंब्रिज के मित्रों में अंग्रेज भी थे. और उसमे भी महीलाओ का समावेश है. यह सब आजसे पचहत्तर साल पहले की दास्तानगोई है.
अमर्त्य सेन कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज 1952 में 19 साल के उम्र में (अब विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है ) में दाखिल होता है. उसके सामने ही ऐतिहासिक कॉफी हाउस में अपनी पढ़ाई के साथ – साथ तत्कालीन देश – दुनिया की स्थिति को लेकर अड्डा मे देश – दुनिया के सवालों को लेकर जिसमे द्वितीय विश्व युद्ध को लेकर , तथा भारत के आजादी के आंदोलन तक और ऐतिहासिक बंगाल के अकाल को लेकर घनघोर चर्चा करते थे . (1942-43) जिसमें सिर्फ अन्न के अभाव में लाखो लोगों की मौत हो गई है. वैसे देखा जाए तो अन्न की कमी नहीं थी. लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिकों के लिए भारत से जहाजों में भर – भरकर अनाज भेजा जा रहा था. इसलिए बंगाल में मनुष्य निर्मित अकाल की स्थिति बन गई थी. यह शतप्रतिशत तत्कालीन अंग्रेजी सरकार की भारत के लोगों के मुह के निवाले छिनकर जोर-जबरदस्ती से अन्न इकट्ठे करने के बाद विदेश में युद्ध भूमि पर भेजा जाता था. और यहां कलकत्ता, ढाका के सड़कों पर हजारों लोग अन्न मिलेगा इस आशा से गांव – देहांत से आकर रस्तोपर अन्न के अभाव में मरने के दृष्य आम बात थीं . अपने बचपन में ही इस भयंकर अकाल की स्तिथि का बालक अमर्त्य के मनपर गहरा असर होने के वजह से ही उनका अर्थशास्त्र का विश्लेषण मे मानवीयता का सबसे अधिक समावेश दिखाई देता है. अन्यथा बहुत सारे अर्थशास्त्री पुंजीवादीयोकी तरफदारी मे अपनी बुद्धि को बेचने का काम करते हैं. लेकिन अमर्त्य सेन ने अपने नोबेल पुरस्कार से मिला आर्थिक लाभ का उपयोग खुद के लिए न लेते हूऐ उन्होंने पश्चिम बंगाल और बंगला देश के प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के लिए प्रतिचि ट्रस्ट के नाम से पिछले 25 सालों से लगातार काम किया जा रहा है.
इस तरह के अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर लिखने – बोलने वाले अमर्त्य सेन की वर्तमान सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ लिखने – बोलने की बात ‘मनकि बात’ करने वाले लोगों को नागवार लगने की वजह से उन्हें अपमानित करने के लिए नये- नये हथकंडे अपनाएं जा रहे हैं. जिससे पता चलता है कि हमारे देश में अघोषित आपातकाल और सेंसरशिप का दौर पिछले 11 सालों से बदस्तूर जारी है. डायलॉग करना जनतंत्र का प्राथमिक कार्य है. और वर्तमान समय में मोनोलॉग मतलब ‘मण की बात’ जैसे बेसिरपैर की बातो के चलते हुए ‘अरग्यूमेंटिव इंडिया’ जैसे तर्क करने की कोशिश करने वाले अमर्त्य सेन को वर्तमान केंद्र सरकारने सबसे पहले, सत्ता मे आतेही उन्हे नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के पद से हटाने का काम किया. और वह कम लगा तो, शांतिनिकेतन की पश्चिम दिशा में अमर्त्य सेन के पिता जी ने एक जमिन का टुकड़ा खरीदकर ,श्रीपल्ली नामके जगह पर 1942 में ‘प्रतिचि’नाम के घर का निर्माण किया है. खुद के लिए घर बनाने के लिए जो जमीन ख़रीदकर उसपर जो घर बनाया था. उसी घर से उन्हें बाहर निकालने के लिए तत्कालीन कुलपति प्रो. विद्युत चक्रवर्ती ने 90 साल उम्र के आंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर अर्थशास्त्री को, मकान से निकाल बाहर करने की अत्यंत अपमानजनक कृति, पिछले कुछ दिनों से विश्वभारती के तत्कालीन कुलपति विद्युत चक्रवर्ती किसके इशरो से कर रहे थे ? जिसे कुछ दिनों पहले शिउडी के कोर्ट ने खारिज कर दिया है.
और उसी कड़ी में अमर्त्य सेन जैसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ बुध्दिजीवियों के हिस्से में वसुधैव कुटुंबकम के नारे हवाई अड्डो से लेकर रेल्वे स्टेशन पर लगाने वाले लोगों को उन्हें अपने घर से बाहर निकालने की कृती को क्या कहेंगे ? पाखंड ? आपातकाल की घोषणा के 25-26 जून के दिन नरेंद्र मोदीजी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कैसे हरण हुआ था और भारत के जनतंत्र की हत्या जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए आपातकाल के बारे में बोलते रहते हैं . लेकिन खुद 2014 में सत्तारूढ़ होने के बाद भारत में बगैर कोई आपातकाल तथा सेंसरशिप की घोषणा किए आज 11 सालों में उससे भी बदतर स्थिति से देश गुजर रहा है. तथाकथित मुख्य धारा के मिडिया संस्थाओं को सरकार ने सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया है. और उसके बावजूद अगर किसी ने कोई कोशिश की तो आज शेकडो पत्रकार जेल मे बंद कर दिए गए हैं. कोई विदेश में रहते हुए लिखते हैं, तो उन्हें भारत में आने की मनाही की जा रही है. अतिश तासीर भारत में जन्मे एक मशहूर महिला पत्रकार तवलिन सिंह के बेटे को वर्तमान भारत की परिस्थिति पर टाइम पत्रिका में प्रकाशित लेख के वजह से उसे भारत में आने – जाने की मनाही कर दी है. न्यूजक्लिक के सभी पत्रकारों को चायना कनेक्शन के नाम पर जेल में बंद कर दिया है. और उसी चायना सरकार के पिपल्स डेली में वर्तमान प्रधानमंत्री के तारिफ वाले लेख का भारत में तथाकथित मुख्य धारा के मिडिया ने हाथों हाथ उठा कर खुब प्रचार- प्रसार करने का प्रयास किया है. और चायनीज सत्ताधारियों के नरेंद्र मोदी जी के मेलमिलाप को लेकर चल रहे चायना कनेक्शन को क्या कहेंगे ? कितना विरोधाभास चल रहा है ?

वैसे ही हमारे देश के सर्वोच्च सभागार लोकसभा के विरोधी दलों के सदस्यों को सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने की वजह से सौ से अधिक संसद सदस्यों को संसद से बर्खास्त कर दिया जाता है . और कुछ सदस्यों की सदस्यता तक छीन ली गई थी. हालांकि जिन मतदाताओं ने उन सदस्यों को चुन कर भेजा है, यह उनका अपमान करने की कृति मानीं जानी चाहिए. लेकिन वर्तमान सरकार इतनी उन्मत्त हो गई है, उसे इस तरह की किसी भी बात की परवाह नहीं है. उसने सभी संविधानिक संस्थाओ को अपने दल की ईकाई जैसे इस्तेमाल करते हुए उनके द्वारा भारत के सभी विरोधी दलों की सरकारों को अस्थिर करने के लिए खुले आम इस्तेमाल करना शुरू किया है. और सबसे महत्वपूर्ण बात जिसको लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने खुद भारतीय गणराज्य की चुनाव प्रणाली को विश्व की सबसे बड़ी चुनाव प्रणाली बोलते हूऐ दावा किया कि यह हमारे देश की सबसे गौरव की बात है आज उस चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया से लेकर उसे अपने दल के अनुकूल चुनाव करने से लेकर अब मतदाताओंका चयन अपने सुविधानुसार करने के लिए कामपर लगाने के लिए तथाकथित एस आई आर के आड मे मतदाताओंका चयन करना देखकर मुझे जॉर्ज आवरेल के एनिमल फार्म शिर्षक के उपन्यास की याद आ रही है. बिहार,पश्चिम बंगाल, तेलंगणा, पंजाब, झारखंड, कर्नाटक, तामिळनाडू, केरल मतलब जो दल भाजपा के विरोध में है उन सभी के पिछे ईडी, सीबीआई के द्वारा दबाव बनाने के बाद अब खुलकर मतदाताओंका चयन किया जा रहा है . और हमारे देश की न्यायिक प्रणाली मे न्यायाधीशों के चयन से लेकर फैसला देने के उपर भी जबरदस्त दबाव बनाने के दर्जन भर उदाहरण मौजूद हैं. क्यों न इसे अघोषित आपातकाल कहा जाए ?
यह बात भाजपा 2011 मे सत्ताधारी पार्टी बनने के बाद सालभर के भितर ही भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 2015 के 25 जून के समय इस सरकार को सिर्फ एक साल होने के बावजूद आपातकाल की घोषणा के चालिस साल के उपलक्ष्य में एनडीटीवी के तरफ से ‘वॉक वुईथ टॉक’ शिर्षक से एक कार्यक्रम में तत्कालीन इंडियन एक्सप्रेस के संपादक श्री. शेखर गुप्ता को दिऐ साक्षात्कार में कहा कि “आप चालिस साल के आपातकाल की घोषणा के बारे में मुझे पुछ रहे हो ? लेकिन पिछले एक साल से हमारे देश में बगैर किसी आपातकाल की घोषणा किए जो स्थिति बन गई है उसका क्या ?” और अमर्त्य सेन जैसे आंतरराष्ट्रीय स्तर के चिंतक भी इन्हीं बातों पर बोल लिख रहे हैं यह जज्बा बना रहने के लिए मै विशेष रूप से आज उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मै प्रार्थना करता हूँ कि “उन्हें अपने स्वास्थ्य को अच्छी तरह रखते हुए, जीवन के शतक पार करते हुए देखना चाहता हूँ .”












